महान शिक्षाविद डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन – जीवन परिचय।

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ϒ महान शिक्षाविद डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन – जीवन परिचय। ϒ

सर्व प्रथम आदिगुरु को नमन…..

5 सितम्बर पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म दिन और ये दिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।

महान शिक्षाविद, महान दार्शनिक, महान वक्ता, हिन्दू विचारक एवं भारतीय संस्कृति के ज्ञानी डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। भारत को शिक्षा के क्षेत्र में नई ऊँचाइयों पर ले जाने वाले महान शिक्षक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन प्रतिवर्ष 5 सितंबर को शिक्षकों के सम्मान के रूप में सम्पूर्ण भारत में मनाया जाता है।

डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन बचपन से किताबें पढने के शौकीन राधाकृष्णन का जन्म तमिलनाडु के तिरुतनी गॉव में 5 सितंबर 1888 को हुआ था। साधारण परिवार में जन्में राधाकृष्णन का बचपन तिरूतनी एवं तिरूपति जैसे धार्मिक स्थलों पर बीता । वह शुरू से ही पढाई-लिखाई में काफी रूचि रखते थे, उनकी प्राम्भिक शिक्षा क्रिश्चियन मिशनरी संस्था लुथर्न मिशन स्कूल में हुई और आगे की पढाई मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में पूरी हुई। स्कूल के दिनों में ही डॉक्टर राधाकृष्णन ने बाइबिल के महत्त्वपूर्ण अंश कंठस्थ कर लिए थे , जिसके लिए उन्हें विशिष्ट योग्यता का सम्मान दिया गया था। कम उम्र में ही आपने स्वामी विवेकानंद और वीर सावरकर को पढा तथा उनके विचारों को आत्मसात भी किया। आपने 1902 में मैट्रिक स्तर की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और छात्रवृत्ति भी प्राप्त की । क्रिश्चियन कॉलेज, मद्रास ने भी उनकी विशेष योग्यता के कारण छात्रवृत्ति प्रदान की। डॉ राधाकृष्णन ने 1916 में दर्शन शास्त्र में एम.ए. किया और मद्रास रेजीडेंसी कॉलेज में इसी विषय के सहायक प्राध्यापक का पद संभाला।

डॉ. राधाकृष्णन के नाम में पहले सर्वपल्ली का सम्बोधन उन्हे विरासत में मिला था। राधाकृष्णन के पूर्वज ‘सर्वपल्ली’ नामक गॉव में रहते थे और 18वीं शताब्दी के मध्य में वे तिरूतनी गॉव में बस गये। लेकिन उनके पूर्वज चाहते थे कि, उनके नाम के साथ उनके जन्मस्थल के गॉव का बोध भी सदैव रहना चाहिए। इसी कारण सभी परिजन अपने नाम के पूर्व ‘सर्वपल्ली’ धारण करने लगे थे।

डॉक्टर राधाकृष्णन पूरी दुनिया को ही एक विद्यालय के रूप में देखते थे । उनका विचार था कि शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सही उपयोग किया जा सकता है। अत: विश्व को एक ही इकाई मानकर शिक्षा का प्रबंधन करना चाहिए।

अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से भारतीय दर्शन शास्त्र कों विश्व के समक्ष रखने में डॉ. राधाकृष्णन का महत्त्वपूर्ण योगदान है। सारे विश्व में उनके लेखों की प्रशंसा की गई। किसी भी बात को सरल और विनोदपूर्ण तरीके से कहने में उन्हें महारथ हांसिल था , यही कारण है की फिलोसोफी जैसे कठिन विषय को भी वो रोचक बना देते थे। वह नैतिकता व आध्यात्म पर विशेष जोर देते थे; उनका कहना था कि, “आध्यात्मक जीवन भारत की प्रतिभा है।“

1915 में डॉ.राधाकृष्णन की मुलाकात महात्मा गाँधी जी से हुई। उनके विचारों से प्रभावित होकर राधाकृष्णन ने राष्ट्रीय आन्दोलन के समर्थन में अनेक लेख लिखे। 1918 में मैसूर में वे रवीन्द्रनाथ टैगोर से मिले । टैगोर ने उन्हें बहुत प्रभावित किया , यही कारण था कि उनके विचारों की अभिव्यक्ति हेतु डॉक्टर राधाकृष्णन ने 1918 में ‘रवीन्द्रनाथ टैगोर का दर्शन’ शीर्षक से एक पुस्तक प्रकाशित की। वे किताबों को बहुत अधिक महत्त्व देते थे, उनका मानना था कि, “पुस्तकें वो साधन हैं जिनके माध्यम से हम विभिन्न संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण कर सकते हैं।“ उनकी लिखी किताब ‘द रीन आफ रिलीजन इन कंटेंपॅररी फिलॉस्फी’ से उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली ।

