कन्हैया तुम्हारी झलक चाहते है।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

ϒ कन्हैया तुम्हारी झलक चाहते है। ϒ

SriKrishna-Radharani-kmsraj51

श्रीकृष्ण-श्रीराधारानी।

सब कुछ है तेरा तुम प्रियतम मेरे हो।
बेबस से फिर काहे ऐसे अलग हो।

मिटे न कभी वो तलब चाहते है।
जो झपके न ऐसी पलक चाहते है।

कन्हैया तुम्हारी झलक चाहते है।
जो झपके न ऐसी पलक चाहते है।

तुम्हारे ख्यालों में बीते ये जीवन।
तुम्हारे ही चरणों में होए मगन हम।

तुम्हे देखने की ललक चाहते है।
कन्हैया तुम्हारी झलक चाहते है।

नहीं रौशनी चाँद सूरज की चाहते।
नहीं चांदनी की माला ही बाटे।

तुम्हारे मुकुट की चमक चाहते है।
जो झपके न ऐसी पलक चाहते है।

थकू न कभी श्याम गुण तेरे गाते-गाते।
ये संसार के गीत अब न सुहाते।

नुपुर की बस अब झनक चाहते है।
कन्हैया तुम्हारी झलक चाहते है।

सब कुछ है तेरा तुम प्रियतम मेरे हो।
बेबस से फिर काहे ऐसे अलग हो।

मिटे न कभी वो तलब चाहते है।
जो झपके न ऐसी पलक चाहते है।

सखी कहे! मन बसिया।

कन्हैया तुम्हारी झलक चाहते है।
जो झपके न ऐसी पलक चाहते है।

कन्हैया तुम्हारी झलक चाहते है।
जो झपके न ऐसी पलक चाहते है।

© जया शर्मा किशोरी। 

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Krishna Mohan Singh(KMS)
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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

 ~Kmsraj51

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

* अपनी आदतों को कैसे बदलें।

निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

क्या करें – क्या ना करें।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

* विचारों का स्तर श्रेष्ठ व पवित्र हो।

* अच्छी आदतें कैसे डालें।

KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

~KMSRAJ51

 

 

 

एक अनुभव – श्रीमत भागवत गीता से।

Kmsraj51 की कलम से…..

Kmsraj51-CYMT-JUNE-15

 

Jaya Kishori Ji-kmsraj51

जया शर्मा किशोरी जी।

जया शर्मा किशोरी जी के शब्दाें में।

जब हम हाई स्कूल में थे उस समय गीता का अभ्यास पाठ्यक्रम में शामिल किया गया था।

गीता पढ़ाने के लिए जो एक शास्त्रीजी नियुक्त किये गये थे, जो बड़े विद्वान व मिलनसार स्वभाव के थे।
वो हमें गीता के एक-दो अध्यायों का पठन कराते।
गीता के अलावा धर्म व अध्यात्म की बातें भी सिखाते।

उनका गीता पढाने का तरीका सुंदर था लेकिन ज्यादातर छात्र उनमें दिलचस्पी नहीं लेते थे।

कई छात्रों को तो धर्म के नाम से ही अरुचि थी।
वो मानते की गीता जैसे ग्रंथो का अध्ययन करने वाले लोग संसार में आम आदमी की तरह नहीं रह सकते और संसार के लिए निकम्मे हो जाते है।

ऐसे उटपटांग विचारों के प्रभाव से बचे हुए हम कुछ चुंनीदा छात्र ही गीता के अभ्यास में रुचि लेते थे।

अधिकांश छात्रो को तो ये भी मालूम नहीं था की गीता में क्या है फिर भी शास्त्रीजी के प्रयास के कारण, परीक्षा में पास होने के लिए आवश्यक विषय समझकर, वो उसका पठन करने लगे।

