अभ्यास की महत्ता।

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ϒ अभ्यास की महत्ता। ϒ

एक लड़का बहुत ही मन्द बुद्धि था। उसे पढ़ना-लिखना कुछ न आता था। बहुत दिन पाठशाला में रहते हुए भी उसे कुछ न आया… तो लड़कों ने उसकी मूर्खता के अनुरूप उसे.. ‘बरधराज’ अर्थात्.. ‘बैलों का राजा’ कहना शुरू कर दिया। घर बाहर सब जगह उसका अपमान ही होता।

एक दिन वह लड़का बहुत दुखी होकर पाठशाला से चल दिया और इधर-उधर मारा-मारा फिरने लगा। वह एक कुँए के पास पहुँचा और देखा कि किनारे पर रखे हुये जगत के पत्थर पर रस्सी खिंचने की रगड़ से निशान बन गये है।

लड़के को सूझा कि- “जब इतना कठोर पत्थर रस्सी की लगातार रगड़ से घिस सकता है तो क्या मेरी मोटी बुद्धि लगातार परिश्रम करने से न घिसेगी।”

वह फिर पाठशाला लौट आया और पूरी तत्परता और उत्साह के साथ पढ़ना आरम्भ कर दिया, उसे सफलता मिली। ‘व्याकरण शास्त्र’ का वह उद्भट विद्वान् हुआ। “लघु सिद्धान्त कौमुदी” नामक ग्रन्थ की उसने रचना की, जो संस्कृत व्याकरण का अद्भुत ग्रंथ है। उसके नाम में थोड़ा सुधार किया गया- ‘बरधराज’ की जगह फिर उसे “वरदराज” कहा जाने लगा।

इसी पर एक दोहा बना…..

“करत-करत अभ्यास से जडमति होत सुजान।
रसरी आवत-जात से सिल पर पडत निसान॥”

अर्थात:- जिस तरह कुवें की जगत के पत्थर पर बारबार रस्सी के आने-जाने की रगड से निशान बन जाते हैं, उसी प्रकार लगातार अभ्यास से अल्पबुद्धि भी बुद्धिमान बन सकता है।

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स्वयं पर और स्व-कर्माे पर विश्वास माना सफलता का आधार(नींव) मज़बूत।

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

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“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की व्यर्थ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51

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तांबे का सिक्का।

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ϒ तांबे का सिक्का। ϒ

एक राजा का जन्मदिन था। सुबह जब वह घूमने निकला, तो उसने तय किया कि वह रास्ते मे मिलने वाले पहले व्यक्ति को पूरी तरह खुश व संतुष्ट करेगा। उसे एक भिखारी मिला। भिखारी ने राजा से भीख मांगी, तो राजा ने भिखारी की तरफ एक तांबे का सिक्का उछाल दिया।

सिक्का भिखारी के हाथ से छूट कर नाली में जा गिरा। भिखारी नाली में हाथ डाल तांबे का सिक्का ढूंढ़ने लगा। राजा ने उसे बुला कर दूसरा तांबे का सिक्का दिया। भिखारी ने खुश होकर वह सिक्का अपनी जेब में रख लिया और वापस जाकर नाली में गिरा सिक्का ढूंढ़ने लगा।

राजा को लगा की भिखारी बहुत गरीब है, उसने भिखारी को चांदी का एक सिक्का दिया। भिखारी राजा की जय जयकार करता फिर नाली में सिक्का ढूंढ़ने लगा। राजा ने अब भिखारी को एक सोने का सिक्का दिया।

भिखारी खुशी से झूम उठा और वापस भाग कर अपना हाथ नाली की तरफ बढ़ाने लगा। राजा को बहुत खराब लगा। उसे खुद से तय की गयी बात याद आ गयी कि पहले मिलने वाले व्यक्ति को आज खुश एवं संतुष्ट करना है।

उसने भिखारी को बुलाया और कहा कि मैं तुम्हें अपना आधा राज-पाट देता हूं, अब तो खुश व संतुष्ट हो? भिखारी बोला, मैं खुश और संतुष्ट तभी हो सकूंगा जब नाली में गिरा तांबे का सिक्का मुझे मिल जायेगा।