गुरु और शिष्य की अनूठी परंपरा के प्रवर्तक डॉ.राधाकृष्णन अपने विद्यार्थियों का स्वागत हाँथ मिलाकर करते थे। मैसूर से कोलकता आते वक्त मैसूर स्टेशन डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जय-जयकार से गूँज उठा था। ये वो पल था जहाँ हर किसी की आँखे उनकी विदाई पर नम थीं। उनके व्यक्तित्व का प्रभाव केवल छात्राओं पर ही नही वरन देश-विदेश के अनेक प्रबुद्ध लोगों पर भी पङा। रूसी नेता स्टालिन के ह्रदय में फिलॉफ्सर राजदूत डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के प्रति बहुत सम्मान था। राष्ट्रपति के पद पर रहते हुए डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन अनेक देशों की यात्रा किये। हर जगह उनका स्वागत अत्यधिक सम्मान एवं आदर से किया गया। अमेरिका के व्हाईट हाउस में अतिथी के रूप में हेलिकॉप्टर से पहुँचने वाले वे विश्व के पहले व्यक्ति थे।

डॉ. राधाकृष्णन ने कई विश्वविद्यालयों को शिक्षा का केंद्र बनाने में अपना योगदान दिया। वे देश की तीन प्रमुख यूनिवर्सिटीज में कार्यरत रहे :

  • 1931 -1936 :वाइस चांसलर , आंध्र प्रदेश विश्वविद्यालय
  • 1939 -1948 : चांसलर , बनारस के हिन्दू विश्वविद्यालय
  • 1953 – 1962 :चांसलर ,दिल्ली विश्वविद्यालय

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की प्रतिभा का ही असर था कि, उन्हें स्वतंत्रता के बाद संविधान निर्मात्री सभा का सदस्य बनाया गया। 1952 में जवाहरलाल नेहरू के आग्रह पर राधाकृष्णन सोवियत संघ के विशिष्ट राजदूत बने और इसी साल वे उपराष्ट्रपति के पद के लिये निर्वाचित हुए।

1954 में उन्हें भारत के सबसे बड़े नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

1962 में राजेन्द्र प्रसाद का कार्यकाल समाप्त होने के बाद राधाकृष्णन ने राष्ट्रपति का पद संभाला। 13 मई, 1962 को 31 तोपों की सलामी के साथ ही डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की राष्ट्रपति के पद पर ताजपोशी हुई।

प्रसिद्द दार्शनिक बर्टेड रसेल ने डॉ राधाकृष्णन के राष्ट्रपति बनने पर कहा था – “यह विश्व के दर्शन शास्त्र का सम्मान है कि महान भारतीय गणराज्य ने डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन को राष्ट्रपति के रूप में चुना और एक दार्शनिक होने के नाते मैं विशेषत: खुश हूँ। प्लेटो ने कहा था कि दार्शनिकों को राजा होना चाहिए और महान भारतीय गणराज्य ने एक दार्शनिक को राष्ट्रपति बनाकर प्लेटो को सच्ची श्रृद्धांजलि अर्पित की है।“

बच्चों को भी इस महान शिक्षक से विशेष लगाव था , यही कारण था कि उनके राष्ट्रपति बनने के कुछ समय बाद विद्यार्थियों का एक दल उनके पास पहुंचा और उनसे आग्रह किया कि वे ५ सितम्बर उनके जन्मदिन को टीचर्स डे यानि शिक्षक दिवस के रूप में मनाना चाहते हैं। डॉक्टर राधाकृष्णन इस बात से अभिभूत हो गए और कहा, ‘मेरा जन्मदिन ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में मनाने के आपके निश्चय से मैं स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करूँगा।’  तभी से 5 सितंबर देश भर में शिक्षक दिवस या Teachers Day के रूप में मनाया जा रहा है।

डॉ. राधाकृष्णन 1962 से 1967 तक भारत के राष्ट्रपति रहे , और कार्यकाल पूरा होने के बाद मद्रास चले गए। वहाँ उन्होंने पूर्ण अवकाशकालीन जीवन व्यतीत किया। उनका पहनावा सरल और परम्परागत था , वे अक्सर सफ़ेद कपडे पहनते थे और दक्षिण भारतीय पगड़ी का प्रयोग करते थे। इस तरह उन्होंने भारतीय परिधानों को भी पूरी दुनिया में पहचान दिलाई। डॉ राधाकृष्णन की प्रतिभा का लोहा सिर्फ देश में नहीं विदेशों में भी माना जाता था। विभिन्न विषयों पर विदेशों में दिए गए उनके लेक्चर्स की हर जगह प्रशंशा होती थी ।

अपने जीवन काल और मरणोपरांत भी उन्हें बहुत से सम्मानो से नवाजा गया , आइये उनपे एक नज़र डालते हैं :

