50 Great Quotations In Hindi !!

::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) …..

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kmsraj51 की कलम से …..
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** 50 अनमोल वचन हिंदी में | 50 Great Quotations In Hindi **

1. जिसने ज्न्यान को आचरण में उतार लिया , उसने ईश्वर को मूर्तिमान कर लिया – विनोबा भावे

2. अकर्मण्यता का दूसरा नाम मर्त्यु है – मुसोलिनी

3. पालने से लेकर कब्र तक ज्ञान प्राप्त करते रहो – पवित्र कुरान

4. इच्छा ही सब दूखो का मूल है – गौतम बुद्ध

5. मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका अज्न्यान है – चाणक्य

6. आपका आज का पुरुषार्थ आपका कल का भाग्य है – पालशिरू

7. क्रोध एक किस्म का क्षणिक पागलपन है – महात्मा गांधी

8. ठोकर लगती है और दर्द होता है तभी मनुष्य सीख पाटा है – महात्मा गांधी

9. अप्रिय शब्द पशुओ को भी नहीं सुहाते है – गौतम बुद्ध

10. नरम शब्दों से सख्त दिलो को जीता जा सकता है – सुकरात

11. गहरी नदी का जल प्रवाह शांत व गंभीर होता है – शेक्सपीयर

12. समय और समुद्र की लहरे किसी का इंतज़ार नहीं करती – अज्ञात

13. जिस तरह जौहरी ही असली हीरे की पहचान कर सकता है , उसी तरह गुनी ही गुणवान की पहचान कर सकता है – कबीर

14. जो आपको कल कर देना चाहिए था , वही संसार का सबसे का थीं कार्य है – कन्फ्यूशियस

15. ज्ञानी पुरुषो का क्रोध भीतर ही , शान्ति से निवास करता है , बाहर नहीं – खलील जिब्रान

16. कुबेर भी यदि आय से अधिक व्यय करे तो निर्धन हो जाता है – चाणक्य

17. डूब की तरह छोटे बनाकर रहो . जब घास -पात जल जाते है तब भी डूब जस की तस बनी रहती है – गुरु नानक देव

18. ईश्वर के हाथ देने के लिए खुले है . लेने के लिए तुम्हे प्रयत्न करना होगा – गुरु नानक देव

19. जो दूसरो से घृणा करता है वह स्वय पतित होता है – स्वामी विवेकानंद

20. जो जैसा शुभ व अशुभ कार्य करता है , वो वैसा ही फल भोगता है – वेदव्यास

21. मनुष्य की इच्छाओ का पेट आज तक कोइ नहीं भर सका है – वेदव्यास

22. नम्रता और मीठे वचन ही मनुष्य के सच्चे आभूषण होते है – तिरूवल्लुवर

23. खुदा एक दरवाजा बंद करने से पहले दूसरा खोल देता है , उसे प्रयत्न कर देखो – शेख सादी

24. बुरे आदमी के साथ भी भलाई करनी चाहिए – कुत्ते को रोटी का एक टुकड़ा डालकर उसका मुंह बंद करना ही अच्छा है – शेख सादी

25. अपमानपूर्वक अमरत पीने से तो अच्छा है सम्मानपूर्वक विषपान – रहीम

26. थोड़े से धन से दुष्ट जन उन्मत्त हो जाते है – जैसे छोटी , बरसाती नदी में थोड़ी सी वर्षा से बाढ़ आ जाती है – गोस्वामी तुलसीदास

27. ईश प्राप्ति (शान्ति ) के लिए अंत: कारन शुद्ध होना चाहिए – रविदास

28. जब मई स्वय पर हँसता हूँ तो मेरे मन का बोज़ हल्का हो जाता है – टैगोर

29. जन्म के बाद मर्त्यु , उत्थान के बाद पतन , संयोग के बाद वियोग , संचय के बाद क्षय निश्चित है . ज्ञानी इन बातो का ज्न्यान कर हर्ष और शोक के वशीभूत नहीं होते – महाभारत

30. जननी जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढाकर है – अज्ञात

31. भरे बादल और फले वर्कश नीचे ज़ुकारे है , सज्जन ज्न्यान और धन पाकर विनम्र बनाते है – अज्ञात

