चरित्रहीन।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ चरित्रहीन। ϒ

प्रिय मित्रों,

यह कहानी गौतम बुद्ध के जीवन से जुड़ी एक सच्ची घटना पर आधारित हैं।

स्त्री तब तक “चरित्रहीन” नहीं हो सकती ….. जब तक पुरुष चरित्रहीन न हो।
~ गौतम बुद्ध।

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संन्यास लेने के बाद गौतम बुद्ध ने अनेक क्षेत्रों की यात्रा की। एक बार वह एक गांव में गए। वहां एक स्त्री उनके पास आई और बोली – आप तो कोई “राजकुमार” लगते हैं। क्या मैं जान सकती हूँ … कि इस युवावस्था में गेरुआ वस्त्र पहनने का क्या कारण है?

बुद्ध ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया कि – … “तीन प्रश्नों” के हल ढूंढने के लिए उन्होंने संन्यास लिया।

बुद्ध ने कहा – … हमारा यह शरीर जो युवा व आकर्षक है, पर जल्दी ही यह “वृद्ध” होगा … फिर “बीमार” और … अंत में “मृत्यु” के मुंह में चला जाएगा। मुझे “वृद्धावस्था”“बीमारी”“मृत्यु” के कारण का ज्ञान प्राप्त करना है।

बुद्ध के विचारो से प्रभावित होकर उस स्त्री ने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया – शीघ्र ही यह बात पूरे गांव में फैल गई। गांव वासी बुद्ध के पास आए व आग्रह किया कि वे इस स्त्री के घर भोजन करने न जाएं।

क्योंकि वह “चरित्रहीन” है!! बुद्ध ने गांव के मुखिया से पूछा? क्या आप भी यह मानते हैं कि वह स्त्री “चरित्रहीन” है?

मुखिया ने कहा कि मैं शपथ लेकर कहता हूं कि वह बुरे चरित्र वाली स्त्री है। आप उसके घर न जाएं। बुद्ध ने मुखिया का दायां हाथ पकड़ा … और उसे ताली बजाने को कहा … मुखिया ने कहा – … “मैं एक हाथ से ताली नहीं बजा सकता” – क्योंकि मेरा दूसरा हाथ आपने पकड़ा हुआ है।

बुद्ध बोले – … इसी प्रकार यह स्वयं चरित्रहीन कैसे हो सकती है?

जब तक इस गांव के “पुरुष चरित्रहीन” न हों। अगर गांव के सभी पुरुष अच्छे होते तो यह औरत ऐसी न होती इसलिए इसके चरित्र के लिए यहां के पुरुष जिम्मेदार हैं।

यह सुनकर सभी “लज्जित” हो गए।

लेकिन आजकल हमारे समाज के पुरूष “लज्जित” नही “गौर्वान्वित” महसूस करते है। क्योकि यही हमारे “पुरूष प्रधान” समाज की रीति एवं नीति है।

सदैव सकारात्मक सोचो – सकारात्मक सोचने से ही अपना व अपने घर समाज और देश का विकास होगा। सदैव ही नारी का सम्मान करें।

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Krishna Mohan Singh(KMS)
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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

~KMSRAJ51

 

शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार।

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ϒ शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार। ϒ

प्रिय मित्रों,

यह Story महाकवि कालिदास जी के जीवन से संबधित हैं।

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महाकवि कालिदास जी।

महाकवि कालिदास जी के कंठ में साक्षात सरस्वती जी का वास था। शास्त्रार्थ में उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता था। अपार यश, प्रतिष्ठा और मान सम्मान पाकर एक बार कालिदास जी को अपनी विद्वत्ता का बहुत घमंड हो गया।

उन्हें लगा कि उन्होंने विश्व का सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया है और अब सीखने को कुछ भी बाकी नहीं बचा। उनसे बड़ा ज्ञानी संसार में कोई दूसरा नहीं। एक बार पड़ोसी राज्य से शास्त्रार्थ का निमंत्रण पाकर कालिदास जी विक्रमादित्य से अनुमति लेकर अपने घोड़े पर रवाना हुए।

गर्मी का मौसम था, धूप काफी तेज़ और लगातार यात्रा से कालिदास जी को प्यास लग आई। थोङी तलाश करने पर उन्हें एक टूटी-फूटी झोपड़ी दिखाई दी। पानी की आशा में वह उस ओर बढ चले। झोपड़ी के सामने एक कुआं भी था।

कालिदास जी ने सोचा कि अगर कोई झोपड़ी में हो तो उससे पानी देने का अनुरोध किया जाए। उसी समय झोपड़ी से एक छोटी बच्ची मटका लेकर निकली। बच्ची ने कुएं से पानी भरा और वहां से जाने लगी।

तभी कालिदास जी उसके पास जाकर बोले – बालिके बहुत प्यास लगी है ज़रा पानी पिला दे ….. बच्ची ने पूछा – आप कौन हैं? मैं आपको जानती भी नहीं, पहले अपना परिचय दीजिए। कालिदास जी को लगा कि मुझे कौन नहीं जानता भला, मुझे परिचय देने की क्या आवश्यकता?

फिर भी प्यास से बेहाल थे तो बोले – बालिके अभी तुम छोटी हो, इसलिए मुझे नहीं जानती। घर में कोई बड़ा हो तो उसको भेजो। वह मुझे देखते ही पहचान लेगा। मेरा बहुत नाम और सम्मान है दूर – दूर तक। मैं बहुत विद्वान व्यक्ति हूँ।

कालिदास जी के बड़बोलेपन और घमंड भरे वचनों से अप्रभावित बालिका बोली – आप असत्य कह रहे हैं। संसार में सिर्फ दो ही बलवान हैं और उन दोनों को मैं जानती हूं। अपनी प्यास बुझाना चाहते हैं तो उन दोनों का नाम बाताएं?

थोङा सोचकर कालिदास जी बोले – मुझे नहीं पता, तुम ही बता दो मगर मुझे पानी पिला दो। मेरा गला सूख रहा है। बालिका बोली – दो बलवान हैं ‘अन्न’ और ‘जल’। भूख और प्यास में इतनी शक्ति है कि बड़े से बड़े बलवान को भी झुका दें। देखिए प्यास ने आपकी क्या हालत बना दी है।

कलिदास जी चकित रह गए। लड़की का तर्क अकाट्य था। बड़े – बड़े विद्वानों को पराजित कर चुके कालिदास जी एक बच्ची के सामने निरुत्तर खङे थे। बालिका ने पुन: पूछा – सत्य बताएं, कौन हैं आप? वह चलने की तैयारी में थी।

कालिदास जी थोड़ा नम्र होकर बोले – बालिके, मैं बटोही हूँ….. मुस्कुराते हुए बच्ची बोली – आप अभी भी झूठ बोल रहे हैं। संसार में दो ही बटोही हैं। उन दोनों को मैं जानती हूं, बताइए वे दोनों कौन हैं? तेज़ प्यास ने पहले ही कालिदास जी की बुद्धि क्षीण कर दी थी पर लाचार होकर उन्होंने फिर से अनभिज्ञता व्यक्त कर दी।

बच्ची बोली – आप स्वयं को बङा विद्वान बता रहे हैं जी और ये भी नहीं जानते? एक स्थान से दूसरे स्थान तक बिना थके जाने वाला बटोही कहलाता है। बटोही दो ही हैं, एक चंद्रमा और दूसरा सूर्य जो बिना थके चलते रहते हैं। आप तो थक गए हैं। भूख प्यास से बेदम हैं। आप कैसे बटोही हो सकते हैं?

इतना कहकर बालिका ने पानी से भरा मटका उठाया और झोपड़ी के भीतर चली गई। अब तो कालिदास जी और भी दुखी हो गए। इतने अपमानित वे जीवन में कभी नहीं हुए। प्यास से शरीर की शक्ति घट रही थी। दिमाग़ चकरा रहा था। उन्होंने आशा से झोपड़ी की तरफ़ देखा…. तभी अंदर से एक वृद्ध स्त्री निकली…..

उसके हाथ में खाली मटका था। वह कुएं से पानी भरने लगी। अब तक काफी विनम्र हो चुके कालिदास जी बोले – माते पानी पिला दीजिए बङा पुण्य होगा।

वृद्ध स्त्री बोली – बेटा मैं तुम्हें जानती नहीं। अपना परिचय दो। मैं अवश्य पानी पिला दूंगी। कालिदास जी ने कहा – मैं मेहमान हूँ, कृपया पानी पिला दें माते। स्त्री बोली – तुम मेहमान कैसे हो सकते हो? संसार में दो ही मेहमान हैं। पहला धन और दूसरा यौवन। इन्हें जाने में समय नहीं लगता। सत्य बताओ कौन हो तुम?

अब तक के सारे तर्क से पराजित और हताश कालिदास जी बोले – मैं सहनशील हूँ। अब आप पानी पिला दें। स्त्री ने कहा – नहीं, सहनशील तो दो ही हैं। पहली, धरती जो पापी – पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है। उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है।

दूसरे, पेड़ जिनको पत्थर मारो फिर भी ओ मीठे फल ही देते हैं। तुम सहनशील नहीं हाे, सच बताओ तुम कौन हो? कालिदास जी लगभग मूर्च्छा की स्थिति में आ गए और तर्क – वितर्क से झल्लाकर बोले – मैं हठी हूँ।

वृद्ध स्त्री बोली – फिर असत्य, हठी तो दो ही हैं – पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो बार – बार निकल आते हैं। सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप? पूरी तरह से अपमानित और पराजित हो चुके कालिदास जी ने कहा ….. फिर तो मैं मूर्ख ही हूँ।

नहीं तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो, मूर्ख दो ही हैं। पहला अयोग्य राजा जो बिना योग्यता के भी सब पर शासन करता है, और दूसरा दरबारी पंडित जो राजा को प्रसन्न करने के लिए ग़लत बात पर भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है।

कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास जी ….. वृद्ध स्त्री के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे। वृद्ध स्त्री ने कहा – उठो वत्स… आवाज़ सुनकर कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती जी वहां खड़ी थी। कालिदास जी पुन: नतमस्तक हो गए।

माता ने कहा – शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार। तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठे इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए ये स्वांग(लीळा) करना पड़ा।

कालिदास जी को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े।

दोस्तों,

ज़िन्दगी में कभी भी किसी भी बात का अहंकार न करें। सदैव विनम्रता व धैर्य के साथ हर कार्य करें।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

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निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

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बच्चों में अच्छे संस्कार का बीज रोपण।

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ϒ बच्चों में अच्छे संस्कार का बीज रोपण। ϒ

shantivan-KMSRAJ51

बच्चो में अच्छे संस्कार 16 वर्ष की आयु तक ही डाले जा सकते है। बचपन से ही बच्चो में जो संस्कार माता पिता के द्वारा दिये जाते है, वे ही आगे जाकर उनके भावी जीवन की उन्नती अथवा अवनीति के कारण बनते है।

हमारे बड़े-बुजुर्ग, संत-महात्मा कहते है की जैसा बीज होगा, वैसा ही वृक्ष होगा, तथा वैसा ही उसका फल होगा।

बचपन से ही अच्छे संस्कारो से संस्कारीत बालक युवावस्था में शुभ कार्यो मेें प्रवृत होकर माता-पिता की प्रतिष्ठा एवं स्वयं के सुख का कारण बनता है।

परंतु यदि बचपन से कुसंगत में रहकर कुसंस्कारो का बीजारोपण यदि बालक के जीवन में हो गया तो अपने माता-पिता के साथ ही वह स्वयं अपमानित जीवन जीकर अपने को पतन एवं दुःख की आग में झोक देगा।

श्रीमद्भागवत कथा में गौकर्ण और धुंनकारी की कथा आती है जिसके अनुसार गौकर्ण बचपन से अच्छे संस्कारो में पला था जिसके फलस्वरूप उसमें अपने उद्धार के साथ ही दूसरो की मुक्ती का मार्ग प्रशस्त किया जबकि धुंधुकारी बचपन से ही कुसंगत के कारण अधोगति को प्राप्त हुआ जिसका उद्धार भी गौकर्ण ने किया।

हमारी प्राचीन शिक्षा अधिक मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर निर्भर थी। बच्चों को गुरु, माता-पिता, बड़े व्यक्तियों, धर्म, धार्मिक कार्यों में रुचि उत्पन्न की जाती थी। उनके प्रति पूजनीय भाव प्रारम्भ से ही जोड़ दिये जाते थे, धार्मिक अंत:वृत्ति होने से बड़ा होने पर भी भारतीय भोगवाद की ओर प्रवृत्त न होते थे।

ब्रह्मचर्य का संयम सदैव उन्हें संयमित किया करते थे, पवित्र भाेजन, पवित्र भजन, पूजा, यज्ञ, चिंतन, अध्ययन, मनन आदि से जो गुप्त मन निर्मित होता था, वह ….. पवित्रतम भावनाओं का प्रतीक होता था।

घर का वातावरण भी उच्च नैतिकता से परिपूर्ण होता था, जिससे एक पीढ़ी के पश्चात् दूसरी पीढ़ी उन्हीं संस्कारों को निरन्तर विकसित करती चली आती थी।

जब हमारी भावनाओं में नैतिकता, श्रेष्ठता, पवित्रता का बीज नहीं डाला जायगा, तो किस प्रकार उत्तम चरित्र वाले मानव तथा समाज की या देश की सृष्टि हो सकती है?

आवश्यकता इस बात की है कि पहले माता-पिता स्वयं भावनाओं की शिक्षा की उपयोगिता समझें; स्वयं आदर की भावनाओं को संस्कार रूप में शिशु मन पर स्थापित करें।

वातावरण का भारी महत्व है, वातावरण का अर्थ व्यापक है। घर, तथा संगति तो यह महत्वपूर्ण है हीं, घर की पुस्तकें, दीवारों के चित्र, हमारे गाने, भजन, इत्यादि भी बड़े महत्व के हैं। यदि इन्हीं से उन्नति तथा सुधार की भावना में चलाई जायँ, तो आचार व्यवहार के क्षेत्र में क्रान्ति हो सकती है।

अच्छे-अच्छे भजन, पवित्र कर्त्तव्य की शिक्षा देने वाली कहानियाँ, उत्तमोत्तम व्यवहार द्वारा नये राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण हो सकता है।

बचपन से ही शिशु के मन पर बड़ों के प्रति आदर प्रतिष्ठा सम्मान, छोटों के प्रति स्नेह, दया, सहानुभूति, सहकारिता, बराबर वालों से मैत्री, प्रेम, संगठन सहयोग की भावनाएं बच्चों के गुप्त मन में उत्पन्न करनी चाहिये।

आचरण, आदर्श, तथा उचित निर्देशन से यह कार्य माता-पिता, अध्यापक सभी कर सकते हैं।

मान लीजिये, एक बच्चा सिनेमा का एक भद्दा गाना अनजाने ही कुसंगति से सुनकर याद कर लेता है। वह उसका अर्थ नहीं समझता, किन्तु उसे पुन: पुन: दोहराता है, बड़ा होकर वह उसका अर्थ समझने लगता है और जीवन भर उससे प्रभावित हुये बिना नहीं रहता।

यही बच्चा यदि कोई राष्ट्रप्रेम का गीत, उत्तम भजन, पवित्र विचार वाली उक्ति अनजाने में सीख ले, (जो माता-पिता सतत् अभ्यास, पुनरावृत्ति से सिखा सकते हैं,) तो वह बड़ा होकर निरन्तर उच्च मार्ग की ओर ही अग्रसर होगा।

Note : Post inspired by – Pujya Jaya Kishori Ji.

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‘शून्य’ – (Shunya) सस्पेंस थ्रिलर उपन्यास – उपन्यास ….. जारी ….. है,, (भाग-11 – भाग-25)!!

kmsraj51 की कलम से …..

‘शून्य’
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प्रिय मित्रों,,

हिंदी उपन्यास ‘शून्य’ जारी….. है…..

भाग-11 => गद्दार … (शून्य-उपन्यास)-

रात काफी हो चूकी थी. और उसमें जिस्मको चूभती हूई ठंड. पुलसे गाडीयोंके आने जानेकी चहलपहल अभीभी जारी थी. एक गाडी पुलसे किनारे आकर रुकी. उसमेंसे एक साया बाहर आया, उसने ठंडसे बचनेके लिये अच्छा खासा जाडा उलन कोट पहना हूवा था. ठंडके वजहसे या फिर कोई पहचान नही पाए इसलिए उसने सरपरभी उलनका कुछ पहना हूवा था. वह साया धीरे धीरे पुलके निचे उतरने लगा. पुलके निचे एक जगह रुककर उस सायेने फिरसे इधर उधर अपनी नजर दौडाई. फिर निचे झूककर जमीनसे कुछ पत्थर हटाकर कुछ ढुंढा. एक बडासा पत्थर हटाकर वह साया स्तब्ध हुवा. शायद पत्थरके निचे उसे कुछ दिखाई दिया था. उस सायेने वह क्या है यह टटोलकर देखा. उसने वह चिज उठाकर अपने कोट के जेबमें रखी और उस चिजकी जगह अपने कोटके जेबसे कपडेमें लिपटा हूवा कुछ निकालकर रख दिया. फिरसे हटाया हूवा वह बडासा पत्थर अपने जगहपर रख दिया. फिरसे वह साया इधर उधर देखते हूये अपने गाडीके पास जाने लगा. वह साया अपने गाडीके पास जाकर पहूचता नही की सामनेसे एक तेज दौडती हूई गाडी वहां से गुजर गई और उस गाडी के हेडलाईटकी रोशनी उस सायेके चेहरे पर पडी. वह साया दुसरा तिसरा कोई ना होकर जॉनका नजदिकी साथीदार डॅन था.

आज सुबह आयेबराबर आफिसके लोगोंको हॉलमें इकठ्ठा होनेका आदेश मिला. ऐसा बहूतही कम बार होता था. ऐसा क्या हूवा होगा की जॉनने अपने सारे साथीदारोंको हॉलमें इकठ्ठा होनेका आदेश दिया होगा? सॅम सोचमें पड गया. शायद हालहीमें शुरु सिरीयल किलरके सिलसिलेमेंही कुछ जरुरी होगा. सॅम जॉनका एकदम करीबी माना जाता था. ऐसा कुछ रहा तो उसे उसकी पहलेसेही जानकारी रहती थी. लेकिन आज वैसा नही हूवा था. बाकी लोगोंकी तरह आज सॅमभी मिटींगके उद्देशके बारेमे अनजान था.

सॅम जब हॉलमे आया तब वह वहां अकेलाही था. धीरे धीरे सबलोग आपसमें खुसुर फुसुर करते हूए आने लगे. बहुतोंने सॅमको पुछाभी. सॅमभी मिटींगके बारेमे अनभिज्ञ होनेका सबको आश्चर्य हो रहा था. अभी जॉन हॉलमें नही आया था. सबसे आखरी डॅन चोरोंकी तरह हलके पांवसे हॉलमें आया और एक कोनेमें जाकर बैठ गया. उसका चेहरा चिंताग्रस्त लग रहा था. जॉनको अपने कारनामेके बारेमें पतातो नही चला. लेकिन पता चलनेका कोई चान्स नही था. वह खुदको तसल्ली देने लगा. मैने किसका काम किया यह मुझेही पता नही तो फिर जॉनको पता होनेका कोई सवालही पैदा नही होता. मुझे किसी अज्ञात आदमीका फोन आया… उसने मुझे एक काम सौपा और उसके बदलेमे ढेर सारे पैसे दिये. पैसे भी मुझे किसी आदमीसे नही दिए गये थे, वे एक जगह रखे गए थे. डॅन अब थोडा रिलॅक्स हुवा. उसके चेहरेपरसे चिंताके बादल हटने लगे थे. इतनेमें अपने लंबे लंबे तेज कदमोंसे जॉनने हॉलमें प्रवेश किया. सिधे पोडीयमपर जाकर उसने उसके हाथमेंकी फाईल टेबलपर रख दी. आम तौर पर उसकी फाईल उसके पिछे पिछे कोई पियून लाता था. लेकिन आज उसके पिछे कोई नही था. उसकी फाइल उसने खुदही लाई थी. .

‘” आज एक बुरी और उतनी ही सनसनीखेज खबर देनेके लिए मैने आपको यहां बुलाया है” जॉन आये बराबर बोला.

इधर डॅनके दिलकी धडकन बढने लगी. जॉनने अपनी पैनी नजर हॉलमें सब तरफ घुमाई. मानो वह सबके चेहरेके भाव जानने की कोशीश कर रहा था.

उसने उसके फाईलमेंसे दो तस्वीरे निकाली और सामने बैठे उसके एक साथीके हाथमें देकर पुरे हॉलमें घुमानेके लिए कहा. तस्वीरे एकसे दुसरेके पास जाने लगी. किसीके चेहरेपर असंमजससे भ्रमभरे भाव थे तो किसीके चेहरेपर आश्चर्यके भाव छाने लगे थे.

‘”दोनोभी तस्वीरे ध्यान देकर देखो” जॉनने हिदायत दी.

हॉलमें खुसुरफुसुर होने लगी थी.

‘”… दोनो तस्वीरोंमे एक टी पॉय है … एक फोटोमें टीपॉयके उपर पेपरवेट रखा हूवा है … तो दुसरे फोटोमें वह वहांसे गायब है… हमें सबको वारदात की जगह कोईभी वस्तू ना हिलानेकी हिदायत रहती है……” जॉनने फिरसे एकबार अपनी पैनी नजर हॉलमें घुमाई.

‘” फिर वह पेपरवेट गया कहा? …. पेपरवेट गायब होता है इसका मतलब क्या?… की उस पेपरवेटमें ऐसी कोई बात थी की जिसकी वजहसे वह खुनी पकडा जाने की संभावना थी…. जैसे उसके उंगलियोंके निशान… खुनका अंश … या ऐसाही कुछ …” जॉन का आवाज अब कडा हूवा था.

इधर डॅन अपने भाव छिपानेका भरसक प्रयास करने लगा.

‘” तो पेपरवेट गायब होता है इसका मतलब क्या ?…की अपनेमेसेही कोई… गद्दार है और वह खुनीसे मिला हूवा है… .” जॉनने कहा.

