विवेकानंद क्या चाहते थे? ~ Vivekananda wanted to do?

::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) …..

kmsraj51 की कलम से …..
pen-kms

** विवेकानंद क्या चाहते थे? ~ Vivekananda wanted to do? **

Swami-Vivekananda

शिकागो में हुए पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन्स में जब प्रत्येक धर्मावलंबी अपने-अपने धर्म को दूसरे धर्म से ऊपर दिखाने की चेष्टा कर रहा था तब विवेकानंद ने उनके इस शीतयुद्ध का निवारण एक छोटी-सी परंतु महत्वपूर्ण कहानी के द्वारा किया।

Swami Vivekanand Ji


बात 1867 की है। एक ट्यूटर उन दिनों कोलकाता के गौर मोहन मुखर्जी लेन स्थित मकान पर एक बालक को रोज पढ़ाने आते थे। तब न तो उन ट्यूटर को तथा न ही किसी अन्य को पता था कि यही बालक एक दिन विश्व-धर्म का प्रचार करेगा और युवा चेतना का एक अंतरराष्ट्रीय प्रतीक बनेगा। वैसे इस बालक की माता भुवनेश्वरी देवी को तब ही आभास हो चुका था, जब यह बालक उनकी कोख में पल रहा था कि यह संतान विश्व कल्याण के लिए ही उत्पन्न होगी। बचपन में इस बालक का नाम था नरेंद्रनाथ दत्त।

नरेंद्र के पिताजी अंगरेजी शिक्षा में दीक्षित, उदार, पश्चिमपरक तथा एक संपन्न वकील थे। धर्म के प्रति उनकी आस्था कम ही थी। इसके विपरीत नरेंद्र की मां सनातन आस्थाओं वाली धर्मपरायण महिला थी। पिता चाहते थे कि नरेंद्र भी उन्हीं का व्यवसाय अपनाकर जीवनयापन करे और इसी तारतम्य में उन्होंने उसे प्रेसीडेंसी कॉलेज तथा स्कॉटिश चर्च कॉलेज से स्नातक (बीए) करवाया। आगे उन्होंने कानून की पढ़ाई भी प्रारंभ कर दी थी, परंतु युवावस्था से ही उन्हें ‘ईश्वर की खोज’ की भी धुन सवार हो गई थी। यही धुन उन्हें एक प्रतिष्ठित वकील बनने की बजाय स्वामी रामकृष्ण परमहंस तक ले गई।

कालांतर में परमहंस के मुख्य शिष्य के रूप में संन्यास लेकर नरेंद्र ने विवेकानंद नाम ग्रहण किया। इसके पश्चात प्रारंभ हुई एक युवा की क्रांति अलख, जो डेढ़-दो दशक तक खोज, साधना, देशाटन, देशप्रेम आदि के रूप में गुजरते हुए समय से पूर्व अल्पकाल में बुझ गई, परंतु अपने पीछे छोड़ गई एक अनमोल धरोहर, एक परिवर्तन की, विश्व बंधुत्व की। यही क्रांति अलख पिछली एक शताब्दी से प्रत्येक युवा पीढ़ी के मार्गदर्शन व उत्प्रेरक का कार्य करती आ रही है। सबसे अधिक आश्चर्य की बात तो यह है कि जहाँ सौ वर्ष पुरानी अन्य बातें, पहलू व चीजें आज के दौर में लगभग अप्रासंगिक हो चुकी हैं, वहीं विवेकानंद का दर्शन न केवल आज भी उतना ही प्रासंगिक है वरन उस समय से भी आज ज्यादा सार्थक है।

आज हम कितने ही उन्नत होने के बावजूद आंतरिक रूप से खोखले होते जा रहे हैं। जाति, भाषा के आधार पर वैमनस्य, गिरते नैतिक प्रजातांत्रिक मूल्य तथा संस्कृति में हो रहे विराट व अटपटे परिवर्तन से निपटने के लिए अब पुनः युवा शक्ति को जागृत होना होगा। उसकी इस राह में स्वामी विवेकानंद का शाश्वत राष्ट्रवादी व देशप्रेमयुक्त अध्यात्म कारगर सिद्ध हो सकता है।