ऐसे माहौल में भगवद् गीता ग्रंथ मेरे हाथ में आया।
मैंने सुना था की गीता केवल भारत का ही नहीं, विश्व का प्रमुख धर्मग्रंथ माना जाता है।
इसी वजह से गीता का पठन करना मुझे आवश्यक लगा।

उस वक्त मेरा संस्कृत का ज्ञान बिल्कुल साधारण था।
संस्कृत सिखना मैंने अपनी चौथी कक्षा से शुरू किया था, अतः गीता के श्लोकों को सही मायने में समझने का काम मेरे बस का नहीं था, फिर भी मैंने प्रयत्न ज़ारी रखे।

कुछ ही समय में गीता के श्लोकों को समझना मेरे लिए उतना कठिन नहीं रहा जितना पहले हुआ करता था।

शुरु में मैंने अपना ध्यान संस्कृत श्लोकों को समझने के बजाय उसके अर्थ पर दिया।
उसका नतीजा यह निकला की मुझे उसके अर्थ समझमें आने लगे।

यूँ तो गीता के अध्याय समझने कठिन है, किन्तु बारवाँ, पंद्रहवाँ, सोलहवाँ व दूसरा अध्याय बहुत सरल है।

गीता के दूसरे अध्याय को तो मैं कई बार पठन करती क्योंकि दूसरा अध्याय मुझे विशेष रुप से आकर्षित करता था।
मानो मेरे लिए वो प्रेरणा के स्त्रोत जैसे थे।

गीता के श्लोक व अनुवाद मैं बडे ध्यान से पढ़ती, विशेषतः हर रोज रात के समय सोने से पहले।
कुछ अरसे बाद वो मुझे स्मृतिबद्ध हो गये।

जीवन में ये बात समझ में आयी की महान बनने के लिए सदगुणी बनना कीतना आवश्यक है।
उसके लिए कड़े प्रयासों की आवश्यकता थी, मैंने अपने प्रयास बलवत्तर कर दिये।

गीता ने मानो एक माँ की भाँति मुझे मार्गदर्शन दिया, जीवन को कीस तरह से मोड़ना चाहिए उसकी समझ दी और जीवन की शुद्धि के लिए आवश्यक प्रेरणा भी प्रदान की।

मैंने बड़ी सावधानी से अपने जीवन को सदगुणों की प्रतिकृति बनाना प्रारंभ किया।

हर रोज रात को सोते वक्त अपने आपको पूरी तरह टटोलती, सोचती की आज क्या सही किया और क्या गलत।
नतीजा यह निकला की मेरी जागृति बढ़ी और जाग्रत रहकर प्रत्येक कार्य को जाँचने लगी।

अगर कुछ गलत करने का सोचती तो तुरंत वो आगे आके मुझे बचा लेता।

संजोग से अगर साधारण सी गलती भी होती तो उसके लिए मन में बहुत पश्चाताप होता और उसे भविष्य में न दोहराने का दृढ संकल्प करती।

भगवद् गीता के प्रति मेरा प्यार व पूज्यभाव दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही गया।
उसमें कभी कोई बाधा या रुकावट नहीं आयी।

गीता ने मुझे जो दिया, अनमोल साबित हुआ।
उसकी प्रेरणा से मेरे विचारों की दरिद्रता दूर हुई, मानो मैं आध्यात्मिक रुप से धनी हो गयी।

गीता को यथाशक्ति समझने की कोशिस मैंने अपनी आगे की जिंदगी में जारी रखी।

आज मैं निर्भयता से यह कह सकती हूँ की गीतापठन ने मेरी भावि जिंदगी के रुख को बदल दिया।

जय श्री कृष्णा।

~जया शर्मा किशोरी जी।

We are grateful to Pujya Jaya sharma Kishori Ji.

Jaya Kishori Ji-kmsraj51

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शास्त्रों से प्रेरक प्रसंग।

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एक साधु महाराज अपने सतसंग मे श्रोताओ को शराब से दूर रहने का उपदेश देते थे।

एक दिन एक नास्तिक व्यक्ति साधू के पास गया और उनसे बोला:- ‘महोदय, एक बात बताइए।’

साधू ने प्रश्न किया:- क्या?’

