जाड़े के फूलों को देखकर … By kmsraj51

जाड़े के फूलों को देखकर by kmsraj51

 

वे सुन्दर घने फूल हंस पड़े

मुझे पास आते देखकर

इतने पास की चारों और वे रंगों से भरे हुए

हल्की हवा से हिलते-डोलते

जैसे बिना किसी आधार के हों

बस मेरे पास आना चाह रहे हों

वे इसी तरह से, मैं भी इसी तरह से

फर्क इतना कि वे रहेंगे मौजूद वहीं पर

मैं वापस लौट जाऊंगा

वो भी इतने सारे फूलों को छोडक़र

इनकी इतनी घनी कतार

इन्हें गिन भी नहीं सकता मैं

सभी एक ही दृष्टि से मेरी और मुख किये हुए

और उनके प्यार से द्रवित होता जा रहा हूं।

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छूट गया था वो रास्ता … By kmsraj51

छूट गया था वो रास्ता

By ~ kmsraj51

 

छूट गया था वो रास्ता हमारी गलती से

और दूसरे रास्तों से भी गुजर कर

कुछ हासिल नहीं कर पाये हम

दौड़ते रहे हम यहां से वहां तक

जैसे यह ही सही हो सकती थी

हमारे लिए जगह,

बेहद उतावलापन था

कि दौड़े और छू लेंगे वह छोटी सी दूरी

लेकिन सभी जगहों पर

सभी चीजों  का हल नहीं था

कहीं आंख बंद तो कहीं कान बहरे

और अंत में हम पसर गए

परेशानी भरी उधेड़बुन में

उस समय लगा वह पहली भूमि ही सबसे सही थी

वहां सब कुछ था

बस हाथ आने के लिए थोड़ा सा धैर्य चाहिए था

थोड़ा सा और विश्वास रखते

मिल गयी होती हमें सही जगह पहले ही।

हरा रंग ….. By kmsraj51

हरा रंग

By ~ kmsraj51

 

पक्षियों को हरा रंग लगता है सबसे अधिक प्यारा

और मुझे भी सब कुछ सूना-सूना

बिना पेड़ों के।

पत्ते झड़ जाएँ तो रात जैसा लगता है

जैसे आंखों से हरा रंग ही फीका होने लगा

और सोचता हूं मैं नित्

अगर हरियाली को न देखूं

भूल ही जाऊं वे सारे सौन्दर्य स्थल पूर्व के।

मिलता है हमें जो रंग परिचित हर दिन

जुड़ा हुआ हमारे पुराने रंगों से

यादें मजबूत कर देता है हमारी पुरानी

और बचे  रह जाते हैं

हमारे सपने सारे इसी तरह से।

प्रकाश – Light ……. By kmsraj51

प्रकाश – Light ……. By kmsraj51

 

हर अंधेरे की भूख

कि उसे केवल प्रकाश चाहिए।

अपने अंतिम क्षणों तक भी

आंखें मूंदना नहीं चाहता कोई

प्रकाश हमें थोड़ा सा मिला

यही हमारा दुख है।

मेरी सारी गतिविधियों में शामिल है प्रकाश

यह मेरे साथ उठता और बैठता हुआ।

चाहे कितना भी अंधेरा न हो जाएं

गुम हो जाएं सारी बत्तियां

एक अंधकार चारों ओर जैसे पानी के नीचे हम दबे हुए

फिर भी हम तड़पेंगे आंखें  खोलने के लिए

मैं इसी तड़प को देखता हूं दिन-रात

कुछ है जो मेरे भीतर

जो अपना मार्ग ढूंढ़ता है

और ये शब्द उसी के माध्यम से

अपनी आंखें खोलते हैं कागज पर।

जमीन ………. By kmsraj51

जमीन

 

सिर्फ तीन कठ्ठा जमीन पाने का मकसद था मेरा

और मैंने दांत गड़ाये रखे थे अपनी जिद पर

कि किसी तरह से भी हासिल करके रहूंगा मैं इसे

हौसले बुलंद होते थे मेरे हर दिन

और चेहरे पर तनाव आ जाता था घर लौटते-लौटते

और तनाव उस दिन चरम पर था

जब यह भूमि मेरे पास थी

इस पर कहीं घास तो कहीं भूरि मिट्टी

मैं इसके  बीचों-बीच खड़ा

जैसे सारी जमीन की धूरि मैं ही हूं

इस बीच, कितनी ही बार आवाज निकली होगी

मेरे भीतर से,

कि मैं इस जमीन का मालिक  बन गया हूं

मेरी मालिकियत जैसे इसके कण-कण पर राज करती है

और मैं अपने अधिकार को अपने कब्जे में रखकर

गर्व से चलता हुआ

कितनी रौनक से भरा हुआ महसूस करता हूं।

सृजन रुकता नही …. By kmsraj51

सृजन रुकता नही 

 

काफी तेज बारिश हुई है

लगा एक मुश्किल समय सामने है

फूलों की मुश्किल कि उन्हें धोने की जरूरत नहीं थी

और बेवजह उनके धुले चेहरे मुर्झाने लगे

इतना अधिक पानी कि पत्ते जरूर चमकने लगे।

सभी तरफ से घिरे बादल भी

रोशनी को नहीं रोक सकते

मैदान जल से भरे हुए

अब लोग क्या काम करें

वे चुपचाप थके हुए से

धूप का करते हुए इंतजार

गुलाब के कांटे बिल्कुल धारदार

पत्तों की नोक तक दिखती है

पक्षियों के बिना सूना आकाश

फिर भी सृजन रुकता नहीं

घास में हरियाली पहले से अधिक असरदार।

आधुनिकता ….. By kmsraj51

ये कितने ही अनजाने चेहरे

जिन्हें हम देखते हैं रोज

कितनी ही बार उनके पास से गुजरते हैं

कभी साथ भी बैठ जाते हैं

सफर में

लेकिन हममें दूरियां हैं

नीचे से ऊपर तक की

दूरियां सपने और वास्तविकता जितनी ।

सभी का मिलन संक्षिप्त होता है

टुकड़ों-टुकड़ों में बनते-बिखरते संबंध

और सांसों का प्रयास

कि जल्दी ही हम अपने काम पर पहुंचें।

किसी ने गिरे हुए आदमी की मदद की

यह उपकार थोड़ी देर में खत्म हुआ

और भूल गए लोग सारी गाथा।

एक कहानी से कुछ सबक लिया गया

फिर वो किताब खुली ही नहीं वर्षों तक।

दिन के  उजाले कितने ही प्रकाशित कर दें

कितनी ही सारी चीजों को

आधुनिकता हमें बहुत कम देर ही

ठहरने देगी उस छोर तक।

प्यार से देखता हूं एक पल इस तोते को

मुस्कान से वो चोंच खोल देता है

मेरी खुशी को वो देखे

उससे पहले ही मैं उससे दूर चला जाता हूं।