Scrutinizing The Habitable Zone

Webner House

This week the NASA Kepler telescope team announced the discovery of another 715 “exoplanets” outside our solar system — all of which are in their own multi-planet solar systems. The announcement represents another giant leap forward in our understanding of other solar systems, and how commonplace multi-planet systems are.

The Kepler space telescope was focused on finding instances of “transits,” when light from a faraway sun drops slightly in brightness because a planet has crossed in front of the sun. The size of the variation in light allows scientists to calculate the size of the planet moving across the face of the sun. Most of the newly discovered planets — about 95 percent — are smaller than Neptune, which is four times the size of Earth. The size of the planets is of interest to scientists because it is believed that life is more likely on smaller planets than…

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Grubiak, “White Elephants on Campus: The Decline of the University Chapel in America, 1920–1960”

LAW AND RELIGION FORUM

Next month, Notre Dame will publish White Elephants on Campus: The dddDecline of the University Chapel in America, 1920–1960, by Margaret M. Grubiak (Villanova University). The publisher’s description follows.

 In White Elephants on Campus: The Decline of the University Chapel in America, 1920–1960, Margaret M. Grubiak persuasively argues, through a careful selection of case studies, that the evolution of the architecture of new churches and chapels built on campuses reveals the shifting and declining role of religion within the mission of the modern American university. According to Grubiak, during the first half of the twentieth century, university leaders tended to view architecture as a means of retaining religion within an increasingly scientific and secular university. Initially, the construction of large-scale chapels was meant to advertise religion’s continued importance to the university mission. Lavish neo-Gothic chapels at historically Protestant schools, although counter to traditional Protestant imagery, were justified as an appeal…

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50 अनमोल वचन हिंदी में | 50 Great Quotations In Hindi

50 अनमोल वचन हिंदी में | 50 Great Quotations In Hindi

1. जिसने  ज्न्यान  को  आचरण  में  उतार  लिया , उसने  ईश्वर  को  मूर्तिमान  कर  लिया  – विनोबा भावे 

2. अकर्मण्यता  का  दूसरा  नाम  मर्त्यु  है  – मुसोलिनी

3. पालने  से  लेकर  कब्र  तक  ज्ञान  प्राप्त  करते  रहो  – पवित्र कुरान

4. इच्छा  ही  सब  दूखो   का  मूल  है  – गौतम बुद्ध

5. मनुष्य  का  सबसे  बड़ा  शत्रु  उसका  अज्न्यान  है  – चाणक्य

6. आपका  आज  का  पुरुषार्थ  आपका  कल  का  भाग्य  है  – पालशिरू

7. क्रोध  एक  किस्म  का  क्षणिक  पागलपन  है  – महात्मा  गांधी

8. ठोकर  लगती  है  और  दर्द  होता  है  तभी  मनुष्य  सीख  पाटा  है  – महात्मा  गांधी

9. अप्रिय  शब्द  पशुओ  को  भी  नहीं  सुहाते  है  – गौतम बुद्ध 

10. नरम  शब्दों  से  सख्त  दिलो  को  जीता  जा  सकता  है  – सुकरात

11. गहरी  नदी  का  जल  प्रवाह  शांत  व  गंभीर  होता  है  – शेक्सपीयर

12. समय  और  समुद्र  की  लहरे  किसी  का  इंतज़ार  नहीं  करती  – अज्ञात

13. जिस  तरह  जौहरी  ही  असली  हीरे  की  पहचान  कर  सकता  है , उसी  तरह  गुनी  ही  गुणवान  की  पहचान  कर  सकता  है  – कबीर

14. जो  आपको  कल  कर  देना  चाहिए  था , वही  संसार  का  सबसे  का थीं  कार्य  है  – कन्फ्यूशियस

15. ज्ञानी   पुरुषो  का  क्रोध  भीतर  ही , शान्ति  से  निवास  करता  है , बाहर  नहीं  – खलील  जिब्रान

16. कुबेर  भी  यदि  आय  से  अधिक  व्यय  करे  तो  निर्धन  हो  जाता  है  – चाणक्य

17. डूब  की  तरह  छोटे  बनाकर  रहो . जब  घास -पात  जल  जाते  है  तब  भी  डूब  जस  की  तस  बनी  रहती  है  – गुरु  नानक  देव

18. ईश्वर  के  हाथ  देने  के  लिए  खुले  है . लेने  के  लिए  तुम्हे  प्रयत्न  करना  होगा  – गुरु  नानक  देव 

19. जो  दूसरो  से  घृणा  करता  है  वह  स्वय  पतित  होता  है  – स्वामी विवेकानंद

20. जो  जैसा  शुभ  व  अशुभ  कार्य  करता  है , वो  वैसा  ही  फल  भोगता  है  – वेदव्यास 