32. सोचना, कहना व करना सदा सम्मान हो – अज्ञात

33. न कल की न काल की फिकर करो , सदा हर्षित मुख रहो – अज्ञात

34. स्व परिवर्तन से दूसरो का परिवर्तन करो – अज्ञात

35. ते ते पाँव पसारियो जेती चादर होय – अज्ञात

36. महान पुरुष की पहली पहचान उसकी विनम्रता है – अज्ञात

37. बिना अनुभव कोरा शाब्दिक ज्न्यान अँधा है – अज्ञात

38. क्रोध सदैव मूर्खता से प्रारम्भ होता है और पश्चाताप पर समाप्त – अज्ञात

39. नारी की उन्नति पर ही राष्ट्र की उन्नति निर्धारित है – अज्ञात

40. धरती पर है स्वर्ग कहा – छोटा है परिवार जहा – अज्ञात

41. दूसरो का जो आचरण तुम्हे पसंद नहीं , वैसा आचरण दूसरो के प्रति न करो – अज्ञात

42. नम्रता सारे गुणों का दर्द स्तम्भ है – अज्ञात

43. बुद्धिमान किसी का उपहास नहीं करते है – अज्ञात

44. हर अच्छा काम पहले असंभव नजर आता है – अज्ञात

45. पुस्तक प्रेमी सबसे धनवान व सुखी होता है – अज्ञात

46. सबसे उत्तम बदला क्षमा करना है – अज्ञात

47. आराम हराम है – अज्ञात

48. दो बच्चो से खिलाता उपवन , हंसते -हंसते कटता जीवन – अज्ञात

49. अगर चाहते सुख समर्द्धि , रोको जनसंख्या वर्द्धि – अज्ञात

50. कार्य मनोरथ से नहीं , उद्यम से सिद्ध होते है . जैसे सोते हुए सिंह के मुंह में मुर्गे अपने आप नहीं चले जाते – विष्णु शर्मा!

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kmsraj51 की कलम से !!

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** KMSRAJ51 की कलम से 65 ~ सद्विचार **


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1. इस संसार में प्यार करने लायक दो वस्तुएँ हैं-एक दुःख और दूसरा श्रम । दुख के बिना हृदय निर्मल नहीं होता और श्रम के बिना मनुष्यत्व का विकास नहीं होता ।

2. ज्ञान का अर्थ है-जानने की शक्ति । झूठ को सच से पृथक् करने वाली जो विवेक बुद्धि है-उसी का नाम ज्ञान है ।

3. अध्ययन, विचार, मनन, विश्वास एवं आचरण द्वार जब एक मार्ग को मजबूती से पकड़ लिया जाता है, तो अभीष्ट उद्देश्य को प्राप्त करना बहुत सरल हो जाता है ।

4. आदर्शों के प्रति श्रद्धा और कर्तव्य के प्रति लगन का जहाँ भी उदय हो रहा है, समझना चाहिए कि वहाँ किसी देवमानव का आविर्भाव हो रहा है ।

5. कुचक्र, छद्म और आतंक के बलबूते उपार्जित की गई सफलताएँ जादू के तमाशे में हथेली पर सरसों जमाने जैसे चमत्कार दिखाकर तिरोहित हो जाती हैं ।
बिना जड़ का पेड़ कब तक टिकेगा और किस प्रकार फलेगा-फूलेगा ।

6. जो दूसरों को धोखा देना चाहता है, वास्तव में वह अपने आपको ही धोखा देता है ।

7. समर्पण का अर्थ है-पूर्णरूपेण प्रभु को हृदय में स्वीकार करना, उनकी इच्छा, प्रेरणाओं के प्रति सदैव जागरूक रहना और जीवन के प्रत्येक क्षण में उसे परिणत करते रहना ।

8. मनोविकार भले ही छोटे हों या बड़े, यह शत्रु के समान हैं और प्रताड़ना के ही योग्य हैं ।

9. सबसे महान् धर्म है, अपनी आत्मा के प्रति सच्चा बनना ।

10. सद्व्यवहार में शक्ति है । जो सोचता है कि मैं दूसरों के काम आ सकने के लिए कुछ करूँ, वही आत्मोन्नति का सच्चा पथिक है ।

11. जिनका प्रत्येक कर्म भगवान् को, आदर्शों को समर्पित होता है, वही सबसे बड़ा योगी है ।

12. कोई भी कठिनाई क्यों न हो, अगर हम सचमुच शान्त रहें तो समाधान मिल जाएगा ।

13. सत्संग और प्रवचनों का-स्वाध्याय और सदुपदेशों का तभी कुछ मूल्य है, जब उनके अनुसार कार्य करने की प्रेरणा मिले । अन्यथा यह सब भी कोरी बुद्धिमत्ता मात्र है ।

14. सब ने सही जाग्रत् आत्माओं में से जो जीवन्त हों, वे आपत्तिकालीन समय को समझें और व्यामोह के दायरे से निकलकर बाहर आएँ । उन्हीं के बिना प्रगति का रथ रुका पड़ा है ।

15. साधना एक पराक्रम है, संघर्ष है, जो अपनी ही दुष्प्रवृत्तियों से करना होता है ।

