अंतर जीवन को केंद्र पर लाना जरूरी ** By-kmsraj51*****


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भगवान बुद्ध की जीवन-यात्रा वास्तव में खुद की और सामान्य जनों की दुखमुक्ति के दो लक्ष्यों को अपने भीतर लेकर की गई यात्रा है, इसीलिए बुद्ध के दो रूप स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। वे खुद की मुक्ति के लिए किन अग्निपरीक्षाओं से गुजरे, इसका वर्णन आश्चर्यचकित करने वाला है। उनकी निर्वाण-प्राप्ति उनकी खुद की मुक्ति थी, इसीलिए उनका एक रूप स्वयं के मुक्तिदाता का है। निर्वाण-प्राप्ति के बाद आगे के पैंतालीस वर्षो की उनकी यात्रा वास्तव में अंत:करणपूर्वक सामान्यजनों को दुख-मुक्त करने के लिए किया गया श्रम है। उनके जीवन का यह कालखंड मार्गदाता का है। 

 

खुद का मुक्तिदाता हुए बगैर अन्य जनों के मार्गदाता की भूमिका निभाना आत्मवंचना होती है, यह बुद्ध का जीवन-चरित्र कहता है। इन दोनों भूमिकाओं में एक प्रामाणिक रिश्ता होता है, इसका ज्ञान अगर नहीं रहा तो ‘व्यक्ति-मुक्ति या समाज-मुक्ति’ जैसे विवादग्रस्त विकल्पों की भारी-भरकम चर्चा शुरू हो जाती है। ऐसी चर्चा बौद्ध-दर्शन के बाद के विकास-काल में हुई। बुद्ध-चरित्र व्यक्ति-मुक्ति के साथ ही मार्गदाता के स्वरूप को भी महत्व देने वाला जीवन है। इसीलिए तो बुद्ध ने पैंतालीस वर्ष घुमक्कड़ी की। स्वयं मुक्त हुए बगैर औरों को मुक्ति का मार्ग बतलाया नहीं जा सकता, यह उनके जीवन द्वारा प्रस्तुत किया गया आदर्श है। मुक्ति कोई क्षणिक बात नहीं है। वह एक जीवन अनुभव होती है और उसे बार-बार अनुभव करना पड़ता है। 

 

जिन्हें मुक्त होने की इच्छा है, वे पहले स्वयं को जानें और वहीं से शुरुआत करें। स्वयं के मन को जानें — बौद्ध-साहित्य की यह पहली शिक्षा है। यही इस साहित्य की विशेषता है। इस साहित्य ने मनुष्य मन के बारे में विविध स्तरों पर विचार किया है। चौथी शती में असंग और वसुबंधु ने भारत में और छठी शती में प्रसिद्ध चीनी बौद्ध दार्शनिक चिह-ही (Chih-hi) ने चीन में मन संबंधी जो विचार किया है, वह आश्चर्यचकित करने वाला है। मनोविज्ञान की मनोविश्लेषण शाखा के सिग्मंड फ्रॉयड का स्थान असाधारण है। उनका यह स्थान मान्य करते हुए भी अवचेतन का (Sub-Conscious) विचार बौद्ध-दर्शन ने अत्यंत शक्ति के साथ विकसित किया था — इसे भी स्वीकार करना चाहिए। मनुष्य के एहसास (Conciousness) के नीचे के स्तर पर अवचेतन का अस्तित्व और उसका सूक्ष्मता से विचार सच्चे अर्थो में भारत में असंग और वसुबंधु ने किया है। प्राचीन बौद्ध-साहित्य में मन के विविध रूपों का जो प्रतिबिंब दिखलाई देता है, अब हम उस पर विस्तार से विचार करेंगे। 

 

केवल बौद्ध-साहित्य में ही नहीं, बल्कि प्राचीन विश्वसाहित्य में इस दृष्टि से ‘धमपद’ सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है। उसे ‘ग्रंथों का ग्रंथ’ (Book of Books) कहना अधिक सार्थक होगा। धम्मपद के अनुसार —
 
‘(इस) चंचल, चपल, दुर्-रचय, दुर्-निवार्य चित्त को मेधावी पुरुष, उसी प्रकार सीधा करता है, जैसे बाण बनाने वाला बाण को।’ 
‘जैसे जलाशय से निकालकर स्थल पर फेंक दी गई मछली तड़पती है, (वैसे ही) मार (राग, द्वेष, मोह) के फंदे से निकलने के लिए यह चित्त  (तड़पता है)।’
 