1931: नाइट बैचलर / सर की उपाधि , आजादी के बाद उन्होंने इसे लौटा दिया
1938: फेलो ऑफ़ दी ब्रिटिश एकेडमी .
1954: भारत रत्न
1954: जर्मन “आर्डर पौर ले मेरिट फॉर आर्ट्स एंड साइंस ”
1961: पीस प्राइज ऑफ़ थे जर्मन बुक ट्रेड .
1962: उनका जन्मदिन ५ सितम्बर शिक्षक दिवस में मानाने की शुरुआत
1963: ब्रिटिश आर्डर ऑफ़ मेरिट .
1968: साहित्य अकादमी फ़ेलोशिप , डॉ राधाकृष्णन इसे पाने वाले पहले व्यक्ति थे
1975: टेम्प्लेटों प्राइज ( मरणोपरांत )
1989: ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा उनके नाम से Scholarship की शुरुआत

“मौत कभी अंत या बाधा नहीं है बल्कि अधिक से अधिक नए कदमो की शुरुआत है।” ऐसे सकारात्मक विचारों को जीवन में अपनाने वाले असीम प्रतिभा का धनी सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन लम्बी बीमारी के बाद 17 अप्रैल, 1975 को प्रातःकाल इहलोक लोक छोङकर परलोक सिधार गये। देश के लिए यह अपूर्णीय क्षति थी। परंतु अपने समय के महान दार्शनिक तथा शिक्षाविद् के रूप में वे आज भी अमर हैं। शिक्षा को मानव व समाज का सबसे बड़ा आधार मानने वाले डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन का शैक्षिक जगत में अविस्मरणीय व अतुलनीय योगदान सदैव अविस्मरणीय रहेगा। उनके अमुल्य विचार के साथ अपनी कलम को यहीं विराम देते हैं। सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन का कहना है कि,

“जीवन का सबसे बड़ा उपहार एक उच्च जीवन का सपना है।”

धन्यवाद !

अनिता शर्मा

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

~KMSRAJ51

 

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विंडोज एक्सपी के बाद इस्तेमाल करें कुछ नया – By-kmsraj51

विंडोज एक्सपी के बाद इस्तेमाल करें कुछ नया

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अप्रैल 2014 में माइक्रोसॉफ्ट एक्सपी के लिए सपोर्ट बंद करने से विंडोज एक्सपी इस्तेमाल करने वाले लाखों यूजर्स को इस ऑपरेटिंग सिस्टम से अलविदा कहना पड़ सकता है। ऑपरेटिंग सिस्टम ‘उबन्टु’ ऐसे में विंडोज एक्सपी की जगह ले सकता है।

क्या है ‘उबन्टु’

कुछ वर्षों में लाइनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम ‘उबन्टु’ काफी लोकप्रिय हुआ है। एक्सपी के जाने के बाद यूजर्स लिए ‘उबन्टु’ एक अच्छा विकल्प हो सकता है। अगर आप एंड्रॉयड आधारित टैबलेट या स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं तो लाइनक्स से परिचित होंगे। गूगल की तरफ से पेश किया गया एंड्रॉयड, जो स्मार्टफोन यूजर्स में लोकप्रिय मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम है, लिनक्स पर ही आधारित है।

हालांकि यह मुफ्त होने के बावजूद लोकप्रियता में माइक्रोसॉफ्ट विंडोज और एप्पल मैक से पीछे है, लेकिन कामकाज में इस्तेमाल होने वाले ज्यादातर सॉफ्टवेयर (जैसे ऑडियो-वीडियो सॉफ्टवेयर, ऑफिस सॉफ्टवेयर, फोटो एडिटर, इंटरनेट ब्राउजिंग, पेजमेकिंग, आदि) भी मुफ्त उपलब्ध है। 

क्षमताओं और फीचर्स के मामले में विंडोज या मैक से कम भी नहीं हैं। इसमें वे सभी फीचर्स हैं, जिनकी जरूरत आम कंप्यूटर यूजर को पड़ती है। दूसरे ऑपरेटिंग सिस्टम के लिए आपको जेब ढीली करनी पड़ती है। लेकिन उबन्टु समेत लाइनक्स के ज्यादातर संस्करण मुफ्त में मौजूद हैं।

यहां है काफी कुछ

सॉफ्टवेयर डेवलपर, वीडियो एडिटर, एनिमेशन आर्टिस्ट या फिर गेम प्लेयर; उबन्टु में सबकी जरूरत के फीचर्स मौजूद हैं। विंडोज में बनाई गई कई फाइलें भी इसमें खुल जाती हैं। विंडोज इंस्टॉल करते समय कई सॉफ्टवेयर और सुविधाएं खुद-ब-खुद इंस्टॉल हो जाती हैं, जैसे वर्डपैड, नोटपैड, इंटरनेट एक्सप्लोरर, माइक्रोसॉफ्ट पेंट आदि।

उबन्टु के साथ भी कई सॉफ्टवेयर इंस्टॉल होते हैं। वे ठीक उसी तरह काम करते हैं, जैसे विंडोज आधारित सॉफ्टवेयर। इनमें लिबर-ऑफिस (एमएस ऑफिस जैसा ऑफिस पैकेज), मोजिला फायरफोक्स (ब्राउजर), थंडरबर्ड (ईमेल क्लाइंट), जिम्प (इमेज एडिटिंग सॉफ्टवेयर) आदि खास हैं।

