** पगहा ** By-kmsraj51 **

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जब मेरे पास खेत और हल हो
तभी न मुझे जरूरत रहती गाय की?
गाय भी हो गई मेरी तरह बूढ़ी
उसकी जीविका के साथ-साथ
मेरा भी जीवन बन गया प्रश्न-चिह्न
जमीन तो बेच दी मैंने कभी लड़के की पढ़ाई के लिए
घर भी बेच डाला उसकी नौकरी की उम्मीद में
लड़के को पढ़ाई आ गई
फिर नौकरी तो नहीं आई
अगर पढ़ाई न आई हुई होती
तो कम-से-कम घर बच जाता
लड़का घूम रहा है लट्टू जैसा
उस लट्टू को घुमानेवाली रस्सी है बस नौकरी की खोज।

घर चला गया तो कुछ-न-कुछ विकल्प तो चाहिए
आवास के लिए खरक के सिवा कुछ न रहा
गाय को, उसकी जरूरत स्वयं को ही नहीं
उसका बछड़ा भी हाल में ही गुजर गया
गाय के खरक को अपना आवास बना लूँ तो
घर बनाने के लिए अब उधार लेना न पड़ता!
गाय के खरीददारों को खोजा
मुफ्त में दे दूँ तो भी लेनेवाला कोई न दिखा।

गुजरते जा रहे हैं दिन
आँसू भी सूखते जा रहे हैं मेरी आँखों में
एक दिन सुबह-सुबह सोचा कि
गाय को कबेला पहुँचा दूँ
धीरे-धीरे गया उसके पास
निकाल दिया उसके गले में बाँधा पगहा
देखा उसने तब मेरी आँखों में
भूल नहीं सकता उसकी वह नजर जन्म-जन्मांतरों तक

पूछने लगी है वह मानो सजल नेत्रों से—
‘बेच दोगे मुझे?
क्या मुझसे अब नहीं रही कोई जरूरत तुम्हें?’
ये दो ही नहीं सिर्फ
लाखों, करोड़ों सवाल
कौंध गए उसकी नजरों में।
अगर मैं उसके खरक को खाली कराऊँ तो
वह बनेगा मेरा निवास
उसकी कुथली और चारे के व्यय से
मिलेगी रोटी मुझे और मेरी पत्नी को
गुजारा तो हो ही जाएगा न ऐसे कुछ दिन!
¨
फिर मुझे तो सूझा एक उपाय
तुरंत छिपा लिया पगहे को छज्जे में सुरक्षित
कभी तो पड़ेगा शायद इससे काम
जब भूख बनेगी असहनीय
तड़प जाएँगे उसके कारण हमारे प्राण
उम्मीद है—वह पगहा
आएगा मेरे काम
करेगा मेरी मदद।

** कविता ** कुछ मुक्तक ** By-kmsraj51**

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बीच पतझर के बसंती सृजन का उल्लास हूँ

बोल कुछ पाता न जो उस दर्द का अहसास हूँ
भटकते फिरते हो घर से दूर मेरी खोज में
प्यार से देखो जरा मैं तो तुम्हारे पास हूँ।

ः २ ः
वे कहते—‘क्यों गेरुआ नहीं’, 
वे कहते—‘क्यों न लाल हूँ मैं?’
वे कहते—‘क्यों मैं ठंडा हूँ’, 
वे कहते—‘क्यों उबाल हूँ मैं?’
मैं हूँ अदीब, 
मुझ पर न चढ़ा काई भी रंग सियासत का
सत्य के रंग में रँगा हुआ, 
इनसे उनसे सवाल हूँ मैं।

ः ३ ः
फसलें उदास फागुनी बोली बयार से
‘हम देख रही हैं कहना बहार से’
बोली बयार—‘आई थी, आकर है रम गई
आने लगी है अब तो वो दिल्ली में कार से।’

ः ४ ः
जाएँगे हम यहाँ से कहाँ, जानते नहीं
कहते हैं जिसे सच उसे पहचानते नहीं
पर जी रहे हैं जिसको विविध रूप-रंग में
उस जिंदगी को सत्य हाय मानते नहीं।

ः ५ ः
सागर में रहे, जलते रहे फिर भी प्यास में
सुख से लदे हुए रहे सुख की तलाश में
कितना तो चैन मिल रहा है छाँह में घर की
है लग रहा कि माँ कहीं बैठी है पास में।

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ः ६ ः
ज्वाला में जले, शीत में हिम के तले गए
हर राह में लाचार सफर की छले गए
आए थे एक जिंदगी जीने जहान में 
खाकर हजार ठोकरें असमय चले गए।

ः ७ ः
स्कूल तक का रास्ता ही रास्ता होता नहीं है
हो गया असफल यहाँ तो शेर दिल रोता नहीं है
राह चुन लेता है कोई और जीवन की, विहँसकर
मौत के आगोश में निरुपाय हो सोता नहीं है।

ः ८ ः
राहें हैं बहुत दोस्त, जिंदगी ये सफर है
छूटी जो इधर एक तो दूजी तो उधर है
गर टूट गया ख्वाब एक दूसरा देखो
हर रात में पोशीदा कहीं एक सहर है।

ः ९ ः
कितना अच्छा होगा वह दिन जिस दिन घायल प्यार न होगा
मन का कोई हास हाट में बिकने को लाचार न होगा
गले मिलेगी हर मजहब से उठकर इनसान की बोली
सुबह-सुबह कितने जख्मों से लदा-फदा अखबार न होगा।

ः १० ः
ख्वाबों में सही पास जरा आ मेरे बचपन
खेतोें में जो गाया था, वही गा मेरे बचपन
फिर भेंट हो कि न हो यह छाया है शाम की
अपनी हँसी सुबह सी सुना जा मेरे बचपन।

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** कविताएँ ** By-kmsraj51!!

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नयन के नीर से
उन दिनों को याद किया जब भी
आँखों में पानी आया है,
रो-रोकर बीत रहे हैं दिन
पानी भी सूख न पाया है।
जब हर रात उन आँखों ने
रो-रोकर गुजारी थी,
जब एक सहारे को मेरी माँ
वो फिरती मारी-मारी थी।
जब अपनों ने उम्मीदों के 
सारे पुल तोड़ दिए,
और अपनों ने ही उसे
जब कहर-पर-कहर दिए।
जब डर से काली रातें
करवटों में कट जाती थीं,
जब यादें पास आती थीं
हिचकियों से रुलाती थीं।
जब अपनों की ठोकरों ने
उसे चलना सिखा दिया,
जब दुनिया के इन रिश्तों ने
दिल से विश्वास मिटा दिया।
जब अपनों ने ही उसे
बेघर करने की ठानी थी,
तब जाके उसने इस
जीवन की हकीकत जानी थी। ¨

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रिसते रिश्ते
गर रूठ गए अपने तो क्या?
अपने कब अपने थे मेरे,
गर टूट गए सपने तो क्या?
सपने कब सपने थे मेरे।
जब छोड़ दिया
जब तोड़ दिया
रिश्तों से ही
मुँह मोड़ लिया
जब गैर किया
जब बैर दिया
अपनों ने ही—
सब छीन लिया
गर टूट गए रिश्ते तो क्या?
रिश्ते कब रिश्ते थे मेरे। ¨

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राख-ही-राख
हो रहा है क्या और क्यूँ?
आज मैं कैसे कहूँ?
इक महल था प्रेम का
आज जलके राख हुआ।
सब बिचरते थे जहाँ पे
स्वप्न के संसार में,
उस स्वप्न का ताना-बाना
कुछ ऐसे बेजार हुआ।
टूटकर गिर पड़ीं हर तरफ 
उम्मीदों की थेगडि़याँ
इक ममता का आँचल
इस तरह बेकार हुआ। ¨

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भँवर में
दुःख के 
दरिया के सामने
खड़े होकर
पूछा मैंने
अपने आप से
क्या कभी मैं
पार होऊँगी—
दुःख की इस 
मझधार से।
थे किनारे
हर तरफ
पर ना किनारा
था कोई
उस भँवर से
पार होने का—
ना सहारा॒
था कोई।

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कृष्ण मोहन सिंह
हमेशा सकारात्मक विचारक

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** चार गीत ** by-kmsraj51 **

 

चार गीत

-देवेंद्र आर्य 

 

 

मेघ सलोने
भारी-भारी बस्ते लेकर
मेघ सलौने फिर
सावन-भादौं की शाला में
पढ़ने आए हैं।

जेठ दुपहरी देख
किसी कोने में दुबक गए
कभी देख पुरवाई नभ में
मन-मन हुलस गए।

नन्ही-नन्ही आँखों में
खुशियाँ भर लाए हैं।

कभी जेब से
ओलों की टॉफी ले निकल पड़े
कभी किसी कोमल टहनी पर
मुतियन हार जड़े।

स्वाति बूँद बन कभी
सीप का मन हुलसाए हैं।

नटखट बचपन बन
उलटा दी स्याही अंबर पर
इंद्रधनुष निकाल बस्ते से
फेंक दिया घर-घर।

बिजली पर चढ़
ढोल नगाड़े
खूब बजाए हैं।

कभी नदी के घाट नहाने
मिलकर निकले हैं
धरती के कण-कण को छूकर
हरषे-सरसे हैं।

हंसों की पाँतों सा
सजकर 
नभ पर छाए हैं।
¨

बादल गरजे

घनन घनन घन बादल गरजे
बिजली चम-चम-चम,
हाथ उठाकर धरती बोली
बरसो जितना दम।
नदिया चढ़ी, सरोवर बोले
भूल किनारों से,
प्यार बढ़ाओ
बात करो इन उच्छल धारों से।
प्रखर चुनौती खड़ी सामने
आँक रही दम खम।

फुनगी चढ़े पात-पात यूँ
करते गुपचुप बात,
इंद्रधनुष की पहन ओढ़नी
निकली है बरसात।
अधगीली मिट्टी में अँखुआ
नाचे छम-छम-छम।

अँगड़ाई ले उठा गाँव
कि अधमुरझाए पेड़,
हवा बावरी वन-वन डोले
रस की मार चपेड़।

झूम झूम कर कहे जिंदगी
जग है, जग से हम।

बूँद-बूँद कर रिसता पानी
मन में अगन भरे
मनभावन की सुधि नैनन में
सौ-सौ रूप धरे।

घन, बरसो पिय के आँगन
पर कहना दुःख कम-कम।
घनन घनन घन बादल गरजे
बिजली चम-चम-चम।
¨

मलयानिल नाचा करती है
जब से जग के दुःख-दर्दों का
फूलों से शृंगार किया है
तब से मेरे मन-आँगन में
मलयानिल नाचा करती है।

पर्वत जैसी पीर हुई, पर
मैंने उसको तन पर झेला
झंझाओं के विकट व्यूह में
मैं आखिर तक लड़ा अकेला।
जब से तपन जेठ की लेकर
घन-सावन से प्यार किया है
तब से वासंती मनुहारें
मधुर छंद बाँचा करती हैं।

जो भी मिला सभी का माना
विष तो क्या अमृत ही बाँटा
कभी न सोचा इस विनिमय में
कितना लाभ कि कितना घाटा?
जब से पर्वत सा मन लेकर
क्षितिजों को विस्तार दिया है
तब से जीवन की क्षमताएँ
पग-पग को साँचा करती हैं।

संबंधों के लिए आज तक
सम्मानों के दीप जलाए,
घोर वर्जना, अविनय के पथ 
मैंने अनगिन जाल बिछाए।
जब से तम से रण करने में
मैंने मन-दिनमान दिया है
तब से जग की उज्ज्वल आशा 
रह-रहकर जाँचा करती है।
¨

धूपवाले दिन
शील ने कितने चुभोए
कोहरे के पिन
अलगनी पर टँक गए
लो, धूपवाले दिन।

ठुमकती फिरती वसंती हवा
उपवन में,
गीत गातीं कोयलें
मदमस्त मधुबन में।
फूल पर मधुमास करता नृत्य
ता धिन-धिन
अलगनी पर टँक गए
लो, धूपवाले दिन।

पीतवसना घूमती सरसों
लगा पाँखें,
मस्त अलसी की लजाती
नीलमणि आँखें।
ताल में धर पाँव
उतरे चाँदनी पल छिन
अलगनी पर टँक गए
लो, धूपवाले दिन।

दूर वंशी के स्वरों में
गूँजता कानन,
वर्जना टूटी
खिला सौ चाह का आनन।
श्याम को श्यामा पुकारे
साँस भर गिन-गिन
अलगनी पर टँक गए
लो, धूपवाले दिन।

 

बेनाम रिश्ता।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♣♥ बेनाम रिश्ता। ♣♥

-मृदुला सिन्हा।

चित्राजी निमंत्रण-पत्र के साथ हाथ से लिखे मनुहार पत्र के हर अक्षर को अपनी नजरों से आँकती उनमें अंतर्निहित भावों को सहलाने लगीं। कई बार पढ़े पत्र। सोचा विवाह में इकट्ठे लोग पूछेंगे—मैं कौन हूँ? क्या रिश्ता है शालिग्रामजी से मेरा? क्या जवाब दूँगी मैं? क्या जवाब देंगे शालिग्रामजी? दोनों के बीच बने संबंध को मैंने कभी मानस पर उतारा भी नहीं। नाम देना तो दूर की बात थी। बार-बार फटकारने के बाद भी वह अनजान, अबोल और बेनाम रिश्ता चित्राजी को जाना-पहचाना और बेहद आत्मीय लगने लगा था। कभी-कभी उसके बड़े भोलेपन से भयभीत अवश्य हो जाती थीं और तब उस रिश्ते के नामकरण के लिए मानो अपने शब्द भंडार में इकट्ठे हजारों शब्दों को खँगाल जातीं। नहीं मिला था नाम। और जब नाम ही नहीं मिला तो पुकारें कैसे?