‘(जो) कठिनाई से निग्रहयोग, शीघ्र ग्रामी, जहां चाहता है वहां चला जाने वाला है, ऐसे चित्त  का दमन करना उद्यम है, दमन किया गया चित्त सुखप्रद होता है।’
 
‘कठिनाई से जानने योग्य, अत्यंत चालाक, जहां — चाहे वहां ले जाने वाले चित्त  की, बुद्धि मान रक्षा करे, सुरक्षित चित्त सुखप्रद होता है।’
‘दूरगामी अकेला विचरने वाला निराकार, गुहाशाई इस चित्त का, जो संयम करेंगे, वह काम के बंधन से मुक्त होंगे।’
 
‘जिसका चित्त स्थितप्रज्ञ नहीं है, जो सच्चे धर्म को नहीं जानता, जिसका चित्त प्रसन्नताहीन है, उसे परम ज्ञान नहीं मिल सकता।’
 
‘जिसका चित्त दोषरहित है, जिसका मन स्थिर है, जो पाप-पुण्य विहीन है, उस सजग रहने वाले के लिए किसी भी प्रकार का भय नहीं है।’
 
ऐसे इस चंचल घुमक्कड़, चपल, स्वैर और बेलगाम मन को जीतना कितना कठिन है, इसकी कल्पना साधक ही कर सकता है। प्रत्यक्ष युद्ध में कुशल योद्धा दस लाख शत्रु दलों को सहज रूप से पराजित कर सकता है, परंतु वह अपने मन पर विजय संपादित नहीं कर सकता, क्योंकि मन पर होने वाले प्रहार शत्रु प्रहारों से भी अधिक भेदक होते हैं। इस कारण शत्रु द्वारा किए गए विनाश की अपेक्षा मन द्वारा किए गए विनाश अधिक प्रलयंकारी होते हैं। इस मनरूपी शत्रु का वर्णन करते समय धम्मपद कहता है —
 
‘जितनी हानि शत्रु शत्रु की और बैरी बैरी की करता है, झूठे मार्ग पर चला चित्त उससे अधिक बुराई करता है।’
 
इस मनरूपी महाशत्रु का पूर्ण नि:पात किए बगैर निर्वाण और चिरसुख शांति की प्राप्ति असंभव है। इस मन रूपी महाशत्रु पर विजय प्राप्त करने वाला योद्धा ही चिरसुख-शांति के साम्राज्य का चक्रवर्ती सम्राट हो सकता है, इसीलिए धमपद ने मुक्त मनुष्य को इस महायोद्धा से श्रेष्ठ स्थान देते हुए कहा है :
‘जो व्यर्थ के पदों से युक्त सौ गाथाएं भी गाएं, उनसे धर्म का एक पद भी श्रेष्ठ है, जिसे सुनकर संग्राम में हजारोंहजार मनुष्य को जीत ले, उससे एक अपने को जीतने वाला कहीं उद्यम होता है।’
 
खुद के मन से युद्ध करना अर्थात् खुद का खुद से संग्राम करने की तैयारी में लगना है। यह संग्राम भयग्रस्त अवस्था में नहीं किया जा सकता। मनुष्य के भीतर की सारी भयग्रस्तता का उद्गम उसमें स्थित अकुशल विचार और अनैतिक कर्मो के परिणामों में है। बाहरी विश्व का शत्रु जितने आघात, जन्म करता रहता है, उससे कई गुना अधिक आघात या जन्म मनुष्य के भीतरी मन रूपी शत्रु से होता रहता है। मन के जन्मों से घायल मनुष्य  स्वत्व और आत्मविश्वास खो बैठता है। इस कारण वह भीतर से भयग्रस्त हो जाता है। 
 
अपनी इस भयग्रस्तता को छिपाने के लिए वह बाह्य विश्व में अधिक आक्रामक और हिंसात्मक बन जाता है। आज तक के मनुष्य-जाति के इतिहास में मनुष्य ने ही अन्य मनुष्यों पर आक्रमण कर उनके रक्त से इस धरती को नहलाया है। मनुष्य के आक्रामक और हिंसात्मक स्वरूप का उद्गम उसे भीतर से घायल करने के उद्देश्य से उसके मन पर छोड़े गए प्रलोभन रूपी बाण होते हैं। यह बाण आकर्षक रूपों में और उसकी आसक्ति से उस पर आक्रमण करते हैं। इसी को बौद्ध-चिंतन में मार-युद्ध कहा गया है। 
 