सन्‌ 1893 में शिकागो में हुए पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन्स (धर्म संसद) में जब प्रत्येक धर्मावलंबी अपने-अपने धर्म को दूसरे धर्म से ऊपर दिखाने की चेष्टा कर रहा था तब विवेकानंद ने उनके इस शीतयुद्ध का निवारण एक छोटी-सी परंतु महत्वपूर्ण कहानी के द्वारा किया : एक कुएं में बहुत समय से एक मेंढक रहता था। एक दिन एक दूसरा मेंढक, जो समुद्र में रहता था, वहां आया और कुएं में गिर पढ़ा। ‘तुम कहां से आए हो?’ कूपमंडूप ने पूछा। ‘मैं समुद्र से आया हूँ।’ समुद्र! भला वह कितना बड़ा है? क्या वह मेरे कुएं जितना ही बड़ा है?’ यह कहते हुए उसने कुएं में एक किनारे से दूसरे किनारे तक छलांग लगाई।

समुद्र वाले मेंढक ने कहा- ‘मेरे मित्र, समुद्र की तुलना भला इस छोटे से कुएँ से किस प्रकार की जा सकती है?’ तब उस कुएँ वाले मेंढक ने दूसरी छलाँग लगाई और पूछा, ‘तो क्या समुद्र इतना बड़ा है?’ समुद्र वाले मेंढक ने कहा- तुम कैसी बेवकूफी की बात कर रहे हो! क्या समुद्र की तुलना इस कुएँ से हो सकती है? अब कुएं वाले मेंढक ने चिढ़कर कहा- ‘जा, जा, मेरे कुएं से बढ़कर और कुछ हो ही नहीं सकता। संसार में इससे बड़ा और कुछ नहीं है। झूठा कहीं का! अरे, इसे पकड़कर बाहर निकाल दो।

विवेकानंद की इस कथा का सार न केवल धर्म की संकीर्णता दूर करने वाला है वरन इसके पीछे युवाओं को भी एक संदेश है कि प्रत्येक संभावना का विस्तार ही (बगैर कूपमंडूकता के) जीवन का मूल उद्देश्य होना चाहिए।

विवेकानंद चाहते थे कि हर समाज स्वतंत्र हो, दूसरे समाज से विचारगत, आस्थागत समायोजन हो। भारत के विषय में उनका सोचना था कि एक तरफ तो हम निष्क्रिय रहकर प्राचीन गौरव के गर्व में फंस गए, दूसरी ओर हीनता की भावना में दब गए। तीसरे, सारी दुनिया से कटकर घोंघे में बंद हो गए। वे कहते थे कि जिस प्राचीन आध्यात्मिक शक्ति पर हम गर्व करते हैं, उसे अपने भीतर जगाना होगा। यह अभी हमारे भीतर नहीं है, केवल बाहरी है।

उन्होंने यह आह्वान युवाओं से किया था कि तुम ही यह कार्य कर दिखाओ। ये युवा ही हैं, जो इस समाज को आत्मशक्ति दे सकते हैं, संपूर्ण विश्व से गर्व से संवाद व संबंध स्थापित कर सकते हैं। इसके उपरांत ही हम स्वतंत्र हो पाएंगे व सामाजिक न्याय की अवधारणा समाज में स्थापित कर सकेंगे।

ये विचार आज कहीं अधिक उपयोगी हैं, जिससे हम उस राष्ट्र को फिर जीवित कर सकें जो विवेकानंद की कल्पनाओं का था। आवश्यकता है तो बस इतनी ही कि विवेकानंद के दर्शन का प्रसार युवाओं में एक आंदोलन की भांति हो।


::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) …..
kms1006

Note::-
यदि आपके पास Hindi में कोई article, inspirational story, Poetry या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी Id है::- kmsraj51@yahoo.in . पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

##### ::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) ….. #####

10 गुना इंटरनेट स्पीड देगा गूगल का नया डाटा सेंटर ~ Google’s new data center offers internet speeds 10 times !!