नास्तिक ने पूछा:- ‘यदि मैं खजूर खाऊं, तो क्या मुझे पाप लगेगा?’

साधू ने जवाब दिया:- ‘बिल्कुल नहीं।’

नास्तिक ने अगला प्रश्न किया:-‘और यदि मैं उस खजूर के साथ थोड़ा पानी मिला लूं और तब खाऊं, तो क्या मुझे पाप लगेगा?’

साधू ने कहा:- ‘इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा।’

उस नास्तिक ने पुन: प्रश्न किया:- ‘और महोदय, यदि मैं उस खजूर में पानी के साथ-साथ थोड़ा खमीर मिलाकर खाऊं, तो क्या उससे कोई धार्मिक अवज्ञा होगी?’

साधू सारी बात समझ गए थे, किंतु फिर भी बड़े शांत स्वर में उन्होंने उत्तर दिया:-‘नहीं, बिल्कुल नहीं।’

अब नास्तिक तर्क करता हुआ बोला:-‘तो फिर
धार्मिक ग्रंथों में शराब पीना पाप क्यों बतलाया गया है, जबकि वह इन तीनों के मिलाने से ही बनती है?’

साधू ने नास्तिक के सवाल का जवाब न देते हुए उलटे उससे ही प्रश्न कर दिया:- ‘अच्छा, एक बात बताओ।
यदि मैं तुम पर मुट्ठी भर धूल फेंकूं, तो क्या तुम्हें चोट लगेगी?’

नास्तिक का जवाब था:- ‘नहीं’

साधू ने पूछा:- ‘और, यदि मैं उस धूल में थोड़ा पानी मिला लूं और तब तुम पर फेंकूं, तो क्या कोई फर्क पड़ेगा?’

प्रसन्नता से नास्तिक बोला:- ‘तो भी मुझे कोई चोट नहीं पहुंचेगी।’

साधू ने अगला प्रश्न किया:- ‘और मित्र, यदि मैं उस मिट्टी और पानी में कुछ पत्थर मिला कर तुम्हारे ऊपर फेंकूं, तो क्या अंतर होगा?’

घबराकर नास्तिक बोला:- ‘तब तो मेरा सिर ही फूट जाएगा’,

अब साधू ने शांति से कहा:- ‘मुझे विश्वास है कि अब तुम्हें अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया होगा।’

अब नास्तिक वास्तविकता से परिचित हो चुका था।

सत्संग में तथा शास्त्रों मे हमे जो समझाया जाता है और जिन चीजो का परित्याग करने को कहा जाता है उसमे जीवात्मा का ही फायदा है।

~जया शर्मा किशोरी जी।

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सूरदास – श्री राम कथा हिंदी में।

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ϒ श्री राम कथा। ϒ

सूरदास जी का यह पद बहुत ही सुंदर है, जिसमे माता यशोदा अपने लाल को श्री राम कथा सुना रही हैं।

सुनि सुत, एक कथा कहौं प्यारी।
कमल-नैन मन आनँद उपज्यौ, चतुर-सिरोमनि देत हुँकारी॥

दसरथ नृपति हती रघुबंसी, ताकैं प्रगट भए सुत चारी।
तिन मैं मुख्य राम जो कहियत, जनक-सुता ताकी बर नारी॥

तात-बचन लगि राज तज्यौ तिन, अनुज-घरनि सँग गए बनचारी।
धावत कनक-मृगा के पाछैं, राजिव-लोचन परम उदारी॥

रावन हरन सिया कौ कीन्हौ, सुनि नँद-नंदन नींद निवारी।
चाप-चाप करि उठे सूर-प्रभु. लछिमन देहु, जननि भ्रम भारी॥

