थोड़ी सी हिम्मत से फर्क बड़ा।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ थोड़ी सी हिम्मत से फर्क बड़ा। ϒ

बहुत समय पहले की बात है ….. एक चरवाहा था जिसके पास 10 भेड़े थीं। वह रोज उन्हें चराने ले जाता और शाम को बाड़े में डाल देता। सब कुछ ठीक चल रहा था कि एक सुबह जब चरवाहा भेडें निकाल रहा था तब उसने देखा कि बाड़े से एक भेड़ गायब है। चरवाहा इधर-उधर देखने लगा, बाड़ा कहीं से टूटा नहीं था और कंटीले तारों की वजह से इस बात की भी कोई सम्भावना न थी कि बहार से कोई जंगली जानवर अन्दर आया हो और भेड़ उठाकर ले गया हो।

चरवाहा बाकी बची भेड़ों की तरफ घूमा और पुछा :- “क्या तुम लोगों को पता है कि यहाँ सेएक भेंड़ गायब कैसे हो गयी…क्या रात को यहाँ कुछ हुआ था?”

सभी भेड़ों ने ना में सर हिला दिया।

उस दिन भेड़ों के चराने के बाद चरवाहे ने हमेशा की तरह भेड़ों को बाड़े में डाल दिया। अगली सुबह जब वो आया तो उसकी आँखें आश्चर्य से खुली रह गयीं, आज भी एक भेंड़ गायब थी और अब सिर्फ आठ भेडें ही बची थीं।इस बार भी चरवाहे को कुछ समझ नहीं आया कि भेड़ कहाँ गायब हो गयी। बाकी बची भेड़ों से पूछने पर भी कुछ पता नहीं चला। ऐसा लगातार होने लगा और रोज रात में एक भेंड़ गायब हो जाती। फिर एक दिन ऐसा आया कि बाड़े में बस दो ही भेंड़े बची थीं।

चरवाहा भी बिलकुल निराश हो चुका था, मन ही मन वो इसे अपना दुर्भाग्य मान सब कुछ भगवान् पर छोड़ दिया था।आज भी वो उन दो भेड़ों के बाड़े में डालने के बाद मुड़ा। तभी पीछे से आवाज़ आई :-
“रुको-रुको मुझे अकेला छोड़ कर मत जाओ वर्ना ये भेड़िया आज रात मुझे भी मार डालेगा.!”
चरवाहा फ़ौरन पलटा और अपनी लाठी संभालते हुए बोला, “ भेड़िया ! कहाँ है भेड़िया.?”

भेड़ इशारा करते हुए बोली : “ये जो आपके सामने खड़ा है दरअसल भेड़ नहीं, भेड़ की खाल में भेड़िया है। जब पहली बार एक भेड़ गायब हुई थी तो मैं डर के मारे उस रात सोई नहीं थी। तब मैंने देखा कि आधी रात के बाद इसने अपनी खाल उतारी और बगल वाली भेड़ को मारकर खा गया!”

भेड़िये ने अपना राज खुलता देख वहां से भागना चाहा, लेकिन चरवाहा चौकन्ना था और लाठी से ताबड़तोड़ वार कर उसे वहीँ ढेर कर दिया।चरवाहा पूरी कहानी समझ चुका था और वह क्रोध से लाल हो उठा, उसने भेड़ से चीखते हुए पूछा – “जब तुम ये बात इतना पहले से जानती थीं तो मुझे बताया क्यों नहीं?”

भेड़ शर्मिंदा होते हुए बोली : “मैं उसके भयानक रूप को देख अन्दर से डरी हुई थी, मेरी सच बोलने की हिम्मत ही नहीं हुई, मैंने सोचा कि शायद एक-दो भेड़ खाने के बाद ये अपने आप ही यहाँ से चला जाएगा पर बात बढ़ते-बढ़ते मेरी जान पर आ गयी और अब अपनी जान बचाने का मेरे पास एक ही चारा था- हिम्मत करके सच बोलना, इसलिए आज मैंने आपसे सब कुछ बता दिया!”

चरवाहा बोला : “तुमने ये कैसे सोच लिया कि एक-दो भेड़ों को मारने के बाद वो भेड़िया यहाँ से चला जायेगा…भेड़िया तो भेड़िया होता है…वो अपनी प्रकृति नहीं बदल सकता ! जरा सोचो तुम्हारी चुप्पी ने कितने निर्दोष भेड़ो की जान ले ली। अगर तुमने पहले ही सच बोलने की हिम्मत दिखाई होती तो आज सब कुछ कितना अच्छा होता?”

दोस्तों, ज़िन्दगी में ऐसे कई मौके आते हैं जहाँ हमारी थोड़ी सी हिम्मत एक बड़ा फर्क डाल सकती है पर उस भेड़ की तरह हममें से ज्यादातर लोग तब तक चुप्पी मारकर बैठे रहते हैं जब तक मुसीबत अपने सर पे नहीं आ जाती। चलिए इस कहानी से प्रेरणा लेते हुए हम सही समय पर सच बोलने की हिम्मत दिखाएं और अपने देश को भ्रष्टाचार, आतंकवाद और बलात्कार जैसे भेड़ियों से मुक्त कराएं।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

 ~Kmsraj51

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

~KMSRAJ51

 

चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं।

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ϒ चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं। ϒ

एक संत अपने शिष्य के साथ किसी अजनबी नगर में पहुंचे। रात हो चुकी थी और वे दोनों सिर छुपाने के लिए किसी आसरे की तलाश में थे।

उन्होंने एक घर का दरवाजा खटखटाया, वह एक धनिक का घर था और अंदर से परिवार का मुखिया निकलकर आया। वह संकीर्ण वृत्ति का था, उसने कहा – “मैं आपको अपने घर के अंदर तो नहीं ठहरा सकता लेकिन तलघर में हमारा स्टोर बना है। आप चाहें तो वहां रात को रुक सकते हैं, लेकिन सुबह होते ही आपको जाना होगा।”

वह संत अपने शिष्य के साथ तलघर में ठहर गए। वहां के कठोर फर्श पर वे सोने की तैयारी कर रहे थे कि तभी संत को दीवार में एक दरार नजर आई। संत उस दरार के पास पहुंचे और कुछ सोचकर उसे भरने में जुट गए।

शिष्य के कारण पूछने पर संत ने कहा-“चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं।” अगली रात वे दोनों एक गरीब किसान के घर आसरा मांगने पहुंचे।