कहां से करें डाउनलोड

सॉफ्टवेयर डाउनलोड करने के लिए इसमें एक एप-स्टोर भी है, जिसे ‘उबन्टु सॉफ्टवेयर सेंटर’ कहा जाता है। उबन्टु को कहीं से खरीदने की जरूरत नहीं है। बस www.ubuntu.com पर जाकर डाउनलोड कर लीजिए और एक डीवीडी डिस्क पर कॉपी कर लीजिए।

क्या है अलग

उबन्टु में स्टार्ट बटन, स्टार्ट मेनू या टास्कबार की जगह ‘लांचर’ नाम से मेनू मौजूद है, जिसमें प्रमुख सॉफ्टवेयरों के आइकन स्क्रीन के बाईं तरफ लंबी कतार में दिखाई देते हैं। उबन्टु में ‘डैश’ नामक पावरफुल सर्च यूटिलिटी का भी इस्तेमाल होता है, जो विंडोज8 के सर्च बॉक्स जैसा ही है। 

विंडोज ‘कंट्रोल पैनल’ की ही तरह उबन्टु में भी ‘कंट्रोल सेंटर’ उपलब्ध है और ‘माई कंप्यूटर’ का काम ‘प्लेसेज’ करता

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हम-भी-जिद-के-पक्के-है — By-kmsraj51

हम-भी-जिद-के-पक्के-है —

क्या बात करें किससे बात करें 
जब किसी ने सुनना ही नहीं है तो 
कितना भी विरोध प्रदर्शन कर लो, 
कुछ नहीं होने वाला लेकिन 
इतना तो जानते ही है 
वक्त किसी का नहीं होता. 
आज उनका तो कल हमारा 
कर लीजिये कितने भी जुल्म। 
अभी वक्त तुम्हारा है। 
हम भी जिद के पक्के है, 
इस गुस्से को शांत नहीं होने देंगे। 
भरोसा है अपने पर, बदलेगा वक्त जरुर 
आज नहीं तो कल, जवाब तो देना होगा 
अभी तो यह आगाज़ है, अंजाम बाकी है 
कदम अब उठ चुके मंजिल की ओर 
नहीं रुकेगे किसी के रोकने से 
हर जुल्म का हिसाब लेगें हम 
अब नहीं होने देंगे मनमानी 
क्योंकि अब हम भी जागे है 
हम भी जिद के पक्के है, 
इस गुस्से को शांत नहीं होने देंगे।

Chunar Fort – By-kmsraj51

Chunar Fort

 

The Chunar fort is situated in the Vindhya Range at a distance of about 45 odd km from Varanasi. The Chunar fort is located in the Mirzapur district. According to the Puranas the oldest name of Chunar was Charanadri as Lord Vishnu had taken his first step in his Vaman incarnation in the dynasty of Great king Bali. However Chunar came into prominence after the visit of Babar followed by Shershah Suri, Humayun, Akbar, Aurangzeb and finally the Britishers.

It is said that Maharaja Vikramaditya, the king of Ujjain established the fort of Chunar. According to the Alha Khand, King Sahadeo made this fort as his capital and established the statue of Naina Yogini in a cave of Vindhya hill. To commemorate his victory on 52 rulers, King Sahadeo built a stone umbrella inside the fort.

The Chunar fort became important for its association with the Mughal king, Babar and later Shershah Suri, who got the possession of the fort by marrying the wife of Taj Khan Sarang-Khani, the Governer of Ibrahim Lodi. In 1531 AD Humayun made an unsuccessful effort to capture this fort but later in 1574AD, Akbar the great captured this fort and since that very time it remained under the Mughals up to 1772AD. In the year 1772AD the East India Company captured the Chunar fort.

पृथ्वी से परे – ईश्वरीय संकल्पनाओं की संभावनाएं – By-kmsraj51

पृथ्वी से परे – ईश्वरीय संकल्पनाओं की संभावनाएं

पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति होना एक विलक्षण, अति दुर्लभ संयोग सा था… पर अथाह बृह्माँड में हो सकता है कि यह विलक्षण, दुर्लभ संयोग कुछ या अनेक जगहों पर हुआ या हो रहा हो… मानवीय दर्शन शास्त्र के अनुसार इस सभी जगहों की चेतना भी अपने अपने विकास की ऐतिहासिक परिस्थितियों के अनुसार ही रूप लेगी… यह भी हो सकता है कि इनमें से कुछ, कई या सभी में ईश्वर की संकल्पना ही न उभरे… ऐसा ही होगा भी, संभावना यही है… पर, केवल तर्क के लिये ही मान लें, यदि भविष्य में मानव जाति बृह्माँड के अन्य हिस्सों में पनप रही कुछ जातियों के संपर्क में आये व उनमें भी किसी परम चेतना की संकल्पना मिलती है, तो यह मामला थोड़ा पेचीदा हो सकता है…