भावार्थ :-
माता यशोदा ने कहा – ‘लाल सुनो! एक प्रिय कथा कहती हूँ।’
यह सुनकर कमललोचन श्याम के मन में प्रसन्नता हुई, वे चतुर-शिरोमणि हुँकारी देने लगे।

माता यशोदा ने कहा – ‘महाराज दशरथ नाम के एक रघुवंशी राजा थे, उनके चार पुत्र हुए। उन (पुत्रों) में जो सबसे बड़े थे, उनको राम कहा जाता है; उनकी श्रेष्ठ पत्नी थी राजा जनक की पुत्री सीता। पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये उन्होंने राज्य त्याग दिया और छोटे भाई तथा स्त्री के साथ वनवासी होकर चले गये। वहाँ वन में एक दिन जब कमललोचन परम उदार श्रीराम सोने के मृग के पीछे उसको पकड़ने के लिये दौड़ रहे थे, तब रावण ने श्री जानकी का हरण कर लिया।”

सूरदास जी कहते हैं कि इतना सुनते ही नन्दनन्दन ने निद्रा को त्याग दी और वे प्रभु बोल उठे -“लक्ष्मण! धनुष दो, धनुष!’
इससे माता को बड़ी शंका हुई कि मेरे पुत्र को यह क्या हो गया।
जय श्री राम कृष्ण हरि।

©- जया शर्मा किशोरी। 

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

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निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

क्या करें – क्या ना करें।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

* विचारों का स्तर श्रेष्ठ व पवित्र हो।

* अच्छी आदतें कैसे डालें।

KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

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* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

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kmsraj51- C Y M T

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

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“श्री हरि कथा”

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“श्री हरि कथा”

गरुड़जी की जिज्ञासा…..

एक बार भगवान विष्णु गरुड़जी पर सवार होकर कैलाश पर्वत पर जा रहे थे।
रास्ते में गरुड़जी ने देखा कि एक ही दरवाजे पर दो बाराते ठहरी थी।
मामला उनके समझ में नहीं आया।

फिर क्या था, पूछ बैठे प्रभु को।

गरुड़जी बोले! प्रभु ये कैसी अनोखी बात है कि विवाह के लिए कन्या एक और दो बारातें आई है।
मेरी तो समझ में कुछ नहीं आ राह है।

प्रभु बोले- हां एक ही कन्या से विवाह के लिए दो अलग अलग जगह से बारातें आई है।
एक बारात पिता द्वारा पसंद किये गये लड़के की है, और दूसरी माता द्वारा पसंद किये गये लड़के की है।

यह सुनकर गरुड़जी बोले- आखिर विवाह किसके साथ होगा?

प्रभु बोले- जिसे माता ने पसंद किया और बुलाया है उसी के साथ कन्या का विवाह होगा।

भगवान की बाते सुनकर गरुड़जी चुप हो गए और भगवान को कैलाश पर पहुंचाकर कौतुहल वस पुनः वापस उसी जगह आ गए जहां दोनों बारातें ठहरी थी।

गरुड़जी ने मन में विचार किया कि यदि मैं माता के बुलाए गए वर को यहां से हटा दूं तो कैसे विवाह संभव होगा।

फिर क्या था; उन्होंने भगवद्विधान को देखने की जिज्ञासा के लिए तुरन्त ही उस वर को उठाया और ले जाकर समुद्र के एक टापु पर धर दिए।

ऐसा कर गरुड़जी थोड़ी देर के लिए ठहरे भी नहीं थे कि उनके मन में अचानक विचार दौड़ा कि मैं तो इस लड़के को यहां उठा लाया हूँ पर यहां तो खाने-पीने की कोई व्यवस्था नहीं है, ऐसे में इस निर्जन टापु पर तो यह भूखा ही मर जाएगा और वहां सारी बारात मजे से छप्पन भोग का आनन्द लेंगी, यह कतई उचित नहीं है।
इसका पाप अवश्य ही मुझे लगेगा।
मुझे इसके लिए भी खाने का कुछ इंतजाम तो करना ही चाहिए।