16. आत्मा को निर्मल बनाकर, इंद्रियों का संयम कर उसे परमात्मा के साथ मिला देने की प्रक्रिया का नाम योग है ।

17. जैसे कोरे कागज पर ही पत्र लिखे जा सकते हैं, लिखे हुए पर नहीं, उसी प्रकार निर्मल अंतःकरण पर ही योग की शिक्षा और साधना अंकित हो सकती है ।

18. योग के दृष्टिकोण से तुम जो करते हो वह नहीं, बल्कि तुम कैसे करते हो, वह बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण है ।

19. यह आपत्तिकालीन समय है । आपत्ति धर्म का अर्थ है-सामान्य सुख-सुविधाओं की बात ताक पर रख देना
और वह करने में जुट जाना जिसके लिए मनुष्य की गरिमा भरी अंतरात्मा पुकारती है ।

20. जीवन के प्रकाशवान् क्षण वे हैं, जो सत्कर्म करते हुए बीते ।

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21. प्रखर और सजीव आध्यात्मिकता वह है, जिसमें अपने आपका निर्माण दुनिया वालों की अँधी भेड़चाल के अनुकरण से नहीं,
वरन् स्वतंत्र विवेक के आधार पर कर सकना संभव हो सके ।

22. वह स्थान मंदिर है, जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक किन्तु ज्ञान की चेतनायुक्त देवता निवास करते हैं ।

23. बलिदान वही कर सकता है, जो शुद्ध है, निर्भय है और योग्य है ।

24. जिस आदर्श के व्यवहार का प्रभाव न हो, वह फिजूल है और जो व्यवहार आदर्श प्रेरित न हो, वह भयंकर है ।

25. भगवान जिसे सच्चे मन से प्यार करते हैं, उसे अग्नि परीक्षाओं में होकर गुजारते हैं ।

26. हम अपनी कमियों को पहचानें और इन्हें हटाने और उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियाँ स्थापित करने का उपाय सोचें, इसी में अपना व मानव मात्र का कल्याण है ।

27. हर वक्त, हर स्थिति में मुस्कराते रहिये, निर्भय रहिये, कर्त्तव्य करते रहिये और प्रसन्न रहिये ।

28. प्रगति के लिए संघर्ष करो । अनीति को रोकने के लिए संघर्ष करो और इसलिए भी संघर्ष करो कि संघर्ष के कारणों का अन्त हो सके ।

29. धर्म की रक्षा और अधर्म का उन्मूलन करना ही अवतार और उसके अनुयायियों का कर्त्तव्य है ।
इसमें चाहे निजी हानि कितनी ही होती हो, कठिनाई कितनी ही उठानी पड़ती हों ।

30. अवतार व्यक्ति के रूप में नहीं, आदर्शवादी प्रवाह के रूप में होते हैं और हर जीवन्त आत्मा को युगधर्म निबाहने के लिए बाधित करते हैं ।

31. शरीर और मन की प्रसन्नता के लिए जिसने आत्म-प्रयोजन का बलिदान कर दिया, उससे बढ़कर अभागा एवं दुर्बुद्धि और कौन हो सकता है?

32. जीवन के आनन्द गौरव के साथ, सम्मान के साथ और स्वाभिमान के साथ जीने में है ।


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33. आचारनिष्ठ उपदेशक ही परिवर्तन लाने में सफल हो सकते हैं । अनधिकारी धर्मोपदेशक खोटे सिक्के की तरह मात्र विक्षोभ और अविश्वास ही भड़काते हैं ।

34. इन दिनों जाग्रत् आत्मा मूक दर्शक बनकर न रहे । बिना किसी के समर्थन, विरोध की परवाह किए आत्म-प्रेरणा के सहारे स्वयंमेव अपनी दिशाधारा का निर्माण-निर्धारण करें ।

35. जो भौतिक महत्त्वाकांक्षियों की बेतरह कटौती करते हुए समय की पुकार पूरी करने के लिए बढ़े-चढ़े अनुदान प्रस्तुत करते
और जिसमें महान् परम्परा छोड़ जाने की ललक उफनती रहे, यही है-प्रज्ञापुत्र शब्द का अर्थ ।

36. दैवी शक्तियों के अवतरण के लिए पहली शर्त है- साधक की पात्रता, पवित्रता और प्रामाणिकता ।

37. आशावादी हर कठिनाई में अवसर देखता है, पर निराशावादी प्रत्येक अवसर में कठिनाइयाँ ही खोजता है ।

38. चरित्रवान् व्यक्ति ही किसी राष्ट्र की वास्तविक सम्पदा है ।

39. व्यक्तिगत स्वार्थों का उत्सर्ग सामाजिक प्रगति के लिए करने की परम्परा जब तक प्रचलित न होगी, तब तक कोई राष्ट्र सच्चे अर्थों में सार्मथ्यवान् नहीं बन सकता है ।

