Negative Control And Positive Influence

kmsraj51 की कलम से…..

Soulword_kmsraj51 - Change Y M T

Negative Control And Positive Influence 

The power of influence in relationships is extraordinary, but it practically disappears when we try to exercise control and force.

You can influence anyone positively in many ways:

• encouraging,

• sharing,

• listening,

• communicating in the right way. 

In negative control we generate stress, frustration and anger. In positive influence the energy flows in a relaxed way with harmony and is not threatening, respecting each one for their specialty and allowing each one to be as they are.

In order to influence positively we need the power of discrimination and judgement in relation to what to say and what to do e.g. when you believe that the other person is the problem; generally the problem is not what others say or do, but rather how you perceive them. The way that you judge is what creates your negative feelings about them. We have the choice to perceive others as a threat, as a problem, or as an opportunity; an opportunity for learning, for change, for dialogue and understanding. We can choose to have compassion (kindness); to feel that the other is a problem indicates a lack of compassion.

Message for the day 08-07-2014

The way to control the mind is to talk to it with love.

Projection: Whenever I find my mind wandering I try to control it with force. I try to pull the mind and order it not to think about something. Yet I find that, the more I try to force the mind not to go in a particular direction, the more it tends to go there.

Solution: The only way to control the mind is to talk to it with love. Just as I would explain to a child, I need to explain to it with love. This will make my mind my friend and I will be able to concentrate even in any undesirable situations.

In Spiritual Service,
Brahma Kumaris

 

 

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खुशी संसार में नहीं

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 खुशी संसार में नहीं

 एक बार की बात है कि एक शहर में बहुत अमीर सेठ रहता था| अत्यधिक धनी होने पर भी वह हमेशा दुःखी ही रहता था| एक दिन ज़्यादा परेशान होकर वह एक ऋषि के पास गया और उसने अपनी सारी समस्या ऋषि को बताई | उन्होने सेठ की हुई बात ध्यान से सुनी और सेठ से कहा कि कल तुम इसी वक्त फिर से मेरे पास आना , मैं कल ही तुम्हें तुम्हारी सारी समस्याओं का हल बता दूँगा |

सेठ खुशी खुशी घर गया और अगले दिन जब फिर से ऋषि के पास आया तो उसने देखा कि ऋषि सड़क पर कुछ ढूँढने में व्यस्त थे| सेठ ने गुरु जी से पूछा कि महर्षि आप क्या ढूँढ रहे हैं , गुरुजी बोले कि मेरी एक अंगूठी गिर गयी है मैं वही ढूँढ रहा हूँ पर काफ़ी देर हो गयी है लेकिन अंगूठी मिल ही नहीं रही है|
यह सुनकर वह सेठ भी अंगूठी ढूँढने में लग गया, जब काफ़ी देर हो गयी तो सेठ ने फिर गुरु जी से पूछा कि आपकी अंगूठी कहाँ गिरी थी| ऋषि ने जवाब दिया कि अंगूठी मेरे आश्रम में गिरी थी पर वहाँ काफ़ी अंधेरा है इसीलिए मैं यहाँ सड़क पर ढूँढ रहा हूँ| सेठ ने चौंकते हुए पूछा कि जब आपकी अंगूठी आश्रम में गिरी है तो यहाँ क्यूँ ढूँढ रहे हैं| ऋषि ने मुस्कुराते हुए कहा कि यही तुम्हारे कल के प्रश्न का उत्तर है, खुशी तो मन में छुपी है लेकिन तुम उसे धन में खोजने की कोशिश कर रहे हो| इसीलिए तुम दुःखी हो, यह सुनकर सेठ ऋषि के पैरों में गिर गया|
              तो मित्रों, “यही बात हम लोगों पर भी लागू होती है जीवन भर पैसा इकट्ठा करने के बाद भी इंसान खुश नहीं रहता क्यूंकि हम पैसा कमाने में इतना मगन हो जाते हैं और अपनी खुशी आदि सब कुछ भूल जाते हैं |”

Post share by: Pratush Tripathi

We are grateful to Pratush Tripathi Ji for sharing the inspirational story in Hindi.

Note::-

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Coming soon book (जल्द ही आ रहा किताब)…..

“तू ना हो निराश कभी मन से”

 

 

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