हॉलमें स्मशानवत सन्नाटा फैला. डॅनकी आखोमें गद्दारीके भाव तैरने लगे थे. लेकिन क्या वे जॉनने पकडे थे?

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भाग-12अ => फर्स्ट डेट … (शून्य-उपन्यास)-

जॉनका दिमाग सोचसोचकर घुमने लगा था. दो खून हो चूके थे और खुनी का कोई ना अता पता था ना सुराग. कही थोडा पुछताछके लिए जावो तो प्रेसवाले पता नही कहासे आकर घेर लेते थे. जॉन दिखा नही के वे सब उसपर टूट पडते थे. अच्छा .. कोई केसमे कुछ नई डेव्हलपमेंट हो तो ही बतायेंगे ना. कुछ डेव्हलपमेंट ना होते हूए प्रेसवालोंको फेस करना बडा मुश्कील हो गया था. बाहर प्रेसवाले और अंदर उनकाही कोई आदमी अंदर की सारी बाते बाहर डीस्क्लोज कर रहा था. अंदर किसपे विश्वास किया जाए और किसपे नही कुछ समझमें नही आ रहा था. अब अंदर कोई पुलिसवालाही गद्दारी कर रहा है ऐसी खबर बाहर तक पहूच गई थी.

‘अगला कौन?’

‘पुलिसवालेही बेईमान तो खुनीको कौन पकडेगा?’

‘और कितने लोगोंकी जान देनी पडेगी?’

ऐसे अलग अलग हेडींग की अलग अलग खबरें छापकर प्रेसवालोने सारे शहरमे दहशत फैलाके रख दी थी.

अब लोग पुलिसवालोंके कर्तव्यके बारेमेंही सवाल खडा करने लगे थे. और यह इतनाही टेंशन क्या कम था की उपर के वरीष्ठोने दबाव बनाना शुरु किया था. सोच सोचकर जॉन का दिमाग थक चूका था. जॉनने खिडकीसे बाहर झांककर देखा. शाम हो चूकी थी. अंधेरा होनेमे बस थोडाही वक्त बाकी था. अचानक जॉनको क्या सुझा क्या मालूम उसने उसके सामने रखा फोन उठाया, एक नंबर डायल किया –

“” क्या कर रही हो? … ” वह फोनमें बोला.

” कौन? … जॉन! ” उधरसे अँजेनीका उत्साहसे भरा स्वर गुंजा.

” कैसी हो?…” उसने पुछा.

अपना आवाज अँजेनीने पहचाना उसकी खुशी जॉनके चेहरेपर झलक रही थी.

” ठिक हू…'” उसका गहरा दुखी स्वर गुंजा.

उसे यह सवाल पुछना नही चाहिए था ऐसा जॉनको लगा. उसे अब क्या बोलना चाहिए की वह फिरसे आनंदीत हो. जॉन सोचने लगा.

” … क्या कुछ जानकारी मिली … खुनीके बारेमें ?” उधरसे अँजेनीने पुछा.

” इसी सवालसे पिछा छुडवानेके लिये तुम्हे फोन किया और तुम भी यही सवाल पुछो. ..” जॉनने कहा.

” नही ….बहुत दिनोंके बाद तुम्हारा अचानक फोन आया … इसलिए मैने सोचा कुछ केसमे नई डेव्हलपमेंट होगी…”” अँजेनी बोली..

“नही … ऐसी कुछ खास डेव्हलपमेंट नही है… .. अच्छा … मैने फोन इसलिए किया की… आज शामको तुम्हारा क्या प्रोग्रॅम है ? ” जॉन असली मुद्देपर आते हूए बोला.

” कुछ खास नही” अँजेनी उधरसे बोली.

” फिर ऐसा करो … तैयार हो जावो… मै आधे घंटेमें तुम्हे लेने आता हूं…. हम डीनरको जायेंगे… “” जॉन अपना हक जताते हूए बोला.

” लेकिन…”

” लेकिन वेकिन कुछ नही … कुछ भी बहाना नही चलेगा… मै आधे घंटेमे पहूचता हू…'” जॉनने कहा.

और वह कुछ बोले इससे पहलेही फोन रखकर वह निकल भी गया.

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भाग-12ब => फर्स्ट डेट … (शून्य-उपन्यास)-

इधर इतने जल्दी तैयारी करे तो कैसे करे इस दुविधामें अँजेनी पड गई थी. उसे भी बहुत दिनोसे अकेला रह रहके घुटनसी महसुस हो रही थी. उसे अब थोडे ‘चेंज’की जरुरत महसुस होने लगी थी. उसने जल्दी जल्दी कपडे बदले और ड्रेसींग टेबलके सामने आईनेमे देखते हूए अपने बाल वाल संवारने लगी. उसे याद आ रहा थी की आज लगभग एक महना होनेको आया था की वह बाहर कही नही गई थी. सानीके खुनके बाद मानो उसका जीवन कैसे सुना सुना हो गया था. सानीके साथ वह हमेशा सज संवरके कभी शॉपींगके लिये, कभी घुमने के लिए तो कभी डिनरके लिए बाहर जाती थी. सानीका खयाल आते ही उसका सजा संवारा चेहरा मुरझा सा गया. इतनेमें डोअर बेल बज गई. बेल बजेबराबर उसे महसुस हूवा की न जाने क्यों उसके दिलकी धडकन तेज होने लगी है. वह उठकर दरवाजेके तरफ चली गई, दरवाजा खोला, सामने जॉन खडा था.

रेडी?” जॉनने अंदर आनेसे पहलेही पुछा.

” ऑलमोस्ट… ‘ उसे अंदर लेते हूए वह बोली.

दरवाजा अंदरसे लगाकर उसने जॉनको हॉलमें बैठनेके लिए कहा.

” जस्ट वेट अ मिनिट..” कहते हूये वह बचीकुची तैयारी करने के लिए अंदर चली गई. जॉन हॉलमें बैठकर हॉलका सामान, दिवारपर टंगी हूई पेंटीग्ज गौर से देखने लगा. देखते देखते उठकर वह खिडकीके पास चला गया. खिडकीके बाहर फिरसे वह गोल तालाब उसे दिखाई दिया. उसने पहले जब वह इन्व्हेस्टीगेशनके लिये आया था तब उसे देखा था. उस वक्त उसे इस तालाबके बारेमें बहुत सारे सवाल पुछने थे वे वैसे ही रह गए थे.

” यह तालाब नॅचरल है की कृत्रिम ?” उसने उत्सुकतावश बडे स्वर में अंदर अँजेनीसे पुछा.

” हां आती हूं… बस एकही मिनट… ” अंदरसे अँजेनीभी जोरसे बोली.

उसके सवालके इस अनपेक्षित उत्तरसे वह सिर्फ मन ही मन मुस्कुराया.

थोडी देरमें उसके सामने सज धजकर जाने के लिए तैयार अँजेनी खडी थी. उसने पहले कभी उसे इस रुपमें नही देखा था. उसकी सुंदरता और ही खुलकर निखर रही थी.

” सुंदर दिख रही हो” जॉनने उसे कॉम्प्लीमेंट किया.

” क्या कह रहे थे… मै अंदर थी तब पुकारा था क्या ? … ” अँजेनी शरमाकर बात टालते हूए बोली.

“नही मै पुछ रहा था की यह पिछेका तालाब नॅचरल है या कृत्रिम” जॉन खिडकीके बाहर इशारा करते हूए खिडकीके पास जाकर बोला.

” यह ना… नॅचरलही है … हजारो साल पहले एक बडी उल्का आसमानसे गिरी थी और उसके वजहसे यह तालाब बना… ऐसा कहते है… ” अँजेनी खिडकीके पास जाकर बोली.

” तो भी मै बोल रहा था की यह तालाब एकदम परफेक्ट गोल कैसा ?” जॉनने कहा.

” अरे हां … तो फिर निकलनेगे?” जॉन अपने सोचसे बाहर आते हूए बोला.

अँजेनीने आखोही आखोमें हां कहां और दोनो बाहर निकल पडे.

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भाग-13 => शुन्यकी तस्वीर… … (शून्य-उपन्यास)-

रातका घना अंधेरा और उपरसे चूभती हूई कडाकेकी ठंड. ऐसे वातावरण मे बहुत सारे प्रेमी युगल रस्तेसे दिख रहे थे. रस्तेके उस तरफ एक आलीशान हॉटेल था. यह जगह शहरके दुसरे भागसे उंचा होनेके कारण यहांसे शहरकी रोशनाई किसी बिखरे हूए चांदनीकी तरह दिख रही थी. और तालाबके किनारे लगे हूए लाईट्स किसी राणीके गलेमें पहने हूए हिरेके हारकी तरह सुंदर लग रहे थे. और तालाबमें पडे उन लाईट्स की परछाईयां उस नेकलेसको और ही सुंदर बना रही थी. इस माहौलमे एक विषम जोडा था – कमांड1 और कमांड2 का. उधर कोनेमें सबसे हटकर उनकी कुछ गहन चर्चा चल रही थी. तभी हॉटेलके सामने एक बडीसी आलीशान गाडी आकर रुकी. गाडीसे जॉन और अँजेनी उतरे. उनको देखतेही कमांड1 और कमांड2 की चर्चा बंद हूई. वे दोनो चोरी छिपे जॉन और अँजेनीके तरफ देखने लगे.

अँजेनी और जॉन हॉटेलके खुले हॉलमें एक कोनेमे बैठे थे.

” क्या लेंगी?… ड्रिंक्स?” जॉनने पुछा.

” नही… तुम्हे लेना है तो तुम लो… ” अँजेनीने कहा.

” नही फिर मै भी नही लुंगा. … अच्छा खानेके लिए क्या प्रीफर करेंगी “” जॉन ने पुछा.

” कुछभी… तुम जो ठिक समझो.” अँजेनीने कहा.

” चायनीज?” जॉन ने पुछा.

अँजेनीने हां मे गर्दन हिलाई.

“” पहले सूप मंगाएंगे … कार्न सूप ?” जॉनने फिरसे उसे पुछा.

उसने फिरसे गर्दन हिलाकर हां कहा. जॉनने उसके हाथमेंका मोबाईल सामने टेबलपर रख दिया और उसकी नजरें आर्डर देनेके लिए वेटरको ढुंढने लगी.

“” ऐसा लगता है की… तुम यहां हमेशा आते हो… ” अँजेनी कुछतो बोलना है ऐसे बोली.

” हां वैसे हमेशाही आता हूं… लेकिन एक सुंदरीके साथ पहली बार आया हूं ” वह शरारती लहजेमें बोला.

अँजेनी मंद मंद मुस्कुराई. इतनेमें वेटर वहां आया. जॉनने सूपकी आर्डर दी.

“” अब कैसी है तुम्हारी तबीयत … इतनेमें डॉक्टरके पास गई थी क्या?” जॉनने उसको पुछा.

‘” वैसे तो ठिक है…. कल ही गई थी डॉक्टरके यहां …लेकिन वेभी क्या उपचार करेंगे… मुझे तो कुछ भी समझमें नही आ रहा है.,.. की इस हादसेसे कैसे बाहर निकला जाए”” अँजेनीने कहां.

उसके चेहरेपर फिरसे दुखकी छटा छा गई.

” वक्त … वक्त सब जख्म भर देता है …. लेकिने बोलनेवाले कितनाभी बोले… जिसपर बितता है वही दुखकी मार समझता है… ” जॉनने उसके हाथपर अपना तसल्लीभरा हाथ रख दिया.

“वक्त …. हा वक्तही…. लेकिन कितना ” अँजेनी आह भरकर बोली.

” अच्छा तुमने कामपर जाना अभी शुरु किया है की नही?” जॉनने पुछा.

” नही … मेरा अब किसीभी बातमें मन नही लगता… फिर वहां जाकर क्या करु?” वह बोली.

” मेरी मानो… कलसे कामपर जाना शुरु करदो…. काममे व्यस्त रहना तुम्हारे लिए बहुत जरुरी है… काममें व्यस्त रहनेसे धीरे धीरे आदमी दुख भूल जाता है… ‘” जॉनने सलाह दी.

” देखती हू… तुम कहते हो वैसाभी करके देखती हूं'” उसने कहा.

जॉनने उसके हाथपर रखा हूवा हात हलकेही अपने हाथमें लेते हूए वह बोली,

” इस बुरे वक्तमें सचमुछ तुमने मुझे बहुत सहारा दिया… ” वह उसका हाथ और कसकर पकडते हूए बोली.

इतनेमें जॉनको खिडकीके बाहर रस्तेपर एक गाडी जाते हूए दिखी. उस गाडीके पिछेके कांचपर खुनसे शुन्य निकाली हूई तस्वीर थी. जॉन एकदमसे खडा हूवा.

” तूम यही रुको… मै अभी आता हूं… ” ऐसा बोलते हूए जॉन वहांसे दौडते हूएही हॉटेलके बाहर निकला. अँजेनी घबराकर क्या हूवा यह देखने लगी. वह खिडकीसे बाहर देखनेतक बाहर की गाडी उसके आंखोसे ओझल हूई थी. वह भी उठकर गडबडमें जॉनके पिछे पिछे जाने लगी. लेकिन तबतक जॉनने अपनी गाडी पार्किंगसे निकालकर रस्तेपर एक दिशामें जोरसे दौडाई थी. अँजेनी हॉटेलके सिढीयोंपर असमंजससी इधर उधर देखती हूई खडी रही.

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भाग-14 => पिछा … (शून्य-उपन्यास)-

जॉनकी गाडी तेजीसे दौडने लगी थी. थोडीही देरमें जिस गाडीके पिछेके कांच पर खुनसे शुन्य निकाली हूई तस्वीर लगी थी वह गाडी उसे दिखाई देने लगी. वह गाडी दिखतेही जॉनके शरीर मे और जोश आगया और उसके गाडीकी गती उसने और बढाई. थोडीही देरमें वह उस गाडीके नजदीक पहूंच गया. लेकिन यह क्या? उसकी गाडी नजदीक पहूचतेही सामनेके गाडीने अपनी रफ्तार और तेज कर ली और वह गाडी जॉनके गाडीसे और दूर जाने लगी. जॉननेभी अपने गाडीकी रफ्तार और बढाई. दोनो गाडीकी मानो रेस लगी थी. रस्तेपर दुसरी ऐसी कोई खास ट्रॅफिक नही थी. यही दो गाडीयॉं एक के पिछे एक ऐसे दौड रही थी. जानको फिरसे लगा की वह अब सामनेके गाडीके नजदीक पहूंच सकता है. जॉनने उसके गाडीकी गती और तेज कर दी. थोडीही देरमें जॉनकी गाडी सामनेकी गाडीके एकदम नजदीक जाकर पहूंची. जॉनने जेबसे रिव्हॉल्वर निकाला और वह सामनेके गाडीके दिशामें फायर करनेही वाला था की अचानक सामने के ग़ाडीके कर्रऽऽ कर्रऽऽ ऐसा आवाज करते हूए ब्रेक लगे. जॉनकी गाडी उस गाडीके एकदम पिछे अनियंत्रित और बेकाबू रफ्तारसे दौड रही थी. सामनेके गाडीके ब्रेक लगे बराबर जॉनको अपने गाडीके ब्रेक दबानेही पडे. उसके गाडीके टायर चिखने लगे और सामनेके गाडीके साथ होनेवाली टक्कर बचानेके चक्करमें उसकी गाडी रोडसे निचे उतरकर एक जगह रुक गई. बडा भयानक ऍक्सीडेंट होते होते बचा था. ! ऍक्सीडेंट बचा यह देखकर जॉनके जानमे जान आयी. लेकिन यह क्या. वह दुसरी गाडी फिरसे शुरु हूई और जोरसे जॉनके गाडीके तरफ दौडने लगी. जॉन घाबराकर गाडीसे बाहर निकलने की कोशीश करने लगा था लेकिन तबतक वह गाडी उसके गाडीको डॅश कर निकलभी गई थी. जॉन इस हादसे संभलता नहीकी उसने देखा की उस गाडीसे उसकी दिशामें रिव्हॉल्वरकी गोलीयां आने लगी है. थोडी देरमें वह गाडी तेज रफ्तारसे निकल गई और फिर नजरोंसे ओझल हूई. जॉन उसकी गाडी शुरु करनेका प्रयास करने लगा. लेकिन उसकी गाडी शुरु होनेका नाम नही ले रही थी. आखीरमें लंगडते हूए वह गाडीसे बाहर आया और सामनेकी गाडी उसकी पहूंचसे निकलती देखकर चिढकर गुस्सेसे उसने अपनी कसी हूई मुट्ठी अपने गाडीपर जोरसे दे मारी.

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भाग-15 => क्या हूवा? … (शून्य-उपन्यास)-

इधर अँजेनी जॉनकी राह देख देखकर थक गई थी.

क्या हूवा होगा ? …

जॉन कहा गया होगा?…

इतनी देरसे वह अभीतक वापस क्यों नही आया ?…

उसे चिंता होने लगी थी.

अच्छा फोन करने जाओ तो …

तो वह अपना मोबाईल यही छोडके चला गया था .

उसे कुछ सुझाई नही दे रहा था. कभी वह अंदर जाकर उसकी राह देखती तो बाहर कुछ आवाज होनेपर फिरसे बाहर आकर देखती थी. उसे उसकी इतनी चिंता क्यो हो?

उसे खुदकाही आश्चर्य लग रहा था. इतनेमें फिरसे बाहर किसी गाडी आनेकी आहट उसे हूई. वह उठकर फिरसे बाहर आ गई. एक गाडी आकर हॉटेलके बाहर आकर रुकी थी. लेकिन वह जॉनकी गाडी नही थी. वह एक प्रायव्हेट टॅक्सी थी. वह अंदर जानेके लिए पलटी तो पिछेसे उसे आवाज आया –

‘”अँजेनी”

उसने पलटकर देखा तो टॅक्सीसे जॉन उतरा था. उसके सारे बाल उलझे उलझे और शर्ट एक जगह फटा हूवा और शर्टपर काले काले मैल के धब्बे पडे हूए थे.

क्या हूवा होगा ? …

उसे चिंता होकर वह जॉनके तरफ जाने लगी. जॉनभी लंगडता हूवा उसकी तरफ आने लगा.

“” क्या हूवा?”” वह तत्परतासे उसके पास जाते हूए वह बोली.

कुछ ना बोलते हूए जॉन लंगडते हूए उसकी तरफ चलने लगा. उसने झटसे जाकर उसे सहारा दिया.

“” हमें हॉस्पीटलमें जाना चाहिए ‘” अँजेनी उसे कहा कहा लगा यह देखते हूए बोली.

” नही …. उतना कुछ खास लगा नही … सिर्फ कुछ कुछ जगह सुजन आई हूई है..” वह किसी तरह बोला.

‘” तो भी चेकअप करनेमें क्या हर्ज है..?” वह जानेवाली टॅक्सीको रुकनेके लिए हाथ दिखाते हूए बोली.

उसने उसे सहारा देकर टॅक्सीमें बिठाया और वहभी उसके पास उसे सटकर बैठ गई.

” थ्री कौंटीज हॉस्पिटल'” उसने टॅक्सीवालेको आदेश दिया.

‘”नही …सचमुछ वैसी कोई जरुरत नही” जॉनने कहा.

” तुम्हारी गाडी किधर है?”” अँजेनीने पुछा.

‘” है उधर … पिछे… रस्तेके किनारे…. बडा अॅक्सीडेंट होते होते बचा ‘” वह बताने लगा.

” ड्रायव्हर … गाडी पोलीस क्वार्टर्सको लेना ‘” जॉनने बिचमेंही ड्रायव्हरको आदेश दिया.

ड्रायव्हरने गाडी स्लो कर एकबार अँजेनी और फिर जॉनकी तरफ देखा. अँजेनीने ‘ठीक है … वह जहा कहता है उधरही लो’ ऐसा ड्रायव्हरको इशारेसेही कहा.

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भाग-16 => मधूर मिलन … (शून्य-उपन्यास)-

अँजेनी जॉनको सहारा देते हूए उसके क्वार्टरकी तरफ ले जाने लगी.

” अच्छा, तो … उन्होने तुमपर हमला किया था… तूमने ऐसा अकेला घुमना अब खतरेसे खाली नही है…. तूमने हमेशा अपने साथ प्रोटेक्शन लेना चाहिए… “” अँजेनी उसका सब अबतक का कहा सुनकर एक निष्कर्षपर पहूच गई.

” नही … हमला नही किया उन्होने…. अगर वे चाहते तो आज मुझे जानसेभी मार सकते थे… लेकिन उन्होने ऐसा नही किया…. ‘” वह चलते हूए उसका सहारा लेते हूए बोला.

“तुमपर गोलीयाऑं बरसाईना उन्होने? ” अँजेनीने फिरसे पुछा.

” हां … लेकिन सब मेरे इर्द गिर्द … एकभी गोली मेरे नजदिकसेभी नही गई… वे उनकी गाडीसे उतरकरभी मुझपर गोलीयॉं बरसा सकते थे… ” जॉनने अपना तर्क प्रस्तूत किया.

” अच्छा जाने दो… तुम्हे कोई सिरीयस चोट तो नही आई ना … यह सबसे महत्वपुर्ण” वह उसे दिलासा देते हूए बोली.

“उन्होने सिर्फ मुझे उकसानेका प्रयत्न किया .. ऐसा लग रहा है की वे इस सिरीयल किलींगका जादा से जादा प्रचार करना चाहते है” जॉनने अपना अंदाजा बयान किया.

“लेकिन उससे क्या होगा?” अँजेनीने आश्चर्यसे पुछा.

“वही तो एक पहेली है जो मुझसे सुलझ नही रही है… ” जॉन चाबीसे अपना फ्लॅट खोलनेका प्रयत्न करते हूए बोला.

अँजेनीने उसके हाथसे चाबी ली और वह खुद फ्लॅट का ताला खोलने लगी.

जॉन बेडपर अपना शर्ट निकालकर पडा हूवा था. उपरसे कुछ लग नही रहा था फिरभी उसके शरीरपर जगह जगह लगने के लाल निशान थे. अँजेनीने उसे जहा जहा लगा था वहा मलम लगाकर दिया और सेकनेके लिए सेकनेकी रबर की थैली गरम पाणीसे भरकर दी.