इसलिए सच तो यही था कि उन्होंने कभी उस रिश्ते को आवाज नहीं दी। रिश्ते के जन्म और अपनी जिंदगी के रुक जाने के समय पर भी नहीं। जिंदगी के पुनःचालित होकर उसकी भाग-दौड़ में भी नहीं। शालिग्रामजी को कभी स्मरण नहीं किया। शालिग्रामजी ने ही बेनाम रिश्ते को याद रखने की पहल की थी।

बहुत सोच-विचार करने के बाद चित्राजी ने भोपाल जाना तय कर लिया। बहुत दूर जाना था। बस, और फिर ट्रेन की यात्रा। वह भी गरमी में। शालिग्रामजी ने दूरभाष पर ही विश्वास दिलाया था—‘आपको कोई दिक्कत नहीं होगी। मेहमानों को ठहराने की व्यवस्था करते समय भी हमने मौसम का ध्यान रखा है। मैं समझता हूँ, हमारे मेहमानों को कोई कष्ट नहीं होगा। और आप तो खास मेहमान हैं।’

चित्राजी कुछ नहीं बोलीं। उन्होंने जब जाने का निश्चय ही कर लिया था तो कष्ट और आराम का क्या? शिमला बस स्टैंड पर वॉल्वो बस में बैठ गई थीं। मोबाइल की घंटी बजी। शालिग्रामजी का फोन था। उन्होंने कहा, ‘‘आपकी बस के दिल्ली बस अड्डे पर रुकते ही हमारा एक आदमी मिलेगा। उसका नाम राकेश है। उसके पास आपकी रेल टिकट होगी।’’

चित्राजी ने कुछ नहीं कहा। इतना भी नहीं कि मैंने टिकट ले रखी है। और वैसा ही हुआ। उनकी बस के रुकते ही एक व्यक्ति अंदर घुसा। उसकी खोजी नजर ने चित्राजी को पहचान लिया। उनकी अटैची नीचे उतारकर बोला, ‘‘आपके पास यदि कोई टिकट है तो मुझे दे दीजिए। मैं उसे कैंसिल करवा दूँ। ए.सी. द्वितीय श्रेणी की यह टिकट रख लीजिए। ट्रेन शाम को निजामुद्दीन स्टेशन से जाती है। मैं आपको लेने आ जाऊँगा। मैं भी आपके साथ चल रहा हूँ।’’

चित्राजी ने उस व्यक्ति को स्लीपर क्लास की टिकट निकालकर दे दी। वे थ्री-व्हीलर में बैठकर गोल मार्केट स्थित अपनी एक सहेली के क्वार्टर में चली गईं। शाम को सबकुछ वैसे ही घटा जैसा राकेश ने बताया था।

सुबह-सुबह गाड़ी के भोपाल जंक्शन पर रुकते ही एक नौजवान उनकी सीट तक आ गया। उनके पैर छूकर बोला, ‘‘मैं दीपक हूँ। मेरे पिता का नाम शालिग्राम कश्यप है।’’

चित्राजी ने ‘खुश रहने’ का आशीष दिया और उसके पीछे चल पड़ीं। गाड़ी आगे बढ़ रही थी। रोड पर भीड़ के कारण कभी-कभी उसका हॉर्न बजता। अंदर पूरी शांति बनी रही। कोई कुछ नहीं बोला। चित्राजी उस नौजवान से बातें करना चाहती थीं, पर शुरुआत कैसे करें।
उस घर की चौहद्दी, आबादी, संस्कार और स्थितियाँ, कुछ भी तो नहीं जानती थीं। भोपाल शहर के बारे में पूछने ही जा रही थीं कि दीपक बोल पड़ा—‘‘मैं आपको आंटी कहूँ ?’’

‘‘हुँ’’
‘‘तो आंटी! बारात आज शाम को आ रही है, लोकल बारात है, इसलिए समय से ही आ जाएगी। मैंने सुना कि आप कल ही लौट रही हैं। आपके पास समय बहुत कम है। पिताजी ने कहा है कि आप भोपाल शहर पहली बार आ रही हैं। इसलिए भोपाल भी तो देखना चाहेंगी। बड़ा सुंदर शहर है हमारा। आप जल्दी से तैयार हो जाएँ। आपको मेरा मौसेरा भाई घुमाने ले जाएगा।’’

‘‘ठीक है।’’ इतना ही बोल पाईं चित्राजी। मन तो उस व्यक्ति के प्रति आभार प्रकट करने को बन आया था। उनकी इतनी चिंता करनेवाले नौजवान को शाबासी भी दी जा सकती थी। पर वे कुछ नहीं बोलीं। दीपक बोला, ‘‘मेरे पिताजी आपकी बहुत प्रशंसा करते हैं। कहते हैं, आप साक्षात् देवी की अवतार हैं। पर पता नहीं क्यों, न आप कभी भोपाल आईं, न हमें शिमला बुलाया। कुछ देर पहले ही आपके बारे में बताया। आपसे मिलने की चाहत पनप आई। इसलिए कई काम छोड़कर स्वयं स्टेशन आ गया।’’

चित्राजी कुछ बोलने के लिए जिह्वा पर शब्द सजाने लगीं कि ड्राइवर ने गाड़ी में ब्रेक लगा दिया था। गाड़ी किसी गेस्ट हाउस के सामने रुकी। गाड़ी से उनका सामान निकालकर दीपक आगे बढ़ा। वे पीछे-पीछे। उन्हें अंदर तक पहुँचाकर बोला, ‘‘आंटी! आप यहाँ नहा-धो लें। नाश्ता घर पर ही करना है। फिर आप भोपाल दर्शन के लिए निकलेंगी। दोपहर का भोजन भी घर पर ही है। भोजन के बाद फिर यहाँ आराम करिएगा। शाम को तो शादी ही है।’’

चित्राजी कुछ नहीं बोलीं। दीपक के कमरे से निकलने पर अवश्य उसके पीछे गईं। आँखों की पहुँच से उसकी काया ओझल हो जाने पर पीछे लौट कमरे की सिटकिनी बंद कर बिस्तर पर बैठ गईं। सोचने लगीं—दीपक कितना लायक लड़का है। उन्नीस-बीस वर्ष का होगा। इतना जिम्मेदार और पितृभक्त! समाज नाहक परेशान है कि युवा पीढ़ी बिगड़ गई। मेरे साथ थोड़ी देर गुजारकर इस युवा ने मेरे मन में जगह बना ली। पर श्रेय तो इसके पिता को ही जाता है, शालिग्रामजी को। उनका ध्यान आते ही चित्राजी उठ बैठीं। अपना ध्यान बँटाने के लिए तैयार होने लगीं। चित्राजी के नहा-धोकर तैयार होते ही नरेश आ गया था। उन्हें नाश्ते के लिए ले जाते हुए पूछा, ‘‘आप दीपक की बुआजी हैं? उसकी दो बुआओं से मिल चुका हूँ। आपसे पहली बार मिला। दीपक का मैं मित्र हूँ।’’

शालिग्रामजी शीघ्रता से गेट पर पहुँचे। उन्होंने चित्राजी का अभिवादन किया। नरेश ने कहा, ‘‘घुमा लाया आंटी को भोपाल। इन्हें तीनों ताल अच्छे लगे।’’

नरेश इतना नहीं कहता तो शायद चित्राजी सामने खड़े व्यक्ति को पहचान भी नहीं पातीं। कुछ दरक गया था चित्राजी के अंदर। उन्होंने अपने को सँभाला। हाथ जोड़कर उनके अभिवादन का उत्तर देते हुए चेहरे पर भी मुसकान थी। नाश्ते का इंतजाम फ्लैट के बाहरवाले हिस्से में ही किया गया था। कुछ लोग नाश्ता समाप्त कर चुके थे, कुछ का जारी था, कुछ आनेवाले थे। शालिग्रामजी को चित्राजी को लेकर नाश्ते के स्थान पर पहुँचने में दो मिनट भी नहीं लगे होंगे, पर वहाँ उपस्थित नाश्ता कर रहे मेहमानों के प्लेट में पडें स्वादिष्ट व्यंजनों में मानो एक विशेष व्यंजन आ टपका।

‘‘ये कौन हैं?’’ प्रश्न पसरा।
‘‘इन्हें तो पहले कभी नहीं देखा।’’ स्वाद लेने लगे लोग।
आपस में प्रश्नों का आदान-प्रदान हो रहा था। उत्तर किसी के पास नहीं था। शालिग्रामजी की पत्नी माला भी आ गईं। रिश्तेदारों से नाश्ता का स्वाद पूछतीं, कुछ और लेने का आग्रह करतीं, आगे बढ़ रही थीं। किसी ने पूछ ही लिया—‘‘वे कौन हैं? कोटा की साड़ी में वे सुंदर सी महिला?’’
माला ने इधर-उधर आँखें दौड़ाईं। दूसरी ने स्वर दाबकर ही कहा, ‘‘वही, जो शालिग्रामजी के साथ हैं। उन्हें शालिग्रामजी ने स्वयं अपने हाथों से प्लेट लगाकर दी है। देखिए!’’ ठीक ही तो कहा था सबने। माला ने भी यही देखा। चाय का प्याला लिये खड़े थे शालिग्रामजी। सौम्य आकृति, लगभग उसकी ही हम-उम्र, बड़े सलीके से नाश्ता कर रही, कौन है यह महिला? शालिग्रामजी ने तो कभी इसका जिक्र नहीं किया। आमंत्रण भेजनेवाली सूची भी माला ने पढ़ी थी। किसी अनजान महिला का नाम नहीं था। फिर कौन है यह?

प्रश्न तो अनेक थे। पर वह अवसर नहीं था पति से प्रश्न पूछने का। जबकि अधिकांश मेहमानों के बीच यही प्रश्न बॉल की भाँति दिन भर उछलता उसकी पाली में भी आता रहा। रीति-रिवाज और रस्म अदाएगी में सब एक-दूसरे से पूछते रहे। दोपहर के लंच के समय भी चित्राजी आ गईं थीं।
शालिग्रामजी की एक साली उनके पास गई। पूछा, ‘‘आप कहाँ से आई हैं?’’

दूसरा प्रश्न पूछने ही वाली थी—‘‘आप मेरे जीजाजी को कैसे जानती हैं?’’
इस बीच स्वयं जीजाजी उपस्थित हो गए थे। उन्होंने अपनी साली को किसी और विशेष मेहमान की खातिरदारी में लगा दिया था।
गेस्ट हाउस में आराम करते हुए चित्राजी का मन कई मसलों में उलझ गया था। बहुत दिनों बाद पच्चीस वर्ष पूर्व घटी घटना का संपूर्ण दृश्य नजरों के सामने रूढ़ हो गया। शिमला से गाड़ी में पति-पत्नी और दोनों बच्चे का कुल्लु-मनाली के लिए प्रस्थान। थोड़ी दूरी पर जाते ही गाड़ी का खड्डे में गिरना। पति के सिर में चोट आना। उनका होश नहीं लौटना। डॉक्टर से बातचीत। बेहाल-बेहोश चित्राजी के सामने डॉक्टर की एक माँग। माँग पर शीघ्रता से विचार करने का आग्रह। अकेली खड़ी चित्राजी। दो नन्हे बच्चे माँ से चिपके। अपना-पराया कोई साथ न था। निर्णय लेना था चित्राजी को। सबकुछ चला गया था। जो बचा था, उसकी माँग थी। चित्राजी ने वह वस्तु देना स्वीकार कर लिया, जो उनकी थी। डॉक्टर का सुझाव। और फिर मृत्यु के करीब गया व्यक्ति जीवित हो गया।

स्मृतियों में जीवित था सब दृश्य। कभी-कभी जीवंत हो जाता। पर चित्राजी ने दृढ़ निश्चय कर उन यादों को नजर के सामने से हटा दिया था। शुभ-शुभ का अवसर था। ‘जो बीत गई, वह बात गई’ कविता वे क्लास में पढ़ाती आई हैं। जिस लड़की का विवाह है, उसके लिए शुभ सोचना है। अवसर और समय की वही माँग थी।

बारात दरवाजे लगी। स्वागत में खड़े स्त्री-पुरुष तिरछी नजरों से चित्राजी की ओर अवश्य देखते रहे। प्रश्न वही—‘‘कौन है यह?’’, ‘‘क्या रिश्ता है शालिग्रामजी से?’’

शालिग्रामजी ने द्वार पर ही अपने समधी से चित्राजी का परिचय कराया था। उनकी दो सालियाँ अपने पतियों के साथ वहीं खड़ी थीं। उनका परिचय नहीं करवाया। और यह खबर उस भीड़ भरे स्थल पर भी आसानी से यात्रा कर गई। सबको मिल आई।

बराती और घराती के भोजनापरांत विवाह के रस्म पूरे किए जाने लगे। शालिग्रामजी को पंडितजी द्वारा मंडप पर कन्यादान के लिए बुलाया गया। मंडप पर बैठने के पूर्व उन्होंने चारों ओर निगाहें घुमाईं। उनकी दृष्टि के सम्मुख वह चेहरा नहीं आया, जिसकी उन्हें खोज थी। उनके आस-पास मंडप पर बैठी उनकी बहनों और सालियों ने भाँप लिया था। दो-तीन एक साथ बोल पड़ीं—‘‘वहाँ हैं आपकी मेहमान।’’

देखा माला ने भी। मानो खीझकर बोली, ‘‘अब बैठ जाइए। मनचित्त लगाकर कन्यादान करिए। इसी काम के लिए मेहमान और सारा इंतजाम है। बैठिए!’’