::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) …..

kmsraj51 की कलम से …..
pen-kms

** 10 गुना इंटरनेट स्पीड देगा गूगल का नया डाटा सेंटर!! **


ggl

इंटरनेट की दुनिया की सबसे मशहूर कंपनी गूगल ने हाल ही में एशिया में अपने दो नए डाटा सेंटर खोले हैं। टैक्नोलॉजी की दुनिया भर के बाजारों में बढ़ती मांग को देखते हुए कंपनी ने ये कदम उठाया है। एक डाटा सेंटर काउंटी ताइवान और दूसरा जुरोंग वेस्ट, सिंगापुर में खोला गया है। कंपनी ने इन दोनों सेंटर को तैयार करने में कुल मिलाकर 2440 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। इन डाटा सेंटरों की मदद से अब इंटरनेट डाटा ट्रैफिक के लोड को कम किया जा सकेगा। इसके साथ ही गूगल अपने यूजर्स को अब और भी ज्यादा डाटा मुहैया करा सकेगा और इंटरनेट पर सर्च करना 10 गुना तक फास्ट और आसान हो जाएगा।

kms-google
रिपोर्ट के मुताबिक ताइवान, हांगकांग और सिंगापुर जैसे देश टेक कंपनियों के संचालन के लिए उपयुक्त स्थान माने जाते हैं। इन देशों में डाटा सेंटर का संचालन करने के लिए अच्छे कानून, मजबूत बिजली व्यवस्था, कुशल कर्मचारी और फाइबर ब्रॉडबैंड जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं।


google-kms
डा़टा सेंटर एक ऐसी जगह होती है, जहां ढेर सारे कंप्यूटर लगे होते हैं। इन कंप्यूटरों में दुनिया भर के जरूरी डाटा स्टोर किए जाते हैं, जिसकी मदद से दुनिया के कोने-कोने में इंटरनेट यूजर्स को डाटा मुहैया कराया जाता है। इंटरनेट पर मिलने वाली सभी जानकारियां इन्हीं डाटा सेंटरों से आती हैं।

4
गूगल की स्थापना 1998 में लैरी पेज और सेर्गे ब्रिन ने की थी। आज 15 साल बाद कंपनी की कुल संपत्ति 5,80,415 करोड़ रुपए हो चुकि है। अब गूगल अपने बिजनेस को बढ़ाते हुए ताइवान के डाटा सेंटर के संचालन के लिए 3712 करोड़ रुपए निवेश कर रही है। इसकी मदद से दुनिया भर में बढ़ रही टैक्नोलॉजी की जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा।


5
लगभग 3,10,503 करोड़ रुपए की सालाना (2012) रेवेन्यू वाली कंपनी का ताइवान का ये डाटा सेंटर काफी प्रभावशाली है और पर्यावरण के अनुकूल बनाया गया है।


6
इस डाटा सेंटर को रात के समय कंपनी के अंदर के वातावरण को ठंडा रखने और थर्मल ऊर्जा स्टोर करने के लिहाज से बनाया गया है।

7
आमतौर पर डाटा सेंटर का वातावरण ठंडा होना चाहिए क्योंकि कंप्यूटरों से निकलने वाली गर्मी सिस्टम को क्षति पहुंचा सकती है। गूगल के मुताबिक, इस कंपनी का कूलिंग सिस्टम इंसुलेटेड टैंक्स के जरिए चलाया जाता है।