” अच्छा अब मै चलती हू… तुम आराम करो… बहुत देर हो गई है” अँजेनीने उसके कंधेपर थपथपाकर कहा.

जैसेही वह जानेके लिए मुडी जॉनने उसके कंधेपर रखा हूवा उसका हाथ पकड लिया. उसने मुडकर उसकी तरफ देखा. उसका चेहरा लाजके मारे लाल लाल हूवा था. जॉन उसकी ऑंखोमें आखे डालकर देखने लगा. उसकी ऑंखेभी उसके ऑंखोसे हटनेके लिए तैयार नही थी. दोनोंके दिलकी धडकने तेज होने लगी. जॉनने उसे नजदिक खिंच लिया. अब दोनोभी इतने नजदिक आये थे की उनको एकदुसरेंकी गरम सांसे और दिलकी बढी हूई धडकनें महसुस होने लगी थी. जॉनने धीरेसे उसके कांपते होठोंपर अपने गरम होंठ रख दिए और उसे कसकर अपनी बाहोंमे भर लिया. जॉनको याद आया की उसे कृत्रिम सासें देते वक्त उसने ऐसेही उसके होठोंपर अपने होंठ रखे थे. लेकिन उस वक्त और अब कितना फर्क था. क्रिया वही थी लेकिन भावनाओंने उसे कितना अलग अर्थ दिया था. आवेगमें वे एकदुसरेंके चेहरेपर, होठोंपर, गर्दनपर चुमने लगे. जॉन हलकेसे उसके बडी बडी सासोंकी वजहसे उपर निचे होते सिनेके उभोरोंको छुने लगा.

“अँजेनी… आय लव्ह यू सो मच” अनायास उसके मुंहसे निकल गया.

“आय टू” बोलते हूए वह किसी लता की तरह उसे कसकर लिपट गई.

” आं..ऊं” जॉन जोरसे चिल्लाया.

“क्या हूवा ?” झटसे उससे हटकर उसने पुछा.

” कुछ नही… पिठपर जहा लगा है वहा थोडा दब गया ” वह बोला.

” आय अॅम सॉरी” वह शरमाकर बोली.

उसने हंसते हुए उसे फिरसे अपने बाहोंमे भर लिया. वह भी हंसने लगी. और फिर दोनो कब अपने प्रेममिश्रीत प्रणयमें लीन हुए उन्हे पताही नही चला.

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भाग-17 => बॉसका फोन … (शून्य-उपन्यास)-

कमांड1 काम्प्यूटरपर कुछतो कर रहा था. कमांड2 उसके बगलमें हाथमें व्हिस्कीका ग्लास लेकर शानसे बैठा था.

‘” सालेको कुचलना चाहिए था ‘” कमांड2 अपना व्हिस्कीका ग्लास एकही घुंटमें खाली करते हूए बोला.

” अरे नही … उसे जिंदा रखना बहुत जरुरी है ‘” कमांड1 काम्प्यूटरपर तेजीसे कमांडस् टाईप करते हूए बोला.

उतनेमें बगलमें रखे फोनकी घंटी बजी.

कमांड1 ने फोन उठाया.

काम्प्यूटर का काम जारी रखते हूए वह फोनपर बोला,

” हॅलो”

उधरसे कुछभी जबाब नही आया.

” हॅलो … कौन बात कर रहा है ?”

कमांड1ने फोनके डिस्प्लेपर उधरके फोनका नंबर देखा. डिस्प्लेपर कोई नंबर नही था. कोई नंबर नही देखकर कमांड1 सोच मे पड गया.

उसने अपना काम्प्यूटरका काम छोडकर फिरसे फोनमें कहा-

” हॅलो…”

” मै बॉस बोल रहा हूं ” कमांड1को बिचमेंही काटते हूए उधर से आवाज आया.

“ब.. ब… बबॉस ? … यस बॉस ” कमांड1के मुंह से मुश्कीलसे निकल गया.

कमांड1 झटसे कुर्सीसे उठकर खडा हूवा था. उसके हाथ कांपने लगे थे. उसके पुरे चेहरेपर पसीनेकी बुंदे झलक रही थी. एक छोटी पसीनेकी लकीर कानके पिछेसे बहते हूए निचे आ गई.

कमांड2 को आश्चर्य होने लगा था.

कमांड2ने कमांड1को इतना घबराये हूए पहले कभी नही देखा था.

कमांड1की यह स्थिती देखकर कमांड2नेभी अपना व्हिस्कीका ग्लास बाजूमें रख दिया और वह भी कुर्सीसे उठ खडा हूवा.

बॉसने इसके पहले कभीभी फोन लगाया ऐसा उसने कभी सुना नही था.

बॉस उसके सब आदेश इंटरनेटके द्वाराही देता था.

फिर अचानक फोन करनेकी ऐसी कौनसी जरुरत आन पडी?

” तुम्हे जॉनको धडकानेकी बद्तमीजी करनेको किसने कहा था ?” उधरसे कडा और गंभीर आवाज आया.

आवाज किसी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणसे आये जैसा लग रहा था.

“बबबॉस … हमने उसे जानसे मारने के उद्देशसे धडकाया नही था. ‘” कमांड1 अपनी सफाई देनेकी कोशीश कर रहा था.

” चूप. मूरख …. तुम्हे पता है … खुदकी मनमानी करनेवालोंको इस संस्था कोई स्थान नही ” उधरसे बॉसका झल्लाया हूवा स्वर आया.

” स सॉरी बॉस… गलती हूई …. फिरसे नही होगी ऐसी गलती… ” कमांड1 फिरसे क्षमायाचना करने लगा.

” तुम्हे पता है?… तुम्हारी तकदीर अच्छी थी की वह क्षण तुम्हारे लिए अच्छा था …इसलिए तुम लोग बच गए… तुम लोग अगर 45 मिनट इधर या 45 मिनट उधर होते तो तुम्हे उस वक्त कोईभी बचा नही सकता था. ‘” बॉसका कडा स्वर कमांड1के कानमें घुमा.

अब कमांड2 कमाड1के पास जाकर फोनके स्पीकरके पास अपना सर घुसाकर बॉस क्या बोल रहा है यह सुननेका प्रयास करने लगा था. .

” आय अॅम रिअली सॉरी बॉस ” कमांड1 फिरसे माफी मांगने लगा.

” यह तुम्हारी पहली गलती… और यह गलती तुम्हारी आखरी गलती रहनी चाहिए … समझे? ‘” उधरसे बॉसने ताकीद दी.

“हां सर; यस….”

कमांड1 अपना बोलना खतम करनेके पहलेही उधरसे बॉसने धडामसे फोन रख दिया.

कमांड1ने अपने चेहरेका पसीना पोछते हूए फोन क्रेडलपर रख दिया. वह अपने चेहरेके डर के भाव छिपानेकी कोशीश करने लगा.

” बॉसको अच्छा नही लगा ऐसा लग रहा है…'” कमांड2ने कहा.

” हमने अपनी मनमानी नही करनी चाहिए थी ” कमांड1ने कहा.

” जो हूवा सो हूवा … फिरसे ध्यान रखेंगे…” कमांड2ने उसे दिलासा देने की कोशीश करते हूए कहा.

” यह बॉसका पहली बार फोन आया… उसका फोन आया तभी मुझे संदेह हूवा था की कुछ सिरीयस हूवा है… ” कमांड1 ने अपना व्हिस्कीका ग्लास भरते हूए कहा.

कमांड2नेभी अपने बगलमें रखा व्हिस्कीका ग्लास उठाया और वह कमांड1के सामने बैठ गया. कमांड1ने गटागट व्हिस्कीके घुंटके साथ अपना अपमान पिनेकी कोशीश की.

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भाग-18 => कमांड2की चाल … (शून्य-उपन्यास)-

कमांड2ने जाना की यही सही वक्त है…

… की कमांड1से बहुत सारे राज पता किये जा सकते है…

वह एक एक घुटसे उसे साथ देता हूवा उसको नशा चढने का इंतजार करने लगा. थोडीही देरमें कमांड1 टून्न हो गया. यही मौका देखकर कमांड2ने अपने सवालोंका तांता लगा दिया…

“कमांड1, मुझे एक बता …”

कमांड2ने पुछनेसे पहले जानबुझकर रुककर कमांड1के चढे हूए नशेका अंदाजा लिया.

कमांड2को रुका हूवा देखकर कमांड1 नशेमें बोला, ” बोल क्या बतानेका है …. एक क्यू… दो पुछ… तिन पुछ… तुझे जितना चाहिए उतना पुछ… ‘”

उसका यह नशेमे धुत हूवा हाल देखकर कमांड2को हंसी आ रही थी लेकिन उसने बडे प्रयासके साथ अपनी हंसी दबाई.

“‘ नही मतलब… वह वक्त तुम्हारे तकदीरसे अच्छा था और अगर तुम 45 मिनट इधर या 45 मिनट उधर होते तो तुम्हे कोईभी बचा नही सकता था ‘ – ऐसा बॉसने क्यों कहा? मुझे तो कुछभी समझमें नही आ रहा है..” कमांड2ने कमांड1 को पुछा.

कमांड1को अब अच्छी खासी चढ गई थी. .

” वह तुम्हे नही समझेगा … वह एक लंबी स्टोरी है ” कमांड1ने कहा.

कमांड2 सोचने लगा.

अब इससे कैसे उगलवाया जाए…

उसने काम्प्यूटरपर बैठकर बॉसने पहले एक बार भेजा हूवा मेसेज खोला.

” और यह देख पहले एक बार बॉसने भेजे मेसेजमेंभी 11 तारख के रातको 3 से 4 का वक्त तुम्हारे लिए अच्छा है और 4 से 7 का वक्त बहुत ही खतरनाक है ऐसा लिखा था. उसका जोतिष्यपर जरा जादाही विश्वास दिखता है. ” कमांड2 कमांड1को और उकसाने का प्रयत्न करने लगा.

” जोतिष्यपर विश्वास नही … पूरी निष्ठा है. अबतक उसने कहे समयमें कभीभी दगा नही हूवा है ” कमांड1ने कहा.

” वह केवल एक इत्तिफाक हो सकता है…” कमांड2 उसे और छेडनेके उद्देशसे बोला.

” इत्तिफाक नही. बॉसके पास ऐसी एक चिज है की जिसकी मदतसे वह कौनसी बात किस वक्त लाभदायक हो सकती है यह पहलेसे जान सकता है. ”

कमांड1के मुंहसे अब बहुत सारी अंदर की बाते बाहर आनेको जैसे बेकरार थी.

” मुझे नही विश्वास होता’ कमांड2 ने असहमती दर्शाकर अपना आखरी हथीयार इस्तेमाल किया.

” तुम्हाराही क्या किसीकाभी विश्वास नही होगा ”

” इसी एक बातसे तुम कह रहे हो की औरभी कुछ प्रमाण है?” कमांड2ने बिचमें टोककर पुछा.

” यह एकही बात नही ….. औरभी बहुत सारी बाते है… बॉसके पासका पैसा देखो … बॉसके पास इतना पैसा कहांसे आगया? यह पुरी संस्था चलाना कोई मजाक नही… और यह सब वह अपने अकेले के बलबुतेपर चलाता है ” कमांड2ने कहा.

” कैसे क्या?”

” उसके पासके तंत्रके सहाय्यता से कौनसे वक्त कौनसा शेअर फायदेमे रहेगा यह उसे पहलेसेही पता रहता है… और ऐसा कहते है की अबतक वह कभीभी नुकसानमें नही रहा ” कमांड1 अब अच्छा खासा खुलकर बोल रहा था.

” तंत्र? ऐसा कौनसा तंत्र है उसके पास?” कमांड2ने उत्सुकतावश पुछा.

” बताता हूं” कमांड1 अपना व्हिस्कीका ग्लास फिरसे भरते हूए बोला.

” और बॉसने यह तंत्र कहासे हासिल किया ?” कमांड2 बेसब्रीसे सवालपर सवाल पुछे जा रहा था.

कमांड2 कमांड1 क्या बताता है यह सुनने के लिए बेताब हो गया था.

” बोलता हूं बाबा , सब बताता हूं ” बोलते हूए कमांड1 खडा हो गया.

अपने दाएं हाथकी छोटी उंगली बताते हूए कमांड1ने कहा,

” एक मिनट रुको मै जरा इधरसे आता हूं”

कमांड1 झमता हूवा बेडरूमकी तरफ जाने लगा.

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भाग-19 => चाल फंसी? … (शून्य-उपन्यास)-

कमांड2 कमांड1 क्या बताता है यह सुननेके लिए बेताब हो गया था. वह उसकी राह देखते हूए कॉम्पूटरके पास बेसब्रीसे चहलकदमी करने लगा.

कितनी देर हूई कमांड1 बेडरूमकी तरफ गया … अभीतक बाहर कैसे नही आया… इतना टाईम?…

वह उधर के उधरही तो नही कही बाहर चला गया ?…

कमांड2को अब चिंता होने लगी थी. कमांड2 उसे देखनेके लिए उठ गया और कमांड1 जिधर गया था उधर जाने लगा. बेडरूमके सामने आकर देखा तो बेडरुमका दरवाजा अंदर की ऒर खिंचा हूवा था. उसने धीरेसे दरवाजा धकेलकर देखा तो सामने बेडपर कमांड1 घोडे बेचकर सो रहा था. कमांड2को अपने मुंह तक आया निवाला छिन लिया गया हो ऐसा लगा. बडी मुश्कीलसे वह सब बकनेके लिए तैयार हूवा था. होशमें आनेपर वह कुछभी बताने वाला नही था. वह उसके पास गया और उसे हिलाकर उठानेकी कोशीश करने लगा. उसने उसे जोर जोरसे हिलाकर देखा. लेकिन वह निंदमेंही नही तो नशेमे चूर हो गया था. कमांड2ने थोडी देर प्रयास कर फिर उसे जगानेका विचार छोड दिया. फिर उसने सोचा की…

यह तो सो गया … मुझे दूसरा कुछ किया जा सकता है क्या यह देखना चाहिए…

कमांड1 जो जानकारी देनेवाला था जरुर वह उसने कहीतो छिपाकर रखी होगी…

वह अगर मैने ढूंढनेका प्रयास किया तो?…

अबतक इस घरमें हमेशा उसके साथ कमांड1 रहता था. अब उसे पुरी तरह एकांत मिला था.

उसका अगर मैने फायदा उठाया तो?…

उसने निश्चय किया की इस घरका चप्पा चप्पा छान मारना चाहिए.

जरुर मुझे कुछ मिलेगा…

उसने बेडरूमसे शुरवात की. वह आवाज ना करते हूए बेडरूममें इधर उधर ढूंढने लगा. बेडरूममे कुछ खास नही मिल रहा था. इसलिए अब वह घरका बचा हूवा हिस्सा ढूंढने लगा. उधरभी उसे कुछ कामका नही मिला.

अचानक उसके खयालमें आया की…

‘अरे कमांड1ने तो कॉम्प्यूटर शुरुही रखा हूवा है…’

वह तेजीसे काम्प्यूटरके पास गया. देखा तो काम्प्यूटर शुरुही नही कमांड1का मेलबॉक्सभी खुला था. कमांड2के चेहरेपर एक विजयी मुस्कुराहट चमकने लगी. वह झटसे काम्प्यूटरके सामने कुर्सीपर बैठ गया. और बिना वक्त गवाये कमांड1की मेल्स चेक करने लगा. बहुत सारी मेल्स थी. वह एक एक खोलकर उसपरसे तेजीसे अपनी पैनी नजर घुमाने लगा. कुछ खास कोई नही मिल रहा था. अचानक एक मेल खोलनेके बाद उसके चेहरेपर फिरसे मुस्कुराहट आ गई. उस मेलमे ऐसी कुछ जानकारी थी की जो आज कमांड1 उसे आज शायद बताने वाला था. उसने वह मेलपर उपर उपरसे एक नजर दौडाई. फिर अपने जेबसे युएसबी ड्राईव्ह निकालकर कॉम्प्यूटरको लगाया और वह मेल अटॅचमेंटके साथ अपने युएसबी ड्राईव्हमे कॉपी की. कॉपी होनेके बाद युएसबी ड्राईव्ह निकालकर उसने अपने जेबमें रखा. जिधर कमांड1 सोया था उस बेडरुमकी तरफ एकबार देखकर उसने तसल्ली की और फिर बिनधास्त वह मेल पढने लगा. कभी उसकी आंखोमे आश्चर्य दिखता तो कभी चेहरेपर मुस्कुराहट.

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भाग-20 => बॉस का मेसेज. … (शून्य-उपन्यास)-

वह मेल और उसकी अटॅचमेंट्स पूरी तरह पढनेके बाद कमांड2 कॉम्प्यूटरसे उठ गया. उसके चेहरेपर एक संतोष झलक रहा था. वह सब जानकारी उसने उसके दिमागमें, दिलमें और इतनाही नही अपने पास रखे थंब ड्राईव्हमेभी संजोकर रखी थी. वह वहासे जानेके लिए मुडनेही वाला था इतनेमें काम्प्यूटरका बझर बजा. उसने देखा तो कमांड1को मेल आई थी. उसने जाकर कमांड1के खुले मेलबॉक्समें देखा तो मेल बॉसकीही थी. वह फिरसे कॉम्प्यूटरके सामने बैठ गया, मेल खोली. मेलके साथ एक अटॅचमेंट थी. उसने अटॅचमेंट खोली तो वह एक मॅडोनाकी सुंदर सेक्सी तस्वीर थी. बॉस मॅडोनाका जरा जादाही फॅन लगता है… .

उसने सोचा. अबतक कमांड2 कमांड1का देख देखकर तस्वीरमें छिपा हूवा मेसेज कैसा खोलनेका यह सिख गया था. उसने तस्वीरमें छिपा मेसेज खोला. उसमें आगेकी कार्यवाईके बारेंमे लिखा था. आगेका खून कब, किसका करनेका यह सब विस्तारसे लिखा था. आज 15 तारीख थी और आगेके खुनके लिए 17 तारीख मुकम्मल की थी. उस मेलमें 17 तारीख के रात 1 से 3 का वक्त एकदम अनुकल है ऐसा लिखा था. और 16 तारख का पूरा दिन और रात बहूत ही खतरनाक वक्त है ऐसा लिखा था. कमांड2 ने वह पूरा मेसेज एक जगह कॉपी करके रखा. क्योंकी वह मेसेज एकबार खोलनेके बाद खत्म हो जाता था. उसे बॉसने उस तरहसे प्रोग्रॅम किया था. कमांड2ने वह मेल बंद की. मेसेज अब खत्म हो चूका था. अचानक कमांड2 अपने कुर्सीसे उठकर खडा हो गया और दिमाग में कुछ तुफान उठे जैसा रुममें कॉम्प्यूटरके आसपास चहलकदमी करने लगा. उसके दिमागमें कुछ कश्मकश चल रही थी यह स्पष्ट रुपसे दिख रहा था. आखीर वह अपनी चहलकदमी रोककर कॉम्प्यूटरके सामने रखी कुर्सीपर जाकर बैठ गया. वह शायद कुछ निश्चयतक पहूंच गया था.

उसने बॉसका आया हूवा मेसेज बदलनेका निर्णय लिया था…. .

उसने वह मेसेज ‘इडीट’ करनेके लिए ओपन किया. फिर एकबार इधर उधर देखते हूए उसने अपना इरादा पक्का किया और फिर वह मेसेज ‘इडीट’ करने लगा. खुनके लिए जो उचीत वक्त दिया था वह 17 तारीख रात 1 से 3 ऐसा लिखा था उसने वह बदलकर 16 तारीख रात 1 से 3 ऐसा किया. उस मेसेजमें 16 तारख की पुरी रात और दिन अति खतरनाक है ऐसा जिक्र किया था. वह बदलकर उसने 17 तारीख ऐसा किया. मतलब खुनके लिए जो उचीत वक्त था वह खतरनाक है ऐसे और जो खतरनाक था वह उचीत है ऐसा उलट फेर उसने मेसेजमें किया था.

ऐसा उसने क्यो किया?

उसके दिमागमें क्या खिचडी पक रही थी यह बताना बहुत मुश्किल था.

शायद उसका उसके बॉसके भविष्यकथनपर भरोसा नही था. शायद उसे उसका बॉस जो भविष्य बताता है वह सच होता है की नही यह देखना था.

लेकिन अगर उसके बॉसने बताया हूवा सच हूवा तो ?..

ऐसी स्थीतीमें कमांड1 और उसके खुदके जानको खतरा था. फिर इसमेंसे कुछतो रस्ता निकालना पडेगा…

वह सोचने लगा.

आखीर उसने फैसला किया की इस बार वह कमांड1के साथ नही जाएगा. कुछ बहाना बनाकर वह कमांड1को अकेला जानेके लिए विवश करने वाला था.

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भाग-21 => जॉनके बॉसकी व्हीजीट.. … (शून्य-उपन्यास)-

ऑफिसमें अबतक कोई नही आया था. जॉन सुबह सुबह अकेला आकर टेबलके सामने अपने कुर्सीपर बैठ गया. वह शायद थकावट महसुस कर रहा था. उसने एक फाईल निकाली और उसमेंके पन्ने पलटने लगा. उसका उस फाईलमें जराभी खयाल नही था. तो भी वह एकाग्र होनेका प्रयास करते हूए फाईलके पन्ने पलटने लगा. थोडी देरमें एक एक करते हूए ऑफिसका दुसरा स्टाफ आने लगा.

अब ऑफीसमें अच्छी खासी चहलपहल और खुसुर फुसुर सुननेमे आ रही थी. तभी जॉनके पास एक मेसेंजर आकर हल्के आवाजमें बोला.

” सर, बॉस आ गए है ..”

” बॉस ?…”

” सर … शहर पोलीस शाखाप्रमुख”

” क्या? इतनी सुबह सुबह ?” जॉन अपने कुर्सीपरसे उठते हूए बोला.

शहर पोलीस शाखाप्रमुख आया मतलब कुछ तो जरुर सिरीयस होगा….