शालिग्रामजी ने ऊँची आवाज में कहा, ‘‘चित्राजी! आप इधर आइए। मंडप पर बैठिए। मेरी बेटी को आपका विशेष आशीर्वाद चाहिए।’’
चित्राजी अंदर से हिल गईं। ऊपर से उपस्थित जनों की निगाहों के तीरों से बिंध गईं। वे परेशान तो थी हीं। अपने स्थान पर खड़ी होकर बोलीं, ‘‘आप लोग शुभ कार्य के लिए वहाँ उपस्थित हुए हैं। बेटी का कन्यादान करिए। मुझे यहीं बैठना है। मैं विधवा हूँ। मेरा सुहाग नहीं है। समाज ऐसी महिला को किसी सौभाग्याकांक्षिणी को सुहाग देने की मनाही करता है। मैं दिल से आपकी बेटी का शुभ चाहती हूँ। इसलिए दूर बैठी हूँ। आप अपना पुनीत काम पूरा करें। मेरी चिंता छोड़ दें।’’ वे बैठ गईं।

‘‘मैं नहीं मानता ऐसे समाज के विधान को। मेरे परिवार के लिए, मेरी बेटी के लिए आपसे बढ़कर कोई शुभ नहीं हो सकता। आपकी कृपा के बिना तो न मैं होता न मेरी बेटी। आइए! आप मेरी प्रार्थना मानकर मेरी बेटी का कन्यादान करिए।’’ फिर तो पंडितजी भी परेशान हो गए। बोले, ‘‘शालिग्रामजी! आपकी मेहमान महिला ठीक कह रही हैं। आप कन्यादान करिए। अपनी पत्नी को साथ बैठाइए। मंडप पर बैठी सभी महिलाएँ सुहागन ही हैं।’’

शालिग्रामजी बिफर पड़े—‘‘आप सब आज सुबह से चित्राजी का परिचय जानने के लिए परेशान हैं। आपके बीच तरह-तरह की अटकलें लग रही हैं। कार्य व्यस्तता में भी मैं आपके प्रश्नों के बाणों से बिंधता रहा। जब तक मैं उनका परिचय न दे दूँ, आप सबों का ध्यान भी विवाह के रस्म-रिवाजों पर केंद्रित नहीं होगा। तो सुनिए!’’ और जो कुछ शालिग्रामजी ने सुनाया, सुनकर वहाँ बैठे उपस्थित लोगों के प्रश्न तो चुके ही, वे सब चित्राजी के प्रति नतमस्तक हो गए। वे अवाक् रह गए। ‘‘पच्चीस वर्ष पूर्व एक दुर्घटना में चित्राजी के पति घायल हो गए। उनके मस्तिष्क ने काम करना बंद कर दिया था। जिस अस्पताल में उन्हें लाया गया, उसी के एक कमरे में मैं ऑपरेशन बेड पर लेटा था। मेरे दिल ने काम करना बंद कर दिया था। चिकित्सकों ने निर्णय लिया था—किसी का धड़कता दिल मिलने पर प्रत्यारोपण हो सकता है। आँख दान, किडनी दान जैसे अंग दान की बात तो सुनी गई थी। देहदान भी होने लगा था। पर हृदय दान तो तभी हो जब वह धड़कता हो, और जब तक दिल धड़कता है, आदमी जिंदा है। भला जीवित का हृदय कोई क्यों दान करे।

चित्राजी के पति का दिल धड़क रहा था। मस्तिष्क ने कार्य करना बंद कर दिया था। डॉक्टर शर्मा ने इनसे अनुरोध किया—‘‘आपके पति को अब हम नहीं बचा सकते। पर आपकी सहमति हो तो इनका दिल किसी और के शरीर में प्रत्यारोपित किया जा सकता है। वह जिंदा हो सकता है।

‘‘सुझाव सुनकर चित्राजी पर क्या बीती, मुझे नहीं मालूम। और किसी ने जानने की कोशिश भी की कि नहीं, मालूम नहीं। चित्राजी ने अनुमति दे दी थी। मेरा दिल पिछले पच्चीस वर्षों से धड़क रहा है, यह मेरा नहीं, इनके पति का दिल है। पर पिछले पच्चीस वर्षों में इन्होंने एक बार भी एहसान नहीं जताया। इन्होंने तो मुझे तब भी नहीं जाना, न देखा था। मैंने भी नहीं। इन्होंने कभी मुझे ढूँढ़ने की कोशिश भी नहीं की। पर मैं बहुत बेचैन था। जीवन देनेवाली के प्रति आभार भी नहीं प्रगट कर सका। दो वर्ष पूर्व इनके शहर में गया। डॉ. शर्मा मिल गए। मेरा दुर्भाग्य कि इनसे तब भी भेंट नहीं हो सकी। डॉ. शर्मा से इनका मोबाइल नंबर मिल गया। फोन पर ही मैंने इन्हें अपना परिचय दिया। मनुहार पत्र भेजा। फिर निमंत्रण। बहुत आग्रह करने पर ये मेरी बेटी के विवाह पर आईं हैं। मैंने भी इनको आज सुबह ही पहली बार देखा। अब आप ही सोचिए पंडितजी! हमारे परिवार के लिए इनसे बढ़कर शुभ और कौन होगा। मेरे विवाह और मेरे बच्चे होने के पीछे भी यही तो हैं। मैं हूँ, तभी तो सब है।’’

कन्यादान के रस्म के समय तो सबकी आँखें भरती हैं। शालिग्रामजी ने तो कन्यादान के पूर्व ही उपस्थित सभी आँखों में पानी भर दिया।
माला मंडप पर से उठी। सीधे चित्राजी के पास पहुँची। पैर छूकर आशीष लिये और हाथ पकड़कर मंडप पर ले आई। महिलाओं के झुंड ने आँसू पोंछकर गाना प्रारंभ किया —‘शुभ हो शुभ, आज मंगल का दिन है, शुभ होे शुुभ। शुभ बोलू अम्मा, शुभ बोलू पापा, शुभ नगरी के लोग सब, शुभ हो शुभ!’’

रिश्ते को नामकरण की आवश्यकता नहीं पड़ी। अनेक रिश्तों से भरा था प्रांगण। पर सबसे ऊँचा हो गया था शालिग्रामजी और चित्राजी का रिश्ता। बेनाम था तो क्या?

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

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गहरी नींद – मस्तिष्क को दुरुस्त बनाती है।

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गहरी नींद – मस्तिष्क को दुरुस्त बनाती है। 

जब आप सोते हैं, तब वास्तव में आपके मस्तिष्क में कुछ जीन जागृत हो जाते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि मस्तिष्क की मरम्मत व मस्तिष्क कोशिकाओं के विकास के लिए ये जीन बहुत महत्वपूर्ण हैं।

अमेरिका में वैज्ञानिकों का मानना है कि पर्याप्त नींद से विशिष्ट मस्तिष्क कोशिकाओं का निर्माण तेज होता है। इन कोशिकाओं को ओलिगोडेंड्रोसाइट्स कहा जाता है, जो मस्तिष्क के चारों ओर सुरक्षात्मक कवच तैयार करती हैं।

स्वस्थ मस्तिष्क में ओलिगोडेंड्रोसाइट्स माइलीन सुरक्षात्मक कवच का निर्माण करती हैं। यह कुछ वैसा ही कवच होता है, जैसा कि बिजली के तारों का रोधक कवच होता है। माइलीन विद्युत संवेगों को त्वरित रूप से एक कोशिका से दूसरी कोशिका में पहुंचने में मदद करता है।

‘साइंस डेली’ के मुताबिक ‘द जर्नल ऑफ न्यूरोसाइंस’ के चार सितंबर को जारी अंक में प्रकाशित जानवरों पर हुए एक अध्ययन के अनुसार ये परिणाम मस्तिष्क की मरम्मत व विकास में नींद की भूमिका के संबंध में वैज्ञानिकों को नई जानकारियां इकट्ठी करने में मदद करेंगे।

वैज्ञानिक सालों से यह जानते थे कि जीन सोने के दौरान सक्रिय हो जाते हैं, जबकि हमारे जागने के दौरान ये सुप्त अवस्था में चले जाते हैं।

वर्तमान अध्ययन मेडिसन के विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय की काइरा सिर्ली व उनके साथियों ने किया। जिसमें उन्होंने सोते हुए या जगाए रखे गए चूहों में ओलिगोडेंड्रोसाइट्स जीनों की सक्रियता मापी।

अध्ययनकर्ताओं के समूह ने पाया कि नींद के दौरान माइलीन निर्माण से जुड़े जीन सक्रिय हो जाते हैं। इसके विपरीत कोशिका मृत्यु व कोशिकीय तनाव प्रक्रिया की ओर इशारा करने वाले जीन जानवरों के जागने के दौरान जागृत हो जाते हैं।

स्विटजरलैंड के लॉसेन विश्वविद्यालय में निद्रा अध्ययनकर्ता मेहदी ताफ्ती ने कहा, ”ये परिणाम इशारा करते हैं कि नींद व अनिद्रा मस्तिष्क की किस तरह मरम्मत करते हैं या उसे नुकसान पहुंचाते हैं।”

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आकाश में कितने तारे।

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आकाश में कितने तारे। 

एक दिन ख्वाजा ने बीरबल को मूर्ख साबित करने के लिए बहुत सोच-विचार कर कुछ मुश्किल प्रश्न सोच लिए। उन्हें विश्वास था कि बादशाह के सामने उन प्रश्नों को सुनकर बीरबल के छक्के छूट जाएंगे और वह लाख कोशिश करके भी संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाएगा।

बादशाह अकबर अपने मंत्री बीरबल को बहुत पसंद करता था। बीरबल की बुद्धि के आगे बड़े-बड़ों की भी कुछ नहीं चल पाती थी। इसी कारण कई दरबारी बीरबल से जलते थे।

अकबर के एक खास दरबारी ख्वाजा सरा को अपनी विद्या और बुद्धि पर बहुत अभिमान था। बीरबल को तो वे अपने सामने निरा बालक और मूर्ख समझते थे। लेकिन दरबार में तो बीरबल की ही तूती बोलती थी।

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एक दिन ख्वाजा ने बीरबल को मूर्ख साबित करने के लिए बहुत सोच-विचार कर कुछ मुश्किल प्रश्न सोच लिए। उन्हें विश्वास था कि बादशाह के सामने उन प्रश्नों को सुनकर बीरबल के छक्के छूट जाएंगे और वह लाख कोशिश करके भी उत्तर नहीं दे पाएगा। फिर बादशाह मान लेगा कि ख्वाजा सरा के आगे बीरबल कुछ नहीं है।

ख्वाजा साहब अचकन-पगड़ी पहनकर दाढ़ी सहलाते हुए अकबर के पास पहुंचे और सिर झुकाकर बोले, ‘बीरबल बड़ा बुद्धिमान बनता है। आप भी उसकी लम्बी-चौड़ी बातों के धोखे में आ जाते हैं। मैं चाहता हूं कि आप मेरे तीन सवालों के जवाब पूछकर उसके दिमाग की गहराई नाप लें।’ ख्वाजा के अनुरोध पर अकबर ने बीरबल को बुलाया और उनसे कहा, ‘बीरबल! परम ज्ञानी ख्वाजा साहब तुमसे तीन प्रश्न पूछना चाहते हैं। क्या तुम उत्तर दे सकोगे?’ बीरबल बोले, ‘जहांपनाह! जरूर दूंगा। खुशी से पूछें।’ ख्वाजा साहब ने अपने तीनों सवाल लिखकर बादशाह को दे दिए। अकबर ने बीरबल से ख्वाजा का पहला प्रश्न पूछा, ‘संसार का केन्द्र कहां है?’ बीरबल ने तुरंत जमीन पर अपनी छड़ी गाड़कर उत्तर दिया, ‘यही स्थान चारों ओर से दुनिया के बीचों-बीच पड़ता है। ख्वाजा जी को विश्वास न हो तो वे फीते से सारी दुनिया को नापकर दिखा दें कि मेरी बात गलत है।’ अकबर ने दूसरा प्रश्न पूछा, ‘आकाश में कितने तारे हैं?’