किसान और उसकी पत्नी ने प्रेमपूर्वक उनका स्वागत किया। उनके पास जो कुछ रूखा-सूखा था, वह उन्होंने उन दोनों के साथ बांटकर खाया और फिर उन्हें सोने के लिए अपना बिस्तर दे दिया। किसान और उसकी पत्नी नीचे फर्श पर सो गए।

सवेरा होने पर संत व उनके शिष्य ने देखा कि किसान और उसकी पत्नी रो रहे थे क्योंकि उनका बैल खेत में मरा पड़ा था।

यह देखकर शिष्य ने संत से कहा- ‘गुरुदेव, आपके पास तो कई सिद्धियां हैं, फिर आपने यह क्यों होने दिया?
उस धनिक के पास सब कुछ था, फिर भी आपने उसके तलघर की मरम्मत करके उसकी मदद की, जबकि इस गरीब ने कुछ ना होने के बाद भी हमें इतना सम्मान दिया फिर भी आपने उसके बैल को मरने दिया।”

संत फिर बोले-“चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं।”

उन्होंने आगे कहा- ‘उस धनिक के तलघर में दरार से मैंने यह देखा कि उस दीवार के पीछे स्वर्ण का भंडार था। चूंकि उस घर का मालिक बेहद लोभी और कृपण था, इसलिए मैंने उस दरार को बंद कर दिया, ताकि स्वर्ण भंडार उसके हाथ ना लगे।

इस किसान के घर में हम इसके बिस्तर पर सोए थे। रात्रि में इस किसान की पत्नी की मौत लिखी थी और जब यमदूत उसके प्राण हरने आए तो मैंने रोक दिया। चूंकि वे खाली हाथ नहीं जा सकते थे, इसलिए मैंने उनसे किसान के बैल के प्राण ले जाने के लिए कहा।

अब तुम्हीं बताओ, मैंने सही किया या गलत।

यह सुनकर शिष्य संत के समक्ष नतमस्तक हो गया।

प्रिय दोस्तों,

ठीक इसी तरह “दुनिया हमें वैसी नहीं दिखती जैसी वह हैं, बल्कि वैसे दिखती हैं जैसे हम हैं।” अगर कुछ बदलना है ताे सबसे पहले अपने सोच, कर्म व अपने आप काे बदलें।

Jaya Kishori Ji-kmsraj51

जया शर्मा किशोरी जी।

Post inspired by जया शर्मा किशोरी जी। We are grateful to “Jaya Kishori Ji” for this inspirational Hindi Story for Kmsraj51.com readers.

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 पढ़ेंविमल गांधी जी कि शिक्षाप्रद कविताओं का विशाल संग्रह।

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अगर कुछ बदलना है ताे सबसे पहले अपने सोच, कर्म व अपने आप काे बदलें।

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निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

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 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

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अभ्यास की महत्ता।

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ϒ अभ्यास की महत्ता। ϒ

एक लड़का बहुत ही मन्द बुद्धि था। उसे पढ़ना-लिखना कुछ न आता था। बहुत दिन पाठशाला में रहते हुए भी उसे कुछ न आया… तो लड़कों ने उसकी मूर्खता के अनुरूप उसे.. ‘बरधराज’ अर्थात्.. ‘बैलों का राजा’ कहना शुरू कर दिया। घर बाहर सब जगह उसका अपमान ही होता।

एक दिन वह लड़का बहुत दुखी होकर पाठशाला से चल दिया और इधर-उधर मारा-मारा फिरने लगा। वह एक कुँए के पास पहुँचा और देखा कि किनारे पर रखे हुये जगत के पत्थर पर रस्सी खिंचने की रगड़ से निशान बन गये है।

लड़के को सूझा कि- “जब इतना कठोर पत्थर रस्सी की लगातार रगड़ से घिस सकता है तो क्या मेरी मोटी बुद्धि लगातार परिश्रम करने से न घिसेगी।”

वह फिर पाठशाला लौट आया और पूरी तत्परता और उत्साह के साथ पढ़ना आरम्भ कर दिया, उसे सफलता मिली। ‘व्याकरण शास्त्र’ का वह उद्भट विद्वान् हुआ। “लघु सिद्धान्त कौमुदी” नामक ग्रन्थ की उसने रचना की, जो संस्कृत व्याकरण का अद्भुत ग्रंथ है। उसके नाम में थोड़ा सुधार किया गया- ‘बरधराज’ की जगह फिर उसे “वरदराज” कहा जाने लगा।

इसी पर एक दोहा बना…..

“करत-करत अभ्यास से जडमति होत सुजान।
रसरी आवत-जात से सिल पर पडत निसान॥”

अर्थात:- जिस तरह कुवें की जगत के पत्थर पर बारबार रस्सी के आने-जाने की रगड से निशान बन जाते हैं, उसी प्रकार लगातार अभ्यास से अल्पबुद्धि भी बुद्धिमान बन सकता है।

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सकारात्मक सोच + निरंतर कार्य = सफलता।

स्वयं पर और स्व-कर्माे पर विश्वास माना सफलता का आधार(नींव) मज़बूत।

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

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“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की व्यर्थ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51

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तांबे का सिक्का।

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ϒ तांबे का सिक्का। ϒ

एक राजा का जन्मदिन था। सुबह जब वह घूमने निकला, तो उसने तय किया कि वह रास्ते मे मिलने वाले पहले व्यक्ति को पूरी तरह खुश व संतुष्ट करेगा। उसे एक भिखारी मिला। भिखारी ने राजा से भीख मांगी, तो राजा ने भिखारी की तरफ एक तांबे का सिक्का उछाल दिया।

सिक्का भिखारी के हाथ से छूट कर नाली में जा गिरा। भिखारी नाली में हाथ डाल तांबे का सिक्का ढूंढ़ने लगा। राजा ने उसे बुला कर दूसरा तांबे का सिक्का दिया। भिखारी ने खुश होकर वह सिक्का अपनी जेब में रख लिया और वापस जाकर नाली में गिरा सिक्का ढूंढ़ने लगा।

राजा को लगा की भिखारी बहुत गरीब है, उसने भिखारी को चांदी का एक सिक्का दिया। भिखारी राजा की जय जयकार करता फिर नाली में सिक्का ढूंढ़ने लगा। राजा ने अब भिखारी को एक सोने का सिक्का दिया।