8
इस डाटा सेंटर में कुल 60 लोगों की टीम के साथ कुछ फुल और पार्ट टाइम कांट्रेक्टर 24 घंटे साइट को चलाते हैं, जिसमें से कुछ इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स, मैकेनिकल इंजीनियर्स, कंप्यूटर तकनीशियन और कैटरर भी शामिल हैं।

9
एशिया में 2014 तक मोबाइल डाटा ट्रेफिक 68 प्रतिशत तक बढ़ने का अंदेशा है। ये डाटा सेंटर इस ट्रेफिक को नियंत्रित करने में काफी सहयोग करेगी।

10
कंपनी के उपाध्यक्ष डाटा सेंटर में सुरक्षा द्वारों की जांच करते हुए।

11
दुनिया के सबसे बेहतरीन सर्वर के एक कंप्यूटर के गर्म हो जाने के बाद गूगल की कर्मचारी उसकी जांच करती हुईं।

12
कंप्यूटर के खराब मदरबोर्ड की मरम्मत करता हुआ गूगल का कर्मचारी। इस डाटा सेंटर में खराब होने के बाद पुर्जों की पहले मरम्मत की जाती है अगर वो ठीक न हो सकें तो फिर उन्हें तोड़कर रिसाइकिल के लिए दे दिया जाता है।

13
जेनरेटर की मरम्मत करते गूगल के तकनीशियन।

14
डाटा सेंटर को ठंडा रखने वाले पाइप लाइन की जांच करता गूगल कर्मचारी।

15
बैटरी की जांच करते हुए गूगल कर्मचारी। समय-समय पर बैटरियों की जांच की जाती है की वो ठीक से चार्ज हो रहे हैं या नहीं।

16
इस डाटा सेंटर में नए जमाने के लिहाज से बनाए गए अति आधुनिक सर्वर देखे जा सकते हैं।

::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) …..
kms1006

Note::-
यदि आपके पास Hindi में कोई article, inspirational story, Poetry या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी Id है::- kmsraj51@yahoo.in . पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

@@@@@ ::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) ….. @@@@@

सन् 1600 बनाम सन् 2014 – 40 ~ Year 1600 vs. Year 2014 – 40 !!

::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) …..


kmsraj51 की कलम से …..
pen-kms

** सन् 1600 बनाम सन् 2014-40 ….. **

वर्तमान दौर चाहे वह राजनीति का हो या आर्थिक या फिर इस देश के चिर-संस्कारों से निर्मित नैतिक मूल्यों का ये सभी एक बहुत ही भयावह दौर से गुजर रहे हैं शायद कुछ लोग जो विद्वता के धनी है इसे संक्रमण काल के नाम से भी जानते हैं तो कुछ लोग इसे विभिन्न क्षेत्रों में प्रयोगवाद कह रहे हैं लेकिन यह समय मात्र और मात्र एक सच्चे भारतीय जो इसकी अखंडता एवं गौरवमयी इतिहास से थोड़ा भी सरोकार रखता है, के लिए बहुत ही विषम एवं चिंताजनक है स्पष्ट रुप में कहें तो बहुत ही भयावह है।
इतिहास गवाह है कि इस देश की मिट्टी इतनी उपजाऊ है कि इसने एक से एक संस्कारी महापुरुष तथा देशभक्त पैदा किए हैं लेकिन यह इस मिट्टी का दुर्भाग्य है कि विनाशकारी खरपतवार के रुप में यहां जयचंदों ने भी जन्म लिया है तथा इस पावन धरा को कलंकित किया है। आज का भारत भी इसी दौर से गुजर रहा है जहां ख्ररपतवार इतना बढ़ गया है कि अब पोषक फसलें नज़र ही नहीं आती और यह स्थिती केवल राजनीति ही नहीं कमोबेश हर क्षेत्र की हैं। इसका मात्र और एक मात्र कारण हमारे चिर-संस्कारों एवं मूल्यों का ह्रास होना है। मूल्यों एवं आदर्शों का प्रवाह सदैव शीर्ष से होता है और कहा भी है कि यथा राजा-तथा प्रजा लेकिन आज अपने क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति के लिए हमारे देश के कर्णधार नेतृत्व कर्ताओं ने इस उक्ति को ही बदल दिया और बयान दिया कि जैसी जनता है वैसे ही नेतृत्व कर्ता बनेंगे अर्थात ये लोग जनता के इच्छानुसार ही अपने हित साधन के लिए सारे अपराध एवं भ्रष्ट तंत्र को बढ़ावा दे रहे हैं। आखिर वो कौन सी प्रजा या जनता है जिसने राजा को भ्रष्ट एवं डकैत बनने के लिए जनादेश दिया? शायद इसका उत्तर यह है कि इस देश में जनता या नागरिक नाम की कोई व्यवस्था अब अस्तित्व में ही नहीं है यहां केवल उपभोक्तावादी संस्कृति के पोषक मतदाता रहते हैं जिन्हें कोई भी खरीद सकता है तथा ये तथाकथित मतदाता भोली चिड़ियाओं की भांति किसी भी बहेलिए के जाल में फंसने को आतुर है। फिर चाहे वह बहेलिए देशी हो या विदेशी इससे इनको कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि लालच ने संवेदनाओं को मृत प्राय: कर दिया है। इन चिड़ियाओं को स्वतंत्र आसमान से बेहतर सुख-सुविधा युक्त वो स्वप्निल सोने का पिंजड़ा अधिक रास आने लगा है जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं और जो मात्र और मात्र एक छलावा भर है।