बीरबल ने भेड़ मंगवाकर कहा, ‘इसके शरीर में जितने बाल हैं, उतने ही तारे आसमान में हैं। ख्वाजा साहब को सन्देह हो तो वे बालों को गिनकर तारों की संख्या से तुलना कर लें।’ अब अकबर ने तीसरा प्रश्न किया, ‘संसार की आबादी कितनी है?’ बीरबल ने कहा, ‘जहांपनाह! संसार की आबादी पल-पल घटती-बढ़ती रहती है, क्योंकि हर पल लोगों का मरना-जीना लगा रहता है। इसलिए यदि सभी लोगों को एक जगह इकट्ठा किया जाए तभी उन्हें गिनकर ठीक संख्या बताई जा सकती है।’ बादशाह बीरबल के उत्तरों से संतुष्ट हो गए, लेकिन ख्वाजा बोले, ‘ऐसे गोलमोल जवाबों से काम नहीं चलेगा जनाब!’ बीरबल बोले, ‘ऐसे सवालों के ऐसे ही जवाब होते हैं। ख्वाजा साहब से फिर कुछ बोलते नहीं बना।

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मेरू की मंजिल।

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मेरू की मंजिल। 

मेरू को बचपन से ही पढ़ने का बहुत शौक था। उधर उसका छोटा भाई चीनू बिल्कुल उससे उलट। बिल्कुल न पढ़ना और खेलकूद में मस्त रहना। मेरू चीनू से उम्र में तीन साल बड़ी थी और नौवीं क्लास में पढ़ती थी। चीनू छठवीं क्लास में था। मेरू अपनी क्लास में हमेशा अव्वल आती थी। उसके मम्मी-पापा को उस पर बहुत गर्व था, लेकिन चीनू की तरफ से वे परेशान रहते थे। जब भी वे पेरेंट्स मीटिंग में जाते तो चीनू के न पढ़ने और शैतानी करने की ज्यादा शिकायतें मिलतीं। लेकिन चीनू में एक खास बात थी कि स्कूल में वह फुटबाल का अच्छा खिलाड़ी था। मेरू से क्लास के सभी टीचर खुश रहते थे, क्योंकि वह मेहनत से पढ़ाई करने के साथ-साथ स्कूल में समय-समय पर होने वाली गतिविधियों में भी खूब हिस्सा लेती थी।

एक बार एक अन्य स्कूल में एक साइंस क्विज का आयोजन हुआ, जिसमें हिस्सा लेने के लिए स्कूल से सिर्फ मेरू का ही नाम चुना गया। उस स्कूल में क्विज में हिस्सा लेने के लिए बहुत सारे स्कूलों से मेधावी बच्चे आये। शुरू में तो मेरू को डर लगा कि पता नहीं कैसे-कैसे प्रश्न पूछे जाएंगे। लेकिन जब क्विज शुरू हुआ तो उसका सब डर दूर हो गया और उसने सभी प्रश्नों के उत्तर बड़ी कुशलता व निर्भीकता के साथ दिये। अंत में उसे क्विज का विजेता घोषित किया गया। जब स्कूल प्रिंसिपल को पता चला कि मेरू ने क्विज प्रतियोगिता जीत ली है तो वह बहुत खुश हुईं। उन्होंने अपने स्कूल का नाम रोशन करने के लिए उसे सम्मानित किया।

मेरू को साइंस विषय बहुत अच्छा लगता था। जब तक उसे साइंस का कोई टॉपिक समझ में नहीं आ जाता था, तब तक उसका वह पीछा नहीं छोड़ती थी। यही वजह थी कि उसे ही सभी जगह साइंस की होने वाली प्रतियोगिताओं में भेजा जाता। एक बार किसी प्रतियोगिता में उसे पूछा गया कि तुम बड़ा होकर क्या बनोगी, तो उसका जवाब था – साइंटिस्ट। उसने दसवीं क्लास में टॉप किया था। जब 11वीं में आई तो उसने साइंस स्ट्रीम ही चुनी। फिजिक्स व कैमिस्ट्री विषयों के होने वाले प्रयोगों में उसे बड़ा मजा आता था। जब क्लास के बच्चों को कोई बात समझ नहीं आती थी तो वह टीचर की अनुपस्थिति में खुद ही टीचर बन जाती थी।

एक बार स्कूल में एक नाटक का आयोजन किया गया। वह नाटक साइंस विषय पर ही आधारित था, जिसमें स्कूल के बच्चों को अभिनय करना था। उसमें एक साइंस टीचर का भी रोल था। उस रोल को निभाने की बात आई तो इसके लिए मेरू को चुना गया। मेरू प्रतिभाशाली तो थी ही और क्लास में अपने टीचर की अनुपस्थिति में टीचर बन जाती थी तो उसे यह रोल करना बड़ा आसान लगा। उसने यह रोल बखूबी निभाया। उस नाटक को देखने के लिए बड़े-बड़े अधिकारी व गण्यमान्य लोग आये थे। उनमें कुछ फिल्म व टेलीविजन के लोग भी शामिल थे। एक टीवी सीरियल के डायरेक्टर को मेरू साइंस की टीचर के रोल में बहुत पसंद आई।

वह दूसरे दिन प्रिंसिपल से मिले और मेरू के बारे में जानना चाहा। प्रिंसिपल ने मेरू को उनसे मिलाया तो वह उससे बहुत प्रभावित हुए। वह बहुत दिन से ऐसी ही एक बाल कलाकार की खोज में थे, जो उन्हें मेरू के रूप में दिखाई दे गयी थी। उन्होंने उसी समय उसे अपने एक नये टीवी सीरियल में अभिनय करने का ऑफर दे दिया। प्रिंसिपल ने भी अपनी सहमति जताई। यह सुनकर मेरू को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि उसे टीवी सीरियल में काम करने का ऑफर मिल सकता है। पर दूसरी तरफ उसका मन तो साइंस पढ़ने और एक बड़ी साइंटिस्ट बनने का था। उसने सोचा कि अगर वह टीवी सीरियल में काम करने लगेगी तो उसकी पढ़ाई का क्या होगा। और उस सपने का क्या होगा, जिसे उसे साकार करना है, क्योंकि सीरियल करने पर वह अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख पाएगी।

जब पढ़ेगी ही नहीं तो आगे कैसे बढ़ेगी? यह सोच उसने सीरियल के डायरेक्टर को यह कहकर मना कर दिया कि उसका सबसे पहला उद्देश्य पढ़ाई करके साइंटिस्ट बनना है। यह बात सुनकर प्रिंसिपल बहुत खुश हुईं, पर सीरियल के डायरेक्टर के ज्यादा आग्रह करने पर और कुछ अपनी मम्मी-पापा के कहने पर मेरू ने हां तो कर दी, पर एक शर्त रखी कि अगर उसकी पढ़ाई में कोई बाधा न आए तो वह सीरियल में एक्टिंग के लिए तैयार है। सीरियल डायरेक्टर ने कहा कि वह पढ़ाई के लिए उसे पूरा समय देंगे और उन्होंने प्रिंसिपल से भी आग्रह किया कि वह मेरू को पूरा सहयोग करें। चार महीने में सीरियल की शूटिंग पूरी हुई। लेकिन इस बीच मेरू की पढ़ाई का रुटीन कुछ गड़बड़ा गया। वह पढ़ाई में पिछड़ गई थी, क्योंकि जो समय वह सीरियल करने से पहले पढ़ाई में देती थी वह समय देना सीरियल करने पर मुमकिन नहीं था। उसने अच्छे से शूटिंग पूरी कर ली थी। लेकिन अब उसे अपनी पढ़ाई पूरी करनी थी, जिसके लिए उसके सभी टीचरों ने उसे पूरा सहयोग किया।

मेरू को 11वीं में बहुत मेहनत करनी पड़ी। उसका हौसला बुलंद था। उसके अच्छे मार्क्स आए। जब 12वीं में आई तो स्कूल की ओर से उसे अमेरिका जाने का मौका मिला। वहां उसने एक साइंस प्रोग्राम में हिस्सा लिया। वह अब ऐसी सीढियों पर चढ़ गई थी, जो उसे साइंटिस्ट बनने की मंजिल पर ले जा रही थीं।

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बात का घाव।

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बात का घाव। 

बहुत पुरानी बात है। एक लकड़हारे और शेर में दोस्ती थी। दोनों का मन एक दूसरे के बिना नहीं लगता था। शेर जंगल में रहता था और लकड़हारा गांव में। लकड़हारा लकडिया काटकर और उन्हें बेचकर अपना घर चला रहा था। सारे दिन वह जंगल में लकडिम्यां काटता था और शेर उसके पास बैठकर उससे बातें किया करता था।

एक दिन लकड़हारे ने सोचा कि वह अपने दोस्त शेर को दावत पर बुलाए। अगले दिन उसने शेर के सामने दावत का प्रस्ताव रखा। शेर ने दावत का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। लकडियां काटने के बाद शाम को लकड़हारा शेर को अपने घर ले गया। शेर को लकड़हारे के साथ देखकर लकड़हारे की पत्नी और बच्चे डर गए।

उन्हें डरा हुआ देखकर लकड़हारे ने उनका डर दूर करते हुए बताया कि शेर उसका दोस्त है और आज हमारा मेहमान है। लकड़हारे ने शेर की खूब आवभगत की। रात को सोने का वक्त होने पर लकड़हारे ने शेर को अपने साथ घर में सुलाना चाहा, पर उसकी पत्नी ने शेर को घर में सुलाने का विरोध करते हुए कहा कि वह शेर को किसी कीमत पर घर में नहीं सोने देगी, क्योंकि शेर जैसे खूंखार जीव का कोई भरोसा नहीं होता। ऐसा जीव कभी भी नुकसान पहुंचा सकता है। पत्नी के विरोध करने पर लकड़हारे ने पत्नी को समझाया, ‘यह शेर और शेरों की तरह नहीं है।

यह साथ सोने पर किसी को भी नुकसान नहीं पहुंचाएगा।’ लेकिन उसकी पत्नी शेर को घर में सुलाने को तैयार नहीं हुई। आखिर थककर लकड़हारे को अपनी पत्नी की बात माननी पड़ी। लकड़हारे की पत्नी ने लकड़हारे से शेर के गले में रस्सी बांधकर घर के बाहर खड़े पेड़ से बांधने को कहा। पत्नी की बात मानकर लकड़हारे ने ऐसा ही किया।

उस रात मौसम बहुत खराब हो गया, लकड़हारा अपनी पत्नी और बच्चों के साथ घर में आराम से सोता रहा, किंतु शेर बेचारा सारी रात पेड़ के नीचे बंधा बारिश और तेज हवा के थपेड़े सहता रहा। सुबह को लकड़हारा सोकर उठा तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ कि उसकी वजह से उसका मित्र सारी रात बारिश में भीगता रहा। यह सोचकर लकड़हारे को बहुत दुख हुआ, उसने शेर से माफी मांगी। शेर ने मुस्कराते हुए कहा, ‘इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है दोस्त, यह खराब मौसम की मेहरबानी है।’

शेर की बात सुनकर लकड़हारे को खुशी हुई कि उसका मित्र उससे नाराज नहीं है। लकड़हारा लकडिया काटने जंगल गया तो शेर को अपने घर पर रोकना चाहता था, पर शेर नहीं रुका। कई दिन गुजर गए। एक दिन लकड़हारा लकडियां काटने के बाद घर जाने की तैयारी में था तो शेर उसके पास आया और बोला, ‘दोस्त, अपनी कुल्हाड़ी मेरी पीठ पर मारो।’

शेर की बात सुनकर लकड़हारा चौंक गया। उसने सोचा, शायद शेर उससे मजाक कर रहा है। शेर ने दोबारा कुल्हाड़ी मारने को कहा तो लकड़हारा हैरानी से बोला, ‘तुम क्या कह रहे हो? मैं भला तुम्हें कुल्हाड़ी कैसे मार सकता हूं?’

लकड़हारे के इनकार करने पर शेर ने दहाड़ते हुए कहा, ‘अगर तुमने मेरा कहा नहीं माना तो मैं तुम्हें खा जाऊंगा।’

शेर का बदला रूप देखकर लकड़हारा डर गया। उसकी समझ में नहीं आया कि उसका मित्र उससे कुल्हाड़ी मारने को क्यों कह रहा है। उसने इस बारे में शेर से पूछा, लेकिन शेर ने कुछ नहीं बताया। शेर ने तीसरी बार चेतावनी देते हुए कुल्हाड़ी मारने के लिए कहा। मरता क्या न करता, लकड़हारे ने अपनी जान बचाने के लिए शेर की पीठ पर कुल्हाड़ी दे मारी। कुल्हाड़ी लगते ही शेर की पीठ पर गहरा जख्म हो गया, जिससे खून बहने लगा। शेर अपनी गुफा की ओर बढ़ गया।

अगले दिन लकड़हारा डरते-डरते जंगल में लकडियां काटने गया कि पता नहीं आज उसके प्रति शेर का कैसा व्यवहार होगा। शेर ने लकड़हारे के साथ और दिन की तरह व्यवहार किया तो लकड़हारे के दिल को तसल्ली हुई। शेर की पीठ का जख्म वक्त के साथ-साथ भरता गया।

एक दिन शेर ने लकड़हारे से अपने जख्म के बारे में पूछा तो लकड़हारे ने खुश होकर बताया, ‘मित्र, तुम्हारा जख्म अब पूरी तरह भर गया है।’

लकड़हारे के बताने पर शेर गंभीर होते हुए बोला, ‘जानना चाहते हो मित्र, मैंने तुमसे अपनी पीठ पर कुल्हाड़ी क्यों लगवाई थी?’ शेर के कहने पर लकड़हारे ने हामी भर दी। वह भी यह बात जानने को उत्सुक था। शेर उसे बताने लगा, ‘घर आया मेहमान भगवान के समान होता है दोस्त और मेहमान का आदर बड़े प्रेम से किया जाता है। मैं भी तुम्हारा मेहमान था, लेकिन तुमने मुझे घर से बाहर पेड़ से बांध दिया, जहां मैं सारी रात बारिश में भीगता रहा। उस दिन की बात का जख्म मेरे दिल पर आज भी ताजा है। मैंने तुमसे अपनी पीठ पर कुल्हाड़ी इसीलिए लगवाई थी ताकि मैं तुम्हें दिखा सकूं कि चोट का जख्म तो भर जाता है, किंतु बात का जख्म कभी नहीं भरता। एक बात कान खोलकर सुन लो, तुम्हारी और मेरी मित्रता केवल आज तक थी। आज के बाद न मैं तुम्हारा मित्र हूं और न ही तुम मेरे मित्र हो और अगर आज के बाद तुम मुझे इस जंगल में दिखाई दे गए तो मैं तुम्हें अपना भोजन बना लूंगा।’ शेर अपनी बात पूरी करने के बाद चला गया।

लकड़हारा शेर को जाते हुए देखता रहा। अपनी पत्नी के गलत व्यवहार की वजह से आज उसने अपना पुराना मित्र खो दिया था। उसे बहुत पछतावा हुआ, किंतु अब पछताने से क्या फायदा था। लकड़हारा दुखी मन से गांव की तरफ चल दिया।