भिखारी खुशी से झूम उठा और वापस भाग कर अपना हाथ नाली की तरफ बढ़ाने लगा। राजा को बहुत खराब लगा। उसे खुद से तय की गयी बात याद आ गयी कि पहले मिलने वाले व्यक्ति को आज खुश एवं संतुष्ट करना है।

उसने भिखारी को बुलाया और कहा कि मैं तुम्हें अपना आधा राज-पाट देता हूं, अब तो खुश व संतुष्ट हो? भिखारी बोला, मैं खुश और संतुष्ट तभी हो सकूंगा जब नाली में गिरा तांबे का सिक्का मुझे मिल जायेगा।

हमारा हाल भी उस भिखारी जैसा ही है।

हमें भगवान(GOD) ने आध्यात्मिकता रूपी अनमोल खजाना दिया है और हम उसे भूलकर संसार रूपी नाली में तांबे के सिक्के निकालने के लिए जीवन गंवाते जा रहे है। परमात्मा को याद कियें बिन कैसे हो, बेड़ा तेरा पार जी। शवास हाथ से जा रहे हैं, कीमत बेशुमार जी।

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मृत्यु का भय।

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ϒ मृत्यु का भय। ϒ

किसी नगर में एक आदमी रहता था। उसने परदेश के साथ व्यापार किया। मेहनत फली, कमाई हुई और उसकी गिनती सेठों में होने लगी।महल जैसी हवेली बन गई। वैभव और बड़े परिवार के बीच उसकी जवानी बड़े आनंद से बीतने लगी।

एक दिन उसका एक संबंधी किसी दूसरे नगर से आया। बातचीत के बीच उसने बताया कि उसके यहां का सबसे बड़ा सेठ गुजर गया। बेचारे की लाखों की धन-संपत्ति पड़ी रह गई। बात सहज भाव से कही गई थी, पर उस आदमी के मन को डगमगा गई। हां उस सेठ की तरह एक दिन वह भी तो मर जाएगा। उसी क्षण से उसे बार-बार मौत की याद सताने लगी। हाय मौत आएगी, उसे ले जाएगी और सबकुछ यहीं छूट जाएगा। मारे चिंता के उसकी देह सूखने लगी। देखने वाले देखते कि उसे किसी चीज की कमी नहीं है, पर उसके भीतर का दुख ऐसा था कि किसी से कहा भी नहीं जा सकता था। धीरे-धीरे वह बिस्तर पर पड़ गया। बहुतेरा इलाज किया गया, लेकिन उसका रोग कम होने की बजाय बढ़ता ही गया। एक दिन एक साधु उसके घर पर आया। उस आदमी ने बेबसी से उसके पैर पकड़ लिए और रो-रोकर अपनी व्यथा उसे बता दी।

सुनकर साधु हंस पड़ा और बोला – “तुम्हारे रोग का इलाज तो बहुत आसान है।”

उस आदमी के खोए प्राण मानो लौट आए। अधीर होकर उसने पूछा – “स्वामीजी, वह इलाज क्या है।”

साधु ने कहा – “देखो मौत का विचार जब मन में आए, जोर से कहो जब तक मौत नहीं आएगी, मैं जीऊंगा। इस नुस्खे को सात दिन तक आजमाओ, मैं अगले सप्ताह आऊंगा।”

सात दिन के बाद साधु आए तो देखते क्या हैं, वह आदमी बीमारी के चंगुल से बाहर आ गया है और आनंद से गीत गा रहा है। साधु को देखकर वह दौड़ा और उसके चरणों में गिरकर बोला – “महाराज, आपने मुझे बचा लिया। आपकी दवा ने मुझ पर जादू का-सा असर किया। मैंने समझ लिया कि जिस दिन मौत आएगी, उसी दिन मरूंगा, उससे पहले नहीं।”

साधु ने कहा –

“वत्स, मौत का डर सबसे बड़ा डर है। वह जितनों को मारता है मौत उतनों को नहीं मारती”

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काँच और हीरा।

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काँच और हीरा। 

एक राजा का दरबार लगा हुआ था। क्योंकि सर्दी का दिन था इसलिये राजा का दरवार खुले में बैठा था। पूरी आम सभा सुबह की धूप में बैठी थी। महाराज ने सिंहासन के सामने एक टेबल जैसी कोई कीमती चीज रखी थी। पंडित लोग दीवान आदि सभी दरवार में बैठे थे। राजा के परिवार के सदस्य भी बैठे थे। उसी समय एक व्यक्ति आया और प्रवेश मागा, प्रवेश मिल गया तो उसने कहा मेरे पास दो वस्तुए है मै हर राज्य के राजा के पास जाता हूँ और अपनी बात रखता हूँ कोई परख नही पाता सब हार जाते है और मैं विजेता बनकर घूम रहा हूँ अब आपके नगर में आया हूँ।

राजा ने बुलाया और कहा क्या बात है तो उसने दोनो वस्तुये टेबल पर रख दी बिल्कुल समान आकार समान रुप रंग समान प्रकाश सब कुछ नख सिख समान राजा ने कहा ये दोनो वस्तुए एक है तो उस व्यक्ति ने कहा हाँ दिखाई तो एक सी देती है लेकिन है भिन्न। इनमे से एक है बहुत कीमती हीरा और एक है काँच का टुकडा।

लेकिन रूप रंग सब एक है कोई आज तक परख नही पाया की कौन सा हीरा है और कौन सा काँच कोई परख कर बताये की ये हीरा है ये काँच। अगर परख खरी निकली तो मैं हार जाउगा और यह कीमती हीरा मैं आपके राज्य की तिजोरी में जमा करवा दूगां।

यदि कोई न पहचान पाया तो इस हीरे की जो कीमत है उतनी धनराशि आपको मुझे देनी होगी। इसी प्रकार मैं कई राज्यों से जीतता आया हूँ। राजा ने कहा मैं तो नही परख सकूगा, दीवान बोले हम भी हिम्मत नही कर सकते क्योंकि दोनो बिल्कुल समान है। सब हारे कोई हिम्मत नही जुटा पाया।

हारने पर पैसे देने पडेगे इसका कोई सवाल नही, क्योकि राजा के पास बहुत धन है राजा की प्रतिष्ठा गिर जायेगी इसका सबको भय था। कोई व्यक्ति पहचान नही पाया, आखिरकार पीछे थोडी हलचल हुइ एक अंधा आदमी हाथ में लाठी लेकर उठा उसने कहा मुझें महाराज के पास ले चलो, मैंने सब बाते सुनी है और यह भी सुना कि कोई परख नही पा रहा है।