हमारा हाल भी उस भिखारी जैसा ही है।

हमें भगवान(GOD) ने आध्यात्मिकता रूपी अनमोल खजाना दिया है और हम उसे भूलकर संसार रूपी नाली में तांबे के सिक्के निकालने के लिए जीवन गंवाते जा रहे है। परमात्मा को याद कियें बिन कैसे हो, बेड़ा तेरा पार जी। शवास हाथ से जा रहे हैं, कीमत बेशुमार जी।

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मृत्यु का भय।

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ϒ मृत्यु का भय। ϒ

किसी नगर में एक आदमी रहता था। उसने परदेश के साथ व्यापार किया। मेहनत फली, कमाई हुई और उसकी गिनती सेठों में होने लगी।महल जैसी हवेली बन गई। वैभव और बड़े परिवार के बीच उसकी जवानी बड़े आनंद से बीतने लगी।

एक दिन उसका एक संबंधी किसी दूसरे नगर से आया। बातचीत के बीच उसने बताया कि उसके यहां का सबसे बड़ा सेठ गुजर गया। बेचारे की लाखों की धन-संपत्ति पड़ी रह गई। बात सहज भाव से कही गई थी, पर उस आदमी के मन को डगमगा गई। हां उस सेठ की तरह एक दिन वह भी तो मर जाएगा। उसी क्षण से उसे बार-बार मौत की याद सताने लगी। हाय मौत आएगी, उसे ले जाएगी और सबकुछ यहीं छूट जाएगा। मारे चिंता के उसकी देह सूखने लगी। देखने वाले देखते कि उसे किसी चीज की कमी नहीं है, पर उसके भीतर का दुख ऐसा था कि किसी से कहा भी नहीं जा सकता था। धीरे-धीरे वह बिस्तर पर पड़ गया। बहुतेरा इलाज किया गया, लेकिन उसका रोग कम होने की बजाय बढ़ता ही गया। एक दिन एक साधु उसके घर पर आया। उस आदमी ने बेबसी से उसके पैर पकड़ लिए और रो-रोकर अपनी व्यथा उसे बता दी।

सुनकर साधु हंस पड़ा और बोला – “तुम्हारे रोग का इलाज तो बहुत आसान है।”

उस आदमी के खोए प्राण मानो लौट आए। अधीर होकर उसने पूछा – “स्वामीजी, वह इलाज क्या है।”

साधु ने कहा – “देखो मौत का विचार जब मन में आए, जोर से कहो जब तक मौत नहीं आएगी, मैं जीऊंगा। इस नुस्खे को सात दिन तक आजमाओ, मैं अगले सप्ताह आऊंगा।”

सात दिन के बाद साधु आए तो देखते क्या हैं, वह आदमी बीमारी के चंगुल से बाहर आ गया है और आनंद से गीत गा रहा है। साधु को देखकर वह दौड़ा और उसके चरणों में गिरकर बोला – “महाराज, आपने मुझे बचा लिया। आपकी दवा ने मुझ पर जादू का-सा असर किया। मैंने समझ लिया कि जिस दिन मौत आएगी, उसी दिन मरूंगा, उससे पहले नहीं।”

साधु ने कहा –

“वत्स, मौत का डर सबसे बड़ा डर है। वह जितनों को मारता है मौत उतनों को नहीं मारती”

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अपनी मदद स्वयं करें।

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ϒ अपनी मदद स्वयं करें। ϒ

एक बार तीन यात्री पहाड़ की यात्रा पर निकले। मार्ग दुश्वार था, रास्ते में धूप और थकान से उनका गला सूखने लगा। प्यासे यात्रियों की दृष्टि दूर बहते एक झरने पर पड़ी।

एक यात्री ने आसमान की ओर मुख किया और भगवान से प्रार्थना करने लगा कि वह बिना किसी प्रयास के झरने तक पहुंच जाए।

दूसरे ने मेघों को प्रसन्न करने के लिए स्तोत्र पढऩा प्रारंभ कर दिया।

तीसरा चुपचाप झरने की तरफ चल पड़ा और कुछ समय की यात्रा के बाद झरने तक पहुंच गया।
वहां उसने अपनी प्यास बुझाई और आगे की यात्रा पर निकल पड़ा।

♥ सीख ♥

भगवान भी उनकी ही सहायता करते हैं जो अपनी सहायता आप करने को तत्पर रहते हैं।

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