क्या सीख सकते हो: किसी को भी बुरा मत बोलो। दोस्त को मजाक में भी अपशब्द न कहो। अगर तुम्हे किसी की कोई बात बुरी भी लगती है तो उसे बता दो कि तुम्हें इस तरह से बात करना पसंद नहीं है। हमेशा घर आए मेहमान का खूब आदर-सम्मान करो।

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

-KMSRAJ51

 

 

 

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वजन कम करने और कफ में आराम पाने के ये हैं घरेलू उपाय।

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 वजन कम करने और कफ में आराम पाने के ये हैं घरेलू उपाय।

मजबूत होगा इम्यून सिस्टम।

अगर इम्यून सिस्टम को मजबूत करना हो तो रोज सुबह खाली पेट करेले का जूस पीएं। इससे इंफेक्शन से लड़ने की ताकत बढ़ जाती है।

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⇒ बढ़ेगा फाइबर इनटेक।

वजन कम करने के लिए अगर फाइबर इनटेक बढ़ाना हो तो खीरे को सलाद में जरूर शामिल करें। इसमें फाइबर के साथ फ्लूड भी काफी होती है।

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 भर जाएंगे घाव।

अगर कोई चोट लगी हो या कहीं कट गया हो तो गाजर कीसकर उसे आटे में मिलाएं। इस मिश्रण को चोट पर बांधें। इससे घाव जल्दी भरेगा।

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कफ में मिलेगा फायदा।

एक चम्मच अजवायन को एक चम्मच हल्दी के साथ उबालें। इसमें शहद मिलाकर दिन में दो-चार बार लें। कफ में फायदा होगा।

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चेरी।

फायदा  गठिया, मांसपेशियों के दर्द में राहत के लिए, हर दिन 45 खा सकते हैं।

चेरी में मौजूद तत्व एंटोसायनिन्स कहलाते हैं। इसमें काफी मात्रा में एंटी ऑक्सीडेंट्स होते हैं। ये दर्द को रोकते हैं और दर्द पैदा करने वाले एंजाइम्स को रोकने लगते हैं। यह ठीक वैसे ही चलते हैं, जैसे एस्प्रिन या नेप्रोक्सेन।

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अदरक।

फायदा  गठिया, माइग्रेन, मांसपेशियों की ऐंठन में राहत के लिए लाभदायक। हर दिन 1/4 चम्मच जरूर खाएं।

पेट की गड़बड़ी को दुरुस्त करने, समुद्र में बीमार महसूस करने पर या उल्टी आने पर इसका सेवन किया जाना चाहिए। यह आंतों में फंसी हुई हवा को भी निकाल देती है। इसको भोजन में कई तरह से शामिल किया जा सकता है। चाहें तो मसालों के साथ या सुबह की चाय के साथ भी पी सकते हैं।
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 हर्बल टी।

फायदा  सिरदर्द में राहत के लिए, हर दिन करीब तीन कप।
ग्रीन टी एंटी-ऑक्सीडेंट्स से भरपूर होती है। इसमें कम मात्रा में कैफीन होता है। 150 मिलीलीटर के कप में 8 से 36 मिग्रा तक कैफीन होता है। जबकि फिल्टर कॉफी में इतनी ही मात्रा में यह 106 से 164 ग्राम का होता है। इससे ब्लड वैसल सिकुड़ती है और सिर का दर्द तेज़ी से कम हो जाता है।
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महाभारत के अनुसार स्त्री और पुरुष को नहीं करना चाहिए ये ३ काम।

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महाभारत के अनुसार स्त्री और पुरुष को नहीं करना चाहिए ये ३ काम।

शरीर से होने वाले 3 महापाप : शरीर से होने वाले 3 महापाप बताए गए हैं।

इनमें से पहला पाप है हिंसा करना। किसी भी परिस्थिति में अनावश्यक रूप से हिंसा करना पाप माना गया है।

पुरुषों के लिए शरीर से होने वाला एक भयंकर महापाप है परस्त्रीगमन और स्त्रियों के अनुसार परपुरुषगमन करना। किसी भी परिस्थिति में ये कर्म महापाप माना गया है। पति-पत्नी को एक-दूसरे के प्रति ईमानदार रहते हुए वैवाहिक जीवन के नियमों का पालन करना चाहिए। एक-दूसरे के विश्वास को तोडऩा महापाप है।

शरीर से होने वाला अगला पाप है चोरी। चोरी करना भी महापाप माना गया है। व्यक्ति को खुद की मेहनत से धन आदि प्राप्त करना चाहिए। अन्य इंसानों की वस्तुएं चुराना पाप है।


 

महाभारत के अनुशासन पर्व के अनुसार वाणी से होने वाले चार पाप बताए गए हैं। व्यर्थ की बात करना यानी बकवास करना भी एक पाप है। निष्ठुर यानी कठोर वचन बोलना भी पाप की श्रेणी में आता है।
व्यक्ति को कभी भी किसी की चुगली नहीं करना चाहिए। कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए। ये भी वाणी से होने वाले पाप हैं
अनुशासन पर्व के अनुसार मन से होने वाले तीन पाप इस प्रकार हैं- पहला पाप है दूसरों के धन का लालच करना और उसे हड़पने की सोचना। किसी भी व्यक्ति के धन को हड़पना और ऐसा सोचना भी पाप है।
कभी भी दूसरे लोगों से वैर का भाव नहीं रखना चाहिए। सभी प्राणियों से प्रेम का भाव रखना ही हमारा धर्म है।


मन से होने वाला तीसरा पाप है कर्म के फल पर विश्वास न करना। यदि हमें विधाता द्वारा दिए गए कर्म के फल पर विश्वास नहीं करते हैं तो यह भी एक पाप ही है।
जो लोग इन दस महापापों को या इनमें से किसी एक पाप को भी करते हैं तो उन्हें भयंकर परिणाम भोगने पड़ सकते हैं। अत: इस कार्यों से बचना चाहिए।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

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मन की उड़ानः दूसरों के पंखों से कब तक उड़ोगे।

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मन की उड़ान दूसरों के पंखों से कब तक उड़ोगे।

मन की उड़ान।

sapana

मन की उड़ान।

 जीवन एक सुंदर फूल की तरह है।

 तू ना हो निराश कभी मन से।

 समय एक महान गुरु की तरह है।

हमेशा सकारात्मक सोच रखना मन में।

मैं एक पेन का उपयोग कर रहा हूँ, मानव जीवन परिवर्तन के लिए।

प्रकृति ने मानव को एक विकसित दिमाग दिया है। इसके सही इस्तेमाल से मनुष्य अपने जीवन में सार्थक बदलाव ला सकता है। जहां तक लक्ष्य की बात है, इसकी प्राप्ति बिना बलिदान के संभव नहीं है। अगर मन में निष्ठा और नि:स्वार्थता हो तो लक्ष्य तक पहुंचने में काफी मदद मिलती है।

कभी न बैठें भाग्य के भरोसे।

भाग्य के भरोसे बैठकर अपने जीवन को नष्ट केवल कमजोर व्यक्ति करते हैं। जो कुछ कर गुजरने का हौसला रखते हैं, वे भाग्य को कोरी कल्पना मानते हैं। कामयाबी हासिल करने के लिए धैर्य, ठोस योजना, सही साधन व कठोर परिश्रम की आवश्यकता होती है।

हर किसी को नहीं मिलता गॉडफादर।

जीवन में ऐसा व्यक्ति मिलना बहुत मुश्किल है, जो हमें शिखर पर बिठा दे। ऐसे में गॉड-फादर के भरोसे बैठना उचित नहीं है। हमें अपनी जिंदगी की परिभाषा खुद लिखनी होगी। अपने लिए अवसर खुद खोजने होंगे।

लकीर का फकीर रहता है सदा नाकामयाब।

जिंदगी में लकीर का फकीर बने रहना स्वयं को असफलता की गर्त में धकेलने जैसा है। सफल वही होता है, जो वक्त के अनुसार खुद को ढालता है।

दूसरों के लिए योजनाएं ही क्यों बनाएं।

क्या यह सच नहीं है कि जीवन में हम जितनी भी योजनाएं बनाते हैं, उनमें से अधिकांश दूसरों की कामयाबी के लिए बनाते हैं। हम अपनी प्रगति, अपने विकास व अपनी योग्यता को निखारने के लिए आखिर योजनाएं क्यों नहीं बनाते? इस तथ्य पर विचार करना भी बेहद जरूरी है।

तेज दिमाग ही देखता है नए अवसर।

जिंदगी में जितने भी महान अवसर आते हैं, उन्हें हमारी आंखें नहीं देख सकतीं, लेकिन तेज दिमाग न केवल उन्हें देखता है, बल्कि उन्हें पहचानता भी है, इसलिए जो दिमाग सोचता है, उसकी कभी अवहेलना न करें।

एक ही है अमीर बनने का फार्मूला।

संसार में अमीर बनने का केवल एक ही फार्मूला है। अगर आप दूसरों के लिए काम करते हैं तो जो भी कार्य करें उसे पूर्ण निष्ठा, पूर्ण ईमानदारी से अपना कार्य समझकर करें। एक न एक दिन दौलत तुम्हारे कदम अवश्य चूमेगी।

विश्वसनीयता कभी न खोएं।

जीवन में साख या विश्वसनीयता बड़ी मुश्किल से कमाई जाती है, लेकिन इसके सहारे बड़े-बड़े काम चुटकियों में हो जाते हैं, लेकिन अगर जरा-सी भी लापरवाही बरती जाए तो साख खत्म होने में देर नहीं लगती।

शॉर्ट-कट का रास्ता कभी नहीं।

शॉर्ट-कट के रास्ते से जीवन में कभी कामयाबी हासिल नहीं की जा सकती। कामयाबी का रास्ता काफी लंबा है, जिसमें कदम-कदम पर संघर्ष करना पड़ता है।

लेग पुलिंग तो होगी।

जब भी आप आगे बढ़ेंगे, आपकी टांग खींचने का प्रयास जरूर किया जाएगा। सफलता तभी मिलेगी, जब आप टांग खींचने वालों से जरा भी नहीं उलझेंगे।

आलोचना के पीछे छिपी सद्भावना को दें सम्मान।

कभी-कभी ऐसा भी होता है, जब हमारे भले के लिए कोई हमारी आलोचना करता है। ऐसी आलोचना के पीछे छिपी सद्भावना को अवश्य सम्मान दें।

खुद बनिए अपने बॉस।

अगर कामयाबी की डगर पर चलना है तो हमें अपना बॉस खुद बनना होगा। खुद जोखिम भी उठाने होंगे तथा दूसरों का मार्गदर्शन भी करना होगा।

बूढ़ा वही, जिसने सीखना बंद कर दिया।

बुढ़ापे का उम्र से कोई संबंध नहीं है। जो हमेशा नया सीखता है, वक्त के साथ स्वयं को बदलता है, वह हमेशा जवान रहता है।

क्षमताओं का 10 प्रतिशत भी नहीं होता इस्तेमाल।

सफलता का एक मार्ग यह भी है कि हम जितना काम करते हैं, उससे ज्यादा काम करने की आदत डालें। अपनी क्षमता को पहचानने के साथ-साथ हम उसका पूरा इस्तेमाल भी करें।

kms1006

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अंतर जीवन को केंद्र पर लाना जरूरी ** By-kmsraj51*****

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भगवान बुद्ध की जीवन-यात्रा वास्तव में खुद की और सामान्य जनों की दुखमुक्ति के दो लक्ष्यों को अपने भीतर लेकर की गई यात्रा है, इसीलिए बुद्ध के दो रूप स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। वे खुद की मुक्ति के लिए किन अग्निपरीक्षाओं से गुजरे, इसका वर्णन आश्चर्यचकित करने वाला है। उनकी निर्वाण-प्राप्ति उनकी खुद की मुक्ति थी, इसीलिए उनका एक रूप स्वयं के मुक्तिदाता का है। निर्वाण-प्राप्ति के बाद आगे के पैंतालीस वर्षो की उनकी यात्रा वास्तव में अंत:करणपूर्वक सामान्यजनों को दुख-मुक्त करने के लिए किया गया श्रम है। उनके जीवन का यह कालखंड मार्गदाता का है। 

 

खुद का मुक्तिदाता हुए बगैर अन्य जनों के मार्गदाता की भूमिका निभाना आत्मवंचना होती है, यह बुद्ध का जीवन-चरित्र कहता है। इन दोनों भूमिकाओं में एक प्रामाणिक रिश्ता होता है, इसका ज्ञान अगर नहीं रहा तो ‘व्यक्ति-मुक्ति या समाज-मुक्ति’ जैसे विवादग्रस्त विकल्पों की भारी-भरकम चर्चा शुरू हो जाती है। ऐसी चर्चा बौद्ध-दर्शन के बाद के विकास-काल में हुई। बुद्ध-चरित्र व्यक्ति-मुक्ति के साथ ही मार्गदाता के स्वरूप को भी महत्व देने वाला जीवन है। इसीलिए तो बुद्ध ने पैंतालीस वर्ष घुमक्कड़ी की। स्वयं मुक्त हुए बगैर औरों को मुक्ति का मार्ग बतलाया नहीं जा सकता, यह उनके जीवन द्वारा प्रस्तुत किया गया आदर्श है। मुक्ति कोई क्षणिक बात नहीं है। वह एक जीवन अनुभव होती है और उसे बार-बार अनुभव करना पड़ता है। 

 