आज इस देश की जनता को देश के प्रोफाईल से अधिक अपना हाई प्रोफाईल प्रिय है कमोबेश आज हमारा देश गुलामी से पहले के उसी दौर से गुजर रहा हैं। जनता विभिन्न मुद्दों पर आपस में बंटी हुई है चाहे वो आरक्षण का मुद्दा हो या राज्यवाद या फिर धर्म या जातिवाद का चारों और विघटनकारी शक्तियों का बोलबाला हैं हर आदमी ने अपने चारों और अपने स्वार्थों का एक घेरा बना रखा है तथा इस घेरे या उसके क्षुद्र स्वार्थों को नुकसान पहुंचाने वाला हर आदमी उसका शत्रु है। इस देश में अपनी जातिगत गौरव गाथा गाने वाले इतने जातिगत व धार्मिक सामाजिक संगठन है जिनको शायद गिनना भी संभव नहीं होगा लेकिन दुर्भाग्य है कि वे महापुरुष जो राष्ट्र के लिए एक होकर लड़े उनको भी इन कम्बख्तों ने अपने स्वार्थ के अनुरुप बांट दिया । आज कहीं भी अखिल भारतीय समाज नाम की कोई संस्था नही है क्योंकि सभी ने अपने आपको कई सांचों में बांट लिया है तथा सभी के अपने अपने हित हैं जिनके लिए वे लड़ रहे है उनकी तरफ से देश भले गर्त में जाए कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन उन्हें यह पता नही कि जब तक यह देश अखंड एवं सुरक्षित है तभी तक उनका या उनके समाज का अस्तित्व है: आज की युवा पीढ़ी को एक अदद नौकरी और सुख सुविधा युक्त घर से अधिक सोचने की जरूरत महसूस नहीं होती देश के विषय में या अपनी सभ्यता संस्कृति के बारे में मनन करने का कोई औचित्य नहीं हैं अपने घर की बनी रोटी भी यदि विदेशी पेकिंग में दी जाती है तो खुशी होती है। आज कमोबेश हर दूसरा आदमी मानसिक गुलामी के दौर से गुजर रहा है राष्ट्र छद्म अराजकता के वातावरण से गुजर रहा है। क्या यही स्वतंत्रता है? विकास के नाम पर अपने स्वाभिमान, राष्ट्रीय संस्कृति को भूलाना तथा भौतिकता के चकाचौंध में प्राकृतिक संसाधनों का बंदरबांट कर देश को रसातल की और ले जाना, क्या आजादी का यही मतलब है?