एक अवसर मुझें भी दो, एक आदमी के सहारे वह राजा के पास पहुचा। उसने राजा से प्रार्थना की मैं तो जन्म से अंधा हूँ, फिर भी मुझें एक अवसर दिया जाये, जिससे मैं भी एक बार अपनी बुद्धि को परखू और हो सकता है कि सफल भी हो जाऊ और यदि सफल न भी हुआ तो वैसे भी आप तो हारे ही है।

राजा को लगा कि इसे अवसर देने में क्या हरज है। राजा ने कहा ठीक है तो उस अंधे आदमी को दोनो चीजे छुआ दी गयी और पूछा गया इसमे कौन सा हीरा है और कौन सा काँच यही परखना है।

कथा कहती है कि उस आदमी ने एक मिनट में कह दिया कि यह हीरा है और यह काँच।

जो आदमी इतने राज्यों को जीतकर आया था, वह नतमस्तक हो गया और बोला सही है। आपने पहचान लिया धन्य हो आप। अपने वचन के मुताबिक यह हीरा मैं आपके राज्य की तिजोरी में दे रहा हूँ।

सब बहुत खुश हो गये और जो आदमी आया था। वह भी बहुत प्रसन्न हुआ कि कम से कम कोई तो मिला परखने वाला। वह राजा और अन्य सभी लोगो ने उस अंधे व्यक्ति से एक ही जिज्ञासा जताई कि तुमने यह कैसे पहचाना कि यह हीरा है और वह काँच।

उस अंधे ने कहा की सीधी सी बात है मालिक धूप में हम सब बैठे है। मैने दोनो को छुआ जो ठंडा रहा वह हीरा जो गरम हो गया वह काँच।

जीवन में भी देखना जो बात – बात में गरम हो जाये उलझ जाये वह काँच जो विपरीत परिस्थिति में भी ठंडा रहे वह हीरा है।

“खुद को कंकड़ पत्थर मत समझो।”

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भगवान पर सच्चा विश्वास।

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 भगवान पर सच्चा विश्वास।

एक अत्यंत गरीब महिला थी जो ईश्वरीय शक्ति पर बेइंतहा विश्वास करती थी। एक बार अत्यंत ही विकट स्थिति में आ गई, कई दिनों से खाने के लिए पुरे परिवार को कुछ नहीं मिला।

एक दिन उसने रेडियो के माध्यम से ईश्वर को अपना सन्देश भेजा कि वह उसकी मदद करे। यह प्रसारण एक नास्तिक ,घमण्डी और अहंकारी उद्योगपति ने सुना और उसने सोचा कि क्यों न इस महिला के साथ कुछ ऐसा मजाक किया जाये कि उसकी ईश्वर के प्रति आस्था डिग जाय।

उसने आपने सेक्रेटरी को कहा कि वह ढेर सारा खाना और महीने भर का राशन उसके घर पर देकर आ जाये, और जब वह महिला पूछे किसने भेजा है तो कह देना कि ” शैतान” ने भेजा है।

जैसे ही महिला के पास सामान पंहुचा पहले तो उसके परिवार ने तृप्त होकर भोजन किया, फिर वह सारा राशन अलमारी में रखने लगी।

जब महिला ने पूछा नहीं कि यह सब किसने भेजा है तो सेक्रेटरी से रहा नहीं गया और पूछा- आपको क्या जिज्ञासा नही होती कि यह सब किसने भेजा है।

उस महिला ने बेहतरीन जवाब दिया- मैं इतना क्यों सोंचू या पूंछू, मुझे भगवान पर पूरा भरोसा है, मेरा भगवान जब आदेश देते है तो शैतानों को भी उस आदेश का पालन करना पड़ता है।

Jaya Kishori Ji-kmsraj51

जया शर्मा किशोरी जी।

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* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

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* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

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 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

-KMSRAJ51

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क्या लडकियां ही करती है, सिर्फ़ मनमानी।

Kmsraj51 की कलम से…..

Kmsraj51-CYMT04

ϒ क्या लडकियां ही करती है, सिर्फ़ मनमानी। ϒ

क्या लडकियां ही करती है, सिर्फ़ मनमानी।
जो बन जाती है, वो देश की दामिनी॥

हक है तुम्हारा ऐ हर एक हिन्दुस्तानी।
जियो तुम अपनी तरह से अपनी ये जिंदयानी॥

दर्द है, सिसक है, एक खामोशी-सी उनकी कहानी।
क्यों शर्मसार कर शापित कर रहे हो,
हमसे हमारी जवानी॥

तुम्हें क्यों दिक्कत होती है जब होते है हम सयानी।
ऐ अनपढ़ अफसोस है आज हर उस मां को,
जो कह न सकती है, मैं हूं उस हैवान की जननी॥

हम तो है एक ऐसी धानी,
जिसकी चोट वो दरारें लाती है।

जो अगर खत्म न हुआ तो फट जायेगी ये धानी,
और…………
खत्म हो जायेगी सृष्टि से,
हैवानियत की ये कहानी………!!

-संदीप वर्मा – बीकानेर (राज.)

Sandeep Verma-kmsraj51

संदीप वर्मा।

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

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“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की व्यर्थ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51

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नारी की इच्छा।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

नारी की इच्छा। ∗

असंभव के विरुद्ध:- “नारी की इच्छा” हम समझ क्यों नहीं पाते?