सोचते हूए जॉन उन्हे रिसीव्ह करनेके लिए बाहर गया. शहर पोलीस शाखाप्रमुख जॉनको रस्तेमेंही मिले.

” गुड मॉर्निंग सर” जॉनने अभिवादन किया.

” जॉन आय निड टू टॉक टू यू. इट्स व्हेरी इम्पॉर्टंट” शहर पोलीस शाखाप्रमुख ना रुकते हूए सिरीयस मूडमें बोले.

जॉन वैसाही मुडकर उनके पिछे पिछे आने लगा. दोनो आकर जॉनके केबीनमें बैठ गए.

” क्या खुनी का कुछ अता पता लगा की नही ?”

बैठे बराबर शहर पोलीस शाखाप्रमुखने जॉनको सवाल किया.

” नही सर, अबतक और कुछभी खास जानकारी नही मिली. और वो तो वो उपरसे …आपको पता है ही… अपनाही कोई आदमी खुनीको मिला हूवा है” जॉनने कहा.

” और कितने खून होनेकी राह देखनी पडेगी हमें?”

शहर पोलीस शाखाप्रमुखने तिरछे अंदाजमें सवाल पुछा.

” सर, मुझे लगता है की मै आपको अबतक किए इनव्हेस्टीगेशनके बारेंमे संक्षिप्तमें बताता हू… ताकी आपको हम कर रहे इनव्हेस्टीगेशनके बारेमें पता चले. ”

जॉनने एक दीर्घ सांस ली और वह उसके बॉसको उन्होने इस केसपर अबतक किये काम के बारेंमे जानकारी देने लगा.

” जैसे मैने आपको पहले बताया था… पहले खुनके वक्त हमें एक ‘झीरो’ ऐसा लिखा टी शर्ट पहना हूवा आदमी लिफ्टमें चढते हूए मिला था…. वैसाही टी शर्ट पहना और एक आदमी मुझे जहा अँजेनीको अॅडमीट किया था उस हॉस्पिटलमें मिला था….दोनोभी हमारे शिकंजेसे जरासे अंतरसे छूट गए थे… इसलिए हमनें दोनोंके स्केचेस निकालकर पुरी मिडीयाकेद्वारा लोगोमें जारी किये…. उन दोनोंको हमने पकडा भी लेकिन आखिरमें ऐसा पता चला की उन दोनोंका इन खुनसे कोई वास्ता नही था. …. इन फॅक्ट वैसे ‘झीरो’ निकाले हूए टी शर्ट पहनना आजकल फॅशन बनती जा रही है…. लेकिन यह खुनीभी दिवारपर खुनसे झीरो निकालता है इसलिए हमने यह खुन और वे दो टीशर्टवाले ये दोनो घटनाए एकदुसरेसे जोडी थी… इसलिए शुरुसेही हमने खुनीको पकडनेके हिसाबसे पक्की की दिशा पूरी तरहसे गलत साबीत हूई …. उसमें वक्त सो गया, हमारी मेहनत भी गई…. और आखीरमें हाथमें कुछ भी नही आया…. लेकिन अब हम नए जोशके साथ तैयार हूए है…… और पुरी तरह अपनी जान की भी पर्वा ना करते हूए जी जान लगाकर हम इस काममे लग गए है……” जॉन ने पुरी जानकारी सक्षिप्तमें दी.

उसका इशारा हालहीमें उसपर हूए जानलेवा हमलेकी तरफ था.

” काममें लगे हो… फिर खुनी क्यो नही मिल रहा है.? तुम्हे लग रहा होगा की इतनी सुबह आकर तुम लोगोको तकलिफ देनेके बजाय मै चूपचाप अपने ऑफिसमे जाकर शांतीसे अपने कुर्सीपर बैठकर आराम क्यो नही करता? मेरे कुर्सीको कितने किल है इसका तुम्हे अंदाजा नही होगा. उपरसे हमेशा दबाव लगा रहता है. पुरे शहरमें दहशत फैली हूई है… रातको आठ बजनेसे पहले सब रास्ते सुनसान हो जाते है. हर आदमीको लगता है की अब अगला नंबर उनका ही है. इतने दिन लोग चूप थे. अब वे मेयर को जाकर सफाई मांग रहे है और वह मेयर मेरे सरपे चढकर मुझे सफाई मांग रहा है. और इतनाही काफी नही था की यह प्रेसवाले पुलिसके बारेमें उलटा सिधा छापकर अपनी बदनामी कर रहे है. सच कहो तो लोगोका पुलिसपरसे विश्वास उडनेकी नौबत आई है. अब बहुत हो चूका अब सरके उपरसे पानी जा रहा है. मसला अब मिनीस्ट्री तक पहूंच गया है. ऐसी स्थीतीमें मै कैसे शांत रह सकता हूं. तुम लोगोंको जादासे जादा मै 4 दिनकी मौहलत देता हूं. उधर कुछभी करो और चार दिनमें उस खुनीको मेरे सामने पेश करो… लाईव्ह ऑर डेड”

“सर हम रातदीन कडी मेहनत कर रहे है”

” मुझे मेहनत नही, रिझल्ट चाहिए” शहर पोलीस शाखाप्रमुख कुर्सीसे एकदमसे खडे होते हूए बोले.

जॉनभी उसके कुर्सीसे उठ गया. शहर पोलीस शाखाप्रमुख अब जाने लगे थे. जाते जाते वे दरवाजेमे रुके, पलटे और बोले,

“… और अगर तुम्हारेसे यह केस सॉल्व नही होता है तो इस्तीफा दो. मै दुसरा कुछ बंदोबस्त करुंगा”

शहर पोलीस शाखाप्रमुख टाकटाक जुतोंका आवाज करते हूए वहांसे चले गए. जॉन दरवाजेतक गया और उन्हे जाते हूए देखता रह गया.

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भाग-22 => डिटेक्टीव्ह (शून्य-उपन्यास)-

रातके घने अंधेरेमे बस्तीसे दूर एक निर्जन, निर्मनुष्य स्थलपर एक गाडी आकर रुकी. गाडीसे ओवरकोट पहना हूवा एक साया बाहर आया. कडाके के ठंडमे अपने गाडीके पास वह साया खडा हो गया. बेचैन होकर वह साया अपने गाडीके पास चहलकदमी करने लगा. बिच बिचमें अपने घडीमेंभी देखता था. जाहिर था की वह किसीकी राह देख रहा था. उतनेमें सामने अंधेरेमे दो जलते हूए दिए उसे अपने तरफ आते हूए दिखाई दिए. उसकी चहलकदमी रुक गई. एक गाडी नजदिक आ गई. उस गाडीके हेडलाईटकी रोशनी उस साये के चेहरेपर पडी. वह साया दुसरा कोई ना होकर जॉन था. वह गाडी उसके गाडीके पास आकर रुकी. जॉन उस गाडीके पास गया. उस गाडीसे एक काला कोट और काली हॅट पहने हूए एक लंबा चौडा एक आदमी उतरा. उतरतेही उसने जॉनसे हस्तांदोलन किया ” हाय जॉन”

” हाय अलेक्स” जॉनने उसका हाथ अपने हाथमें लेकर कहा.

” बोलो … इतने सुनसान जगह, इतने रात गए, तूमने मुझे क्यो बुलाया? ?” अलेक्सने पुछा.

” बातही वैसी है. तुझे पताही होगा की हमारे डिपार्टमेंटकाही एक हमारा साथी खुनीसे मिल गया है ऐसा हमें संदेह है. अब ऐसी नौबत आई है की मै मेरेही किसी साथीपर भरोसा नही कर सकता. इसलिए मैने तुम्हे यहां बुलाया है ” जॉन ने कहा.

” अच्छा तो उस कल्प्रीटको ढूंढना है. ” अलेक्सने कहा.

” मुझे पता है की इस कामके लिए तुम्हारे सिवा दूसरा कोई काबिल डिटेक्टीव हो नही सकता” जॉन उसको सराहते हूए कहने लगा.

” एकबार तूमने काम मुझे सौप दिया की वह मेरा हो गया. तूम उसकी चिंता मत करो. जल्द से जल्द मै उसका पता लगाउंगा ” अलेक्स आत्मविश्वास से कह रहा था.

” इस खुनीतक पहूचनेका मुझे तो दुसरा कोई उपाय नही दिखता. देखते है इससे कोई फायदा होता है क्या? जॉनने कहा.

” मतलब इस पतले धागे से स्वर्ग तक पहूचना है हमें…!” अलेक्सने मजाकमें कहा.

” स्वर्ग कैसा … नर्क बोलो” जॉनने उसकी दुरूस्ती की.

” हां नर्कही कहना पडेगा ” अलेक्स ने कहा.

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भाग-23 => हॅपी बर्थ डे (शून्य-उपन्यास)-

अँजेनी गहरी निंदमे थी. निंदमें उसका मासूम चेहरा और ही खुलकर निखरा हूवा दिख रहा था. निंदमेंही उसने अपनी करवट बदली. करवट बदलनेकी वह अदा भी दिल पिघला देनेवाली थी. इतनेमें उसेक फ्लॅटके दरवाजे की बेल बजी. उसने फिरसे करवट बदली. फिरसे दरवाजेकी बेल बजी. अब वह निंदसे जाग चूकी थी. उसेने अपनी आंखे मसलते हूए खिडकीके बाहर झांका. काला घना अंधेरा और शहर के दिए किसी टीमटीमाते तारोंकी तरह दिख रहे थे. उसने अंगडाई लेते हूए दिवारपर टंगे घडी की तरफ देखा. घडीमें बारा बजनेको एक-दो मिनट बाकी थे. फिरसे उसके दरवाजेकी बेल बजी. रातके बारा बजनेको आए. इतने रात गए कौन होगा?

वह अपने बिखरे बाल संवारते हूए बेडसे निचे उतर गई. अपने कपडे ठिक करते हूए और कौन आया होगा यह सोचते हूए वह सामने हॉल के दरवाजेकी तरफ जाने लगी. उसने दरवाजेके कीहोल से देखा. गलियारेमें अंधेरा होनेसे कुछ दिख नही रहा था. उसने दरवाजेकी चेन लगाकर कुंडी खोली और दरवाजा तिरछा करते हूए बाहर झांकने लगी. बाहर जॉन खडा था.

इतने रात गए किसलिए आया होगा ?…

” जॉन! इतने रात गए ? ” वह दरवाजा खोलते हूए बोली.

जॉन मुस्कुराते हूए अंदर आया. उसके दोनो हाथ पिछेकी तरफ थे. शायद वह कुछ छिपा रहा था. उसने अंदर आतेही पिछे छिपाया हूवा एक फुलोंका बडासा गुलदस्ता निकाला और दुसरे हाथसे उसे उठाते हूए बोला,

” हॅपी बर्थ डे टू यू…

हॅपी बर्थ डे टू यू अँजेनी…

हॅपी बर्थ डे टू यू”

अँजेनीने दिवार पर टंगे घडीके तरफ देखा. बारा बजकर एक मिनट हो चूका था और घडीमे तारीख थी 16 ऑगष्ट; उसका जनमदिन ! अँजेनीके आंखोमे आंसू तैरने लगे.

” तुझे कैसे पता चला ? ” वह प्रेमभरी नजरोसे उसके तरफ देखकर बोली.

” मॅडम यह मत भुलो की हम पुलिसवाले है और हमारे पास तुम्हारे सारे रेकॉर्डस् है. ” जॉन मुस्कुराते हूए बोला.

” ओ जॉन थँक यू” वह जॉनके गालको चूमते हूए बोली.

जॉनने उसे कसकर अपनी बाहोंमे भरकर निचे उतारा. फिर दोनों एकदूसरेके होठोंको आवेशमें चूमने लगे.

‘ सोई हूई थी” जॉनने पुछा.

” हां ” उसने कहा.

” यह तुम्हारा अच्छा है… उधर तूमने हमारी निंद उडाई और इधर तूम चैनसे सो रही हो. ” जॉन मस्करी करते हूवे बोला.

” मैने ? ” वह मुस्कुराते हूए बोली.

” हां … आधी निंद तुमने उडाई और आधी उस खुनीने.. ” जॉनने खिलखिलाकर हंसते हूए कहा.

अँजेनी मुस्कुराई; यत्नपुर्वक शायद झूट झूट. खुनीका जिक्रभी होनेपर उसे सानीकी याद आती थी.

अब दोनो एकदूसरेके कमरमें हाथ डालकर बेडरुमकी तरफ चल पडे.

” क्या कुछ लोगे? चाय कॉफी? ” उसने पुछा.

” हां लूंगा ना. लेकिन चाय कॉफी नही. ”

” फिर ? ” उसने पुछा.

बेडपर बैठते हूए उसने उसके होठोंका एक कसकर चुंबन लिया. फिर दोनो एकदुसरेको बाहोंमे भरकर बेडपर लेट गए. अचानक फिर अँजेनीको क्या लगा पता नही. वह जॉनका चेहरा अपने दोनो हाथोमे लेकर उसकी तरफ एक टक देखने लगी. उसकी आंखे आंसूओंसे भर गई.

” क्या हूवा ?” जॉनने उसकी पिठपर अपना हाथ फेरकर कहा.

वह कुछ नही बोली.

” सानीकी याद आ रही है.? ” जॉनने उसके चेहरेपर आई लटे ठिक करते हूए पुछा.

” सच … तूम कौन , कहांसे आए, कैसे मेरे जिंदगीमें आते हो और मेरी तबाह होती हूई जिंदगी संवारते हो. सबकुछ कैसे जैसे पहलेसे तय हो..’ वह आंखोमें आंसू लिए बोल रही थी.

जॉनने भावावेशसे से उसे भीरसे बांहोमें भर लिया.

” तूम चिंता मत करो. धीरे धीरे सबकुछ ठिक हो जाएगा” वह उसके पिठपर थपथपाते हूए उसे सांत्वना देते हूए बोला.

अँजेनी जॉनके सिनेपर अपना सर रखकर उसके सिनेके बालोंसे खेलते हूए उसकी तरफ एकटक देखने लगी. जॉनभी उसकी तरफ देख रहा था. मानो दोनोकी आंखे एक दुसरेमें खो गई थी. जॉनका हाथ जो अबतक उसकी पिठ सहला रहा था और उसके लंबे घने बालोंसे खेल रहा था, धीरे धीरे उसके मुलायम जिस्मसे खेलने लगा. वहभी मानो उसे चूमते हूए सारा प्रेम उसपर बरसा रही थी. जॉनने उसे अपने सिनेपरसे अपने मजबूत बाहोंसे उपर खिंच लिया. वह उसके शर्टकी बटन्स खोलने लगी. जॉनभी उसके कपडे निकालने लगा. थोडीही देरमें दोनोंभी विवस्त्र हो चूके थे. जॉन उसके संगे मरमरसे बदनकी तरफ आंखे फाडफाडकर देखने लगा. वह उसमें समानेके लिए अधीर धीरे धीरे उसपर झूकने लगा. इतनेमें बाजूमें रखे जॉनके मोबाईलकी घंटी बजी. दोनोभी किसी बुत की तरह एकदम स्तब्ध हूए. जॉनने अपना हांथ बढाकर अपना मोबाईल लिया. मोबाईलके डिस्प्लेकी तरफ देखा. फोन सॅमका था. उसने बटन दबाकर फोन बंद किया और बाजूमें रख दिया. फिर दोनो मूड बनानेकी कोशीश करने लगे. मोबाईल फिरसे बजा. चिढकर उसने बटन दबाकर फोन कानको लगाया.

” हां सॅम, इतने रात गए क्या काम निकाला ? ” जॉन ने नाराजगीमेंही कहा.

” सर, तिसरा खून हो चूका है ” उधरसे सॅमका स्वर गुंजा.

” क्या? ” जॉन एकदम से उठ गया.

जॉन अपने कपडे ढूंढने लगा.

” फिलहाल हम उधर ही जा रहे है.. किसीने फोन कर पोलीस स्टेशनको यह खबर दी.” सॅमका आवाज आया.

” क्या ऍड्रेस बताया?” जॉनने कपडे पहननेकी चेष्टा करते हूए पुछा.

अँजेनीभी अब उठकर कपडे पहनने लगी थी.

” साऊथ एव्हेन्यू, प्रिन्स अपार्टमेंटस् 1004 … उटीना हॉपर” उधरसे आवाज आया.

” क्या? इसबारभी एक औरत! ठीक है … यू प्रोसीड विथ द टीम. मै जल्द से जल्द आकर तुम्हे जॉईन होता हूं ” जॉनने अपने कपडे पहनते हूए फोन बंद किया.

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भाग-24 => मिस उटीन हॉपर (शून्य-उपन्यास)-

बेडरूममे धुंधलीसी रोशनी थी. बेडपर कोई सोया हूवा दिखाई दे रहा था. एक काले सायेने धीरे धीरे बेडरूममे प्रवेश किया. आतेही बेडरुममे इधर उधर देखते हूए वह साया दरवाजेके पास दिवारपर कुछ ढूंढने लगा. शायद वह कमरेके बल्बका स्वीच ढूंढ रहा था. दिवारपर टटोलनेके बाद उस सायेको एक जगह कुछ इलेक्ट्रीकके स्वीच मिल गए. वह साया एक एक स्वीच दबाकर देखने लगा. आखीर एक बटन दबानेके बाद कमरेका बल्ब जल गया और कमरेमे रोशनी हो गई. वह रोशनी सायेके शरीरपर भी पड गई. एक खुशीकी मंद मंद मुस्कान उस सायेके चेहरेपर दिखने लगी – बल्ब का स्वीच मिलने की खुशी.

वैसे देखा जाए तो बल्ब का स्वीच मिलना यह घटना वह साया जिस कार्यके लिए आया था उसके मुकाबले एक साधारणसी घटना….

लेकिन आदमीका स्वभाव कितना अजीब होता है…

खुशी मनानेका एक भी मौका वह दौडना नही चाहता…

हां, उसकी खुशी की परिभाषा अलग अलग हो सकती है…

अच्छी कृतीमेंही उसे आनंद मिलता है… .

लेकिन फिर उसकी अच्छे बुरे की परिभाषा अपनी अपनी… .

दुसरेके नजरीयेसे गलत कामभी उसके लिए अच्छा हो सकता है..

वह बेडरुममे आया साया दुसरा तिसरा कोई ना होकर कमांड1 था. बेडरुममें रोशनी होतेही बेडपर सोई हूई औरत जग गई और भौचक्कीसी इधर उधर देखने लगी. शायद वह उतनी गहरी निंदमे नही होगी. सामने हाथमें पिस्तौल लिए खडे कमांड1को देखतेही व घबरा गई. डर के मारे उसके हाथपैर कांपने लगे. वह अब जोरसे चिखनेही वाली थी की कमां1ने उसके पिस्तौलका ट्रीगर दबाया. पिस्तौलको शायद सायलेंन्सर लगाया होगा क्योंकी ‘धप्प’ ऐसा आवाज आया और सामनेकी औरत बेडपर अचेतन होकर गिर गई. उसका चिखनेके लिए खुला मुंह खुला की खुला ही रह गया.

अब कमांड1का चेहरा खुशीसे खिल गया.

” मिस उटीन हॉपर … आय अॅम सॉरी. मरना यह तुम्हारे तकदिरमें विधातानेही लिखा था… मै कौन तुम्हे मारने वाला … मै तो सिर्फ उसके हाथ की एक कठपुतली… ” कमांड1 खुदसेही बोल रहा था.

झटसे कमांड1ने अपने कोटके दाए जेबसे एक नुकीला छुरा निकाला और खचाखच उसके निश्चल पडे शरीरपर खंजर के वार किए. जब वह खंजर पुरी तरहसे उटीनाके गर्म खुनसे सन गया तभी वह रुका. फिर वह आगे जाकर दिवारपर उस खुनसे लिखने लगा. दिवारपर एक बडा शून्य निकालकर वह आगे लिखनेहीवाला था की दूर कही उसे पुलिसके गाडीका सायरन सुनाई देने लगा. कमांड1ने खिडकीसे बाहर झांका. आवाज अभीभी दूर था. उसने जल्दी जल्दी वह खंजर फिरसे उटीनाके खुनमें डूबोया और दिवारपर वह आगेका लिखने लगा.

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भाग-25 => घात प्रतिघात (शून्य-उपन्यास)-

तेजीसे सब कुछ निपटाकर कमांड1 फ्लॅटके दरवाजेसे दौडकर लिफ्टके पास गया. थोडीही देर पहले उसे सायरनका आवाज बिल्डीग के निचे आकर बंद हूवा ऐसा महसूस हूवा था. उसने लिफ्टके डिस्प्लेपर देखा. लिफ्ट उपर आ रही थी. वह घबरा गया.

कही पुलिस बिल्डींगमें तो नही आए ?..

और शायद वह उपर ही आ रहे थे …

उसके चेहरेपर अब डर झलकने लगा था. क्या करे कुछ सुझ नही रहा था. उसने इस डरे हूए हालतेमेंभी तेजीसे फैसला लिया और वह सिढीयोंसे उपरकी तरफ दौडने लगा. थोडी देरमें उसके खयालमें आया की दौडते हूए उसके जुतोंका आवाज हो रहा है. उसने अपने जूते निकालकर वही छोड दिए और वह वैसेही उपर तेजीसे दौडने लगा. दौडते हूए निचे क्या हो रहा होगा इसकी तरफ भी उसका ध्यान था. आखीर वह बिल्डींगके टेरेसपर आकर पहूंच गया. टेरेसपर उसने इधर उधर देखा. उपर चमचमाते चांदनीसे भरा आकाश और आजूबाजू चमचमाते इलेक्ट्रीक लाईटसे भरा शहर. दौडनेके वजह से वह हांफ रहा था और उसे पसीना आया था. उपर ठंडी हवा चल रही थी. पसिनेसे सने उसके गरम शरीर को वह ठंडक पहूचा रही थी. उसे थोडी राहतसी महसुस हूई. लेकिन रुकनेके लिए वक्त कहां था? बिल्डींगके सामनेकी तरफ उसने झांककर देखा. बिल्डींगके सामने पुलिसकी गाडी खडी थी. गाडीके पास तीन हथीयारोंसे लेस पुलिस खडे थे. उसे एक समझमें नही आ रहा था की –

खुनके बारेमें पुलिस को पता कैसे चला ?…

ऐसाभी हो सकता है की वे दुसरेही किसी जुर्मके सिलसिलेमें वे वहां आये हों…

लेकिन वह अगर दूसरे किसी अपराधके सिलसिलेमें यहां आए होंगे और ऐसेमे अगर मै पकडा गया तो वह एक घोर इत्तेफाक ही कहना पडेगा…

लेकिन उसे पुरा भरोसा था की बॉसने दिए वक्तमें ऐसी अनहोनी नही होनी थी. अबतक ऐसा कभी नही हूवा था..