यदि विधि का विधान देखना है तो थोड़ा परिश्रम तो मुझे करना ही पड़ेगा।

और ऐसा विचार कर वे वापस उसी स्थान पर फिर से आ गए।

इधर कन्या के घर पर स्थिति यह थी कि वर के लापता हो जाने से कन्या की माता को बड़ी निराशा हो रही थी।
परन्तु अब भी वह अपने हठ पर अडिग थी।
अतः कन्या को एक भारी टोकरी में बैठाकर ऊपर से फल-फूल, मेवा-मिष्ठान्न आदि सजा कर रख दिया, जिसमें कि भोजन-सामग्री ले जाने के निमित्त वर पक्ष
से लोग आए थे।

माता द्वारा उसी टोकरी में कन्या को छिपाकर भेजने के पीछे उसकी ये मंशा थी कि वर पक्ष के लोग कन्या को अपने घर ले जाकर वर को खोजकर उन दोनों का ब्याह करा देंगे।
माता ने अपना यह भाव किसी तरह होने वाले समधि को सूचित भी कर दिया।

अब संयोग की बात देखिये, आंगन में रखी उसी टोकरी को जिसमे कन्या की माता ने विविध फल-मेवा, मिष्ठान्नादि से भर कर कन्या को छिपाया था, गरुड़जी ने उसे भरा देखकर उठाया और ले उड़े।

उस टोकरी को ले जाकर गरुड़जी ने उसी निर्जन टापू पर जहां पहले से ही वर को उठा ले जाकर उन्होंने रखा था, वर के सामने रख दिया।

इधर भूख के मारे व्याकुल हो रहे वर ने ज्यों ही अपने सामने भोज्य सामग्रियों से भरी टोकरी को देखा तो बाज की तरह उस पर झपटा।
उसने टोकरी से जैसे ही खाने के लिए फल आदि निकालना शुरू किया तो देखा कि उसमें सोलहों श्रृंगार किए वह युवती बैठी है जिससे कि उसका विवाह होना था।

गरुड़जी यह सब देख कर दंग रह गए।

उन्हें निश्चय हो गया कि :–‘हरि इच्छा बलवान।’

‘राम कीन्ह चाहैं सोई होई।
करै अन्यथा आस नहिं कोई।’

फिर तो शुभ मुहुर्त विचारकर स्वयं गरुड़जी ने ही पुरोहिताई का कर्तव्य निभाया।
वेदमंत्रों से विधिपूर्वक विवाह कार्य सम्पन्न कराकर वर-वधु को आशीर्वाद दिया और उन्हें पुनः उनके घर पहुंचाया।

तत्पश्चात प्रभु के पास आकर सारा वृत्तांत निवादन किए और प्रभु पर अधिकार समझ झुंझलाकर बोले- प्रभो! आपने अच्छी लीला करी, सारा ब्याह कार्य हमीं से करवा लिया।

भगवान गरुड़जी की बातों को सुनकर मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे थे।

जया शर्मा किशोरी।

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प्रियतम पहली बार लिख रही, चिट्ठी तुमको प्यार की।

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ϒ प्रियतम पहली बार लिख रही, चिट्ठी तुमको प्यार की। ϒ

प्रियतम पहली बार लिख रही, चिट्ठी तुमको प्यार की।

इस आशा के साथ, कि समझो भाषा प्रेमालाप की।
प्रियतम पहली बार लिख रही, चिट्ठी तुमको प्यार की।

अक्षर बन कर जनम लिया है, मेरे दिल के भावों ने।
दबे हुए जो बरसों से थे लिखा उन्हीं जज्बातों ने।

शब्द नहीं लिखे हैं,इसमें भाषा हृदयोद्गार की।
आशा है, सम्मान करोगे, भेंट हमारे प्यार की।