जिन्हें मुक्त होने की इच्छा है, वे पहले स्वयं को जानें और वहीं से शुरुआत करें। स्वयं के मन को जानें — बौद्ध-साहित्य की यह पहली शिक्षा है। यही इस साहित्य की विशेषता है। इस साहित्य ने मनुष्य मन के बारे में विविध स्तरों पर विचार किया है। चौथी शती में असंग और वसुबंधु ने भारत में और छठी शती में प्रसिद्ध चीनी बौद्ध दार्शनिक चिह-ही (Chih-hi) ने चीन में मन संबंधी जो विचार किया है, वह आश्चर्यचकित करने वाला है। मनोविज्ञान की मनोविश्लेषण शाखा के सिग्मंड फ्रॉयड का स्थान असाधारण है। उनका यह स्थान मान्य करते हुए भी अवचेतन का (Sub-Conscious) विचार बौद्ध-दर्शन ने अत्यंत शक्ति के साथ विकसित किया था — इसे भी स्वीकार करना चाहिए। मनुष्य के एहसास (Conciousness) के नीचे के स्तर पर अवचेतन का अस्तित्व और उसका सूक्ष्मता से विचार सच्चे अर्थो में भारत में असंग और वसुबंधु ने किया है। प्राचीन बौद्ध-साहित्य में मन के विविध रूपों का जो प्रतिबिंब दिखलाई देता है, अब हम उस पर विस्तार से विचार करेंगे। 

 

केवल बौद्ध-साहित्य में ही नहीं, बल्कि प्राचीन विश्वसाहित्य में इस दृष्टि से ‘धमपद’ सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है। उसे ‘ग्रंथों का ग्रंथ’ (Book of Books) कहना अधिक सार्थक होगा। धम्मपद के अनुसार —
 
‘(इस) चंचल, चपल, दुर्-रचय, दुर्-निवार्य चित्त को मेधावी पुरुष, उसी प्रकार सीधा करता है, जैसे बाण बनाने वाला बाण को।’ 
‘जैसे जलाशय से निकालकर स्थल पर फेंक दी गई मछली तड़पती है, (वैसे ही) मार (राग, द्वेष, मोह) के फंदे से निकलने के लिए यह चित्त  (तड़पता है)।’
 
‘(जो) कठिनाई से निग्रहयोग, शीघ्र ग्रामी, जहां चाहता है वहां चला जाने वाला है, ऐसे चित्त  का दमन करना उद्यम है, दमन किया गया चित्त सुखप्रद होता है।’
 
‘कठिनाई से जानने योग्य, अत्यंत चालाक, जहां — चाहे वहां ले जाने वाले चित्त  की, बुद्धि मान रक्षा करे, सुरक्षित चित्त सुखप्रद होता है।’
‘दूरगामी अकेला विचरने वाला निराकार, गुहाशाई इस चित्त का, जो संयम करेंगे, वह काम के बंधन से मुक्त होंगे।’
 
‘जिसका चित्त स्थितप्रज्ञ नहीं है, जो सच्चे धर्म को नहीं जानता, जिसका चित्त प्रसन्नताहीन है, उसे परम ज्ञान नहीं मिल सकता।’
 
‘जिसका चित्त दोषरहित है, जिसका मन स्थिर है, जो पाप-पुण्य विहीन है, उस सजग रहने वाले के लिए किसी भी प्रकार का भय नहीं है।’
 
ऐसे इस चंचल घुमक्कड़, चपल, स्वैर और बेलगाम मन को जीतना कितना कठिन है, इसकी कल्पना साधक ही कर सकता है। प्रत्यक्ष युद्ध में कुशल योद्धा दस लाख शत्रु दलों को सहज रूप से पराजित कर सकता है, परंतु वह अपने मन पर विजय संपादित नहीं कर सकता, क्योंकि मन पर होने वाले प्रहार शत्रु प्रहारों से भी अधिक भेदक होते हैं। इस कारण शत्रु द्वारा किए गए विनाश की अपेक्षा मन द्वारा किए गए विनाश अधिक प्रलयंकारी होते हैं। इस मनरूपी शत्रु का वर्णन करते समय धम्मपद कहता है —
 
‘जितनी हानि शत्रु शत्रु की और बैरी बैरी की करता है, झूठे मार्ग पर चला चित्त उससे अधिक बुराई करता है।’
 
इस मनरूपी महाशत्रु का पूर्ण नि:पात किए बगैर निर्वाण और चिरसुख शांति की प्राप्ति असंभव है। इस मन रूपी महाशत्रु पर विजय प्राप्त करने वाला योद्धा ही चिरसुख-शांति के साम्राज्य का चक्रवर्ती सम्राट हो सकता है, इसीलिए धमपद ने मुक्त मनुष्य को इस महायोद्धा से श्रेष्ठ स्थान देते हुए कहा है :
‘जो व्यर्थ के पदों से युक्त सौ गाथाएं भी गाएं, उनसे धर्म का एक पद भी श्रेष्ठ है, जिसे सुनकर संग्राम में हजारोंहजार मनुष्य को जीत ले, उससे एक अपने को जीतने वाला कहीं उद्यम होता है।’
 
खुद के मन से युद्ध करना अर्थात् खुद का खुद से संग्राम करने की तैयारी में लगना है। यह संग्राम भयग्रस्त अवस्था में नहीं किया जा सकता। मनुष्य के भीतर की सारी भयग्रस्तता का उद्गम उसमें स्थित अकुशल विचार और अनैतिक कर्मो के परिणामों में है। बाहरी विश्व का शत्रु जितने आघात, जन्म करता रहता है, उससे कई गुना अधिक आघात या जन्म मनुष्य के भीतरी मन रूपी शत्रु से होता रहता है। मन के जन्मों से घायल मनुष्य  स्वत्व और आत्मविश्वास खो बैठता है। इस कारण वह भीतर से भयग्रस्त हो जाता है। 
 
अपनी इस भयग्रस्तता को छिपाने के लिए वह बाह्य विश्व में अधिक आक्रामक और हिंसात्मक बन जाता है। आज तक के मनुष्य-जाति के इतिहास में मनुष्य ने ही अन्य मनुष्यों पर आक्रमण कर उनके रक्त से इस धरती को नहलाया है। मनुष्य के आक्रामक और हिंसात्मक स्वरूप का उद्गम उसे भीतर से घायल करने के उद्देश्य से उसके मन पर छोड़े गए प्रलोभन रूपी बाण होते हैं। यह बाण आकर्षक रूपों में और उसकी आसक्ति से उस पर आक्रमण करते हैं। इसी को बौद्ध-चिंतन में मार-युद्ध कहा गया है। 
 
मनुष्य के भीतरी मन रूपी शत्रु के पास में जितने भी बाण हैं, उन्हें निर्थक करना, उनका विनाश करना ही मारयुद्ध में आत्मविश्वासपूर्वक विजय की दिशा में जाना है। 19वीं शती के मध्य में कार्ल मार्क्‍स ने मनुष्य के अकेलेपन (Alienation) को लेकर अभूतपूर्व चिंतन किया है। उनका सारा रुख बाह्य स्थिति की ओर रहा है। मनुष्य अपनी मनुष्यता को कैसे खो चुका — इस पर मार्क्‍स ने अपने काल के अनुरूप भाष्य किया है। भगवान बुद्ध मनुष्य के अकेलेपन का उद्गम उसके ‘भीतर’ छिपकर बैठे हुए शक्तिशाली शत्रु की शक्ति में खोजते हैं। मनुष्य की अकेलेपन से मुक्ति अर्थात् उसके द्वारा मन पर प्राप्त की गई विजय है। इस मन रूपी शत्रु के पास स्वार्थ-परार्थ, पुत्र और वित्त, आकांक्षा, भूमि और समृद्धि की इच्छा जैसे एक-से-एक प्रलोभनकारी तीक्ष्ण बाणों का संचय होता है। इन बाणों की धार को भोथरा करने वाला ही मन रूपी शत्रु पर विजय प्राप्त कर सकता है।
 
भगवान बुद्ध यहां पर मनुष्य के मूलभूत दुख के संबंध में बोल रहे हैं। मनुष्य के जीवन-अस्तित्व में स्थित इस मूलभूत द्वैत को वे सुलझाना चाहते हैं। यह उलझन अनेक गांठों से युक्त है। इन गांठों को छुड़वाने के लिए बुद्ध वासना मुक्ति का आग्रह करते हैं। वासनाओं की मुक्ति अर्थात् अकुशल, दुखदायक, अधर्मकारक और स्वार्थी वासना से मुक्ति नहीं, अपितु सभी-के-सभी कुशल-अकुशल, सुखकारकदुखकारक, स्वार्थपरायण- परार्थपरायण, खेद से परिपूर्ण-आनंददायक — इन सभी प्रकार की कामनाओं से मुक्ति है, क्योंकि निर्वाण की अवस्था में इनमें से कुछ भी शेष नहीं रहता। इन सबसे मुक्ति अगर चाहिए तो इसके लिए मनुष्य में ‘शील की उत्पत्ति’ होनी पड़ती है। शीलवंत का वर्णन करते हुए धम्मपद कहता है —
‘सत्पुरुष सभी जगह जाते हैं। वह भोगों के लिए बात नहीं चलाते, सुख मिले या दुख — पंडितजन विकार प्रदर्शन नहीं करते।
 
‘जो अपने लिए या दूसरों के लिए पुत्र, धन और राज्य नहीं चाहते, न अधर्म से अपनी उन्नति चाहते हैं, वे ही सदाचारी (शीलवान) प्रज्ञावान और धार्मिक होते हैं।’
 
बुद्ध वासनाओं के दमन की शिक्षा नहीं देते। वे वासना मुक्ति की शिक्षा देते हैं। वासनाओं का उद्गम स्थान जो मन है, उससे युद्ध करने के लिए कहते हैं। और उस पर विजय प्राप्त करना ही वासनाओं से मुक्त होना है। बुद्ध को दमन की अपेक्षा मुक्ति में अधिक रस था। इसीलिए तो उन्होंने आपादान स्मृति समाधि प्राप्त की थी। यह समाधि पाप के जड़ के स्थान को ही उध्वस्त करने वाली होती है। पाप की जड़ जिसमें से जन्म लेती है, उस मन से मुक्ति ही बुद्ध की सच्ची शिक्षा है। बौद्ध तत्व-चिंतन का मूल ‘मन की मुक्तावस्था’ अथवा जिसे हम ज्हृo रूद्बठ्ठस्रज् कहें, वह है। धम्मपद कहता है —
‘उपशांत और यथार्थ ज्ञान द्वारा मुक्त हुए उस अर्हत पुरुष का मन शांत होता है। वाणी और कर्म शांत होते हैं।’
 
मन शांत होने का अर्थ है — मन की सभी कामनाओं का निरस्त हो जाना। कामनाओं का उच्छेद, कामनाएं जिस भूमि में जन्म लेती हैं, उस भूमि से मुक्ति प्राप्त किए बगैर हो नहीं पाता। यह मुक्ति सहस्र नाम के आडंबर से प्राप्त नहीं हो सकती। अधिक-से-अधिक कुछ समय के लिए मन का दमन किया जा सकता है। इस प्रकार का दमन कृत्रिम होता है। अंतरजीवन को केंद्र स्थान पर लाना जरूरी है। इस केंद्र स्थान को जब प्रज्ञा शक्ति प्रकाशित करती जाती है, तब उसमें से प्रेम के निर्झर फूटने लगते हैं। ऐसा जब घटित होता है, तब एक नया जीवन अनुभव प्राप्त होता है। यह जीवन सार्थक होने का अनुभव है। सौ वर्ष की नीरस जिंदगी जीने की इच्छा अपने आप गल जाती है। धम्मपद कहता है —
 
‘आलसी और अनुद्योगों के सौ वर्षो के जीवन से दृढ़ उद्योग करने वाले के जीवन का एक दिन श्रेष्ठ है।’ 
 
‘संसार में वस्तुओं की उत्पत्ति और विनाश का ख्याल न करते हुए सौ वर्ष जीने के जीवन से, उत्पत्ति और विनाश का ख्याल करने वाले के जीवन का एक दिन श्रेष्ठ है।’
 
‘अमृत पद (दुख निवारण) का ख्याल न करते हुए सौ वर्षो के जीवन से, अमृत पद को देखने वाले के जीवन का एक दिन श्रेष्ठ है।’ ‘उद्यम धर्म को न देखने के सौ वर्षो के जीवन से उद्यम धर्म को देखने वाले के जीवन का एक दिन श्रेष्ठ है।’
 
यह अमृतानुभव किसी के उपदेशों से, देहदंड से, कामोभोग की तृप्ति से अथवा किसी के चरणों में अपने जीवनअस्तित्व को समर्पित करने से प्राप्त नहीं होता। यह अनुभव एक व्यक्तिगत बात है। इसके लिए खुद को ही ठीक से देखना पड़ता है। खुद की ओर खुद ही कैसे देखें — इसका संकेत बुद्ध का धम मनुष्य को देता है। इसीलिए बुद्ध की भूमिका औरों के लिए मार्गदाता की है। उस मार्ग पर एकाकी यात्रा कैसे करें, इसका प्रदर्शन स्वत: बुद्ध ने ही बोधिसत्व अवस्था में करके बतलाया था। इस मार्ग से जाने वालों के लिए उन्होंने एक आदर्श उपलध करा दिया है। इस मार्ग पर ठोस कदम रखते समय खुद को ही खुद का स्वामी होना पड़ता है।
 
‘व्यक्ति खुद ही अपना मालिक है! दूसरा कौन मालिक हो सकता है? अपने को भली प्रकार दमन कर लेने पर वह एक दुर्लभ मालिक को पाता है।’ — अत्तवग्गो 
 
भगवान बुद्ध खुद को खुद का स्वामी होने के लिए कहते हैं — यह सीधी-सादी बात नहीं है। मनुष्य-प्राणी की आज तक की यात्रा ‘उससे भी कोई श्रेष्ठ है’, इस ‘कल्पित के असत्य से’ हुई है। इस कारण मनुष्य खुद को जानने की अपेक्षा ‘उसे ही’ जानने का प्रयत्न करता रहा। उसके पीछे लगकर खुद के अज्ञान को उसने छिपाकर रखा। खुद की खोज के लिए उसका कभी अपने मन से संघर्ष नहीं हुआ। ईश्वर की खोज के लिए वह वासनाओं का दमन करता रहा, परंतु दमन से वासनाएं बुझती नहीं। धीमी फूंक से वह पुन: प्रज्‍जवलित होती हैं। धम्मपद कहता है —‘सच बोलें, क्रोध न करें, थोड़ा भी मांगने पर दें — इन तीन बातों से मनुष्य देवताओं के पास जाता है।’
 
मनुष्य के अंत:करण से क्रोध का नष्ट होना ही वास्तव में उसके अंत:करण का प्राणी जाति के प्रति प्रेम से भर जाना है। सहृदय अंत:करण से जन्म लेने वाले प्रेम को प्रत्यक्ष आचरण में कृतिशील करना, अभिव्यक्ति देना ही ईश्वर होना है। बुद्ध ईश्वर का अस्तित्व नहीं मानते। इसका एकमात्र कारण इतना ही था कि प्रेमपूर्ण मनुष्य उनका आदर्श था।
 
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महात्मा गांधी के अनमोल वचन हिन्दी में।

Kmsraj51 की कलम से…..