 

आपने एकदम सही कहा है, जीवन की उत्पत्ति के लिए आवश्यक संयोग, अभी तक उपलब्ध विपुल जानकारी में, इतने सारे है कि अभी तक ब्रह्मांड़ में जहां तक हमारी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष पहुंच संभव हो पाई है, जीवन की उत्पत्ति की संभावनाएं बहुत कम ही हैं। यह लगभग सुनिश्चित सा ही लगता है इतने सारे संयोगों का एक साथ होना असंभव सा है। इस नीले ग्रह पर हुआ है तो, और साथ ही ब्रह्मांड़ की असीमता को देखते हुए, इसे तार्किक रूप से, सिरे से ही नकारा तो नहीं जा सकता लेकिन फिर भी, इस मामले में हमारी कल्पनाशीलता की भी कुछ सीमाएं तो होनी ही चाहिएं।
 
हमारा ब्रह्मांड, पदार्थ की उपस्थिति और उसका विस्तार ही है और जाहिरा तौर पर वह इसी के कुछ मूलभूत नियमों से सक्रिय है। तो इसके विकास स्वरूप अस्तित्व में आए जटिल प्रोटीन अणुओं ( जो कि जीवन का मूल हैं ) के निर्माण और उसके विकसित होने की प्रक्रिया और नियम भी सभी जगह एक जैसे ही होंगे। जीवन के विकास की हर जगह, कुछ पारिस्थितिक विशिष्टताएं तो होंगी, पर उसके आधारभूत गुणधर्म, संरचना और नियमसंगतियां एक समान ही होंगी। भूतद्रव्य और उसके बहुत ही जटिल विकास से उत्पन्न जैव-कोशिकाओं की प्रतिक्रियात्मकता के भी जटिल विकास के रूप में ही, विभिन्न इन्द्रियों और चेतना का सफ़र तय हुआ है। जीवन के साथ, चेतना ( जिसे हम मनुष्य का विशिष्ट लक्षण ) की उत्पत्ति के लिए तो और भी कई विशिष्ट संयोगों की उपस्थिति जुड़ी हुई है।
 
इसलिए हमें तो यह लगता है कि चेतना के विकास और उससे संबद्ध क्रियाविधियों की नियमसंगतियां भी लगभग एक जैसी ही रहने की संभावनाएं हैं। तार्किक रूप से हम कल्पना भी करना चाहें, कि कहीं और भी इसी तरह के चेतना संपन्न प्राणी हो सकते हैं, तो जाहिरा तौर पर चेतना की उपस्थिति भय के आधारों पर ही ख़ड़ी मिलेगी। जीवनीय द्रव अपने को बनाए रखने के लिए प्रयत्नशील रहता है, जाहिर है कि वह उसको नष्ट कर सकने वाली परिस्थितियों से दूर रहने को गतिशील करता है। यानि उसका रासायनिक और भौतिक संघटन, स्वयं को विघटित कर सकने वाले कारकों के प्रति प्रतिक्रिया करता है। ये कारक उसके लिए खतरे के रूप में उपस्थित होते हैं। और यदि साथ में चेतना होगी, तो ये खतरे उसके लिए चेतन भय का रूप लेंगे, और इसी भय और अज्ञान से वही प्रक्रिया चल निकलेगी जो अंततः इसी तरह की किसी अलौकिक अवधारणाओं का, कोई विशिष्ट पारिस्थितिक रूप लेने को अभिशप्त होगी।
 
यह उनके विकास और परिस्थितियों की अवस्थाओं पर निर्भर करेगा कि ईश्वर की अवधारणा उनमें किस रूप में होगी। पर यदि चेतना विकसित होगी तो जाहिरा तौर पर वह ऐसी ही क्रम-प्रक्रिया से गुजरने को अभिशप्त होगी। हां उसका रूप थोड़ा या अधिक भिन्न हो सकता है, बिल्कुल उसी तरह, जिस तरह से हमारी पृथ्वी पर भी अलग-अलग चेतना-विकास की धाराओं के कारण, इसमें भिन्नताएं पाई जाती हैं। अब चूंकि हम यह कल्पना करना चाह ही रहे हैं, तो फिर उनमें भी उनकी परिस्थितियों के अनुसार ही इस तरह की अवधारणाएं मिलना सुनिश्चित सी ही लगती है। बजाए ऐसा कहने के, कि इसकी संभावनाए ही नहीं है।
 
अतएव, मामला स्पष्ट नहीं हुआ। अब जैसा कि आपने कहा है, हम मान रहे हैं कि उनमें भी परम चेतना की संकल्पना मिलती है, तो इसमें मामला थोड़ा पेचीदा कैसे हुआ…? हमें तो लगता है, मामला तब पेचीदा होगा, जब उनमें इस तरह की अवधारणाएं नहीं मिलें। 🙂
 