21. मनुष्य  की  इच्छाओ  का  पेट  आज  तक  कोइ  नहीं  भर  सका  है  – वेदव्यास 

22. नम्रता  और  मीठे  वचन  ही  मनुष्य  के  सच्चे  आभूषण  होते  है  – तिरूवल्लुवर 

23. खुदा  एक  दरवाजा  बंद  करने  से  पहले  दूसरा  खोल  देता  है , उसे  प्रयत्न  कर  देखो  – शेख  सादी

24. बुरे  आदमी  के  साथ  भी  भलाई  करनी  चाहिए  – कुत्ते  को  रोटी  का  एक  टुकड़ा  डालकर  उसका  मुंह  बंद  करना  ही  अच्छा  है  – शेख  सादी 

25. अपमानपूर्वक  अमरत  पीने  से  तो  अच्छा  है  सम्मानपूर्वक  विषपान  – रहीम 

26. थोड़े  से  धन  से  दुष्ट  जन  उन्मत्त  हो  जाते  है  – जैसे  छोटी , बरसाती  नदी   में  थोड़ी  सी  वर्षा  से  बाढ़  आ  जाती  है  – गोस्वामी  तुलसीदास 

27. ईश  प्राप्ति  (शान्ति ) के  लिए  अंत: कारन  शुद्ध  होना  चाहिए  – रविदास 

28. जब  मई  स्वय  पर  हँसता  हूँ  तो  मेरे  मन  का  बोज़  हल्का  हो  जाता  है  – टैगोर 

29. जन्म  के  बाद  मर्त्यु , उत्थान  के  बाद  पतन , संयोग  के  बाद  वियोग , संचय  के  बाद  क्षय  निश्चित  है . ज्ञानी इन  बातो  का  ज्न्यान  कर  हर्ष  और  शोक  के  वशीभूत  नहीं  होते  – महाभारत  

30. जननी  जन्मभूमि  स्वर्ग  से  भी  बढाकर  है – अज्ञात

31. भरे  बादल  और  फले  वर्कश  नीचे  ज़ुकारे  है , सज्जन  ज्न्यान  और  धन  पाकर  विनम्र  बनाते  है – अज्ञात

32. सोचना, कहना  व  करना  सदा   सम्मान  हो – अज्ञात

33. न   कल  की  न  काल  की  फिकर  करो , सदा  हर्षित  मुख  रहो – अज्ञात

34. स्व  परिवर्तन  से  दूसरो  का  परिवर्तन  करो – अज्ञात

35. ते  ते  पाँव   पसारियो   जेती  चादर  होय – अज्ञात

36. महान  पुरुष  की  पहली  पहचान  उसकी  विनम्रता  है – अज्ञात

37. बिना  अनुभव  कोरा  शाब्दिक  ज्न्यान  अँधा  है – अज्ञात

38. क्रोध  सदैव  मूर्खता   से  प्रारम्भ  होता  है  और  पश्चाताप  पर  समाप्त – अज्ञात

39. नारी  की  उन्नति  पर  ही  राष्ट्र  की  उन्नति  निर्धारित  है – अज्ञात

40. धरती  पर  है  स्वर्ग  कहा  – छोटा  है  परिवार  जहा – अज्ञात

41. दूसरो  का  जो  आचरण  तुम्हे  पसंद  नहीं , वैसा  आचरण  दूसरो  के  प्रति  न  करो – अज्ञात

42. नम्रता  सारे  गुणों  का  दर्द  स्तम्भ  है – अज्ञात

43. बुद्धिमान  किसी  का  उपहास  नहीं  करते  है – अज्ञात

44. हर  अच्छा  काम  पहले असंभव  नजर  आता  है – अज्ञात

45. पुस्तक  प्रेमी  सबसे  धनवान  व  सुखी  होता  है – अज्ञात

46. सबसे   उत्तम  बदला  क्षमा  करना  है – अज्ञात

47. आराम  हराम  है – अज्ञात

48. दो  बच्चो  से  खिलाता  उपवन , हंसते -हंसते  कटता  जीवन – अज्ञात

49. अगर  चाहते  सुख  समर्द्धि , रोको  जनसंख्या  वर्द्धि – अज्ञात

५०. कार्य  मनोरथ  से  नहीं , उद्यम  से  सिद्ध  होते  है . जैसे  सोते  हुए  सिंह  के  मुंह  में  मुर्गे अपने  आप  नहीं  चले  जाते  – विष्णु  शर्मा!

Chankya Niti – मूल चाणक्य नीति!!