अब यहांसे कैसे खिसका जाए?…

वह सोचने लगा.

एक बात पक्की थी की बिल्डींगके सामनेसे खिसकना लगभग नामुमकीन था…

दुसरा कोई विकल्प ढूंढनेके लिए वह इधर उधर देखने लगा. बिल्डींगके दाए बायेंसेभी निकलना मुमकीन नही था. एक तो उतरनेको कुछ नही था और किसी तरह उतरो तो पुलिसके सामनेसेही जाना पड सकता था. फिर कमांड1 धीरे धीरे बिल्डींगके पिछले हिस्सेमें आकर वहांसे निकलनेके बारेंमे ताकझाक करने लगा. पिछे उतरनेको पाईप थे. वह देखकर उसके जानमें जान आ गई. लेकिन पिछे दुसरे एक बिल्डींगपर लगे सोडीयम लँपकी रोशनी पड रही थी. इसलिए उतरते वक्त किसीके नजरमें आना मुमकीन था. वह और कुछ विकल्प है क्या इसके बारेंमें सोचने लगा. उसके पास जादा वक्त नही था.

अगर गलतीसेभी पुलीस यहा टेरेसपर आ गई तो ?…

तो वह अपने आप ही उनके कब्जेमें आनेवाला था….

उसने बिल्डींगका पिछला हिस्सा निचे उतरनेके हिसाबसे और एकबार ठिक ढंगसे देखने का फैसाला किया. इसलिए वह पिछे के तरफ की पॅराफिट वॉलपर चढ गया. पाईप उपरसे निचे जमीनतक थे. शायद ड्रेनेज पाईप थे. पाईपपर जगह जगह किले लगाए हूए थे इसलिए उतरने के लिए पकडना आसान था. अचानक उसके खयालमें आया की उसके पिछे टेरेसपर कुछ हरकत हूई है. जबतक वह पलटकर देखता एक काला साया उसपर झपट पडा और उसने पुरा जोर लगाकर कमांड1को टेरेसके निचे धकेला. इस अचानक हूए हमलेसे कमांड1 गडबडा गया. उसे खुदको संभालनेकाभी वक्त नही मिला. वह बिल्डींगसे निचे गिरने लगा. गिरते वक्त उसका चेहरा उपर टेरेसकी तरफही था. वह काला साया टेरेससे झुककर उसे निचे गिरता हूवा देख रहा था. पिछेसे आ रहे सोडीयम लॅंप के रोशनीमें उसे उस काले साएका चेहरा दिखाई दिया. वह उस चेहरेकी तरफ आंखे फाडफाडकर देखने लगा. इधर निचे गिरकर मरनेका डर और सामने उस काले साए का चेहरा देखकर उसके डरमें और आश्चर्यमें जैसे औरही इजाफा हो रहा था.

वह चेहरा कमांड2का था …

उसे विश्वासही नही हो रहा था….

उसने एकबार फिरसे तसल्ली कर ली.

हां वह चेहरा, उसका दोस्त जिसपर उसने पुरी तरहसे भरोसा किया था उस कमांड2काही था…

लेकिन उसने ऐसा क्यों किया ?…

वह उस सवालपर सोचकर कुछ नतिजेतक पहूंचनेके पहलेही वह निचे फर्शपर गिर गया. लगभग 15-16 माले उपरसे निचे गिरकर उसके सरके टूकडे टूकडे हूए थे और तत्काल उसकी जान चली गई थी. इधर उपर उसे निचे गिरते हूए देख रहे कमांड2के चेहरेपर एक गुढ मुस्कुराहट बिखेर गई.

=========== क्रमश::…………..

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‘शून्य’ – (Shunya) सस्पेंस थ्रिलर उपन्यास – उपन्यास ….. जारी ….. है,,

kmsraj51 की कलम से …..

‘शून्य’
Real Art

प्रिय मित्रों,,

हिंदी उपन्यास ‘शून्य’ जारी ….. है …..

भाग-6 => ब्लैंक मेल (शून्य-उपन्यास)-

चांदके धुंधले रोशनीमे टेरेसपर कमांड1 और कमांड2 बैठे हूए थे. उनके सामने लॅपटॉप रखा हूवा था. बिच बिचमें वे मजेसे व्हिस्कीके घूंट ले रहे थे. कमांड1 कॉम्प्यूटरको तेजीसे कमांड दे रहा था. एक पलमें न जाने कितने की बोर्डके बटन वह दबा रहा था.

‘” यह तुम क्या कर रहे हो?” कमांड2ने उत्सुकतावश पुछा.

” अरे यह पोलीस ऑफीसर जॉन अपने केसपर काम कर रहा है ” कमांड1 ने अपना की बोर्डके बटन दबाना जारी रखते हूए कहा.

“‘ तो फिर?” कमांड2 ने पुछा.

” उसके दिमागमें क्या पक रहा है यह हमें जानना नही चाहिए?” कमांड1 ने कहा.

‘” उसके दिमागमें क्या चल रहा है यह हमें कैसे पता चलेगा?” कमांड2ने आश्चर्यसे पुछा.

” इधर देख वह अब इंटरनेटपर ऑनलाईन है .. अब यह मेल मै उसको भेज रहा हूँ …. यह मेल उसका पासवर्ड ब्रेक करेगी” कमांड1 बडे आत्मविश्वाससे कह रहा था.

” पासवर्ड? लेकिन कैसे ?” कमांड2ने आश्चर्यसे पुछा.

” बताता हू… बताता हू” कमांड1 ने मेलका ‘सेंड’ बटन दबाया और आगे कहा,

” देखो, यह मेल जब वह खोलेगा तब उसके कॉम्प्यूटरपर ‘सेशन एक्सपायर्ड’ ऐसा मेसेज आयेगा. फिर वह फिरसे जब अपना पासवर्ड एंटर करेगा तब वह अपने प्रोग्रॅम मे एंटर किया हूवा होगा. इस तरह यह अपना प्रोग्रॅम उसका पासवर्ड अपने पास बडी सुरक्षा के साथ पहूँचाएगा”

कमांड1के चेहरेपर एक अजीब मुस्कुराहट की छटा दिखाई देने लगी.

” क्या दिमाग पाया बॉस…” कमांड2 कॉम्प्यूटरकी तरफ देखते हूए अपना व्हिस्कीका ग्लास बगल में रखते हूए बोला.

‘” धीरे धीरे तू भी यह सब सिख जाएगा” कमांड1ने उसके पिठपर थपथपाते हूए कहा.

” तेरे जैसा गुरू मिलनेके बाद मुझे चिंता करने की क्या जरुरत है ?” कमांड1 चढाते हूए कमांड2ने कहा.

कमांड1को जादा से जादा चढाने के चक्करमें कमांड2का बगलमें रखे व्हिस्कीके ग्लासको धक्का लगा और वह ग्लास निचे फर्शपर गिर गया. उसके टूकडे टूकडे होगए. कमांड2 ग्लासके टूकडे उठाने लगा.

कमांड1ने कॉम्प्यूटरपर काम करते हूए कांचके टूकडे उठा रहे कमांड2की तरफ देखा और फिरसे अपने काममें जूट गया.

” इऽऽ” कमांड2 चिल्लाया.

” क्या हूवा ?” कमांड1ने पुछा.

” उंगली कट गया “” कमांड2की कांच के टूकडे उठाते हूए उंगली कट गई थी. कमांड2 अपना दर्द छिपाने का प्रयास करने लगा.

” बी ब्रेव्ह … डोन्ट अॅक्ट लाइक अ किड ” कमांड1 ने कहा और मॉनिटरकी तरफ देखते हूए फिरसे अपने काममें जूट गया.

कमांड2ने वैसेही खुनसे सने हाथसे कांचके बाकी टूकडे उठाए, वहाँ एक पॉलीथीन बॅग पडी हूई थी उसमें डाले और उस पॉलीथीनकी बॅगको गांठ मारकर वह बॅग मकान के पिछले हिस्सेमें झाडीमें फेंक दी.

उतनेमें कमांड1को एक मेल आई हूई दिखाई दी.

” उसने अपनी मेल खोली है शायद… इसको तो अपना पासवर्ड ब्रेक करवाके लेनेकी बडी जल्दी दिख रही है ‘” बोलते हूए कमांड1ने मेल खोली. मेल ब्लँक थी. मेलमें पासवर्ड नही आया था. अचानक कमांड1ने विद्युत गतीसे कॉम्प्यूटर बंद किया.

” क्या हूवा?” कमांड2 ने पुछा.

‘” साला हम जितना सोच रहे थे उतना येडा नही है…. उसको शायद संदेह हूवा है'” कमांड1 ने कहा.

” मेल ब्लँक है … इसका मतलब उसका पासवर्डभी ब्लँक होगा'” कमाड2ने अपना अनुमान लगाया.

“मि. कमांड2 … इमेल पासवर्ड कभीभी ब्लँक नही होता'” कमांड1 अपने खास अंदाजमें कहा.

“” फिर …तूमने इतनी तेजीसे कॉम्प्यूटर क्यों बंद किया?” कमांड2 ने उत्सुकतावश पुछा.

“‘अरे, उसे अगर सहीमें संदेह हूवा होगा तो वह हमें ट्रेस करनेकी कोशीश जरुर करेगा'” कमांड2ने कहा.

“अच्छा अच्छा” कमांड2 उसे जैसे समझ गया ऐसा जताते हूए बोला.

कमांड1 व्हिस्कीका ग्लास लेकर अपने जगहसे उठ गया.

” हमें यहाँ ऐसे खुलेमें नही बैठना चाहिए ” कमांड2ने अपनी चिंता जाहिर की.

“‘ ऐसा क्यों?” कमांड1 ने व्हिस्कीका ग्लास हाथमें लेकर टहलते हूए कहा.

” नही मैने सुना है की अमेरिकन सॅटेलाईटके कॅमेरे धरतीपर 10 बाय 10 इंच तक स्पष्ट रुपसे देख सकते है … उसमें हम लोगभी दिख सकते है…” कमांड2ने स्पष्ट किया.

कमांड1 टहलते हूए एकदम ठहाका लगाकर हसने लगा.

” क्या हूवा ‘” कमांड2 उसके हसनेकी वजह समझ नही पा रहा था.

‘” अरे, यह अमेरिकन लोग प्रोपॅगँन्डा करनेमें बहुत एक्सपर्ट है .. अगर वे 10 बाय 10 इंच तक स्पष्टतासे देख सकते है तो फिर वे उस ओसामा बीन लादेनको, जो की कितने दिनसे उनके नाकमें दम कर रहा है, उसे क्यों पकड नही पा रहे है? … हां यह बात सही है की कुछ चिजोंमे अमेरिकन टेक्नॉलॉजीका कोई जवाब नही… लेकिन एक सच के साथ 10 झुठ जोडनेकी अमेरिकाकी पुरानी स्टाईल है… एक सच के साथ 10 झुठ जोडनेको क्या कहते है पता है? ‘”

” क्या कहते है?” कमांड2ने उत्सुकतासे पुछा.

” शुगरकोटींग … तुझे पता है? … दुसरे र्वल्ड वार के वक्त हिटलरकी फौज मरते दमतक क्यों लढी?”‘ कमांड1 ने पुछा.

कमांड2 कमांड1की तरफ असमंजस सा देखने लगा.

हिटलरने प्रोपॅगॅन्डा किया था की उनके फौजमें जल्दीही व्ही2 मिसाईल आनेवाला है… और अगर वह मिसाईल उनके फौजमें आता तो वे पुरी दुनियापर राज कर सकते थे'” कमांड1 ने कहा.

” फिर क्या हूवा आगया क्या वह मिसाईल उनके फौजमें ?” कमांड2 ने पुछा.

” जब व्ही2 नामकी कोई चिज होगी तो आएगी ना? …” कमांड1 ने कहा.

अब कमांड1 कॉम्प्यूटर फिरसे शुरु करने लगा.

” अब फिरसे क्यो शुरु कर रहे हो?… वह फिरसे हमें ट्रेस करेगा ना'” कमांड2 ने अपनी चिंता व्यक्त की.

” नही … अब शुरु करनेके बाद अपनेको अलग आय. पी. अॅड्रेस मिलेगा … जिसकी वजहसे वह हमें ट्रेस नही कर पाएगा ‘” कमांड1 कॉम्प्यूटर शुरु होनेकी राह देखते हूए बोला.

कॉम्प्यूटर शुरू हूवा और मॉनिटरके दाएँ कॉर्नरमें मेल आनेका मेसेजभी आया.

“‘बॉसकी मेल है ‘” मेल खोलते हूए कमांड1ने कहा.

उसने मेल खोली और पढने लगा.

“कमांड2…” कमांड1 ने आवाज दिया.

“‘ हां”

” हमें अगले मिशनके बारेंमे आदेश मिल चूके है” कमांड1 मेल पढते हूए बोला.

कमांड2 कमांड1 के कंधेपर झूककर मेलमें क्या लिखा है यह पढने की कोशीश करने लगा.

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भाग-7 => दिल है कि … (शून्य-उपन्यास)-

जॉन कारमें जा रहा था. हॉस्पिटलसे डॉक्टरने उसे फोन कर बताया था की अँजेनीको डिस्चार्ज दिया गया है. डॉक्टरके अनुसार मेडीकली वह पुरी तरहसे संवर गई थी. सिर्फ मेंटली और इमोशनली संवरनेमें उसे थोडा वक्त लग सकता था. सानीके पोस्टमार्टमके रिपोर्टभी आए थे. जॉनको उस सिलसिलेमें अँजेनीसे थोडी बातचीत करनी थी. बातचीत वह फोनपरभी कर सकता था. लेकिन दिलको कितनाभी समझाने की कोशीश करने पर भी दिल है की मानता नही था. उसे मिलनेकी उसकी इच्छा जितना रोकने की कोशीश करो उतनी तिव्र हो चली थी. उसने उसे मुंहसे कृत्रिम सांसे दी तब उसे उसका कुछ विषेश नही लगा था. लेकिन अब उसे उसके होठोंका वह मुलायम स्पर्श रह रहकर याद आ रहा था. उसने कर्र ऽऽ.. गाडीका. ब्रेक लगाया. गाडीको मोड लिया और निकल गया – अँजेनीके घरकी तरफ.

जॉनकी कार अँजेनीके अपार्टमेंटके निचे आकर रुकी. उसने गाडी पार्किंगकी तरफ मोड ली. पार्किंगमे कुछ समय वह वैसाही गाडीमें बैठा रहा. आखीर अपने मन से चल रहे कश्मकशसे उभरकर वह गाडीसे उतर गया. लंबे लंबे कदमसे वह लिफ्टकी तरफ गया. लिफ्ट खुलीही थी, उसमें वह घुस गया. लिफ्ट बंद होकर उपरकी तरफ दौडने लगी.

लिफ्ट रुक गई. लिफ्टमें डिस्प्लेपर 10 आंकडा आया था. लिफ्टका दरवाजा खुला और जॉन बाहर निकल गया. अँजेनीका फ्लॅटका दरवाजा अंदर से बंद था. वह दरवाजेके पास गया. फिर वहा थोडी देर अपने दरवाजा खटखटाऊ की नही यह सोचकर चहलकदमी करने लगा. वह डोअर दबानेही वाला था की अचानक सामनेका दरवाजा खुला. दरवाजेमें अँजेनी खडी थी. जॉन का चेहरा ऐसा हुवा मानो उसे चोरी करते हूए पकडा गया हो.

” क्या हूवा? ” अँजेनी हसते हूए बोली.

इतना खिलखिलाकर हसते हूए जॉन उसे पहली बार देख रहा था.

“‘ किधर? कहा? … कुछ नही… मुझे तुम्हारे यहा इस केसके सिलसिलेमें आना था… नही मतलब आया हूँ ” जॉन अपने चेहरेके भाव जितने हो सकते है उतने छिपाते हूए बोला.

” आवो ना फिर… अंदर आवो… ” अँजेनी फिरसे हसते हूए बोली.

अँजेनीने उसे घरके अंदर लेकर दरवाजा बंद किया.

जॉन और अँजेनी ड्रॉईंगरूममें बैठे हूए थे.

” पोस्टमार्टमके रिपोर्टके अनुसार … सानीको पिस्तौल की गोली सिनेमें बाई तरफ एकदम हार्टके बिचोबिच लगी… इसलिये वह गोल जो दिवारपर निकाला था वह उसने निकालनेका कोई सवालही पैदा नही होता” जॉनने अपना तर्क प्रस्तूत किया.

” मतलब वह आकार जरुर खुनीनेही निकाला होगा” अँजेनीने कहा.

थोडा सोचकर वह आगे बोली , ” लेकिन गोल निकालकर उसे क्या जताना होगा? “”

” वही तो… सबसे बडा सवाल अब हमारे सामने है”” जॉनने कहा.

” अगर इस तरह से और कोई खुन इससे पहले हूवा है क्या यह अगर देखा तो?” अँजेनीने अपना विचार व्यक्त किया.

” वह हम सब पहलेही देख चूके है… पिछले रेकॉर्डमें इस तरह का एकभी खुन मौजूद नही है”” जॉनने कहा.

इतनेमे जॉनका मोबाईल बजा. उसने बटन दबाकर वह कानको लगाया, “यस …सॅम”

जॉनने उधरसे सॅमको सुना और वह एकदम उठकर खडा होगया, ” क्या?”

अँजेनी क्या हूवा यह समझनेकी कोशीश करती हूई आश्चर्यसे उसके तरफ देखने लगी.

” मुझे जाना पडेगा ” जॉनने कहा और दरवाजेकी तरफ जानेको निकला.

जॉनने मोबाईल बंद कर अपने जेबमें रखा.

जाते जाते अँजेनीको उसने सिर्फ इतनाही कहा , “मै तुझे बादमे मिलता हूँ … मुझे अब जल्दसे जल्द वहाँ पहूँचना पडेगा.

अँजेनी कुछ बोले इसके पहले जॉन जा चूका था.

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भाग-8 => और एक ? … (शून्य-उपन्यास)-

जॉनकी गाडी एक भीड भाड वाले रस्ते से दौडने लगी. बादमें इधर उधर मुडते हूए वह गाडी एक पॉश बस्तीमें एक अपार्टमेंटके पास आकर रुकी. जॉन वहा पहूचनके पहले ही वहां पुलिस की टीम आकर पहूँची थी. इस बार पुलिस के अलावा वहां मिडीयाकी उपस्थीतीभी थी. भीडकी वजहसे रस्ता ब्लॉक होनेको आया था. जैसेही जॉनने गाडी पार्क की और वह गाडीसे बाहर आगया मिडीयावालोने उसे घेर लिया. भलेही वह एक प्राईव्हेट गाडीसे आया था और युनिफॉर्ममें नही था फिरभी पता नही मिडीयावालोंको वह इस केससे सबंधीत होनेकी भनक कैसे लगी थी?

“‘मि. जॉन वुई वुड लाईक टू हिअर यूअर कमेंट ऑन द केस प्लीज ‘” कोई उसके सामने कॅमेरा और माईक्रोफोन लेकर आया.

“‘प्लीज बाजू हटो …. मुझे अंदर जाने दो … पहले मुझे इन्व्हेस्टीगेशन पूरा करने दो … उसके बादही मै अपनी कमेंट दे पाऊंगा “‘ जॉन भीडमेंसे बाहर निकलने की कोशीश करते हूए बोला.

फिरभी वहांसे कोई हटनेके लिए तैयार नही था. बडी मुश्कीलसे उस भिडसे रस्ता निकालते हूए जॉन अपार्टमेंटकी तरफ जाने लगा. दुसरे कुछ पुलिस उसे जानेके लिए जगह बनानेके लिए उसकी मदत करने लगे.

जॉन लिफ्टसे अपार्टमेंटके दसवे मालेपर पहूँच गया. सामनेही एक फ्लॅटके सामने पुलिसकी भीड थी. जॉन फ्लॅटमें घुसतेही उसके सामने सॅम आया.

“सर, इधर ” सॅम जॉनको बेडरूमकी तरफ ले गया.

बेडरूममे खुनसे लथपथ एक स्त्री का शव पडा हूवा था और सामने दिवारपर फिरसे खुनसे एक बडासा गोल निकाला हुवा था. इस बार उस गोलके अंदर खुनसे 0+6=6 और 0x6=0 ऐसा लिखा हूवा था. जॉन सामने जाकर दिवारकी तरफ गौरसे देखने लगा.

” कौन औरत है यह?”” जॉनने सॅमको पुछा.

” हुयाना फिलीकिन्स … कोई टी व्ही आर्टीस्ट है ‘” सॅमने कहा.

” यहाँ क्या अकेली रह रही थी?” जॉनने पुछा.

‘” हाँ सर, … पडोसीयोंका तो यही कहना है … उनके अनुसार बिच बिचमें कोई आता था उसे मिलने… लेकिन हरबार वह कोई अलग ही शख्स रहता था. ‘” सॅमने उसे मिले जानकारी का सारांश बयान किया.

” खुनीने दिवारपर 0+6=6 और 0x6=0 ऐसा लिखा है … इससे कमसे कम इतना तो पता चलता है की वह गोल यानी की शुन्यही है .. लेकिन 0+6=6 और 0x6=0 इसका क्या मतलब? … कही वह हमे गुमराह करनेकी कोशीश तो नही कर रहा है?” जॉनने अपना तर्क प्रस्तुत किया.

‘” अॅडीटीव्ह आयडेंटीटी प्रॉपर्टी और झीरो मल्टीप्लीकेशन प्रॉपर्टी … गणितमें पढाया हूवा थोडा थोडा याद आ रहा है……” सॅम ने कहा.