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क्या ध्यान लगाने व चित्त को एकाग्र करने के लिये बताये गये आध्यात्मिक तरीके जिनमें सामान्यत: स्वचालित श्वसन क्रिया को नियंत्रित करने पर जोर दिया जाता है के दौरान, या कीर्तन-सत्संग-समागम-गुरू दर्शन के दौरान कुछ लोगों को हुऐ अलौकिक अनुभवों को Hypo या Hyper Ventilation के कारण हुऐ अथवा उनके दिमाग की कंडिशनिंग के कारण हुऐ आनुभाविक भ्रम कहा जा सकता है… 🙂
 
सही है :-)। इस तरह के आनुभाविक भ्रमों के आधार में दिमाग के अनुकूलन साथ ही, दिमाग़ की क्रियाशील कमजोरी भी है। दिमाग़ के काम करने की अपनी सीमाएं हैं। अनुभवों की सीमाओं, अज्ञान, और कई सारे नये अनुभवों के दिमाग़ में पूर्व-संदर्भ नहीं होने के कारण, व्यक्ति इन्हें मिलते-जुलते से काल्पनिक, अवास्तविक, अनुकूलित संदर्भों के साथ जोड़ लेता है। इन्हीं क्रियात्मक सीमाओं के कारण, दिमाग़ को आसानी से भ्रम हो सकता है, भ्रमित किया जा सकता है।
 
पर दिमाग को भ्रमित कर पाने की इस क्षमता का अभी तक नकारात्मक प्रयोग ही दिखा है, सकारात्मक प्रयोग के उदाहरण नहीं दिखते ज्यादा… 😦
 
भ्रम अपने आप में ही एक नकारात्मक अवधारणा है, तो जाहिरा तौर पर इसके नकारात्मक प्रयोग ही अस्तित्व में होंगे और दिखेंगे। 🙂 अभी के यथार्थ में, कुछ मानसिक समस्याओं के समाधानों में कुछ लोग इसका सकारात्मक सा प्रयोग कर लिया करते हैं। जैसे कि अधिक गंभीर से दिखते भ्रमों के ईलाज के लिए उसके समक्ष उसके मूल सरोकारों से अलग कम गंभीर और नये भ्रमों की रचना का ताना-बाना उसके सामने बुन देते हैं। मानसिक अपरिपक्व व्यक्ति नये भ्रमों में उलझ जाता है और पुराने भ्रमों से तात्कालिक राहत सी पा लेता है। 🙂

 

 

 

5 चीजें जो आपको नहीं करनी चाहिए और क्यों ? – By-kmsraj51

5 चीजें  जो  आपको  नहीं  करनी  चाहिए  और  क्यों ?

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1) दूसरे  की  बुराई  को  enjoy करना 

ये  तो  हम  बचपन  से  सुनते  आ  रहे  हैं  की  दुसरे  के  सामने  तीसरे  की  बुराई  नहीं  करनी  चाहिए , पर  एक और  बात  जो  मुझे  ज़रूरी  लगती  है  वो  ये  कि  यदि  कोई  किसी  और  की  बुराई  कर  रहा  है  तो  हमें  उसमे  interest नहीं  लेना  चाहिए  और  उसे  enjoy नहीं  करना  चाहिए . अगर  आप  उसमे  interest दिखाते  हैं  तो  आप  भी  कहीं  ना  कहीं  negativity को  अपनी  ओर  attract करते  हैं . बेहतर  तो  यही  होगा  की  आप  ऐसे  लोगों  से  दूर  रहे  पर  यदि  साथ  रहना  मजबूरी  हो  तो  आप  ऐसे  topics पर  deaf and dumb हो  जाएं  , सामने  वाला  खुद  बखुद  शांत  हो  जायेगा . For example यदि  कोई  किसी  का  मज़ाक  उड़ा रहा  हो  और  आप  उस पे  हँसे  ही  नहीं  तो  शायद  वो  अगली  बार  आपके  सामने  ऐसा  ना  करे . इस  बात  को  भी  समझिये  की  generally जो  लोग  आपके  सामने  औरों  का  मज़ाक  उड़ाते  हैं  वो  औरों  के  सामने  आपका  भी  मज़ाक  उड़ाते  होंगे . इसलिए  ऐसे  लोगों  को  discourage करना  ही  ठीक  है .

2) अपने  अन्दर  को  दूसरे  के  बाहर  से  compare करना 

इसे  इंसानी  defect कह  लीजिये  या  कुछ  और  पर  सच  ये  है  की  बहुत  सारे  दुखों  का  कारण  हमारा  अपना  दुःख  ना  हो  के  दूसरे   की  ख़ुशी  होती  है . आप  इससे  ऊपर  उठने  की  कोशिश  करिए , इतना  याद  रखिये  की  किसी  व्यक्ति  की  असलियत  सिर्फ  उसे  ही  पता  होती  है , हम  लोगों  के  बाहरी यानि नकली रूप  को  देखते  हैं  और  उसे  अपने  अन्दर के यानि की असली  रूप  से  compare करते  हैं . इसलिए  हमें लगता  है  की  सामने  वाला  हमसे  ज्यादा  खुश  है , पर  हकीकत  ये  है  की  ऐसे  comparison का  कोई  मतलब  ही  नहीं  होता  है . आपको  सिर्फ  अपने  आप  को  improve करते  जाना  है और व्यर्थ की comparison नहीं करनी है.