मनुष्य के भीतरी मन रूपी शत्रु के पास में जितने भी बाण हैं, उन्हें निर्थक करना, उनका विनाश करना ही मारयुद्ध में आत्मविश्वासपूर्वक विजय की दिशा में जाना है। 19वीं शती के मध्य में कार्ल मार्क्‍स ने मनुष्य के अकेलेपन (Alienation) को लेकर अभूतपूर्व चिंतन किया है। उनका सारा रुख बाह्य स्थिति की ओर रहा है। मनुष्य अपनी मनुष्यता को कैसे खो चुका — इस पर मार्क्‍स ने अपने काल के अनुरूप भाष्य किया है। भगवान बुद्ध मनुष्य के अकेलेपन का उद्गम उसके ‘भीतर’ छिपकर बैठे हुए शक्तिशाली शत्रु की शक्ति में खोजते हैं। मनुष्य की अकेलेपन से मुक्ति अर्थात् उसके द्वारा मन पर प्राप्त की गई विजय है। इस मन रूपी शत्रु के पास स्वार्थ-परार्थ, पुत्र और वित्त, आकांक्षा, भूमि और समृद्धि की इच्छा जैसे एक-से-एक प्रलोभनकारी तीक्ष्ण बाणों का संचय होता है। इन बाणों की धार को भोथरा करने वाला ही मन रूपी शत्रु पर विजय प्राप्त कर सकता है।
 
भगवान बुद्ध यहां पर मनुष्य के मूलभूत दुख के संबंध में बोल रहे हैं। मनुष्य के जीवन-अस्तित्व में स्थित इस मूलभूत द्वैत को वे सुलझाना चाहते हैं। यह उलझन अनेक गांठों से युक्त है। इन गांठों को छुड़वाने के लिए बुद्ध वासना मुक्ति का आग्रह करते हैं। वासनाओं की मुक्ति अर्थात् अकुशल, दुखदायक, अधर्मकारक और स्वार्थी वासना से मुक्ति नहीं, अपितु सभी-के-सभी कुशल-अकुशल, सुखकारकदुखकारक, स्वार्थपरायण- परार्थपरायण, खेद से परिपूर्ण-आनंददायक — इन सभी प्रकार की कामनाओं से मुक्ति है, क्योंकि निर्वाण की अवस्था में इनमें से कुछ भी शेष नहीं रहता। इन सबसे मुक्ति अगर चाहिए तो इसके लिए मनुष्य में ‘शील की उत्पत्ति’ होनी पड़ती है। शीलवंत का वर्णन करते हुए धम्मपद कहता है —
‘सत्पुरुष सभी जगह जाते हैं। वह भोगों के लिए बात नहीं चलाते, सुख मिले या दुख — पंडितजन विकार प्रदर्शन नहीं करते।
 
‘जो अपने लिए या दूसरों के लिए पुत्र, धन और राज्य नहीं चाहते, न अधर्म से अपनी उन्नति चाहते हैं, वे ही सदाचारी (शीलवान) प्रज्ञावान और धार्मिक होते हैं।’
 
बुद्ध वासनाओं के दमन की शिक्षा नहीं देते। वे वासना मुक्ति की शिक्षा देते हैं। वासनाओं का उद्गम स्थान जो मन है, उससे युद्ध करने के लिए कहते हैं। और उस पर विजय प्राप्त करना ही वासनाओं से मुक्त होना है। बुद्ध को दमन की अपेक्षा मुक्ति में अधिक रस था। इसीलिए तो उन्होंने आपादान स्मृति समाधि प्राप्त की थी। यह समाधि पाप के जड़ के स्थान को ही उध्वस्त करने वाली होती है। पाप की जड़ जिसमें से जन्म लेती है, उस मन से मुक्ति ही बुद्ध की सच्ची शिक्षा है। बौद्ध तत्व-चिंतन का मूल ‘मन की मुक्तावस्था’ अथवा जिसे हम ज्हृo रूद्बठ्ठस्रज् कहें, वह है। धम्मपद कहता है —
‘उपशांत और यथार्थ ज्ञान द्वारा मुक्त हुए उस अर्हत पुरुष का मन शांत होता है। वाणी और कर्म शांत होते हैं।’
 