::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) …..


kmsraj51 की कलम से …..
pen-kms

** मूल चाणक्य नीति/चाणक्य सूत्र **


आचार्य चाणक्य एक ऐसी महान विभूति थे, जिन्होंने अपनी विद्वत्ता और क्षमताओं के बल पर भारतीय इतिहास की धारा को बदल दिया। मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चाणक्य कुशल राजनीतिज्ञ, चतुर कूटनीतिज्ञ, प्रकांड अर्थशास्त्री के रूप में भी विश्वविख्यात हुए।

इतनी सदियाँ गुजरने के बाद आज भी यदि चाणक्य के द्वारा बताए गए सिद्धांत और नीतियाँ प्रासंगिक हैं तो मात्र इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने गहन अध्ययन, चिंतन और जीवानानुभवों से अर्जित अमूल्य ज्ञान को, पूरी तरह नि:स्वार्थ होकर मानवीय कल्याण के उद्देश्य से अभिव्यक्त किया।

वर्तमान दौर की सामाजिक संरचना, भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था और शासन-प्रशासन को सुचारू ढंग से बताई गई नीतियाँ और सूत्र अत्यधिक कारगर सिद्ध हो सकते हैं। चाणक्य नीति के द्वितीय अध्याय से यहाँ प्रस्तुत हैं कुछ अंश –


1. जिस प्रकार सभी पर्वतों पर मणि नहीं मिलती, सभी हाथियों के मस्तक में मोती उत्पन्न नहीं होता, सभी वनों में चंदन का वृक्ष नहीं होता, उसी प्रकार सज्जन पुरुष सभी जगहों पर नहीं मिलते हैं।

2. झूठ बोलना, उतावलापन दिखाना, दुस्साहस करना, छल-कपट करना, मूर्खतापूर्ण कार्य करना, लोभ करना, अपवित्रता और निर्दयता – ये सभी स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं। चाणक्य उपर्युक्त दोषों को स्त्रियों का स्वाभाविक गुण मानते हैं। हालाँकि वर्तमान दौर की शिक्षित स्त्रियों में इन दोषों का होना सही नहीं कहा जा सकता है।

3. भोजन के लिए अच्छे पदार्थों का उपलब्ध होना, उन्हें पचाने की शक्ति का होना, सुंदर स्त्री के साथ संसर्ग के लिए कामशक्ति का होना, प्रचुर धन के साथ-साथ धन देने की इच्छा होना। ये सभी सुख मनुष्य को बहुत कठिनता से प्राप्त होते हैं।

4. चाणक्य कहते हैं कि जिस व्यक्ति का पुत्र उसके नियंत्रण में रहता है, जिसकी पत्नी आज्ञा के अनुसार आचरण करती है और जो व्यक्ति अपने कमाए धन से पूरी तरह संतुष्ट रहता है। ऐसे मनुष्य के लिए यह संसार ही स्वर्ग के समान है।

5. चाणक्य का मानना है कि वही गृहस्थी सुखी है, जिसकी संतान उनकी आज्ञा का पालन करती है। पिता का भी कर्तव्य है कि वह पुत्रों का पालन-पोषण अच्छी तरह से करे। इसी प्रकार ऐसे व्यक्ति को मित्र नहीं कहा जा सकता है, जिस पर विश्वास नहीं किया जा सके और ऐसी पत्नी व्यर्थ है जिससे किसी प्रकार का सुख प्राप्त न हो।

6. जो मित्र आपके सामने चिकनी-चुपड़ी बातें करता हो और पीठ पीछे आपके कार्य को बिगाड़ देता हो, उसे त्याग देने में ही भलाई है। चाणक्य कहते हैं कि वह उस बर्तन के समान है, जिसके ऊपर के हिस्से में दूध लगा है परंतु अंदर विष भरा हुआ होता है।

7. जिस प्रकार पत्नी के वियोग का दुख, अपने भाई-बंधुओं से प्राप्त अपमान का दुख असहनीय होता है, उसी प्रकार कर्ज से दबा व्यक्ति भी हर समय दुखी रहता है। दुष्ट राजा की सेवा में रहने वाला नौकर भी दुखी रहता है। निर्धनता का अभिशाप भी मनुष्य कभी नहीं भुला पाता। इनसे व्यक्ति की आत्मा अंदर ही अंदर जलती रहती है।

8. ब्राह्मणों का बल विद्या है, राजाओं का बल उनकी सेना है, वैश्यों का बल उनका धन है और शूद्रों का बल दूसरों की सेवा करना है। ब्राह्मणों का कर्तव्य है कि वे विद्या ग्रहण करें। राजा का कर्तव्य है कि वे सैनिकों द्वारा अपने बल को बढ़ाते रहें। वैश्यों का कर्तव्य है कि वे व्यापार द्वारा धन बढ़ाएँ, शूद्रों का कर्तव्य श्रेष्ठ लोगों की सेवा करना है।