“तुम तो नदी की धारा के साथ दौड़ रहे हो।
उस सुख को कैसे समझोगे, जो हमें नदी को देखकर मिलता है।”

– रामधारी सिंह ‘दिनकर’

मैं जब बच्ची थी।
पेड़ पर चढ़ने को मचलती, मां डांटती
कहती ये लड़कों जैसी गलत मस्तियां हैं।

उछलना, कूदना, दौड़ना, चढ़ना, गिरना,
उड़ना।

पिता हंसते, शाम को कंधे पर बिठाकर ले जाते।
अमरूद के पेड़ पर चढ़ना सिखाते, समझाते – शरीर
सब कुछ कर सकता है।
अगर “तुम्हारी इच्छा हो”

मैं जब कुछ बड़ी हुई।
दादी को जैसे बस एक ही काम था।
काम सीख लो, कल ससुराल में बदनामी होगी।

दादा न जाने क्या-क्या खिलाते,
मेरे खेलने- खाने के दिन होने का विश्वास दिलाते।
बस करो। कोशिश करो। देखो। सुनो। करो।
नहीं आया तो फिर करो।

सब होगा – अगर “तुम्हारी इच्छा हो”

एक नाज़ुक समय आया।
हर बात पर रोकना, हर काम पर पूछना, हर साथ
पर संदेह।

जीवन लगने लगा बोझ, अपने लगने लगे फांस घुटन।

छटपटाहट। घबराहट।

कहां गए वो खेलने-खाने के दिन?
पिता का लाड़, लगने लगा लताड़। भाई की
शरारत, देने लगी हरारत।

“मेरी इच्छा”? क्यों नहीं चलती?
मैं कहां जाती हूं, कब लौटती हूं, क्या पहनकर
जाती हूं,
किसके साथ बैठती हूं, किससे हंसती-बोलती
हूं।

इस पर घरवाले पहरा बिठा देना चाहते हैं?
आखिर क्यों?
“मेरी इच्छा”का क्या? और वे होते कौन हैं?
और समझते क्यों नहीं
कि मैं बड़ी हो चुकी हूं। पढ़ी-लिखी हूं।

अपना अच्छा-बुरा समझती हूं।
बेटा, जमाना ठीक नहीं है। आजकल किसी
का भरोसा नहीं।

कॉलेज के बाद सीधे घर आना। दिल्ली का पता है न?
क्यों? “मेरी इच्छा”का क्या?
लड़की हूं न, इसलिए इतनी रोक।
यह उम्र ही ऐसी होती है। बंधन तोड़ने की उग्र इच्छा होती है।
बंधन।

पढ़ाई करो। और पढ़ो। शादी के बाद,
आत्मनिर्भर रहना चाहिए।
अपने पैरों पर खड़े होना, संसार की सबसे बड़ी
चुनौती, सबसे अच्छा उपाय।

“मेरी इच्छा”क्या है?
उनके इस प्रश्न ने मानो मुझे नींद से जगाया
आपको, किसी को “मेरी इच्छा”का क्या?
उन्होंने लाड़ से हाथ फेरा। बच्ची है। बड़ी कब होगी।
कल शादी होगी। कितनी जिम्मेदारियां निभानी हैं।
अरे…। मैं तो खुश हुई थी कि आज “मेरी इच्छा” जानी जाएगी।
ये तो फिर।

और एक पल में मैं बच्ची हूं। दूसरे ही पल में मेरी शादी।
मां, कभी तो मुझे मेरी इच्छा से कुछ करने दो…
सबको तुम पर नाज़ है बच्चा।
तो इतने बंधन क्यों है?
तू नहीं समझेगी। ये प्यार होता है!
फिर नैराश्य भरी बातें।

अब शादी के बाद बंधन टूटने चाहिए
या कि अपने पैरों पर खड़े रहने वाली नई बेड़ियों की चिंता करें?
मैं तो ढेर सारी मस्ती करना चाहती हूं। ढेर सारे दोस्त बनाना चाहती हूं,आज़ाद होना चाहती हूं।
ये हैं कि फिर फंसाना चाहते हैं। होते कौन हैं,ये?
“मेरी इच्छा”।

रात को मां से मुलाकात हुई, कई दिनों बाद, उन्हें ध्यान से देखा
पापा की तबीयत को लेकर, भारी चिंता में थी वह
भाई की नौकरी का किस्सा, कई तरह की घर की समस्याएं
लेकिन मुझे न जाने क्या-क्या सिखाने की कोशिश करती रहीं
मैं अपनी ज़िंदगी जीना चाहती हूं। मैं शादी करना ही न चाहूं …
पागल हो गई हो क्या – ऐसे गन्दे शब्द …

हम तो, संगीत में क्या होगा, जोड़ा कैसा होगा और फेरे कहां करवाएंगे
यह सोच भी चुके हैं।

ये क्या कह रहे हैं।
आंखों में आंसू, गालों पर गढ्ढे और ओठों पर
थरथराहट
घर पर हुआ निर्णय।
लेकिन मैं शादी नहीं करूंगी।
फिर बना दृश्य विचित्र
झड़प। समझ। सलाह। तड़प।
तय हुआ जो वे चाहते थे।
“मेरी इच्छा”का क्या?

पढ़ाई का चक्र चलता ही रहता है।
मैंने वहां पूरी की। एक दूर की बहन थी उसने यहां,
चिंता का चक्र भी निरन्तर है,
बड़ी होती लड़कियों पर चलता ही रहता है।

मैं इतना पढ़ ली कि लड़का मिलना मुश्किल।
वो बहन पढ़ी। लेकिन लड़के वालों ने कहा और पढ़ी होती तो कमाती।
नानी के बगल वाले घर में थी एक लड़की। पढ़ न सकी।

सबको है डर। कौन होगा इसका वर।
पिता कहते, होगा सब अच्छा । हुआ ।
चाचा जानते थे मिलेगा समझदार। मिला ।
पढ़ न सकने का अर्थ नहीं है अनपढ़। उसके दूल्हे ने
कहा।

घरवालों का सपना हुआ साकार। था उनका
आधार :
बुद्धि चलानी है। विद्या चलेगी पीछे-पीछे।
दक्षता। क्षमता। योग्यता। लड़कियों में गुण
होते ही हैं, बहुत अच्छा चलेगा
अगर “तुम्हारी इच्छा”हो।

और लोग? समाज? पुरुष? वो क्या समझते हैं मुझे?
कि वो मेरे साथ दुर्व्यवहार करेंगे? अत्याचार
करेंगे?