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राष्ट्र पिता महात्मा गांधी जी।

Name Mohandas Karamchand Gandhi / मोहनदास करमचंद गाँधी
Born 2 October 1869
Porbandar, Bombay Presidency, British India
Died 30 January 1948 (aged 78)
New Delhi, Union of India
Nationality Indian
Field Politics,Social Work
Achievement पूरे विश्व में सत्य और अहिंसा के  प्रेरणास्रोत.
भारत के राष्ट्रपिता.
भारत के स्वतंत्रता-संघर्ष के सूत्रधार.
एक साधारण व्यक्ति कितना असाधारण हो सकता है इसका प्रमाण हैं महात्मा गाँधी.
महात्मा गाँधी की आत्मकथा “सत्य के प्रयोग ” उन चुनिन्दा किताबों में से है जिसने मेरे जीवन पर गहरा असर डाला है. आप भी इसे अवश्य पढ़ें।

महात्मा गाँधी के अनमोल विचार

Quote 1. A man is but the product of his thoughts what he thinks, he becomes.

In  Hindi : व्यक्ति अपने विचारों से निर्मित एक प्राणी है, वह जो सोचता है वही बन जाता है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 2.  A small body of determined spirits fired by an unquenchable faith in their mission can alter the course of  history.

In Hindi  : अपने प्रयोजन  में दृढ  विश्वास रखने वाला एक सूक्ष्म शरीर इतिहास के रुख को बदल सकता है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 3. Always aim at complete harmony of thought and word and deed. Always aim at purifying your  thoughts and everything will be well.

In Hindi : हमेशा अपने विचारों, शब्दों और कर्म के पूर्ण सामंजस्य का लक्ष्य रखें. हमेशा अपने विचारों को शुद्ध करने का लक्ष्य रखें और सब कुछ ठीक हो जायेगा।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 4. An eye for an eye only ends up making the whole world blind.

In Hindi : आँख के बदले में आँख पूरे विश्व को अँधा बना देगी।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 5. An ounce of practice is worth more than tons of preaching.

In Hindi : थोडा सा अभ्यास बहुत सारे उपदेशों से बेहतर है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 6: Be the change that you want to see in the world.

In Hindi : खुद वो बदलाव बनिए जो दुनिया में आप देखना चाहते हैं।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 7. Faith… must be enforced by reason… when faith becomes blind it dies.

In Hindi : विश्वास को हमेशा तर्क से तौलना चाहिए. जब विश्वास अँधा हो जाता है तो मर जाता है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 8. First they ignore you, then they laugh at you, then they fight you, then you win.

In Hindi : पहले वो आप पर ध्यान नहीं देंगे, फिर वो आप पर हँसेंगे, फिर वो आप से लड़ेंगे, और तब आप जीत जायेंगे।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 9. Freedom is not worth having if it does not connote freedom to err.

In Hindi : जब तक गलती करने की स्वतंत्रता ना हो तब तक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 10. Happiness is when what you think, what you say, and what you do are in harmony.

In Hindi : ख़ुशी तब मिलेगी जब आप जो सोचते हैं, जो कहते हैं और जो करते हैं, सामंजस्य में हों।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 11 : Silence is the strongest speech. Slowly and gradually world will listen to you.

In Hindi : मौन सबसे शाशाक्त भाषण है. धीरे-धीरे दुनिया आपको सुनेगी।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 12 : A ‘No’ uttered from the deepest conviction is better than a ‘Yes’ merely uttered to please, or worse, to avoid trouble.

In Hindi : पूर्ण धारणा के साथ बोला गया ” नहीं” सिर्फ दूसरों को खुश करने या समस्या से छुटकारा पाने के लिए बोले गए “हाँ” से बेहतर है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 13 : All the religions of the world, while they may differ in other respects, unitedly proclaim that nothing lives in this world but Truth.

In Hindi : विश्व के सभी धर्म, भले ही और चीजों में अंतर रखते हों, लेकिन सभी इस बात पर एकमत हैं कि दुनिया में कुछ नहीं बस सत्य जीवित रहता है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 14 : An error does not become truth by reason of multiplied propagation, nor does truth become error because nobody sees it.

In Hindi : कोई त्रुटी तर्क-वितर्क करने से सत्य नहीं बन सकती और ना ही कोई सत्य इसलिए त्रुटी नहीं बन सकता है क्योंकि कोई उसे देख नहीं रहा।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 15 : Anger and intolerance are the enemies of correct understanding.

In Hindi : क्रोध और असहिष्णुता सही समझ के दुश्मन हैं।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 16 : Capital as such is not evil; it is its wrong use that is evil. Capital in some form or other will always be needed.

In Hindi : पूंजी अपने-आप में बुरी नहीं है, उसके गलत उपयोग में ही बुराई है, किसी ना किसी रूप में पूंजी की आवश्यकता हमेशा रहेगी।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 17 : Confession of errors is like a broom which sweeps away the dirt and leaves the surface brighter and clearer.

In Hindi : अपनी गलती को स्वीकारना झाड़ू लगाने के सामान है जो सतह को चमकदार और साफ़ कर देती है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 18 : Constant development is the law of life, and a man who always tries to maintain his dogmas in order to appear consistent drives himself into a false position.

In Hindi : निरंतर विकास जीवन का नियम है , और जो व्यक्ति खुद को सही दिखाने  के लिए हमेशा अपनी रूढ़िवादिता को बरकरार रखने की कोशिश करता है वो खुद को गलत इस्थिति में पंहुचा देता है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 19 : Even if you are a minority of one, the truth is the truth.

In Hindi : यद्यपि आप अल्पमत में हों , पर सच तो सच है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 20 : Everyone who wills can hear the inner voice. It is within everyone.

In Hindi : जो भी चाहे अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुन सकता है. वह सबके भीतर है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 21 : Glory lies in the attempt to reach one’s goal and not in reaching it.

In Hindi : गर्व लक्ष्य को पाने के लिए किये  गए प्रयत्न में निहित है, ना कि उसे पाने में.

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 22 : I am prepared to die, but there is no cause for which I am prepared to kill.

In Hindi : मैं मरने के लिए तैयार हूँ, पर ऐसी कोई वज़ह नहीं है जिसके लिए मैं मारने को तैयार हूँ।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 23 : I believe in equality for everyone, except reporters and photographers.

In Hindi : मैं सभी की समानता में विश्वास रखता हूँ, सिवाय पत्रकारों और फोटोग्राफरों के।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 24: Truth stands, even if there be no public support. It is self-sustained.

In Hindi: सत्य बिना जन समर्थन के भी खड़ा रहता है.वह आत्मनिर्भर है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 25: Truth never damages a cause that is just.

In Hindi: सत्य कभी कभी ऐसे कारण को क्षति नहीं पहुंचता जो उचित हो।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 26: My religion is based on truth and non-violence. Truth is my God. Non-violence is the means of realising Him.

In Hindi : मेरा धर्म सत्य और अहिंसा पर आधारित है. सत्य मेरा भगवान है.अहिंसा उसे पाने का साधन।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 27 : My life is my message.

In Hindi : मेरा जीवन मेरा सन्देश है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 28: Where there is love there is life.

In Hindi: जहाँ प्रेम है वहां जीवन है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 29: Live as if you were to die tomorrow. Learn as if you were to live forever.

In Hindi: ऐसे जियो जैसे कि तुम कल मरने वाले हो. ऐसे सीखो की तुम हमेशा के लिए जीने वाले हो।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 30: When I despair, I remember that all through history the way of truth and love have always won. There have been tyrants and murderers, and for a time, they can seem invincible, but in the end, they always fall. Think of it–always.

In Hindi: जब मैं निराश होता हूँ , मैं याद कर लेता हूँ कि समस्त इतिहास के दौरान सत्य और प्रेम के मार्ग की ही हमेशा विजय होती है. कितने ही तानाशाह और हत्यारे हुए हैं, और कुछ समय के लिए वो अजेय लग सकते  हैं, लेकिन अंत में उनका पतन होता है. इसके बारे में सोचो- हमेशा।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 31: Seven Deadly Sins:Wealth without work;Pleasure without conscience;Science without humanity;Knowledge without character;Politics without principle; Commerce without morality;Worship without sacrifice.

In Hindi: सात घनघोर पाप: काम के बिना धन;अंतरात्मा  के बिना सुख;मानवता के बिना विज्ञान;चरित्र के बिना ज्ञान;सिद्धांत के बिना राजनीति;नैतिकता के बिना व्यापार ;त्याग के बिना पूजा।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 32: God has no religion.

In Hindi: भगवान का कोई धर्म नहीं है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 33: I will not let anyone walk through my mind with their dirty feet.

In Hindi: मैं किसी को भी गंदे पाँव  अपने मन से नहीं गुजरने दूंगा।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 34: Hate the sin, love the sinner.

In Hindi: पाप से घृणा करो, पापी से प्रेम करो।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 35: Nobody can hurt me without my permission.

In Hindi: मेरी अनुमति के बिना कोई भी मुझे ठेस नहीं पहुंचा सकता।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 36: Prayer is not asking. It is a longing of the soul. It is daily admission of one’s weakness. It is better in prayer to have a heart without words than words without a heart.

In Hindi: प्रार्थना माँगना नहीं है.यह आत्मा की लालसा है. यह हर रोज अपनी कमजोरियों की स्वीकारोक्ति है. प्रार्थना में बिना वचनों के मन लगाना, वचन होते हुए मन ना लगाने से बेहतर है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 37: To give pleasure to a single heart by a single act is better than a thousand heads bowing in prayer.

In Hindi: एक कृत्य द्वारा किसी एक दिल को ख़ुशी देना , प्रार्थना में झुके हज़ार सिरों से बेहतर है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 38: The best way to find yourself is to lose yourself in the service of others.

In Hindi: स्वयं को जानने का सर्वश्रेष्ठ तरीका है स्वयं को औरों की सेवा में डुबो देना।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 39: Your beliefs become your thoughts, Your thoughts become your words, Your words become your actions, Your actions become your habits, Your habits become your values, Your values become your destiny.

In Hindi: आपकी मान्यताएं  आपके  विचार बन जाते हैं,आपके विचार आपके शब्द बन जाते हैं,आपके  शब्द  आपके  कार्य बन जाते हैं,आपके कार्य  आपकी आदत बन जाते हैं,आपकी आदतें आपके मूल्य बन जाते हैं, आपके  मूल्य  आपकी नीयति बन जाती है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 40: The future depends on what you do today.

In Hindi: आप आज जो करते हैं उसपर भविष्य निर्भर करता है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 41: Man often becomes what he believes himself to be. If I keep on saying to myself that I cannot do a certain thing, it is possible that I may end by really becoming incapable of doing it. On the contrary, if I have the belief that I can do it, I shall surely acquire the capacity to do it even if I may not have it at the beginning.

In Hindi: आदमी अक्सर वो बन जाता है जो वो होने में यकीन करता है. अगर मैं खुद से यह कहता रहूँ कि मैं फ़लां चीज नहीं कर सकता, तो यह संभव है कि मैं शायद सचमुच वो करने में असमर्थ हो जाऊं. इसके विपरीत, अगर मैं यह यकीन करूँ कि मैं ये कर सकता हूँ , तो मैं निश्चित रूप से उसे करने की क्षमता पा लूँगा, भले ही शुरू में मेरे पास वो क्षमता ना रही हो।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 42: Let the first act of every morning be to make the following resolve for the day:
– I shall not fear anyone on Earth. – I shall fear only God. – I shall not bear ill will toward anyone. – I shall not submit to injustice from anyone. – I shall conquer untruth by truth. And in resisting untruth, I shall put up with all suffering.

In Hindi: चलिए सुबह का पहला काम ये करें कि इस दिन के लिए संकल्प करें कि- मैं दुनिया में किसी से डरूंगा नहीं.-मैं केवल भगवान से डरूं.-मैं किसी के प्रति बुरा भाव ना रखूं.-मैं किसी के अन्याय के के समक्ष झुकूं नहीं.-मैं असत्य को सत्य से जीतुं. और असत्य का विरोध करते हुए, मैं सभी कष्टों को सह  सकूँ।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 43: You must not lose faith in humanity. Humanity is like an ocean; if a few drops of the ocean are dirty, the ocean does not become dirty.