आज के दौर की तुलना भारत के राजपूतकालीन समय से की जा सकती है जब भारत कई छोटी- छोटी रियासतों में बंटा हुआ था तथा ये रियासतें छुद्र स्वार्थों की पूर्ती हेतु आपस में लड़ती रहती थीं। विलासिता एवं अकर्मण्यता की पर्याय बन चुकी ये रियासतें अंदर से जर्जर हो चुकी थी।परिणामस्वरूप ये रियासतें कमजोर होती गईं विदेशी आक्रांताओं ने अपनी हवस एवं बेलगाम क्षुधा की पूर्ति हेतु इसा पावन धरा को कलुषित किया ताकत का एक बड़ा भाग भारतीय समाज कई बुराईयों जैसे छुआछुत, उच्श्रंखल जातिवाद , संप्रदायवाद इत्यादि में जकड़ा हुआ था तो क्या आज कमोबेश हमारे सामने वही परिदृश्य नहीं दिखाई दे रहा है। किसी ने क्या खूब कहा है कि इतिहास अपनी पुनरावृत्ति करता है पर क्या इतने कम अंतराल पर और क्या हम इससे सीख लेने के बजाय इसकी पुनरावृति होने देंगें। आज ये छोटे-छोटे राज्य जो कि नदी के पानी, भाषा, खनिजों के आधिपत्य के लिए न्यायालय में हाजिरी दे रहे हैं और सैकड़ों पार्टियां जो क्षुद्र स्वार्थों के लिए जनता को सब्ज बाग दिखा कर उनका वोटा हासिल कर रही हैं तत्पश्चात उसी जनता का शोषण तो क्या ये आजादी और उससे भी पूर्व अंग्रेजों के आगमन के समय का परिदृश्य प्रस्तुत नहीं कर रही है तथा जनता लाचार कई मतभेदों में उलझी हुई निरिह बनी सब कुछ सहने को विवश है।अगर इसी का नाम आजादी है तो वह दिन दूर नहीं जब इस देश के गद्दार इस देश की अमूल संपदा के साथ-साथ यहां के कथित मतदाताओं के भविष्य का भी किसी विदेशी के हाथों सौदा कर दें तथा बाद में कहें कि जीडीपी बढ़ाने के लिए यह जरूरी था।
जिस देश के पड़ोसी ताकतवर, कूटनीतिक एवं साम्राज्यवादी हों उस देश का राजनैतिक व नैतिक पतन की ओर अग्रसर होना उसके दुश्मनों के मार्ग को और सुगम बना देता है तथा वह देश बिना किसी युद्ध के ही गुलाम बनाया जा सकता है क्योंकि किसी देश का नेतृत्व ही उस देश की समृद्धि और ताकत का आईना होता है जिसमें उस देश की बाकी आवाम की झलक देखी जा सकती है।

संजय मिश्र “सदांश”

नोट: यह रचना किसी विशेष वर्ग, समुदाय या व्यक्ति विशेष पर आधारित नहीं है, न ही हमारा उद्देश्य किसी के दिल को ठेस पहुंचाना है । यह लेख पूर्ण रुप से मां भारती को समर्पित है। यदि कोई तथ्य किसी से मिलता है तो यह संयोग मात्र होगा।

** Important Note:: यह लेख संजय मिश्रा द्वारा शेयर किया गया है !! https://kmsraj51.wordpress.com/ **
पर ** दिल से धन्यवाद संजय भाई !! **
IMG_0033
** संजय मिश्रा **

::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) …..
cropped-kms10060.jpg

Note::-
यदि आपके पास Hindi में कोई article, inspirational story, Poetry या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें. हमारी Id है::- kmsraj51@yahoo.in . पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!!

@@@@@ ::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) ….. @@@@@