“‘ वह सब ठीक है … लेकिन उस खुनीको क्या कहना है यह तो पता चले?” जॉनने जैसे खुदसेही पुछ लिया.

दोनो सोचने लगे. उस सवाल का जवाब दोनोंके पास नही था.

‘”बाकीके कमरे देखे क्या?'” जॉनने पुछा.

“‘ हां, तलाशी जारी है”” सॅम ने कहा.

फोटोग्राफर फोटो ले रहे थे. फिंगर प्रिन्ट एक्सपर्ट कुछ हाथके, उंगलीयोंके निशान मिलते है क्या यह ढूढ रहे थे.

” मोटीव्ह के बारेमें कुछ ?'” जॉनने बेडरूमसे बाहर आते हूए सॅमसे पुछा.

‘” नही सर … लेकिन इतना जरुर है की पहला खुन जिसने किया था उसनेही यह खुनभी किया होगा.” सॅम अपना अंदाजा बयान कर रहा था.

‘” हां … बराबर है … यह कोई सिरियल किलरकाही मसला लग रहा है “” जॉनने सॅमका समर्थन करते हूए कहा.

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भाग-9-अ => पहली गलती ? … (शून्य-उपन्यास)-

कमांड1 और कमांड2 कुर्सीपर सुस्ता रहे थे. बॉसने उनको जो काम सौंपा था वह उन्होने अच्छी तरह से निभाया था. इसलिए वे खुश लग रहे थे. उनकी पुरी रात दौडधूपमें गई थी. बैठे बैठे कमांड1को निंदभी आ रही थी. उसके सामने रातका एक एक वाक्या किसी चलचित्रकी तरह आ रहा था…

… रातके 3-3.15 बजे होगे. बाहर कडाके की ठंड थी. इधर उधर देखते हूए बडी सावधानीसे कमांड1 और कमांड2 एक अपार्टमेंटमें घुस गए. आपर्टमेंटमें सब तरफ एक तरह की डरावना सन्नाटा फैला हूवा था. वहा जो भी सेक्यूरीटी तैनात थी, उसका उन्होने पहलेसेही बंदोबस्त करके रखा था. तोभी वे बडी सावधानी बरतते हूए, अपने कदमोंका आवाज ना हो इसका खयाल रखते हूए लिफ्टके पास गए. चारो तरफ अपनी पैनी नजर दौडाते हूए कमांड1ने धीरेसे लिफ्टका बटन दबाया. लिफ्ट खुलतेही आजूबाजू देखते हूए कमांड1 और कमांड2 दोनो लिफ्टमें घुस गए. दोनोंने हाथमें सफेद सॉक्स पहने हूए थे. अपना चेहरा किसीकोभी दिखना नही चाहिए इसलिए उन्होने अपने पहने हूए ओव्हरकोटकी कॉलर खडी की थी. लिफ्टका दरवाजा बंद हूवा कमांड1ने सामने जाकर लिफ्टका बटन दबाया, जिसपर लिखा हूवा था -10.

लिफ्ट दसवे मालेपर आकर रुकी. लिफ्ट का दरवाजा अपने आप खुला. कमांड1 और कमांड2 फिरसे इधर उधर देखते हूए धीरेसे बाहर आ गए. कोई देख नही रहा है इसकी तसल्ली कर वे पॅसेजमें चलने लगे. उनके जूते के तलवेमे मुलायम रबर लगाया होता, क्योंकी वे भलेही तेजीसे चल रहे थे लेकीन उनके जुतोंका बिलकुल आवाज नही आ रहा था. वे 103 नंबरके फ्लॅटके सामने आकर रुके. फिरसे दोनोंने अपनी नजर आजूबाजू दौडाई, कोई नही था. अपने ओव्हरकोटके जेबसे कुछ निकालकर कमांड1ने सामने दरवाजे के की होलमे डालकर घुमाया. बस दो तिन झटके देकर घुमाया और दरवाजेके हॅडलको हलकासा झटका देकर निचे दबाया, दरवाजा खुल गया. दोनोंके चेहरे खुशीसे खिल गए. अंदर घना अंधेरा था.

दोनो धीरेसे फ्लॅटके अंदर घुस गए. उन्होने अपने हाथके सॉक्स निकालकर अपने ओव्हरकोटके जेबमें रख दिए. सॉक्सके अंदर उनके हाथमें रबरके हॅन्डग्लोव्हज पहने हूए थे. उन्होने धीरेसे आवाज ना हो इसकी खबरदारी लेते हूए दरवाजा अंदरसे बंद कर लिया.

हॉलमे अंधेरेमें कमांड1 और कमांड2 जैसे छटपटा रहे थे. अंधेरेमें उन्होने बेडरूमकी तरफ जानेवाले रस्तेका अंदाजा लगाया और वे उस दिशामें चलने लगे. अचानक कमांड1 बिचमें रखे हूए टी पॉयसे टकराया गिरते गिरते उसने बाजूमें रखे एक चिजको पकड लिया और खुदको गिरनेसे बचाया. कमांड2नेभी उसे गिरनेसे बचानेके लिए सहारा दिया. वो गिरनेसे तो बच गया लेकिन दुर्भाग्यसे बगलमें रखे एक गोल कांच के पेपर वेटको उसका धक्का लगा, जिसकी वजहसे वह पेपरवेट लुढकने लगा. कमांड1ने पेपरवेटको बडी चपलतासे पकड लिया और फिरसे उसकी पहली जगहपर रख दिया.

” अरे यार लायटर लगा … साला यहां कुछभी नही दिख रहा है….” कमांड1 दबे स्वरमें लेकिन चिढकर बोला.

कमांड2ने अपने जेबसे लायटर निकालकर जलाया. अब धुंदले प्रकाशमें थोडाबहुत दिखने लगा था. उनके सामनेही एक खुला हुवा दरवाजा था.

बेडरूम इधरही होना चाहिए…..

कमांड1ने सोचा. कमांड1 धीरे धीरे उस दरवाजेकी तरफ बढने लगा. उसके पिछे पिछे कमांड2 चल रहा था. दरवाजेसे अंदर जानेके बाद अंदर उनको बेडपर लिटी हुई कोई आकृती दिखाई दी. कमांड1ने मुंहपर उंगली रख कमांड2को बिलकुल आवाज ना करने की हिदायत दी. कमांड1ने अंधेरेमें टटोलकर बेडरूमका बल्ब जलाया. जो भी कोई लेटा हुवा था शायद घोडे बेचकर सो रहा था, क्योंकी उसके शरीरमें कुछ भी हरकत नही थी. कौन होगा यह जाननेके लिए कोई रास्ता नही था क्योंकी उसने अपने सरको चादरसे ढक लिया था. कमांड1 ने अपने ओवरकोटकी जेबसे बंदूक निकाली. सोये हूए आकृतीपर उसने वह बंदूक तानकर उसके चेहरेपरसे चादर हटाई. वह एक सुंदर स्त्री थी. वह शायद वही थी जो उनको चाहिए थी क्योंकी एक पलकाभी अवकाश ना लेते हूए कमांड1 ने सायलेंसर लगाई बंदुकसे उसपर गोलीयोंकी बौछार कर दी. उसके शरीर में हरकत हूई, लेकीन वह सिर्फ मरनेके पहलेकी छटपटाहट थी. फिरसे उसका शरीर ढीला होकर एक तरफ लूढक गया. निंदसे जगनेकीभी मोहलत कमांड1ने उसको नही दी थी. वह खुनसे लथपथ निश्चल अवस्थामें मरी हूई पडी थी.

” ए, तेरे पासका खंजर देना जरा” कमांड1 कमांड2को फरमान दिया.

अबतक का उसका दबा स्वर एकदम कडा हो गया था. कमांड2 ने उसके ओवरकोटके जेबसे चाकू निकालकर कमांड1के हाथमें दिया. कमांड1 वह खंजर मुर्देके खुनसे भिगोकर दिवारपर लिखने लगा.

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भाग-9-ब => पहली गलती ? … (शून्य-उपन्यास)-

लिखना होनेके बाद कमांड1 वहा बगलमेंही रखे हूए फोनके पास गया. ओवरकोटके दाएँ जेबसे उसने एक उपकरण निकाला, फोन नंबर डायल किया और उस उपकरणसे वह फोनके माऊथपीसमें बोलने लगा, ” … और एक शख्स …हयूयाना फिलीकींन्स …शून्यमे समा गया है …”

उधरसे कुछ आवाज आनेसे पहलेही उसने फोन रख दिया. शायद उसने पुलिस स्टेशनको फोन लगाया था. फोन रखनेके बाद अचानक कमांड1का खयाल उसके हाथ की तरफ गया.

” माय गॉड!” उसके मुंह से आश्चर्ययुक्त डरसे निकल गया.

” क्या हूवा ?” कमांड2 कमांड1के हाथकी तरफ देखकर बोला.

क्या गडबड हूई यह अब कमांड2केभी खयालमें आया था. कमांड1के दाए हाथका रबरसे बना हूवा हॅन्डग्लोव्ह फट गया था. खुनके पहले जब वह हॉलमे किसी चिजसे टकराया था तब शायद वह कहीं अटकर फट गया होगा.

“” मेरे हाथके और उंगलियोंके निशान अब सब तरफ लगे होगे… हमें अब यहांसे जानेसे पहले सब निशान मिटाना जरुरी है…” कमांड1 अपने जेबसे रुमाल निकालते हूए बोला.

” जादा नही होंगे … हम पुलिस आनेसे पहले झटसे साफ कर सकते है ‘” कमांड2भी अपने जेबसे रुमाल निकालते हूए बोला.

दोनो रुमालसे कमरेंमे सब जगह, लाईटका स्वीच, बेडका किनारा , बगलमें रखा टेबल सब जल्दी जल्दी साफ करने लगे.

बेडरूममें कहीभी उसके हाथके निशान नही बचे होगे इसकी तसल्ली करके वे हॉलमे चले गए. वहा उन्होने टी पॉय, दरवाजेका हॅन्डल, निचेका फर्श , जहां जहां हाथ लगनेकी गुंजाईश थी वे सब कपडेसे साफ किया. अचानक उन्हे पुलिसकी गाडीका सायरन सुनाई देने लगा. दोनोने तेजीसे एकबार बेडरुममें जाकर इधर उधर नजर दौडाकर कुछ बचातो नही इसकी तसल्ली की. जैसे पुलिस की गाडीका आवाज नजदिक आने लगा वे दौडतेही सामने दरवाजेके पास गए. सावधानीसे, धीरेसे दरवाजा खोलकर वे बाहरकी गतिविधीयोंका अंदाजा लेते हूए वहासे रफु चक्कर हो गए.

…. अचानक कमांड1 अपनी विचारोंकी दुनियासे जागते हूए कुर्सीसे खडा हो गया.

” क्या हूवा ?” कमांड2 ने पुछा.

” गफल्लत हो गई साली … एक बहुत बडी गलती हो गई” कमांड1ने कहा.

कमांड1का नशा पुरी तरह उतरा हूवा था.

” गलती … कैसी गलती? कमांड2 ने पुछा.

कमांड1के चेहरेके भाव देखकर कमांड2काभी नशा उतरने लगा था.

” मेरी उंगलीयोंके निशान अभीभी वहां बाकी रह गए है ” कमांड1ने कहा.

” हमनेतो सब जगहकी निशानिया मिटाई थी” कमांड2ने कहा.

” नही … एक जगह साफ करनेका हम भूल गए” कमांड1ने कहा.

” कहां ?” कमांड2ने पुछा.

अबतक कमांड2भी उठकर खडा हूवा था.

“” तुझे याद होगा की … जब मै हॉलमें किसी चीजसे टकराकर गिरनेवाला था … तब वहां टी पॉयपर रखे एक कांचके पेपरवेटको मेरा धक्का लगा था … और वह लुढकते हूए गिरने लगा था… .” कमांड1 बोल रहा था. .

कमांड2 कमांड1की तरफ चिंता भरी नजरोंसे देख रहा था.

” आवाज ना हो इसलिए मैने वह पेपरवेट उठाकर फिरसे उसकी पहली जगह पर रखा था…'” कमांड1ने कहा.

” माय गॉड … उसपर तेरे उंगलीके निशान मिटाने तो रह ही गए ”

कमांड1 गहन सोच मे डूब गया.

” अब क्या करना है ?” कमांड2 ने पुछा.

कमांड1 कुछ बोलनेके मनस्थीतीमें नही था. वह खिडकीके पास जाकर सोचमें डूबा खिडकीके बाहर देखने लगा. कमांड2को क्या करें और क्या बोले कुछ समझ नही रहा था. वह सिर्फ कमांड1की गतिविधीयाँ निहारने लगा. कमांड1 फिरसे खिडकीके पाससे वे दोनो जहां बैठे हूए थे वहां वापस आगया. उसने सामने रखा हूवा व्हिस्कीका ग्लास फिरसे भरा और एकही घूंटमे पुरा ग्लास खाली कर दिया. फिरसे कमांड1 खिडकीके पास गया और अपनी सोचमें डूब गया.

” कुछ ना कुछ तो होगा जो हम कर सकते है” कमांड2 कमांड1को दिलासा देनेकी कोशीश कर रहा था.

कमांड1 कुछ समय के लिए स्तब्ध खडा रहा और अचानक कुछ सुझे जैसा चिल्लाया,

” यस्स ऽऽ”

” क्या कुछ रास्ता मिला ?” कमांड2 खुशीसे पुछा.

लेकिन कमांड1 कहां वह सब कहनेके मनस्थितीमें था? उसने कमांड2को इशारा किया,

” चल जल्दी … चल मेरेसाथ चल”

कमांड1 दरवाजेसे बाहर गया और कमांड2 उसके पिछे पिछे असमंजसा चलने लगा.

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भाग-10 => माय गॉड …(शून्य-उपन्यास)-

हयूयानाके शवके आसपास इनव्हेस्टीगेशन कर रहे टेक्नीकल लोगोंकी भीड हूई थी. उनको दिक्कत ना हो इसलिए जॉन और सॅम बेडरूमसे बाहर चले गए. बाहर हॉलमेंभी जॉनके कुछ और साथी थे. उनमेंसे डॅन बाकी कमरोंमे कुछ मिलता है क्या यह ढूंढ रहा था. इतनेमें डॅनका व्हायब्रेशन मोडमें रखा हूवा मोबाईल व्हायब्रेट हूवा डॅनने फोन निकालकर नंबर देखा. नंबर तो पहचानका नही लग रहा था. डॅनने मोबाईल बंद कर जेबमे रखा और फिर अपने काम मे व्यस्त हूवा.

थोडी देरमें डॅनके फोनपर एस. एम. एस. आया. एस. एम. एस. उसी फोन नंबरसे आया था. उसने मेसेज खोलकर देखा-

‘डॅन फोन उठावो … वह तुम्हारे लिए बहुत फायदेका सौदा रहेगा.’

डॅन सोचमें पड गया. ऐसा किसका एस. एम. एस. हो सकता है? फायदा यानी किस फायदेके बारेंमे वह बात कर रहा होगा? अपने दिमागपर जोर देकर डॅन वह नंबर किसका होगा यह याद करनेकी कोशीश करने लगा. शायद नंबर अपने डायरीमें होगा यह सोचकर उसने डायरी निकालनेके लिए जेबमें हाथ डालाही था की डॅनका मोबाईल फिरसे व्हायब्रेट होगया. वही नंबर था. डॅनने मोबाईलका बटण दबाकर मोबाईल कानको लगाया.

उधरसे आवाज आई-

” मै जानता हू अब तुम कहा हो .. हयूयाना फिलीकींन्सके फ्लॅटमें … जल्दीसे कोई सुनेगा नही , कोई देखेगा नही ऐसे जगहपर जावो… मुझे तुमसे बहुत महत्वपुर्ण बात करनी है ”

जॉन और अँजेनी हॉलमें बैठे थे.

” इस दोनो खुनसे मै कुछ नतिजे तक पहूंचा हूं…” जॉन अँजेनीको बताने लगा.

“‘कौनसे?” अँजेनीने पुछा.

” पहली बात… यह की यह खुनी .. इंटेलेक्च्यूअल्स इस कॅटेगिरीमे आना चाहिए'” जॉनने कहा.

” मतलब?” अँजेनीने पुछा

” मतलब प्रोफेसर , वैज्ञानिक, मॅथेमॅटेशियन … या ऐसाही कोई उसका प्रोफेशन होना चाहिए'” जॉनने अपना तर्क बताया.

” कैसे क्या?”‘ अँजेनीने पुछा.

” उसके शून्यसे रहे लगावसे ऐसा लगता है… लेकिन 0+6=6 और 0x6 =0 ऐसा लिखकर उसे क्या सुझाना होगा?” जॉनने जैसे खुदसेही पुछा.

” ऐसा हो सकता है की उसे सब मिलाकर 6 खुन करने होंगे” अँजेनीने अपना कयास बताया.

“‘ हां हो सकता है” जॉन सोचमें डूबा उसकी तरफ देखते हूए बोला.

जॉनने मौकाए वारदात पर निकाले कुछ फोटो अँजेनीके पास दिए.

” देखो इस फोटोंसे कुछ खास तुम्हारे नजरमें आता है क्या?”” जॉनने कहा.

” एक बात मेरे ध्यानमें आ रही है …” जॉनने कहा.

” कौनसी?” फोटोकी तरफ ध्यानसे देखते हूए अँजेनीने पुछा.

” की दोनोभी खून अपार्टमेंटके दसवे मालेपरही हूए है …” जॉनने कहा.

अँजेनीने फोटो देखते हूए जॉनकी तरफ देखते हूए कहा, ‘” अरे हां… तुम बराबर कहते हो … यह तो मेरे ध्यानमेंही नही आया था””

अँजेनी फिरसे फोटो देखनेमें व्यस्त हूई. जॉन उसके चेहरेके हावभाव निहारने लगा. अचानक अँजेनीके चेहरेपर आश्चर्यके भाव आ गए.

‘” जॉन यह देखो …” अँजेनी दो तस्वीरें जॉनके हाथमें पकडाते हूए बोली.

जॉनने वे दोनो तस्वीरे देखी और अनायास ही उसके मुंह से निकल गया,”

‘” माय गॉड…”

जॉन उठकर खडा हो गया था.

=========== क्रमश::………..

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‘शून्य’ – (Shunya) सस्पेंस थ्रिलर उपन्यास – हिन्दी में !!

kmsraj51 की कलम से …..

‘शून्य’
Real Art

प्रिय मित्रों,,

आज मैं आप सब के लिए हिंदी उपन्यास ‘शून्य’ – (Shunya) सस्पेंस थ्रिलर उपन्यास …..
लेकर आया हूँ,,,,,

“‘शून्य’ – (Shunya) Suspense Thriller Complete Novel in Hindi”

भाग-1 => हैप्पी गो अनलकी (शून्य-उपन्यास)-

हिमालय की वह उंचे पर्वतोंकी श्रुंखला और पर्वतोंपर लहराते हूए, आसमानमें बादलोंसे बातें करते हूए उंचे पेढ. आगे बर्फ से ढंकी हूई पर्वतोंकी ढलान चमक रही थी. उस चमकती ढलानसे लगकर कहीं दूरसे किसी सांप की तरह बल खाती हूई एक नदी गुजर रही थी. शुभ्र और अमृत की तरह निर्मल उस नदीका पाणी बहते हूए आसमंतमें जैसे एक मधूर धुन बिखेरता हूवा जा रहा था.

उंचे उंचे पेढ की सरसराहट , पंछींयोंकी चहचहाट, बहते नदी की मधूर धुन. इन कुदरती बातोंसे कौनसा युग चल रहा होगा यह बताना लगभग नामुमकीन. हजारो, लाखो सालोंसे चल रहे इन कुदरती करिश्मों में अगर मानवी उत्थान का प्रतीक समझे जाने वाली बातोंकी उपस्थीती ना हो तो पुराना युग क्या? और आधुनिक युग क्या? … दोनो एक समान. ऐसी इस जगह पर्वत की गोदमें नदीके किनारे एक पुरानी गुंफा थी. उस गुंफा के आस पास उंची हरी हरी घास हवा के साथ लहरा रही थी. गुंफामे एक ऋषी ध्यानस्थ बैठा हूवा था. सरपर बढी हूई जटायें, दाढी मुंछ बढ बढकर थकी हूई. न जाने कितने सालसे तप कर रहे ऋषी के चेहरेपर एक तेज, एक गांभीर्य झलक रहा था. आसपासके वातावरण से अनजान , या यूं कहीए वक्त, जगह और अपने शरीर से अनजान उनकी सुक्ष्म अस्तीत्वका विचर युगो युगोतक चल रहा होगा. अनादि, अनंत, सनातन कालसे विचर करते हूए उस ऋषीकी सुक्ष्म अहसास ने इस आधुनिक युग में प्रवेश किया …

अमेरिकाके एक शहरमें एक रस्ते के फुटपाथपर शामके समय लोग अपनी आधूनिकता की शानमें अपने ही धुनमें चले जा रहे थे. रस्तेपर आलिशान गाडीयाँ दौड रही थी. लोग अपने आपमे ही इतने व्यस्त और मशगुल थे की उन्हे दुसरों की तरफ ध्यान देने की बिलकुल फुरसत नही थी. सब कैसे अनुशाशीत ढंग से एक स्वयंचलित यंत्र की तरह चल रहा था. चलते हूए सबकी नजर कैसी अपनी नाक की दिशा में सिधी थी. हो सकता है उन्हे इधर उधर देखते हूए चलना भी अपने शिष्टाचार के खिलाफ लगता होगा. ऐसेही लोगोंकी भिडमें चलती हूई एक बाईस तेईस साल की सुंदरी अँजेनी अपने हाथमें शॉपींग बॅग लिये एक दुकान मे जानेके लिये मुडी. चलते हूए एक हाथसे बडी खुबसुरतीसे वह बिच बिचमें अपने चेहरे पर आती लटोंको पिछे की ओर हटा रही थी. उसकी लबालब भरे शॉपिंग बॅगसे लग रहा था की उसकी खरीदारी लगभग पुरी हो गयी होगी, बस कुछ दो-एक चिजें रह गई होगी. अचानक एक पुलिस व्हन सायरन बजाती हूई रास्ते से गुजरने लगी. लोगोंका अनुशाशन जैसे भंग हो गया. अँजेनी दुकानमें जाते हूए रुक गई और मुडकर क्या हूवा यह देखने लगी. कोई चलते चलते रुककर, तो कोई चलते चलते मुडकर क्या हूवा यह देखने लगे. न जाने कितने दिनोंके बाद कुछ लोगोंके भावहिन चेहरे पर डर के भाव उमटने लगे थे. कुछ लोग तो चेहरे पर बिना कुछ भाव लाए उस व्हन की तरफ देखने लगे. शायद चेहरेपर कुछ भाव जताना भी उनको नागवार लगता होगा. पुलिस व्हन आई उसी गतीमें गुजर गई. रस्ता थोडी देर तक जैसे पाणी में पत्थर गिरने से निकलने वाले तरंग की तरह विचलित हूवा और फिर थोडी देरमें पुर्ववत हुवा. जैसे कुछ हूवा ही ना हो. अँजेनी फिरसे मुडकर दुकानमें जाने लगी. उसे क्या मालूम था? की अभी अभी जो व्हॅन रस्ते से गुजर गई उसका उसके जिंदगी से भी कुछ सरोकार होगा.