नहीं मैं उनसे भयभीत, नहीं मैं उनसे निराश
नहीं मेरा किसी पुरुष में विश्वास।
शिक्षा ली है मैंने घटनाओं से। सीखा है मैंने
दुर्घटनाओं से।

रहा होगा सफल दादी, नानी, मां, दीदी
का जीवन
मैं उसे कहूंगी विफल, क्योंकि संभवत: वे परम्परा
ही निभा रही थीं
निश्चित ही वे जिम्मेदारियां ढो रही थीं
वे “स्वयं’ कुछ, क्या थीं?
पिता, भाई, श्वसुर, पति और परिवार इन्हीं से
उनके विचारों का आकार
सहानुभूति पर जीती रहीं वे, प्रेम बांटती,
करती रहीं वे।

पुरुष तो पुरुष, बच्चों से भी डरती रहीं वे।
मैं अपनी इच्छा से जीऊंगी, क्योंकि मैं “अलग’
हूं, क्योंकि मुझे चुनना आता है
क्योंकि मैं ब्रह्मांड हूं,
मैं यूनिवर्स हूं।

मेरा शरीर। मेरा दिमाग। मेरी इच्छा। माय चॉइस।
“मेरी इच्छा सब समझेंगे, असंभव है। किन्तु समझनी ही होगी।”

 क्योंकि संसार की जननी, जब एक मुट्ठी
भर पापियों से त्रस्त होकर, रुष्ट होकर,
कुंठित होकर, क्रुद्ध होकर परिवार की
जगह “मैं’ को चुनने की घोषणा करने पर
विवश हो जाए, तो हमारे पालन-पोषण
और संस्कार देने में भारी कमी हो गई है।

वह जीवन के सबसे सुंदर भाव “प्रेम” को भी
ठुकरा रही है। यह सबसे बड़ी चिंता है।
क्योंकि नारी ने ही हमें प्रेम सिखाया है।

©- (लेखक – कल्पेश याग्निक) दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर हैं।

-संदीप वर्मा – बीकानेर (राज.)

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संदीप वर्मा।

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आस्था और आशा

Kmsraj51 की कलम से…..

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♥ “आस्था और आशा” 

एक साधु थे। बाल्यावस्था से ही उन्होनें  घर छोड़  दिया था और ईश्वर से लौ लगा ली थी। दिन-रात भर प्रभु का भजन करते। जब भूख लगती तो आस-पास के घरों के सामने खड़े हो जाते और भजन गाने लगते। उनका कंठ अत्यंत मधुर था, इसलिए लोग उन्हें तन्मयता से सुनते और जो बन करता दे देते।

साधु को वैसे भी दो रोटी से ज्यादा की दरकार होती ही नहीं थी। एक दिन साधु भजन गाते-गाते जरा दूर निकल गये। जब दिन चढ़ आया तो खाने की सुध आई। निकट ही एक हवेली नजर आई। साधु वहीं खड़े होकर मग्न हो गए भजन गाने में।

हवेली थी एक धनिक व्यापारी की। रसोई के भीतर व्यापारी की पत्नी खाना बना रही थी। उसने साधु का भजन सुना तो मुग्ध हो गई । साधु को देने के लिए हाथ में भोजन भी ले लिया, लेकिन वो बाहर नहीं गई।

भीतर से ही कहा – रूको बाबा ! आ रही हूँ। साधु भी मस्त भाव से भजन गाते रहे। व्यापारी ने जब ये दृश्य देखा तो बोला – तुम भोजन हाथ में लिए खड़ी हो बाबा को दे नहीं रही, क्या वजह है?

व्यापारी की पत्नी भजन सुनते हुए फिर बोली – ठहरो, बाबा ! अभी आई। फिर पति को उत्तर दिया – भोजन साधु को दूंगी तो वह चले जायेंगें। मुझे उनका भजन बहुत प्रिय लग रहा है। उसे थोड़ा सुन लूं, फिर भोजन दूंगी।

इस प्रतीकात्मक का निहितार्थ यह है कि जब लंबे समय तक कोई मनोकामना पूर्ण न हो, तो निराश न हों, बल्कि यह मानना कि व्यापारी की पत्नी की भांति ईश्वर को आपकी प्रार्थना अच्छी लग रही है। वस्तुतः ईश्वर में विश्वास और स्वयं पर भरोसा रखते हुए आशावादी बने रहें तो अभिलक्षित लक्ष्य अवश्य पूर्ण होता है। ईश्वर की भक्ति में डूबे व्यक्ति को हर वस्तु में ईश्वर ही नजर आते हैं। जब ऐसी हालत हो जाती है, इतनी तड़प पैदा होती है तब जाकर ईश्वर की प्राप्ति संभव होती है।

                       -संदीप वर्मा – बीकानेर (राज.)

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♥”जीवन दर्शन”♥

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जीवन दर्शन

।। “ हम ईश्वर में भरोसा करते हैं ” ।।

(In God We Trust)

कहानी अमेरिका का है। किसी कम्पनी के मालिक ने अपने यहाँ काम करने वाले साधारण से दम्पति को एक दिन बिताने के लिए महलनुमा आवास पर आमंत्रित किया।

वह उनकी मेहनत व ईमानदारी का सम्मान करना चाहता था। महिला ज्यादा खुश थी कि उसे अत्यंत समृद्ध व जीवन का अनुभव लेने का मौका मिला है। बॉस ने अपनी मेहमान नवाजी पूरी तरह निभाई। उसने उन्हें अपना घर दिखाया और फिर वह उन्हें शहर के महंगे रेस्तरां में डिनर के लिए ले गया। वहां पहुंचने पर बॉस अचानक रुका और फर्श को देर तक मौन होकर देखता रहा।

फर्श पर एक पुराने, काले पड़ चुके सिक्के के अलावा कुछ नहीं था। बॉस ने सिक्का उठाकर जेब में इस तरह रखा मानो उन्हें तो कोई बड़ा खजाना मिल गया हो। महिला सोचने लगी कि इस बड़े आदमी को ऐसा करने की क्या जरूरत है?

आखिर महिला से रहा नहीं गया और उसने पूछा, ‘आपने जो सिक्का उठाया क्या वह कोई पुराना सिक्का है?”  मुस्कुराकर बॉस ने सिक्का निकालकर दिखाया और कहा, ‘ देखिए क्या लिखा है इस पर।’

महिला ने पढ़ा ‘यूनाइटिड स्टेट्स’।
बॉस ने और पढ़ने को कहा।
महिला ने पढ़ा ‘एक सेंट’।
उसने कहा और पढ़ो।

महिला ने पढ़ा, “इन गॉड वी ट्रस्ट ( हम ईश्वर में भरोसा करते हैं )।”

बॉस ने कहा, “ हां, ईश्वर का नाम पवित्र है। ईश्वर ने मुझे संदेश भेजा है कि मैं उन पर भरोसा रखूं। मैं कौन होता हूँ कि उसे नजर-अंदाज करूं? जब भी मुझे सिक्का दिखता है, मैं रुककर प्रार्थना करता हूँ और सिक्का उठाकर पुष्टि करता हूँ कि मुझे उस परमशक्ति पर भरोसा है। थोड़ी देर के लिए मैं इस भरोसा का आनंद लेता हूँ, जैसे यह भगवान की दी कोई खजाना है। सौभाग्य से ईश्वर के पास असीम धैर्य है और सिक्कों की अर्थात् खजानों की कोई कमी नहीं है।”
  -संदीप वर्मा, बीकानेर (राज.)