प्रियतम पहली बार लिख रही, चिट्ठी तुमको प्यार की।

तुम्हें दृष्टि भर जिस दिन देखा उन सतरंगी रंगों में।
भूल गयी मैं रंग पुराने, जितने खिले थे यादों में।

उसी समय से पढ़नी सीखी, गीता तेरे प्यार की।
प्रियतम पहली बार गा रहा, मधुर रागिनी प्यार की।

प्रियतम पहली बार लिख रही, चिट्ठी तुमको प्यार की।

अंतिम शब्द तुम्हारे ऐसे लिखे हुए मानस पट पर।
कभी नहीं मिट पाएंगे ये जब तक जीवन है पट पर।

निज मन की बतलाऊँ कैसे? बातें हैं अहसास की।
बहुत आ रही मुझे प्रियतम याद तुम्हारे प्यार की।

प्रियतम पहली बार लिख रही, चिट्ठी तुमको प्यार की।

इस आशा के साथ, कि समझो भाषा प्रेमालाप की।
प्रियतम पहली बार लिख रही, चिट्ठी तुमको प्यार की।

जय-जय श्री राधे॥

© जया शर्मा किशोरी।

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

* अपनी आदतों को कैसे बदलें।

निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

क्या करें – क्या ना करें।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

* विचारों का स्तर श्रेष्ठ व पवित्र हो।

* अच्छी आदतें कैसे डालें।

KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

kmsraj51- C Y M T

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

~KMSRAJ51

 

 

 

जागिये हे मातृ शक्ति।

Kmsraj51 की कलम से…..

Kmsraj51-CYMT-Oct-14-1

जागिये हे मातृ शक्ति।

आधुनिकता के नाम पर आज की आधुनिक नारी खुद को मातृ सुख से वंचित रखकर बहुत बड़ा पाप कर रही हैं।

जागिये हे मातृ शक्ति…………!!

जागिये हे मातृ शक्ति, नींद में क्यों सो रही,
बंद कर संतान को तुम, क्यों निपूती हो रही।

जागिये हे हिन्दू जननी, नींद में क्यों सो रही,
वंश अपना नाश कर तुम, क्यों निपूती हो रही।।टेर।।

यह सकल सृष्टी तुम्हारी, तुम्हीं पालन हार हो।
नाश अब तुम कर रही, है दुःख बड़ा हमको यही।।१।।

माँ अगर नहीं बनती नहीं तुम, हो कहो किस काम की।
छनिक सुख की लालसा से, बीज विष के बो रही।।२।।

गर्भ पात कराय के तुम, डाकिनी क्यों बन रही।
ख रही बच्चों को कुछ माता की कीर्ति खो रही।।३।।

है भयंकर पाप इसका, ब्रह्महत्या से बड़ा।
करके अपनी दुर्गति क्यों, पाप सर पर ढो रही।।४।।

छोड़ सुख आराम हिन्दू, वंश की रच्छा करो।
अन्न जल भगवान देते, बात सच्ची है सही।।५।।

जागिये हे मातृ शक्ति, नींद में क्यों सो रही,
बंद कर संतान को तुम, क्यों निपूती हो रही।

जागिये हे हिन्दू जननी, नींद से क्यों सो रही,
वंश अपना नाश कर तुम, क्यों निपूती हो रही।।टेर।।

चेतावनी पद संग्रह पुस्तक से, भजन ‘जागिये हे मातृ शक्ति’,
भजन संख्या २१७, पृष्ठ संख्या १०९, पुस्तक कोड १४२,
गीताप्रेस गोरखपुर, भारत

– जया शर्मा किशोरी।

We are grateful to जया शर्मा किशोरी जी for sharing this inspirational article in Hindi  for Kmsraj51 readers.

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© आप सभी का प्रिय दोस्त ®

Krishna Mohan Singh(KMS)
Head Editor, Founder & CEO
of,,  http://kmsraj51.com/

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

 ~Kmsraj51

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* चांदी की छड़ी।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

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 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

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