3) किसी  काम  के  लिए  दूसरों  पर  depend करना 

मैंने  कई  बार  देखा  है  की  लोग  अपने  ज़रूरी काम  भी  बस  इसलिए  पूरा  नहीं  कर  पाते क्योंकि  वो  किसी  और  पे  depend करते  हैं . किसी  व्यक्ति  विशेष  पर  depend मत  रहिये . आपका  goal; समय  सीमा  के  अन्दर  task का  complete करना  होना चाहिए  , अब  अगर  आपका  best  friend तत्काल  आपकी  मदद  नहीं  कर  पा  रहा  है  तो  आप  किसी  और  की  मदद  ले  सकते  हैं , या  संभव  हो  तो  आप  अकेले  भी  वो  काम  कर  सकते  हैं .

ऐसा  करने  से  आपका  confidence बढेगा , ऐसे  लोग  जो  छोटे  छोटे  कामों  को  करने  में  आत्मनिर्भर  होते  हैं  वही  आगे  चल  कर  बड़े -बड़े  challenges भी  पार  कर  लेते  हैं , तो  इस  चीज  को  अपनी  habit में  लाइए  : ये  ज़रूरी  है की  काम  पूरा  हो  ये  नहीं  की  किसी  व्यक्ति  विशेष  की  मदद  से  ही  पूरा  हो .

4) जो बीत गया  उस  पर  बार  बार  अफ़सोस  करना

अगर  आपके  साथ  past में  कुछ  ऐसा  हुआ  है  जो  आपको  दुखी  करता  है  तो  उसके  बारे  में  एक  बार  अफ़सोस  करिए…दो  बार  करिए….पर  तीसरी  बार  मत  करिए . उस  incident से जो सीख  ले  सकते  हैं  वो  लीजिये  और  आगे  का  देखिये . जो  लोग  अपना  रोना  दूसरों  के  सामने  बार-बार  रोते  हैं  उसके  साथ  लोग  sympathy दिखाने  की  बजाये उससे कटने  लगते  हैं . हर  किसी  की  अपनी  समस्याएं  हैं  और  कोई  भी  ऐसे  लोगों  को  नहीं  पसंद  करता  जो  life को  happy बनाने  की  जगह  sad बनाए . और  अगर  आप  ऐसा  करते  हैं  तो  किसी  और  से  ज्यादा  आप ही  का  नुकसान  होता  है . आप  past में  ही  फंसे  रह  जाते  हैं , और  ना  इस  पल  को  जी  पाते  हैं  और  ना  future के  लिए  खुद  को prepare कर  पाते  हैं .

5) जो  नहीं  चाहते  हैं  उसपर  focus करना 

सम्पूर्ण ब्रह्मांड में हम जिस चीज पर ध्यान केंद्रित करते हैं उस चीज में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि होती है.  इसलिए   आप  जो  होते  देखना  चाहते  हैं  उस  पर  focus करिए , उस  बारे  में  बात  करिए  ना  की  ऐसी  चीजें  जो  आप  नहीं  चाहते  हैं . For example: यदि  आप अपनी  income बढ़ाना  चाहते  हैं  तो  बढती  महंगाई  और  खर्चों  पर  हर  वक़्त  मत  बात  कीजिये  बल्कि  नयी  opportunities और  income generating ideas पर  बात  कीजिये .

 

इन  बातों पर  ध्यान  देने  से  आप  Self Improvement के  रास्ते  पर  और  भी  तेजी  से  बढ़ पायेंगे  और  अपनी  life को  खुशहाल  बना  पायेंगे . Always Think Positive.

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Aapka – kmsraj51

बड़ा बनने के लिए बड़ा सोचो – By-kmsraj51

बड़ा बनने के लिए बड़ा सोचो …………..