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“मन की आवाज”

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“मन की आवाज” 

दो दोस्त थे। दोनों बचपन में एक साथ पढ़े-लिखे थे। एक दोस्त जो पढ़ लिख कर बड़ा अमीर आदमी बन गया। वहीं उसका बचपन का दोस्त गरीबी के कारण गरीबी तक ही सिमित रहा। फिर भी दोनों की मित्रता में नहीं भाव में प्रभाव हुआ। एक बार दोनों मित्र मिले। धनवान दोस्त ने कार खड़ी की और दोनों बगीचे में बैठकर बातें करने लगे। बहुत इधर- उधर की बातें की फिर अपनी-अपनी समस्याएँ बताई। जब शाम होनें को चली तो दोनों बगीचे से निकल रहे थे…… तभी गरीब दोस्त अचानक रूक गया।

मित्र क्या हुआ ? अमीर दोस्त ने आश्चर्यचकित होते हुए कहा।

तुम्हें कुछ आवाज सुनी दी। गरीब दोस्त ने कहा।

अमीर दोस्त कुछ इधर-उधर मुड़ा फिर नीचे झुकते हुए सिक्का उठाकर बोला-किसी की आवाज नहीं थी मित्र। मेरा सिक्का गिरा था इसकी आवाज थी।

फिर भी गरीब दोस्त का मन शांत नहीं हुआ। जिधर से आवाज आ रही थी गरीब दोस्त उधर की तरफ गया। एक कांटे के छोटे पौधे में एक तितली पंख फडफड़ा रही थी। गरीब दोस्त ने उस तितली को धीरे से बाहर निकाला और आकाश में आजाद कर दिया।
अमीर दोस्त ने आतुरता से पूछा- तुम्हें तितली की आवाज कैसे सुनाई दी?

गरीब दोस्त ने नम्रता से कहा-

“तुम्हारे में और मुझ में ये ही फर्क है मित्र”
तुम्हें  ‘धन की आवाज’ सुनाई दी और
मुझे  “मन की आवाज” सुनाई दी।

♥- संदीप वर्मा, बीकानेर (राज.) 

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

♣- KMSRAJ51

 

 

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स्वागत है बेटी।

Kmsraj51 की कलम से…..

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स्वागत है बेटी। 

स्वागत है बेटी।
ऑटो में बैठी वो छोटी सी गुडिया स्कूल जा रही है। बस एक टक न जाने कहाँ निहारती। कब वह ऑटो में बैठती, कब स्कूल में पहुँचती, पता ही नहीं चलता।

कैसा मासूम था उसका बचपन? उसका वो उदासी चेहरा, उसकी मासूमियत, उसके बचपन को समझता कौन? आखिर क्यों वो ऐसे रहती हैं, अलग-थलग?

सब बच्चे स्कूल में मस्ती करते है, वो गुमसुम बैठी सोचती रहती। कुछ तो कमी थी उसकी जिंदगी में। जब लंच में सब बच्चे कहते कि मेरी मम्मी ने ये बनाया तो वो सुन कर उदास हो जाती। उस प्यार से डर जाती, जो उसे कभी ही नहीं था।

सब स्कूल की  छुट्टी होने के इंतज़ार में रहते और वो सोचती कि बस समय यहीं रुक जाए। शायद उसे स्कूल में रहना अच्छा लगता था। कभी-कभी उसके साथी पूछ लेते कि ‘घर नहीं जाना है क्या, इच्छा ?’

स्कूल गेट के बाहर जो वह नजारा देखती उसे कचोट सा जाता है। जब कहीं कोई बच्चा अपनी मम्मी, अपनी दादी तो कोई पापा के साथ घर जाता। उसकी नन्ही आँखों में छिपी मासूमियत मानो उसका खालीपन बयां करती। घर का दरवाजा खोला, अंदर गई, सहमी सी नीची नजरों से। बस यही दोहराती हुई बात रोज सुनती, “थोड़ा ठहर भी जाया कर इतनी भी जल्दी क्या रहती है, घर आने की।

“और वो ‘सॉरी आंटी ’कहकर अपने कमरे में चली जाती है, आंटी तीखे स्वर से पूछती है, ‘खाना नहीं खायेगी क्या’? बेमन से अपने हाथों से खाना खाती…फिर बस अपने खिलौने के साथ खेलते हुए कब उसकी आँखो में नींद आ जाती। पता ही नहीं चलता। बस यही सोचती हुई सो जाती कि काश मेरी माँ होती तो कैसा होता?

जन्म देते ही उसकी माँ दुनिया से अलविदा हो गई। वो भी बेटी को जन्म दिया था उसने, पिता को चाहिए था बेटा। बेटे की चाहत में कई बार उसके पिता ने उस पवित्र कोख से बेटी का अपहरण कर लिया था। इसी कारण उसकी माँ कमजोर हो चली थी। आखिर बड़ी मुश्किल से एक बिटिया को जन्म दिया अपनी कोख से लेकिन उस बदनसीब माँ की आँखों में अपनी बेटी का चेहरा देखना भी मुनासिब न था।

जन्म देते ही चल बसी वो। पिता ने दूसरी शादी कर ली परन्तु इच्छा को न माँ का प्यार मिला और न ही पिता का। अब वो सौतेली माँ जिसे वो आंटी कहती है, उससे खफ़ा रहती है।

बेटी जिसे शास्त्रों में लक्ष्मी माना गया है जिसके बिना घर में लक्ष्मी माँ का नहीं होता धन की प्राप्ति नहीं होती। उसका पिता अपनी ही बेटी को अपशकुन की तरह  मानते है।

माँ तो सिर्फ उसकी कल्पना में हैं। माँ का प्यार, दुलार उसे कभी मिला ही नहीं। माँ की तड़प इच्छा को, उसके पूरे वजूद को बिखरा देती है।

वो बस जी रही है। अब वो अपने को समझने लगी है। दीवार पर टंगी तस्वीर को निहारने के अलावा कुछ शेष नहीं है इच्छा के पास, जिसे उसकी माँ ने टांग रखा था और लिखा था –
“स्वागत है बेटी”।
 ♥-संदीप वर्मा {बीकानेर (राजस्थान)

Sandeep Verma-kmsraj51

संदीप वर्मा।

Post share by Mr. Sandeep Verma, from Bikaner (Raj.).