In Hindi: आप मानवता में विश्वास मत खोइए. मानवता सागर की तरह है; अगर सागर की कुछ बूँदें गन्दी हैं, तो सागर गन्दा नहीं हो जाता।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 44: The greatness of a nation and its moral progress can be judged by the way its animals are treated.

In Hindi: एक देश की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से आँका जा सकता है कि वहां जानवरों से कैसे व्यवहार किया जाता है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 45: Each night, when I go to sleep, I die. And the next morning, when I wake up, I am reborn.

In Hindi: हर रात, जब मैं सोने जाता हूँ, मैं मर जाता हूँ. और अगली सुबह , जब मैं उठता हूँ, मेरा पुनर्जन्म होता है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 46: Whatever you do will be insignificant, but it is very important that you do it.

In Hindi: तुम जो भी करोगे वो नगण्य होगा, लेकिन यह ज़रूरी है कि तुम वो करो।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 47: What difference does it make to the dead, the orphans and the homeless, whether the mad destruction is wrought under the name of totalitarianism or in the holy name of liberty or democracy?

In Hindi: मृत,अनाथ, और बेघर को इससे क्या फर्क पड़ता है कि यह तबाही सर्वाधिकार या फिर स्वतंत्रता या लोकतंत्र के पवित्र नाम पर लायी जाती है?

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 48: To believe in something, and not to live it, is dishonest.

In Hindi: किसी चीज में यकीन करना और उसे ना जीना बेईमानी है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 49: There are people in the world so hungry, that God cannot appear to them except in the form of bread.

In Hindi: दुनिया में ऐसे लोग हैं जो इतने भूखे हैं कि भगवान उन्हें किसी और रूप में नहीं दिख सकता सिवाय रोटी के रूप में।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 50: Earth provides enough to satisfy every man’s needs, but not every man’s greed.

In Hindi: पृथ्वी सभी मनुष्यों की ज़रुरत पूरी करने के लिए पर्याप्त संसाधन  प्रदान करती है , लेकिन लालच पूरी करने के लिए नहीं।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 51: It is unwise to be too sure of one’s own wisdom. It is healthy to be reminded that the strongest might weaken and the wisest might err.

In Hindi: अपने ज्ञान के प्रति ज़रुरत से अधिक यकीन करना मूर्खता है. यह याद दिलाना ठीक होगा कि सबसे मजबूत कमजोर हो सकता है और सबसे बुद्धिमान गलती कर सकता है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 52: Whenever you are confronted with an opponent. Conquer him with love.

In Hindi: जब भी आपका सामना  किसी विरोधी से हो. उसे प्रेम से जीतें।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 53: I object to violence because when it appears to do good, the good is only temporary; the evil it does is permanent.

In Hindi: मैं हिंसा का विरोध करता हूँ क्योंकि जब ऐसा लगता है कि वो अच्छा कर रही है तब वो अच्छाई अस्थायी होती है; और वो जो बुराई करती है वो स्थायी होती है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 54: You can chain me, you can torture me, you can even destroy this body, but you will never imprison my mind.

In Hindi: आप मुझे जंजीरों में जकड़ सकते हैं, यातना दे सकते हैं, यहाँ तक की आप इस शरीर को नष्ट कर सकते हैं, लेकिन आप कभी मेरे विचारों को कैद नहीं कर सकते।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 55: You may never know what results come of your actions, but if you do nothing, there will be no results.

In Hindi: हो सकता है आप कभी ना जान सकें कि आपके काम का क्या परिणाम हुआ, लेकिन यदि आप कुछ करेंगे नहीं तो कोई परिणाम नहीं होगा।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 56: Love is the strongest force the world possesses and yet it is the humblest imaginable.

In Hindi: प्रेम दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति है और फिर भी हम जिसकी कल्पना कर सकते हैं उसमे सबसे नम्र है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 57: There is more to life than simply increasing its speed.

In Hindi: जीवन की  गति बढाने के अलावा भी इसमें बहुत कुछ है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 58: You don’t know who is important to you until you actually lose them.

In Hindi: आप तब तक यह नहीं समझ पाते की आपके लिए कौन महत्त्वपूर्ण है जब तक आप उन्हें वास्तव में खो नहीं देते।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 59: There is nothing that wastes the body like worry, and one who has any faith in God should be ashamed to worry about anything whatsoever.

In Hindi: चिंता से अधिक   कुछ और शरीर को इतना बर्बाद नहीं करता, और वह जिसे ईश्वर में थोडा भी यकीन है उसे किसी भी चीज के बारे में चिंता करने पर शर्मिंदा होना चाहिए।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 60: I offer you peace. I offer you love. I offer you friendship. I see your beauty. I hear your need. I feel your feelings.

In Hindi: मैं तुम्हे शांति का प्रस्ताव देता हूँ. मैं तुम्हे प्रेम का प्रस्ताव देता हूँ. मैं तुम्हारी सुन्दरता देखता हूँ.मैं तुम्हारी आवश्यकता सुनता हूँ.मैं तुम्हारी भावना महसूस करता हूँ।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 61: What we are doing to the forests of the world is but a mirror reflection of what we are doing to ourselves and to one another.

In Hindi: हम जो दुनिया के जंगलों के साथ कर रहे हैं वो कुछ और नहीं बस  उस चीज का प्रतिबिम्ब है जो हम अपने साथ और एक दूसरे के साथ कर रहे हैं।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 62: Truth is one, paths are many.

In Hindi: सत्य एक है, मार्ग कई।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 63: In doing something, do it with love or never do it at all.

In Hindi: कुछ करने में , या तो उसे प्रेम से करें या उसे कभी करें ही नहीं।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 64: There is no ‘way to peace,’ there is only ‘peace.

In Hindi: शांति का कोई रास्ता नहीं है, केवल शांति है।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

Quote 65: The day the power of love overrules the love of power, the world will know peace.

In Hindi: जिस दिन प्रेम की शक्ति , शक्ति के प्रति प्रेम पर हावी हो जायेगी , दुनिया में अमन आ जायेगा ।

Mahatma Gandhi  महात्मा गाँधी

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राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी।

एक ही दिवस पर दो विभूतियों ने भारत माता को गौरवान्वित किया। गाँधी जी एवं लाल बहादूर शास्त्रीजैसी अदभुत प्रतिभाओ का 2 अक्टूबर को अवतरण हम सभी के लिये हर्ष का विषय है। सत्य और अहिंसा के बल पर अंग्रेजों से भारत को स्वतंत्र करा करके हम सभी को स्वतंत्र भारत का अनमोल उपहार देने वाले महापुरूष गाँधी जी को राष्ट्र ने राष्ट्रपिता के रूप में समान्नित किया। वहीं जय जवान, जय किसान का नारा देकर भारत के दो आधार स्तंभ को महान कहने वाले महापुरूष लाल बहादुर शास्त्री जी ने स्वतंत्र भारत के दूसरे प्रधान मंत्री के रूप में राष्ट्र को विश्वपटल पर उच्चकोटी की पहचान दिलाई।

आज इस लेख में मैं आपके साथ राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी से सम्बंधित कुछ रोचक बातें साझा करने का प्रयास करुँगी|

भारत ही नही वरन पूरे  विश्व पटल पर महात्मा गाँधी सिर्फ़ एक नाम नहीं अपितु शान्ति और अहिंसा का प्रतीक है। महात्मा गाँधी के पूर्व भी शान्ति और अहिंसा की अवधारणा फलित थी, परन्तु उन्होंने जिस प्रकार सत्याग्रह, शान्ति व अहिंसा के रास्तों पर चलते हुये अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर किया, उसका कोई दूसरा उदाहरण विश्व इतिहास में देखने को नहीं मिलता। तभी तो प्रख्यात वैज्ञानिक आइंस्टीन ने कहा था कि -‘‘हज़ार साल बाद आने वाली नस्लें इस बात पर मुश्किल से विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई इन्सान धरती पर कभी आया था।’’

संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी वर्ष 2007 से गाँधी ज्यन्ती को ‘विश्व अहिंसा दिवस’ के रूप में मनाये जाने की घोषणा की।

मित्रों आज हम गाँधी जी की उस उप्लब्धी का जिक्र करने का प्रयास कर रहे हैं जो हम सभी के लिये गर्व का विषय है।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अहिंसा के बूते पर आजादी दिलाने में भले ही भारत के हीरो हैं लेकिन डाक टिकटों के मामले में वह विश्व के 104 देशों में सबसे बड़े हीरो हैं। विश्व में अकेले गांधी ही ऐसे लोकप्रिय नेता हैं जिन पर इतने अधिक डाक टिकट जारी होना एक रिकार्ड है। डाक टिकटों की दुनिया में गांधी जी सबसे ज़्यादा दिखने वाले भारतीय हैं तथा भारत में सर्वाधिक बार डाक-टिकटों पर स्थान पाने वालों में गाँधी जी प्रथम हैं। यहाँ तक कि आज़ाद भारत में वे प्रथम व्यक्ति थे, जिन पर डाक टिकट जारी हुआ। किन्तू एक दिलचस्प बात यह थी कि ज़िंदगी भर ‘स्वदेशी’ को तवज्जो देने वाले गांधी जी को सम्मानित करने के लिए जारी किए गए पहले डाक टिकटों की छपाई स्विट्जरलैंड में हुई थी। इसके बाद से लेकर आज तक किसी भी भारतीय डाक टिकट की छपाई विदेश में नहीं हुई।

गाँधी जी की शक्सियत का ही असर था कि, भारत को ग़ुलामी के शिकंजे में कसने वाले ब्रिटेन ने जब पहली दफ़ा किसी महापुरुष पर डाक टिकट निकाला तो वह महात्मा गांधी ही थे। इससे पहले ब्रिटेन में डाक टिकट पर केवल राजा या रानी के ही चित्र छापे जाते थे।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पर सर्वाधिक डाक टिकट उनके जन्म शताब्दी वर्ष 1969 में जारी हुए थे। उस वर्ष विश्व के 35 देशों ने उन पर 70 से अधिक डाक टिकट जारी किए थे।

मित्रों, गाँधी जी ने सत्य को अपने जीवन में बचपन से ही अपनाया था। सत्य को परिलाक्षित करती उनकी एक बचपन की घटना याद आती है जब टीचर के कहने के बावजूद भी उन्होने नकल नही की। किस्सा यूँ है कि, एक बार- राजकोट के अल्फ्रेड हाई स्कूल में तत्कालीन शिक्षा विभाग के इंसपेक्टर “जाइल्स” मुआयना करने आए थे। उन्होने नवीं कक्षा के विद्यार्थियों को अंग्रेजी के पाँच शब्द लिखने को दिये, जिसमें से एक शब्द था “केटल” मोहनदास इसे ठीक से नही लिख सके तो मास्टर साहब ने ईशारा किया कि आगे वाले लङके की नकल कर लो किन्तु मोहनदास ने ऐसा नही किया। परिणाम ये हुआ कि सिर्फ उनके ही लेख में गलती निकली सभी के पाँचो शब्द सही थे। जब मास्टर साहब ने पूछा कि तुमने नकल क्यों नही की तो मोहनदास ने ढृणता से उत्तर दिया कि “ऐसा करना धोखा देने और चोरी करने जैसा है जो मैं हर्गिज नही कर सकता”। ये घटना इस बात का प्रमाण है कि गाँधी जी बचपन से ही सत्य के अनुयायी थे। राजा हरिश्चन्द्र और श्रवण कुमार का असर उन पर बचपन से ही था।

ऐसे सत्य और अहिंसा के पूजारी को निम्न पंक्तियों से नमन करते हैं-

“दे दी हमें आजादी खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल”

जयहिन्द।

Post inspired by Mrs. Anita Sharma Ji (http://roshansavera.blogspot.in/and AKC (http://www.achhikhabar.com/), I am grateful to Mrs. Anita Sharma Ji, & My dear friends Mr. Gopal Mishra & AKC. for more motivational quotes & story visit at http://www.achhikhabar.com/

अनिता शर्मा (City :  Indore)

E-mail ID:  voiceforblind@gmail.com

एक अपील- आज कई दृष्टीबाधित बच्चे अपने हौसले से एवं ज्ञान के बल पर अपने भविष्य को सुनहरा बनाने का प्रयास कर रहे हैं। कई  दृष्टीबाधित बच्चे तो शिक्षा के माधय्म से अध्यापक पद पर कार्यरत हैं। उनके आत्मनिर्भर बनने में शिक्षा का एवं आज की आधुनिक तकनिक का विशेष योगदान है।आपका साथ एवं नेत्रदान का संकल्प कई दृष्टीबाधित बच्चों के जीवन को रौशन कर सकता है।मेरा प्रयास शिक्षा के माध्यम से दृष्टीबाधित बच्चों को आत्मनिर्भर बनाना है। इस प्रयोजन हेतु, ईश कृपा से कुछ कार्य करने की कोशिश कर रहे हैं जिसको YouTube पर “audio for blind by Anita Sharma”  लिख कर देखा जा सकता है।

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अगर जीवन में सफल हाेना हैं. ताे जहाँ १० शब्दाें से काेई बात बन जाये वहा पर

१०० शब्द बाेलकर अपनी मानसिक और वाणी की ऊर्जा को नष्ट नहीं करना चाहिए॥

-Kmsraj51

जिनके संकल्प में दृढ़ता की शक्ति है, उनके लिए हर कार्य सम्भव है।

 ~KMSRAJ51

 

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