40. युग निर्माण योजना का लक्ष्य है-शुचिता, पवित्रता, सच्चरित्रता, समता, उदारता, सहकारिता उत्पन्न करना ।

41. भुजाएँ साक्षात् हनुमान हैं और मस्तिष्क गणेश, इनके निरन्तर साथ रहते हुए किसी को दरिद्र रहने की आवश्यकता नहीं ।

42. विद्या की आकांक्षा यदि सच्ची हो, गहरी हो तो उसके रहते कोई व्यक्ति कदापि मूर्ख, अशिक्षित नहीं रह सकता ।

43. मनुष्य दुःखी, निराशा, चिंतित, उदिग्न बैठा रहता हो तो समझना चाहिए सही सोचने की विधि से अपरिचित होने का ही यह परिणाम है ।

44. धर्म अंतःकरण को प्रभावित और प्रशासित करता है, उसमें उत्कृष्टता अपनाने, आदर्शों को कार्यान्वित करने की उमंग उत्पन्न करता है ।

45. जीवन साधना का अर्थ है- अपने समय, श्रम और साधनों का कण-कण उपयोगी दिशा में नियोजित किये रहना ।

46. निकृष्ट चिंतन एवं घृणित कर्तृत्व हमारी गौरव गरिमा पर लगा हुआ कलंक है ।

47. आत्मा का परिष्कृत रूप ही परमात्मा है ।

48. हम कोई ऐसा काम न करें, जिसमें अपनी अंतरात्मा ही अपने को धिक्कारे ।

49. अपनी दुष्टताएँ दूसरों से छिपाकर रखी जा सकती हैं, पर अपने आप से कुछ भी छिपाया नहीं जा सकता ।

50. किसी महान् उद्देश्य की ओर न चलना उतनी लज्जा की बात नहीं होती, जितनी कि चलने के बाद कठिनाइयों के भय से पीछे हट जाना ।


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51. महानता का गुण न तो किसी के लिए सुरक्षित है और न प्रतिबंधित । जो चाहे अपनी शुभेच्छाओं से उसे प्राप्त कर सकता है ।

52. सच्ची लगन तथा निर्मल उद्देश्य से किया हुआ प्रयत्न कभी निष्फल नहीं जाता ।

53. खरे बनिये, खरा काम कीजिए और खरी बात कहिए । इससे आपका हृदय हल्का रहेगा ।

54. मनुष्य जन्म सरल है, पर मनुष्यता कठिन प्रयत्न करके कमानी पड़ती है ।

55. ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।

56. सज्जनों की कोई भी साधना कठिनाइयों में से होकर निकलने पर ही पूर्ण होती है ।

57. असत् से सत् की ओर, अंधकार से आलोक की और विनाश से विकास की ओर बढ़ने का नाम ही साधना है ।

58. किसी सदुद्देश्य के लिए जीवन भर कठिनाइयों से जूझते रहना ही महापुरुष होना है ।

59. अपना मूल्य समझो और विश्वास करो कि तुम संसार के सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति हो ।

60. उत्कृष्ट जीवन का स्वरूप है-दूसरों के प्रति नम्र और अपने प्रति कठोर होना ।


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61. वही जीवति है, जिसका मस्तिष्क ठण्डा, रक्त गरम, हृदय कोमल और पुरुषार्थ प्रखर है ।

62. चरित्र का अर्थ है- अपने महान् मानवीय उत्तरदायित्वों का महत्त्व समझना और उसका हर कीमत पर निर्वाह करना ।

63. मनुष्य एक भटका हुआ देवता है । सही दिशा पर चल सके, तो उससे बढ़कर श्रेष्ठ और कोई नहीं ।

64. अपने अज्ञान को दूर करके मन-मन्दिर में ज्ञान का दीपक जलाना भगवान् की सच्ची पूजा है ।

65. जो बीत गया सो गया, जो आने वाला है वह अज्ञात है! लेकिन वर्तमान तो हमारे हाथ में है ।

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Lest we forget

Carbon Addiction

On this day, Remembrance Day, it’s poignant to remember that many top cyclists lost their lives during the Great War, and again in WW2. I was half way through writing a piece about champion English rider, Thomas Gascoyne – who emigrated to Australia in the early 1900s, raced for a while under a pseudonym, enlisted in the Australian 21st Battalion and died at the Battle of Passchendaele on the Western Front on 4 October 1917 – when I happened upon the following article from inrng.com, it’s well worth a read. Especially today.

http://inrng.com/2013/11/fallen-cyclists-war-stories/

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