We are grateful to Mr. Sandeep Verma, for sharing inspirational Hindi “Heart-touching-real-Story.

We wish you a great & bright future. Thanks a lot dear Sandeep Verma.

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

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हम चिल्लाते क्यों हैं गुस्से में?

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हम चिल्लाते क्यों हैं गुस्से में?

एक बार एक संत अपने शिष्यों के साथ बैठे थे। अचानक उन्होंने सभी शिष्यों से एक सवाल पूछा; “बताओ जब दो लोग एक दूसरे पर गुस्सा करते हैं तो जोर-जोर से चिल्लाते क्यों हैं?”

शिष्यों ने कुछ देर सोचा और एक ने उत्तर दिया : “हमअपनी शांति खो चुके होते हैं इसलिए चिल्लाने लगते हैं।”

संत ने मुस्कुराते हुए कहा : दोनों लोग एक दूसरे के काफी करीब होते हैं तो फिर धीरे-धीरे भी तो बात कर सकते हैं। आखिर वह चिल्लाते क्यों हैं?” कुछ और शिष्यों ने भी जवाब दिया लेकिन संत संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने खुद उत्तर देना शुरू किया।

वह बोले : “जब दो लोग एक दूसरे से नाराज होते हैं तो उनके दिलों में दूरियां बहुत बढ़ जाती हैं। जब दूरियां बढ़ जाएं तो आवाज को पहुंचाने के लिए उसका तेज होना जरूरी है। दूरियां जितनी ज्यादा होंगी उतनी तेज चिल्लाना पड़ेगा। दिलों की यह दूरियां ही दो गुस्साए लोगों को चिल्लाने पर मजबूर कर देती हैं।

जब दो लोगों में प्रेम होता है तो वह एक दूसरे से बड़े आराम से और धीरे-धीरे बात करते हैं। प्रेम दिलों को करीब लाता है और करीब तक आवाज पहुंचाने के लिए चिल्लाने की जरूरत नहीं।

जब दो लोगों में प्रेम और भी प्रगाढ़ हो जाता है तो वह खुसफुसा कर भी एक दूसरे तक अपनी बात पहुंचा लेते हैं। इसके बाद प्रेम की एक अवस्था यह भी आती है कि खुसफुसाने की जरूरत भी नहीं पड़ती।

एक दूसरे की आंख में देख कर ही समझ आ जाता है कि क्या कहा जा रहा है।

शिष्यों की तरफ देखते हुए संत बोले : “अब जब भी कभी बहस करें तो दिलों की दूरियों को न बढ़ने दें। शांत चित्त और धीमी आवाज में बात करें। ध्यान रखें कि कहीं दूरियां इतनी न बढ़े जाएं कि वापस आना ही मुमकिन न हो।”

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निश्चय ही आप विजयी होंगे, यदि आप अपनी दुर्बलता (Weakness) को अपनी ताकत में तब्दील करना सीख लें।

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“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की व्यर्थ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51

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अलग-अलग दृष्टिकोण।

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अलग-अलग दृष्टिकोण।

मास्टर जी क्लास में पढ़ा रहे थे, तभी पीछे से दो बच्चों के आपस में झगड़ा करने की आवाज़ आने लगी। “क्या हुआ तुम लोग इस तरह झगड़ क्यों रहे हो ? ” मास्टर जी ने पूछा।

राहुल : सर, अमित अपनी बात को लेकर अड़ा है और मेरी सुनने को तैयार ही नहीं है।

अमित : नहीं सर, राहुल जो कह रहा है वो बिलकुल गलत है इसलिए उसकी बात सुनने से कोई फायदा नही।

और ऐसा कह कर वे फिर तू-तू मैं-मैं करने लगे।

मास्टर जी ने उन्हें बीच में रोकते हुए कहा, एक मिनट तुम दोनों यहाँ मेरे पास आ जाओ।

राहुल तुम डेस्क की बाईं और अमित तुम दाईं तरफ खड़े हो जाओ।

इसके बाद मास्टर जी ने कवर्ड से एक बड़ी सी गेंद निकाली और डेस्क के बीचो-बीच रख दी।

मास्टर जी : राहुल तुम बताओ, ये गेंद किस रंग की है।

राहुल : जी ये सफ़ेद रंग की है।

मास्टर जी : अमित तुम बताओ ये गेंद किस रंग की है ?

अमित : जी ये बिलकुल काली है। दोनों ही अपने जवाब को लेकर पूरी तरह कॉंफिडेंट थे की उनका जवाब सही है, और एक बार फिर वे गेंद के रंग को लेकर एक दुसरे से बहस करने लगे।

मास्टर जी ने उन्हें शांत कराते हुए कहा, “ठहरो, अब तुम दोनों अपने अपने स्थान बदल लो और फिर बताओ की गेंद किस रंग की है ?”
दोनों ने ऐसा ही किया, पर इस बार उनके जवाब भी बदल चुके थे।

राहुल ने गेंद का रंग काला तो अमित ने सफ़ेद बताया।

अब मास्टर जी गंभीर होते हुए बोले , “बच्चों, ये गेंद दो रंगो से बनी है और जिस तरह यह एक जगह से देखने पे काली और दूसरी जगह से देखने पर सफ़ेद दिखती है उसी प्रकार हमारे जीवन में भी हर एक चीज को अलग – अलग दृष्टिकोण से देखा जा सकता है।”

ये ज़रूरी नहीं है, की जिस तरह से आप किसी चीज को देखते हैं।

उसी तरह दूसरा भी उसे देखे….. इसलिए अगर कभी हमारे बीच विचारों को लेकर मतभेद हो तो ये ना सोचें की सामने वाला बिलकुल गलत है बल्कि चीजों को उसके नज़रिये से देखने और उसे अपना ‪‎नजरिया‬ समझाने का प्रयास करें। तभी आप एक अर्थपूर्ण संवाद कर सकते हैं।

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-KMSRAJ51

किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए हिम्मत और उमंग-उत्साह बहुत जरूरी है।

जहाँ उमंग-उत्साह नहीं होता वहाँ थकावट होती है और थका हुआ कभी सफल नहीं होता।

 ~KMSRAJ51

 

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