9. चाणक्य का कहना है कि मूर्खता के समान यौवन भी दुखदायी होता है क्योंकि जवानी में व्यक्ति कामवासना के आवेग में कोई भी मूर्खतापूर्ण कार्य कर सकता है। परंतु इनसे भी अधिक कष्टदायक है दूसरों पर आश्रित रहना।

10. चाणक्य कहते हैं कि बचपन में संतान को जैसी शिक्षा दी जाती है, उनका विकास उसी प्रकार होता है। इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे उन्हें ऐसे मार्ग पर चलाएँ, जिससे उनमें उत्तम चरित्र का विकास हो क्योंकि गुणी व्यक्तियों से ही कुल की शोभा बढ़ती है।

11. वे माता-पिता अपने बच्चों के लिए शत्रु के समान हैं, जिन्होंने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दी। क्योंकि अनपढ़ बालक का विद्वानों के समूह में उसी प्रकार अपमान होता है जैसे हंसों के झुंड में बगुले की स्थिति होती है। शिक्षा विहीन मनुष्य बिना पूँछ के जानवर जैसा होता है, इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे बच्चों को ऐसी शिक्षा दें जिससे वे समाज को सुशोभित करें।

12. चाणक्य कहते हैं कि अधिक लाड़ प्यार करने से बच्चों में अनेक दोष उत्पन्न हो जाते हैं। इसलिए यदि वे कोई गलत काम करते हैं तो उसे नजरअंदाज करके लाड़-प्यार करना उचित नहीं है। बच्चे को डाँटना भी आवश्यक है।

13. शिक्षा और अध्ययन की महत्ता बताते हुए चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य का जन्म बहुत सौभाग्य से मिलता है, इसलिए हमें अपने अधिकाधिक समय का वेदादि शास्त्रों के अध्ययन में तथा दान जैसे अच्छे कार्यों में ही सदुपयोग करना चाहिए।

14. चाणक्य कहते हैं कि जो व्यक्ति अच्छा मित्र नहीं है उस पर तो विश्वास नहीं करना चाहिए, परंतु इसके साथ ही अच्छे मित्र के संबंद में भी पूरा विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि यदि वह नाराज हो गया तो आपके सारे भेद खोल सकता है। अत: सावधानी अत्यंत आवश्यक है।

चाणक्य का मानना है कि व्यक्ति को कभी अपने मन का भेद नहीं खोलना चाहिए। उसे जो भी कार्य करना है, उसे अपने मन में रखे और पूरी तन्मयता के साथ समय आने पर उसे पूरा करना चाहिए।

15. चाणक्य के अनुसार नदी के किनारे स्थित वृक्षों का जीवन अनिश्चित होता है, क्योंकि नदियाँ बाढ़ के समय अपने किनारे के पेड़ों को उजाड़ देती हैं। इसी प्रकार दूसरे के घरों में रहने वाली स्त्री भी किसी समय पतन के मार्ग पर जा सकती है। इसी तरह जिस राजा के पास अच्छी सलाह देने वाले मंत्री नहीं होते, वह भी बहुत समय तक सुरक्षित नहीं रह सकता। इसमें जरा भी संदेह नहीं करना चाहिए।

17. चाणक्य कहते हैं कि जिस तरह वेश्या धन के समाप्त होने पर पुरुष से मुँह मोड़ लेती है। उसी तरह जब राजा शक्तिहीन हो जाता है तो प्रजा उसका साथ छोड़ देती है। इसी प्रकार वृक्षों पर रहने वाले पक्षी भी तभी तक किसी वृक्ष पर बसेरा रखते हैं, जब तक वहाँ से उन्हें फल प्राप्त होते रहते हैं। अतिथि का जब पूरा स्वागत-सत्कार कर दिया जाता है तो वह भी उस घर को छोड़ देता है।

18. बुरे चरित्र वाले, अकारण दूसरों को हानि पहुँचाने वाले तथा अशुद्ध स्थान पर रहने वाले व्यक्ति के साथ जो पुरुष मित्रता करता है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। आचार्य चाणक्य का कहना है मनुष्य को कुसंगति से बचना चाहिए। वे कहते हैं कि मनुष्य की भलाई इसी में है कि वह जितनी जल्दी हो सके, दुष्ट व्यक्ति का साथ छोड़ दे।

19. चाणक्य कहते हैं कि मित्रता, बराबरी वाले व्यक्तियों में ही करना ठीक रहता है। सरकारी नौकरी सर्वोत्तम होती है और अच्छे व्यापार के लिए व्यवहारकुशल होना आवश्यक है। इसी तरह सुंदर व सुशील स्त्री घर में ही शोभा देती है।

Note::-


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