बड़ा सोचो

 

अत्यंत गरीब परिवार का एक  बेरोजगार युवक  नौकरी की तलाश में  किसी दूसरे शहर जाने के लिए  रेलगाड़ी से  सफ़र कर रहा था | घर में कभी-कभार ही सब्जी बनती थी, इसलिए उसने रास्ते में खाने के लिए सिर्फ रोटीयां ही रखी थी |

आधा रास्ता गुजर जाने के बाद उसे भूख लगने लगी, और वह टिफिन में से रोटीयां निकाल कर खाने लगा | उसके खाने का तरीका कुछ अजीब था , वह रोटी का  एक टुकड़ा लेता और उसे टिफिन के अन्दर कुछ ऐसे डालता मानो रोटी के साथ कुछ और भी खा रहा हो, जबकि उसके पास तो सिर्फ रोटीयां थीं!! उसकी इस हरकत को आस पास के और दूसरे यात्री देख कर हैरान हो रहे थे | वह युवक हर बार रोटी का एक टुकड़ा लेता और झूठमूठ का टिफिन में डालता और खाता | सभी सोच रहे थे कि आखिर वह युवक ऐसा क्यों कर रहा था | आखिरकार  एक व्यक्ति से रहा नहीं गया और उसने उससे पूछ ही लिया की भैया तुम ऐसा क्यों कर रहे हो, तुम्हारे पास सब्जी तो है ही नहीं फिर रोटी के टुकड़े को हर बार खाली टिफिन में डालकर ऐसे खा रहे हो मानो उसमे सब्जी हो |

तब उस युवक  ने जवाब दिया, “भैया , इस खाली ढक्कन में सब्जी नहीं है लेकिन मै अपने मन में यह सोच कर खा रहा हू की इसमें बहुत सारा आचार है,  मै आचार के साथ रोटी खा रहा हू  |”

 फिर व्यक्ति ने पूछा , “खाली ढक्कन में आचार सोच कर सूखी रोटी को खा रहे हो तो क्या तुम्हे आचार का स्वाद आ रहा है ?”

“हाँ, बिलकुल आ रहा है , मै रोटी  के साथ अचार सोचकर खा रहा हूँ और मुझे बहुत अच्छा भी लग रहा है |”, युवक ने जवाब दिया|

अत्यंत गरीब परिवार का एक  बेरोजगार युवक  नौकरी की तलाश में  किसी दूसरे शहर जाने के लिए  रेलगाड़ी से  सफ़र कर रहा था | घर में कभी-कभार ही सब्जी बनती थी, इसलिए उसने रास्ते में खाने के लिए सिर्फ रोटीयां ही रखी थी |

आधा रास्ता गुजर जाने के बाद उसे भूख लगने लगी, और वह टिफिन में से रोटीयां निकाल कर खाने लगा | उसके खाने का तरीका कुछ अजीब था , वह रोटी का  एक टुकड़ा लेता और उसे टिफिन के अन्दर कुछ ऐसे डालता मानो रोटी के साथ कुछ और भी खा रहा हो, जबकि उसके पास तो सिर्फ रोटीयां थीं!! उसकी इस हरकत को आस पास के और दूसरे यात्री देख कर हैरान हो रहे थे | वह युवक हर बार रोटी का एक टुकड़ा लेता और झूठमूठ का टिफिन में डालता और खाता | सभी सोच रहे थे कि आखिर वह युवक ऐसा क्यों कर रहा था | आखिरकार  एक व्यक्ति से रहा नहीं गया और उसने उससे पूछ ही लिया की भैया तुम ऐसा क्यों कर रहे हो, तुम्हारे पास सब्जी तो है ही नहीं फिर रोटी के टुकड़े को हर बार खाली टिफिन में डालकर ऐसे खा रहे हो मानो उसमे सब्जी हो |

तब उस युवक  ने जवाब दिया, “भैया , इस खाली ढक्कन में सब्जी नहीं है लेकिन मै अपने मन में यह सोच कर खा रहा हू की इसमें बहुत सारा आचार है,  मै आचार के साथ रोटी खा रहा हू  |”

 फिर व्यक्ति ने पूछा , “खाली ढक्कन में आचार सोच कर सूखी रोटी को खा रहे हो तो क्या तुम्हे आचार का स्वाद आ रहा है ?”

“हाँ, बिलकुल आ रहा है , मै रोटी  के साथ अचार सोचकर खा रहा हूँ और मुझे बहुत अच्छा भी लग रहा है |”, युवक ने जवाब दिया|

 उसके इस बात को आसपास के यात्रियों ने भी सुना, और उन्ही में से एक व्यक्ति बोला , “जब सोचना ही था तो तुम आचार की जगह पर मटर-पनीर सोचते, शाही गोभी सोचते….तुम्हे इनका स्वाद मिल जाता | तुम्हारे कहने के मुताबिक तुमने आचार सोचा तो आचार का स्वाद आया तो और स्वादिष्ट चीजों के बारे में सोचते तो उनका स्वाद आता | सोचना ही था तो भला  छोटा क्यों सोचे तुम्हे तो बड़ा सोचना चाहिए था |”

मित्रो इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है की जैसा सोचोगे वैसा पाओगे | छोटी सोच होगी तो छोटा मिलेगा, बड़ी सोच होगी तो बड़ा मिलेगा | इसलिए जीवन में हमेशा बड़ा सोचो | बड़े सपने देखो , तो हमेश बड़ा ही पाओगे | छोटी सोच में भी उतनी ही उर्जा और समय खपत होगी जितनी बड़ी सोच में, इसलिए जब सोचना ही है तो हमेशा बड़ा ही सोचो|