पुलिस व्हॅन एक साफ सुधरी कोलोनीमें एक अपार्टमेंट के निचे रुक गई. बस्तीमें एक अजीब सन्नाटा छाया हूवा था. पुलिस व्हॅनसे तप्तरताके साथ पुलिस ऑफीसर जॉन और उसकी टीम उतर गई. जो लोग अपार्टमेंटके बाल्कनीमें बैठकर सुस्ता रहे थे वह अचंभेसे निचे पुलिस व्हॅनकी तरफ देखने लगे. उतरते ही जॉन और उसकी टीम अपार्टमेंट की लिफ्ट की तरफ दौड गई. ड्रायव्हरने व्हॅन अंदर ले जाकर पार्किंग लॉटमें पार्क की. जॉन और उसके सहकारीयोंने लिफ्टके पास आकर देखा तो लिफ्ट जगह पर नही थी. जॉनने लिफ्टका बटन दबाया. बहुत देर से राह देखकरभी लिफ्ट निचे नही आ रही थी.
” शिट” चिढे हूए जॉनके मुंह से निकल गया.
अधिरतासे जॉन बार बार लिफ्टका बटन दबाने लगा. थोडी देरमें लिफ्ट निचे आ गई. जॉनने लिफ्टका बटन फिरसे दबाया. लिफ्टका दरवाजा खुल गया. अंदर काला टी शर्ट पहना हूवा एकही आदमी था. उस हालातमें भी उसके टी शर्टपर लिखे अक्षरोंने जॉन का ध्यान आकर्षित किया. उस काले टी शर्टपर सफेद अक्षरोंसे लिखा हुवा था –
‘ झीरो’.
वह आदमी बाहर आतेही जॉन और उसके साथीदार लिफ्टमें घुस गए. लिफ्टमें जातेही जॉनने 10 नं. फ्लोअरका बटन दबाया. लिफ्ट बंद होकर उपरकी तरफ दौडने लगी.

10 नं. फ्लोअरपर लिफ्ट रुक गई. जॉनके साथ सब लोग बाहर आ गए. उन्होने देखा की उनके सामने ही एक फ्लॅटका दरवाजा पुरा खुला हूवा था. सब लोग उस खुले फ्लॅटकी तरफ दौड पडे. वे सब लोग एक दुसरे को कव्हर करते हूए धीरे धीरे फ्लॅटके अंदर जाने लगे. हॉलमें कोई नही था. जॉन और उसके और दो साथीदार बेडरुमकी तरफ जाने लगे. बचे हूए कुछ किचनमें, स्टडी रुममें और बाकी कमरे देखने लगे. किचन और स्टडी रुम खालीही थी. जॉनको बेडरूममें जाते वक्त ही अंदर सब सामान बिखरा हूवा दीख गया. उसने अपने साथीदारको इशारा किया. जॉन और उसके दो साथीदार सतर्तकासे धीरे धीरे बेडरुममें जाने लगे. वे एक दुसरेको कव्हर करते हूए अंदर जातेही उनको सामने बेडरुममे एक भयानक दृष्य दिखाई दिया. एक खुन से लथपथ आदमी बेडपर लिटा हूवा था. उसके शरीर में कुछ हरकत नही दिख रही थी. या तो वह मर गया था या फिर बेहोश हो गया होगा. जॉनने सामने जाकर उसकी नब्ज टटोली. वह तो कबका मर चुका था.
” इधर है … इधर”
जॉनके साथ आया एक साथीदार चिल्लाया.
अब जॉनके पिछे उसके बाकी साथीदार भी अंदर आगए. जॉनने आजुबाजू अपनी मुआयना करती हूई नजर दौडाई. अचानक उसका ध्यान जिस दिवार को बेड सटकर लगा हूवा था उस दिवार ने आकर्षीत किया. दिवार पर खुन की छींटे उड गई थी या खुन से कुछ लिखा हूवा था. जॉनने गौर करकर देखा तो वह खुनसे कुछ लिखा हूवाही प्रतित हो रहा था क्योकी दिवारपर खुनसे एक गोल निकाला हूवा था.
गोल… गोल का क्या मतलब होगा…
जॉन सोचने लगा.
और वह खुन उस मरे हूए आदमी का है या और किसीका?…
वह गोल खुनी ने निकाला होगा या फिर जो मर गया उसने मरनेसे पहले वह निकाला होगा?
” यू पिपल कॅरी ऑन ”
जॉनने अपने टीमको उनकी इन्वेस्टीगेशन प्रोसीजर शुरु करने को कहा.
उसके साथीदार अपने अपने काममें व्यस्त हो गए. जॉनने अपनी पैनी नजर एकबार फिरसे बेडरुमकी सब चिजे निहारते हूए दौडाई. बेडरुममें कोनेमें एक टेबल रखा हूवा था. टेबलपर एक तस्वीर थी. तस्वीरके बाजुमें कुछ खत और लिफाफ़े पडे हूए थे. जॉन ने एक लिफाफ़ा उठाया. उसपर लिखा हूवा था-
”प्रति – सानी कार्टर’.
इसका मतलब जो मर गया था उसका नाम सानी कार्टर था और वह सब खत उसे पोस्टसे आये हूए थे. जॉन बाकी लिफाफ़े और खत उठाकर देखने लगा. वे खत छानते हूए जॉन खिडकीके पास गया. उसने खिडकीसे बाहर झांककर देखा. बाहर बडा खुबसुरत दृष्य था – एक गोल नयनरम्य तालाब का. उस तालाब को हरी हरी हरीयालीने घेर रखा था. वह दृष्य देखकर जॉन कुछ पलोंके लिये अपने आसपासके मौहोल को भूल सा गया. तालाब की तरफ देखते देखते तालाब के आकारने उसे अपने आसपासके मौहोलसे फिरसे जोड दिया. क्योंकी तालाब का आकार लगभग गोलही था. जॉन फिरसे सोचने लगा-
” दिवारपर… गोलसा क्या निकाला होगा?”
अचानक जॉनके दिमाग मे एक विचार चौंध गया..
” गोल यानी ‘झीरो’ तो नही होगा… हां गोल यानी जरुर ‘झीरो’ ही होगा”
जॉन ने आवाज दिया ” सॅम और तू डॅन “‘
” यस सर” सॅम और डॅन तत्परतासे आगे आते हूए बोले.
” हम जब निचे लिफ्टमें चढे… तब हमें एक काले टी शर्टवाला आदमी दिखाई दिया…और उसके टी शर्टपर ”झीरो” ऐसा लिखा हूवा था… तुमने देखाना?” जॉनने पुछा.
” हां सर…मुझे उसका चेहरा भी याद है” सॅमने कहा.
” हां सर…मुझेभी याद है” डॅन ने कहा.
” गुड … अब तेजीसे निचे जावो और देखो वह निचे मिलता है क्या? … जल्दी जावो … वह अबभी जादा दुरतक नही गया होगा.”
जॉनके साथीदार सॅम और डॅन लगभग दौडते हूए ही निकल गए.

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भाग-2 => आसमान गिर पड़ा (शून्य-उपन्यास)-

जब अँजेनीने अपनी कार अपार्टमेंटमें पार्किंगके लिए घुमाई उसे वहाँ वह शापींग करते वक्त रस्ते में दिखी पुलिस व्हॅन दिखाई दी. उसका दिल जोर जोर से धडकने लगा. क्या हूवा होगा? वह कार से उतरकर अपना शॉपींग किया हूवा सामान लेकर जल्दी जल्दी लिफ्ट की तरफ चल पडी. जब वह वहाँ पहूँची, लिफ्टका दरवाजा खुला और अंदरसे दो पुलिसके लोग बाहर आ गए. पुलीसको देखकर उसका दिल औरही बैठसा गया. उसने झटसे लिफ्टमें जाकर लिफ्टका बटन दबाया जिसपर 10 यह नंबर लिखा हूवा था.
लिफ्टसे बाहर आतेही जब अँजेनीने अपने खुले फ्लॅटके सामने लोगोंकी भीड देखी उसकेतो हाथ पांव कापने लगे. उसके हाथसे शॉपींगका सारा सामान निचे गीर पडा. वैसेही वह उस भीडकी तरफ दौड पडी.
” क्या हूवा?” उसने अंदर जाते हूवे वहाँ जमा हूई भीडको पुंछा. सब लोग गंभीर मुद्रामें सिर्फ उसकी तरफ देखने लगे. किसीकी उसको कुछ बताने की हिम्मत नही बनी. वह फ्लॅटके अंदर चली गई. सब पुलीसवालोंका बेडरुमकी तरफ रुख देखकर वह बेडरुमकी तरफ चली गई.
जाते जाते फीरसे उसने एक पुलीसवालेको पुछा, ” क्या हूवा?”
वह उससे आँखे ना मिलाते हूवे गंभीरतासे सिर्फ बेडरुमकी तरफ देखने लगा.
वह जल्दीसे बेडरुमके अंदर चली गई. सामनेका दृष्य देखकर जैसे अब उसकी बचीकुची जान निकल गई थी. उसके सामने उसके पती का खुनसे लथपथ शव पडा हूवा था. उसे अब सारा कमरा घुमता हूवा नजर आने लगा और वह अपना होशोहवास खोकर निचे गीर पडी. गिरते वक्त उसके मुंहसे निकल गया-
” सानी…”
उसकी वह हालत देखकर बगलमें खडा जॉन झटसे उसे सहारा देने के लिए सामने आया. उसने उसे हिलाकर उसे जगाने की कोशीश की. वह बेहोश हो गई थी. लेकिन जब जॉनने गौर किया की उसकी सांसभी शायद रुक चूकी थी, उसने बगलमें खडे अलेक्स को आदेश दिया ” कॉल द डॉक्टर इमीडीएटली … आय थींक शी हॅज गॉट अ ट्रिमेंडस शॉक”.
अलेक्स तत्परतासे बगलमें रखे फोनके पास जाकर फोन डायल करने लगा.
डॉक्टर के आने तक कुछ करना जरुरी था लेकिन जॉन को क्या करे कुछ सुझाई नही दे रहा था.
“सर शी नीड्स आर्टिफिशीअल ब्रीदिंग” किसीने सुझाव दिया.
फिर जॉन अपने मुंहसे उसके मुंहमे सांस भरने लगा और बिच बिचमे उसकी रुकी हूई धडकन शुरु होनेके लिए उसके सिनेपर जोर जोरसे दबाव देने लगा. दबाव देते हूए 101,102,103 गिनकर उसने फिरसे उसके मुंहमें हवा भरी और फिरसे 102,102,103 गिनकर उसके सिनेपर दबाव देने लगा. ऐसा दो-तीन बार करनेके बाद जॉनने अँजेनीकी सांस टटोली. लेकिन एक बार गई हूई उसकी सांस मानो लौटनेको तैयार नही थी. उसके सारे साथीदार उसके इर्द-गिर्द जमा हुए थे. उनको भी क्या करे कुछ समझ नही आ रहा था. डॉक्टरके आनेतक एक आखरी प्रयास सोचकर जॉनने फिरसे एकबार अँजेनीके मुंहमे हवा भरी और 101,102,103 गिनकर उसके सिनेपर दबाव देने लगा.
हॉस्पीटलमें अँजेनीको इंटेसीव केअर युनिट में रखा गया था. बाहर दरवाजे के पास जॉन और उसका एक साथीदार खडे थे. इतनेंमे आय.सी.यू का दरवाजा खुला और डॉक्टर बाहर आगए. जॉन वह क्या कहते है यह सुननेके लिए बेताब उनके सामने जाकर खडा होगया. डॉक्टरने अपने चेहरेसे हरा कपडा हटाते हूए कहा-
” शी इज आऊट ऑफ डेंजर …. नथींग टू वरी”
जॉनके जानमें जान आगई. इतनेमें जॉनके मोबाईलकी घंटी बजी. जॉनने मोबाईलके तरफ देखते हूए बटन दबाते हूए कहा-
” यस सॅम”
उधरसे आवाज आई ” सर , हमने उसे सब तरफ ढुंढा लेकिन वह हमें नही मिला.”
”नही मिला.?.. उसके जानेमें और हमारे ढुंढनेमें ऐसा कितना फासला था? ….वह वही कही आसपास होना चाहिए था. ” जॉनने कहा.
”सर… शायद उसने बादमें अपने कपडे बदले होगे.. क्योंकी हमने आसपासके सभी पुलीस स्टेशनमें उसका हूलिया और पहनावेके बारेंमे खबर कर दी थी…” उधरसे आवाज आई.
”अच्छा, अब एक काम करो…उसका स्केच बनानेके काममें जुड जावो… हमें उसे किसीभी हालमें पकडनाही होगा…” जॉनने अपना दृढ निश्चय जताते हूए आदेश दिया.
” यस सर …” उधर से आवाज आई.
जॉनने मोबाईल बंद किया और डॉक्टरसे कहा,” अच्छा अब हम निकलते है… टेक केअर ऑफ हर … और कोई मुसीबत या परेशानी हो तो हमें फोन करना ना भूलीएगा…”
”ओ.के…” डॉक्टरने कहां.
जानेसे पहले जॉनने अपने साथीदारसे कहा,” उसके रिश्तेदारके बारेमे मालूम करो…और उन्हे इन्फॉर्म करो…”
” यस सर” जॉनके साथीदारने कहा.
….क्रमश:…

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भाग-3 => वर्ल्ड अंडर अंडरवर्ल्ड (शून्य-उपन्यास)-

एक कोलनीमें एक छोटासा आकर्षक बंगला. बंगलेके बाहर एक कार आकर खडी हूई. कारसे उतरकर एक आदमी झटसे घरके कंपाऊंडमे घूस गया. कोई पच्चीसके आसपास उसकी उम्र होगी. उसने काला गॉगल पहन रखा था. अंदर जाते हूए आसपासके गार्डनपर अपनी नजरे दौडाते हूए वह दरवाजेके पास पहूंच गया. अपनी कारकी तरफ देखते हूए उसने दरवाजेकी बेल बजाई. दरवाजा खुलनेकी राह देखते हूए वह कोलनीके दुसरे घरोंकी तरफ देखने लगा. दरवाजा खुलने को बहुत समय लग रहा था इसलिए बंद दरवाजे के सामने वह चहलकदमी करने लगा. अंदरसे आहट सुनते ही वह दरवाजेके सामने अंदर जानेके लिए खडा होगया. दरवाजा खुला. सामने दरवाजेमें उसकाही हमउम्र एक आदमी खडा था. अंदरका आदमी दरवाजेसे हट गया और बाहरका आदमी बिना कुछ बोले अंदर चला गया. ना कुछ बातचीत ना भावोंका आदान प्रदान.

बाहरका आदमी अंदर जानेके बाद दरवाजा अंदरसे बंद हूवा. दोनोंकी रहन सहन, कद काठी, रंग इससे तो वे दोनो अमेरीकी मुलके नही लग रहे थे. दोनोही बिना कुछ बोले घर के तहखानेकी तरफ जाने लगे. घरके ढाचेसे ऐसा कतई प्रतित नही होता था की इस घरको कोई तहखाना होगा.

जो बाहरसे आया था उसने पुछा, ” बॉसका कोई मेसेज आया?”

” नही अभीतक तो नही … कब क्या करना है , बॉस सब महूरत देखकर करता है” दुसरेने कहा.

पहला मन ही मन मुस्कुराया और बोला,” कौन किस पागलपनमें उलझेगा कुछ बोल नही सकते ”

दूसरेने गंभिरतासे कहा ” कमांड2 तुझे अगर हमारे साथ काम करना है तो यह सब समझकर अपने आपमें ढालना जरुरी है… यहां सब बातें तोलमोलकर प्रिकॅलक्यूलेटेड ढंगसे की जाती है.””

कमांड2 कैसी प्रतिक्रिया व्यक्त करे ये ना समझते हूए सिर्फ कमांड1 की तरफ देखने लगा.

”कोईभी बात करनेसे पहले बॉसको उसके नतिजे की जानकारी पहलेसेही होती है.” कमांड1ने कहा.

अब वे चलते चलते अंधेरे तहखानेमें आ पहूचें. वहां तहखानेमें बिचोबिच टेबलपर एक कॉम्प्यूटर रखा हूवा था. दोनो काम्प्यूटरके सामने जाकर खडे हूए. कमांड1ने कॉम्प्यूटरके सामने कुर्सीपर बैठते हूए कॉम्प्यूटर शुरू किया. कमांड2 उसकेही बगलमें एक स्टूलपर बैठ गया. कॉम्प्यूटरपर लिनक्स ऑपरेटींग सिस्टीम शुरू होने लगी.

” तूझे पता है हम लिनक्स क्यों युज करते है?” कमांड1ने पुछा.

अपना अज्ञान जताते हूए कमांड2 ने सिर्फ अपना सर हिलाया.

‘”कॉम्प्यूटरके लगभग सभी सॉफ्टवेअर जिसका सोर्स कोड युजर (उपभोक्ता) को नही दिया जाता कहां बनायें जातें है?” कमांड1ने जवाब देने के बजाय दुसरा सवाल पुछा.

” कंपनीमें…” कमांड2ने भोले भावसे कहा.

” मेरा मतलब कौनसे देशमें?”

” अमेरिकामें” कमांड2ने जवाब दिया.

” तुझे पता होगाही की जिस सॉफ्टवेअरका सोर्स कोड कस्टमरको दिया जाता है उसे ‘ओपन सोर्स’ सॉफ्टवेअर कहते है… मतलब उस सॉफ्टवेअरमें क्या होता है यह कस्टमर जान सकता है… … और जिस सॉफ्टवेअरका कोड कस्टमरको नही दिया जाता उस सॉफ्टवेअरमें ऐसा बहुत कुछ हो सकता है… जो की होना नही चाहिए.” कमांड1 कह रहा था.

‘”मतलब?'” कमांड2 ने बिचमेंही टोका.

‘”मतलब तुझे पताही होगा की मायक्रोसॉफ्ट कंपनीने एक बार ऐलान किया था की वे उनके प्रतिस्पर्धीयोंको काबूमें रखनेके लिए उनके सॉफ्टवेअर विंन्डोज ऑपरेटींग सीस्टीममें कुछ ‘टॅग्ज’ इस्तेमाल करने वाले है…” कमांड1 कह रहा था.

” हां … तो ?” कमांड2 कमांड1 आगे क्या कहता है यह सुनने लगा.

”और उन ‘टॅग्ज’ की वजहसे कंपनीको जो चाहिए वही प्रोग्रॅम ठीक ढंगसे काम करेंगे… और दुसरे यातो बहुत धीमी गतीसे चलेंगे, बराबर नही चलेंगे या चलेंगेही नही.” कमांड1ने कहा.

” लेकिन उसका अपने लिनक्स इस्तेमाल करनेसे क्या वास्ता?” कमांड2ने पुछा.

” वास्ता है… बल्की बहुत नजदीकी वास्ता है… सुनो … अगर वे अपने प्रतिस्पर्धीयोंको काबुमें करनेके लिए ऐसे ‘टॅग्ज’ इस्तेमाल कर सकते है की जिसकी वजहसे उनके प्रतिस्पर्धीयोंका पुरा खातमा हो जाए … तो ऐसाभी मुमकीन है की वे उनके सॉफ्टवेअर और हार्डवेअरमें ऐसे कुछ ‘टॅग्ज’ इस्तेमाल करेंगे की जिसकी वजह से पुरी दुनिया की महत्वपुर्ण जानकारी इंटरनेटके द्वारा उनके पास पहूंच जाए … उसमें हमारे जैसे लोगोंकी गतिविधीयाँ भी आगई… खासकर 9-11 के बाद यह सब उनके लिए बहुत महत्वपुर्ण होगया है…” कमांड1 ने कमांड2की तरफ देखते हूए उसकी प्रतिक्रिया लेते हूए कहा.

” हां तुम सही कहते हो… ऐसा हो सकता है” कमांड2 ने अपनी राय बताते हूए कहा.

” इसलिए मैने क्या किया पता है? … लिनक्स का सोर्स कोड लेकर उसे कंपाईल किया… और फिर उसे अपने कॉम्प्यूटरमें इन्स्टॉल किया… अपनेसे जो हो सकता है वह सभी तरह की एतीहात बरतना जरुरी है…” कमांड1 बोल रहा था.

उसके बोलनेमे गर्व और खुदका बडप्पन झलक रहा था.

” अरे यह अमेरिका क्या चीज है तुझे पताही नही … सारी दुनियापर राज करनेका उनका सपना है… और उसके लिए वह किसीभी हदतक गिर सकते है…” कमांड1 आगे बोल रहा था.

कमांड2ने कमांड1 की तरफ प्रश्नार्थक मुद्रामें देखा.

” चांदपर सबसे पहले आदमी कब पहूँचा? … तुमने स्कुलमें पढाही होगा ना?..” कमांड1 ने सवाल किया.