मन शांत होने का अर्थ है — मन की सभी कामनाओं का निरस्त हो जाना। कामनाओं का उच्छेद, कामनाएं जिस भूमि में जन्म लेती हैं, उस भूमि से मुक्ति प्राप्त किए बगैर हो नहीं पाता। यह मुक्ति सहस्र नाम के आडंबर से प्राप्त नहीं हो सकती। अधिक-से-अधिक कुछ समय के लिए मन का दमन किया जा सकता है। इस प्रकार का दमन कृत्रिम होता है। अंतरजीवन को केंद्र स्थान पर लाना जरूरी है। इस केंद्र स्थान को जब प्रज्ञा शक्ति प्रकाशित करती जाती है, तब उसमें से प्रेम के निर्झर फूटने लगते हैं। ऐसा जब घटित होता है, तब एक नया जीवन अनुभव प्राप्त होता है। यह जीवन सार्थक होने का अनुभव है। सौ वर्ष की नीरस जिंदगी जीने की इच्छा अपने आप गल जाती है। धम्मपद कहता है —
 
‘आलसी और अनुद्योगों के सौ वर्षो के जीवन से दृढ़ उद्योग करने वाले के जीवन का एक दिन श्रेष्ठ है।’ 
 
‘संसार में वस्तुओं की उत्पत्ति और विनाश का ख्याल न करते हुए सौ वर्ष जीने के जीवन से, उत्पत्ति और विनाश का ख्याल करने वाले के जीवन का एक दिन श्रेष्ठ है।’
 
‘अमृत पद (दुख निवारण) का ख्याल न करते हुए सौ वर्षो के जीवन से, अमृत पद को देखने वाले के जीवन का एक दिन श्रेष्ठ है।’ ‘उद्यम धर्म को न देखने के सौ वर्षो के जीवन से उद्यम धर्म को देखने वाले के जीवन का एक दिन श्रेष्ठ है।’
 
यह अमृतानुभव किसी के उपदेशों से, देहदंड से, कामोभोग की तृप्ति से अथवा किसी के चरणों में अपने जीवनअस्तित्व को समर्पित करने से प्राप्त नहीं होता। यह अनुभव एक व्यक्तिगत बात है। इसके लिए खुद को ही ठीक से देखना पड़ता है। खुद की ओर खुद ही कैसे देखें — इसका संकेत बुद्ध का धम मनुष्य को देता है। इसीलिए बुद्ध की भूमिका औरों के लिए मार्गदाता की है। उस मार्ग पर एकाकी यात्रा कैसे करें, इसका प्रदर्शन स्वत: बुद्ध ने ही बोधिसत्व अवस्था में करके बतलाया था। इस मार्ग से जाने वालों के लिए उन्होंने एक आदर्श उपलध करा दिया है। इस मार्ग पर ठोस कदम रखते समय खुद को ही खुद का स्वामी होना पड़ता है।
 
‘व्यक्ति खुद ही अपना मालिक है! दूसरा कौन मालिक हो सकता है? अपने को भली प्रकार दमन कर लेने पर वह एक दुर्लभ मालिक को पाता है।’ — अत्तवग्गो 
 
भगवान बुद्ध खुद को खुद का स्वामी होने के लिए कहते हैं — यह सीधी-सादी बात नहीं है। मनुष्य-प्राणी की आज तक की यात्रा ‘उससे भी कोई श्रेष्ठ है’, इस ‘कल्पित के असत्य से’ हुई है। इस कारण मनुष्य खुद को जानने की अपेक्षा ‘उसे ही’ जानने का प्रयत्न करता रहा। उसके पीछे लगकर खुद के अज्ञान को उसने छिपाकर रखा। खुद की खोज के लिए उसका कभी अपने मन से संघर्ष नहीं हुआ। ईश्वर की खोज के लिए वह वासनाओं का दमन करता रहा, परंतु दमन से वासनाएं बुझती नहीं। धीमी फूंक से वह पुन: प्रज्‍जवलित होती हैं। धम्मपद कहता है —‘सच बोलें, क्रोध न करें, थोड़ा भी मांगने पर दें — इन तीन बातों से मनुष्य देवताओं के पास जाता है।’
 
मनुष्य के अंत:करण से क्रोध का नष्ट होना ही वास्तव में उसके अंत:करण का प्राणी जाति के प्रति प्रेम से भर जाना है। सहृदय अंत:करण से जन्म लेने वाले प्रेम को प्रत्यक्ष आचरण में कृतिशील करना, अभिव्यक्ति देना ही ईश्वर होना है। बुद्ध ईश्वर का अस्तित्व नहीं मानते। इसका एकमात्र कारण इतना ही था कि प्रेमपूर्ण मनुष्य उनका आदर्श था।
 
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