” अमेरिकाने भेजे यान द्वारा 1969 को नील आर्मस्ट्राँग सबसे पहले चांदपर पहूंचा.” कमांड2 ने झटसे स्कुली बच्चे की तरह जवाब दिया.

”सभी स्कुली बच्चोंके दिमाग मे यही कुटकुटकर भरा हूवा है … और अभीभी भरा जा रहा है… लेकिन सच क्या है इसके बारेमे लोगोंने कभी सोचा है?… जो व्हीडीओ अमेरिकाने टी व्ही पर सारी दुनिया को दिखाया उसमें अमेरिकाका झंडा मस्त लहराता हूवा दिख रहा था… चांदपर अगर हवाही नही है … तो वह झंडा कैसा लहरेगा … जो लोग चांद पर उतरे उनके साये… यान की बदली हूई जगह… ऐसे न जाने कितने सबुत है जो दर्शाते है की अमेरीकाका यान चांदपर गयाही नही था…” कमांड1 आवेशमें आकर बोल रहा था.

” क्या बात करता है तू … फिर यह सब क्या झूट है? …” कमांड2 ने आश्चर्यसे पुछा.

” झूठ ही नही … सफेद झूठ… इतनाही नही उस वक्त सॅटेलाईटसे जमीन की ली हूई तस्वीरोंमे जो सेट उन लोगोंने बनाया था उसकी तस्वीर भी मिली है…”

” ठिक है मान लेते है की यह सब झूठ … लेकिन अमेरिका यह सब किसलिए करेगा?”

” हां यह अच्छा सवाल है … की उन्होने वह सब क्यों किया? … इतना सारा झंझट करने की उन्हे क्या जरुरत थी? … जिस वक्त अमेरिकाने उनका यान चांदपर उतरनेका दावा किया तब रशीया अमेरिकाका सबसे बडा प्रतिस्पर्धी था… हम रशीयासे दो कदम आगे है यह दिखानेके लिये उन्होने यह सब किया … और उसमें वे कामयाबभी रहे…” हर एक शब्दके साथ कमांड1का आवेश बढता दिखाई दे रहा था.

” माय गॉड… मतलब इतना बडा धोखा और वह भी सारी दुनियाको…” कमांड2के मुंहसे निकल गया.

” अमेरिका अब अंग्रेज पहले जिस रास्तेसे जा रहे थे उस रस्ते से चल रहा है… दुसरे वर्ल्ड वार के पहले ब्रिटीश लोगोंने सारी दुनियापर राज किया… उस वक्त कहते थे की उनकी जमिनपर सुरज कभी डूबता नही था… अब अमेरिकाभी वही करनेका प्रयास कर रही है…. फर्क सिर्फ इतना है की ब्रिटीश लोगोंने आमनेसामने राज किया और ये अब छुपे रहकर राज करना चाहते है… मतलब ‘प्रॉक्सी रूलींग’. अफगाणिस्थान, इराक, कुवेत, साऊथ कोरिया यहाँ पर वे क्या कर रहे है … प्रॉक्सी रूलींग … और क्या?”

” हां तुम बिलकुल सही कहते हो…” कमांड2ने सहमती दर्शाई.

” और यही अमेरिकाका अधिपत्य, प्रभुत्व खतम करना अपना परम हेतू है ..” कमांड1ने जोशमें कहा.

कमांड2के चेहरेसे ऐसा लग रहा था की वह उसकी बातोंसे बहुत प्रभावित हुवा है. और कमांड1के चेहरेपर कमांड2को ब्रेन वॉश करनेमें उसे जो सफलता मिली थी उसका आनंद झलक रहा था.

इतनेमें शुरु हुए कॉम्प्यूटरका बझर बजा. कमांड1को ईमेल आई थी. कमांड1ने मेलबॉक्स खोला. उसमें बॉसकी मेल थी.

” एक बात मेरे समझमें नही आती की यह बॉस है कौन?” कमांड2ने उत्सुकतापुर्वक पुछा.

” यह किसीकोभी पता नही … सिवाय खुद बॉसके… और इस बातसे हमें कोई सरोकार नही की बॉस कौन है?… क्योंकी हम सब लोगोंको एक सुत्रमें जिस बातने जोडा है वह कोई एक व्यक्ती ना होकर … एक विचारधारा है… वह विचारधाराही सबसे महत्वपुर्ण है… आज बास है कल नही होगा… लेकिन उसकी विचारधारा हमेशा जिंदा रहना चाहिए…” कमांड1 मेल खोलते वक्त बोल रहा था.

मेलमें सिर्फ ‘हाय’ ऐसा लिखा हूवा था और मेलको कोई फाईल अटॅच की हूई थी. कमांड1 ने अटॅचमेंट ओपन की. वह मॅडोनाकी एक ‘बोल्ड’ तस्वीर थी.

” यह क्या भेजा बॉसने?” कमांड2 ने आश्चर्यसे पुछा.

” तुम अभी बच्चे हो… धीरे धीरे सब समझ जावोगे… बस इतनाही जान लो की दिखाने के दात और खाने के दात हमेशा अलग रहते है… ” कमांड1 तस्वीर की तरफ देखकर मुस्कुराते हूए बोला.

कमांड1 ने बडी चपलतासे कॉम्प्यूटरके कीबोर्डके चार पाच बटन दबाए. सामने मॉनिटरपर एक सॉफ्टवेअर खुल गया. कमांड1ने मॅडोनाके उस तस्वीरको डबल क्लीक किया. एक निले रंग का प्रोग्रेस बार धीरे धीरे आगे बढने लगा. कमांड1 ने कमांड2की तरफ रहस्यतापुर्ण ढंग से देखा.

” लेकिन यह क्या कर रहे हो … स…” कमांड2ने कहा.

कमांड1ने झटसे कमांड2के मुंहपर हाथ रखकर उसकी बोलती बंद की.

” गलतीसेभी तुम्हारे मुंहमें मेरा नाम नही आना चाहिए… तुझे पता है… दिवार के भी कान होते है…”

”सॉरी” कमांड2 अपने गलती का अहसास होते हूए बोला.

” यहां गलतियोंको माफ नही किया जाता…” कमांड1ने दृढतापुर्वक कहा.

तबतक प्रोग्रेस बार आगे बढते हूए पुरीतरह निला हो चूका था.

” इसे स्टेग्नोग्राफी कहते है … मतलब तस्वीरोंमे संदेश छुपाना… देखनेवालोंको सिर्फ तस्वीर दिखाई देगी … लेकिन इस तस्वीरमेंभी बहोत सारी महत्वपुर्ण जानकारी छिपाई जा सकती है…” कमांड1 उसे समझा रहा था.

” लेकिन अगर यह तस्वीर यहां पहूचनेसे पहले किसी और के हाथ लगी तो?” कमांड2 अपनी शंका उपस्थीत की.

” यह सब जानकारी सिर्फ इस सॉफ्टवेअरके द्वारा ही बाहर निकाली जा सकती है… और उसे पासवर्ड लगता है…. यह सॉफ्टवेअर बॉसने खुद बनाया हूवा है…. इसलिये यह किसी दुसरे के पास रहने का तो सवाल ही पैदा नही होता” कमांड1ने उसके सवाल का यथोचीत उत्तर दिया था.

” कौनसी जानकारी छिपाई गई है इस तस्वीर में … जरा देखु तो” कमांड2 उत्सुकतावश देखने लगा.

इतनेमें मॉनिटरपर एक मेसेज दिखने लगा. ” अगले काम की तैयारी शुरु करो … उसका वक्त बादमें बताया जाएगा.”

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भाग-4 => वह कहाँ गई? (शून्य-उपन्यास)-

हॉस्पिटल के सामने एक सफेद कार आकर खडी हूई, उसमेंसे जॉन उतर गया. आज वह उसके हमेशाके पुलीस युनीफार्ममें नही था. और उसका मुडभी हमेशा का नही लग रहा था. उसके हाथमें सफेद फुलोंका एक गुलदस्ता था. सिधे लिफ्टके पास जाकर उसने लिफ्ट का बटन दबाया. लिफ्टमें प्रवेश कर उसने फ्लोअर नं. 12 का बटन दबाया. लिफ्ट बंद होकर उपरकी तरफ दौडने लगी. लिफ्टके रफ्तारके साथ उसके दिमाग में चल रहे विचारोंनेभी रफ्तार पकड ली….

दिवारपर खुनसे गोल क्यों निकाला गया होगा?….

फोरेन्सीक जांचमें खुन सानीकाही पाया गया था…..

जरुर जिसने भी वह गोल निकाला वह कुछ कहने का प्रयास कर रहा होगा…

खुन किसने किया इसका अंदाजा शायद अँजेनीको होगा…

लिफ्ट रुक गई और लिफ्टकी बेल बजी. बेलने जॉनके विचारोंके श्रुंखलाको तोडा. सामने इलेक्ट्रॉनिक डिस्प्लेमें 12 यह नंबर आया था. लिफ्टका दरवाजा खुला और जॉन लिफ्टसे बाहर निकल गया. अपने लंबे- लंबे कदम से चलते हूए जॉन सिधा ‘बी’ वार्डमें घुस गया.

जॉनने एकबार अपने हाथमें पकडे फुलोंके गुलदस्तेकी तरफ देखा और उसने ‘बी2’ रूमका दरवाजा धीरेसे खटखटाया. थोडी देर तक राह देखी, लेकिन अंदर कोईभी आहट नही थी. उसने दरवाजा फिरसे खटखटाया – इस बार जोरसे. लेकिन अंदर से कोई प्रतिक्रिया नही थी. यह देखकर उसने अपनी उलझन भरी नजर इधर उधर दौडाई. उसे अब चिंता होने लगी थी. वह दरवाजा जोर जोरसे ठोकने लगा.

क्या हूवा होगा?…

यही तो थी अँजेनी …

आज उसे डिस्चार्ज तो नही करने वाले थे…

फिर .. वह कहाँ गई?

कुछ अनहोनी तो नही हूई होगी?…

उसका दिल धडकने लगा. उसने फिरसे आजूबाजू देखा. वार्डके एक सिरेको एक काऊंटर था. काऊंटरपर जानकारी मील सकती है… ऐसा सोचकर वह तेजीसे काऊंटरकी तरफ जाने लगा.

“एक्सक्यूज मी” उसने काऊंटरपर नर्सका ध्यान अपनी तरफ आकर्षीत करनेका प्रयास किया.

नर्सके लिए यह रोजका ही होगा, क्योंकी जॉनकी तरफ ध्यान न देते हूए वह अपने काममें व्यस्त रही.

” ‘बी2’ को एक पेशंट थी… अँजेनी कार्टर … कहा गई वह? … उसे डिस्चार्ज तो नही दिया गया? … लेकिन उसका डिस्चार्ज तो आज नही था … फिर वह कहाँ गई? … वहाँ तो कोई नही…” जॉन सवालों पे सवाल पुछे जा रहा था.

” एक मिनट … एक मिनट … कौनसी रूम कहां आपने?'” नर्सने उसे रोकते हुए कहा.

“बी2” जॉनने एक गहरी सास लेकर कहां.

नर्सने एक फाईल निकाली. फाईल खोलकर ‘बी2′ … बी2’ ऐसा बोलते हूए उसने फाईलके इंडेक्सके उपर अपनी लचीली उंगली फेरी. फिर इंडेक्समें लिखा हूवा पेज नंबर निकालने के लिए उसने फाईलके कुछ पन्ने अपने एक खास अंदाजमें पलटे.

“‘बी2’ … मिसेस अँजेनी कार्टर…” नर्स तसल्ली करने के लिए बोली.

” हां …अँजेनी कार्टर” जॉनने कंन्फर्म किया.

जॉन उत्सुकतासे उसकी तरफ देखने लगा. लेकिन वह एकदम शांत थी. जैसे वह जॉनके सब्रका इंतहान ले रही हो. जॉनको उसका गुस्सा भी आ रहा था.

” सॉरी … मिस्टर ..?” नर्सने जॉनका नाम जानने के लिए उपर देखा.

जॉन का दिल और जोर जोरसे धडकने लगा.

“जॉन” जॉनने खुदको संभालते हूए अपना नाम बताया.

” सॉरी … मिस्टर जॉन … सॉरी फॉर इनकन्व्हीनियंस … उसे दुसरी रूममें … बी23 में शीफ्ट किया गया है….” नर्स बोल रही थी.

जॉनके जान मे जान आई थी.

“ऍक्यूअली … बी2 बहुत कंजेस्टेड हो रहा था … इसलिए उनकेही कहने पर….” नर्स अपनी सफाई दे रही थी.

लेकिन जॉनको कहा उसका सुनने की फुरसत थी? नर्स अपना बोलना पुरा करनेके पहलेही जॉन वहांसे तेजीसे निकल गया … बी23 की तरफ.

….. उपन्यास ….. जारी रखा ……….. है ,,,,,

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भाग-5 => दिल-विल… (शून्य-उपन्यास)-

बी23 की तरफ जाते हूए जॉनको खुदका ही आश्चर्य लगने लगा था.

यह कैसी बेचैनी?…

ऐसा तो पहले कभी नही हूवा था…

अबतक न जाने कितनी केसेस उसके हाथके निचेसे गई थी… लेकिन एक स्त्री के बारेमें ऐसी बेचैनी…

और कुछ अनहोनी तो नही हूई होगी? ऐसी चिंता और इतनी चिंता उसे पहले कभी नही हूई थी…

उसने बी23 का दरवाजा खटखटाया. दरवाजा खुलाही था. दरवाजा धकेलकर वह अंदर जाने लगा. अंदर बेडपर अँजेनी लेटी हूई थी. वह सोचमें डूबी खिडकीसे बाहर जैसे शुन्य भावसे देख रही थी. जॉन की आहट आतेही उसने दरवाजे की तरफ देखा. जॉनको देखतेही वह मुस्कुरा दी. लेकिन उसके चेहरेसे दुख का साया अभीभी हटा नही दिख रहा था. शायद अभीभी वह गहरे सदमेसे उभरी नही थी. वह उसके पास जाकर खडा हूवा. उसने उसे बगलमे रखे स्टूलपर बैठने का इशारा किया. स्टूलपर बैठनेके बाद फुलोंका गुलदस्ता उसके बाजूमे रखते हूवे जॉनने पुछा – ” कैसी हो?”

वह फिरसे उसकी तरफ देखकर मुस्कुराई. ऐसे लग रहा था जैसे मुस्कुरानेके लिए उसे बडा कष्ट हो रहा हो.

” मुसिबतोंका पहाड जिसपर गिर पडता है वही उसकी मार समझ सकता है… आप किस पिडादायक मनस्थीतीसे गुजर रही होगी मै समझ सकता हू…” जॉन बोल रहा था.

अँजेनीके आँखोसे आसु बहने लगे. जॉन बोलते बोलते रुक गया. उसने उसे धिरज देता हूवा अपना हाथ उसके कंधेपर रख दिया. अब तो उसने जो आँसूओंका बांध रोकने की कोशीश की थी वह टूट गया और वह जॉनसे लिपटकर फुट फुटकर रोने लगी. जॉन उसे सहलाते हूए ढाढस बंधाने का प्रयास कर रहा था. उसे कैसे समझाया जाए कुछ समझ नही आ रहा था.

अब वह थोडी नॉर्मल हो गई थी. जॉनने अब जान लिया की अँजेनीको खुनके बारेमें पुछनेका यही सही वक्त है.

” किसने खुन किया होगा? … आपको कोई संदेह? … या अंदाजा? ‘” जॉनने धीरेसे पुछा.

अँजेनीने इन्कारमें अपना सर हिलाया और फिर खिडकीके बाहर देखते हूए फिरसे सोचमें डूब गई.

जॉनने उसकी जेबसे एक फोटो निकाला.

” यह देखो… यहाँ दिवारपर … खुनसे गोल निकाला गया है … यह क्या हो सकता है? …कुछ अंदाजा? … या फिर किसने निकाला होगा… इसके बारे मे कुछ बता सकती हो?” जॉनने पुछा.

अँजेनीने फोटो गौरसे देखा. दिवारपर लिखे हूए गोल के निचे बेडपर पडे हूए उसके पतीके मृत शरीरको देखकर फिरसे उसका गला भर आया… जॉनने फोटो फिरसे जेबमें रखा.

‘” नही मतलब इस गोलका कुछ अर्थ समझमें आता है क्या? … वह एबीसीडीका ‘ओ’ भी हो सकता है … या फिर शून्यभी हो सकता है …” जॉनने कहा.

” मै समझ सकता हूँ की यह आपके पती के खुन के बारे में पुछने का उचीत वक्त नही … लेकिन जानकारी जितनी जादा और जितने जल्दी मिल सकती है उतने जल्दी हम खुनीको पकड सकते है…” जॉन ने कहा.

अँजेनी अब अपने इरादे पक्के कर संभलकर सिधे बैठ गई ” पुछो आपको जो पुछना है ..”‘

जॉननेभी जान लिया की पुरी जानकारी निकालनेका यही उचीत समय है.

“‘ सानी क्या करता था? … मतलब बाय प्रोफेशन” जॉनने पहला सवाल पुछा.

” वह इंपोर्ट एक्सपोर्टका बिझीनेस करता था … मेनली गारमेंटस् … इंडीयन कॉन्टीनेंटमें उसका बिझीनेस फैला हूवा था ” अँजेनी बोल रही थी.

” कोई प्रोफेशनल रायव्हल?” जॉनने पुछा.

” नही… उसका डोमेन एकदम अलग होनेसे उसे कोई प्रोफेशनल रायव्हल्स होनेका सवालही पैदा नही होता. ‘” अँजेनी बोल रही थी.

“‘ अच्छा आप क्या करती है ?” जॉनने अगला सवाल पुछा.

” मै एक फॅशन डिझायनर हूँ” अँजेनीने कहा.

बहुत देरतक उनके सवाल जवाब चलते रहे. आखीर स्टूलसे उठते हूए जॉनने कहा ” ठीक है … अबके लिए इतनी जानकारी काफी है… अब आप थकी भी होगी… मतलब दिमागसे… आराम करो … फिरसे कुछ लगा तो हम आपसे पुछेंगेही …”

जॉन जाने लगा.

अँजेनी उसे दरवाजे तक छोडनेके लिए उठने लगी तो जॉन ने कहा ” आप पडे रहिए .. आपको आराम की सख्त जरुरत है'”

फिरभी वह उसे दरवाजेतक छोडनेके लिए उठ गई. जॉन दरवाजे तक पहूचता नही की उसे पिछेसे उसकी आवाज आई –

” थँक यू …”

जॉन एकदमसे रुक गया और उसने मुडकर पुछा ” किसलिए?”

” मेरी जान बचानेके लिए … डॉक्टरने मुझे सब बताया है… अगर आप समयपर मुझे कृत्रिम सांसे नही देते तो शायद मै अब जिवीत नही होती …” अँजेनी उसकी तरफ कृतज्ञता भरी निगाहोंसे देखते हूए बोली.

” उसमें क्या है… मैने मेरा कर्तव्य किया बस ‘” जॉनने कहा.

” वह आपका बडप्पन है” अँजेनी दरवाजेतक पहूचते हूए बोली.

जॉन अब वहा से निकल गया था. लंबे लंबे कदम डालते हूवे जल्दी जल्दी वह चलने लगा. शायद अपनी भावनाएँ छिपाने के लिए. थोडे ही समयमे वह कॉरीडोर के सिरेतक जा पहूंचा. दाई तरफ मुडनेसे पहले उसने एक बार पिछे मुडकर देखा. वह अभीभी उसके तरफही देख रही थी.

जॉन पॅसेजमेंसे लिफ्टकी तरफ जा रहा था. अँजेनीको छोडकर जाते हूए उसे अपना दिल भारी भारी लग रहा था. अचानक जॉनका ध्यान लिफ्टकी तरफ गया. लिफ्ट अभीभी वहासे दूरही थी. लिफ्टके उस तरफवाले हिस्सेसे एक युवक आया. उसने काला टी शर्ट पहना हूवा था और उस टी शर्टपर ‘झीरो’ निकाला हुवा था, जैसा उसने पहलेभी सानीके खुनके दिन देखा था. जॉन एकदम हरकतमें आया और लिफ्टकी तरफ दौडने लगा.

उसने आवाज दिया, “ए… हॅलो ”

लेकिन उसका आवाज पहूचनेसे पहलेही वह युवक लिफ्टमें घुस गया था. जॉन औरभी जोरसे दौडने लगा. लिफ्ट बंद होगई थी… लेकिन अभीभी निचे या उपर नही गई थी. जॉन दौडते हूए लिफ्टके पास गया. उसने लिफ्टका बटन दबाया. लेकिन व्यर्थ. लिफ्ट निचे जाने लगी थी. जॉनको क्या करे कुछ सुझ नही रहा था. वह युवक उस दिन देखे युवकके हूलिए जैसा नही था. लेकिन पता नही क्यों जॉनको लग रहा था की जरुर सानीके खुनका रहस्य उस ‘झीरो’ में छिपा हूवा है. जॉन बगलकी सिढीयोंसे तेजीसे निचे उतरने लगा. बिच बिचेमें उसका लिफ्टकी तरफभी ध्यान था. लेकिन मानो लिफ्ट बिचमें कही भी रुकनेके लिए तैयार नही थी. शायद वह एकदम ग्राऊंड फ्लोअरकोही रुकनेवाली थी. जब जॉनने देखा की लिफ्ट उससे दो माले आगे निकल गई तो वह और जोरसे सिढीयाँ उतरने लगा.

आखिर सासें फुली हूई हालतमे वह ग्राऊंड फ्लोअरको पहूँच गया. उसने लिफ्टकी तरफ देखा. लिफ्टमेंके लोग कबके बाहर आ चूके थे और लिफ्टका डिस्प्ले लिफ्ट उपरकी दिशामें जा रही है ऐसा दर्शा रहा था. जॉन दौडते हूए हॉस्पीटलके बाहर लपका. उसने सब तरफ अपनी पैनी नजरें दौडाई. पार्कीगमेभी जाकर देखा. हॉस्पीटलके बाहर रोडपर जाकर देखा. लेकिन वह काले रंगके टी शर्टवाला युवक कही भी दिखाई नही दे रहा था.

…..क्रमश::………..

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