कैसे करें – गुस्से पर नियंत्रण।

Kmsraj51 की कलम से…..
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ϒ कैसे करें – गुस्से पर नियंत्रण। ϒ

Control Anger 

  • क्रोध को जीतने में मौन सबसे अधिक सहायक है।
  • मूर्ख मनुष्य क्रोध को जोर _ शोर से प्रकट करता है, किंतु बुद्धिमान शांति से उसे वश में करता है।
  • क्रोध करने का मतलब है, दूसरों की गलतियों कि सजा स्वयं को देना।
  • जब क्रोध आए तो उसके परिणाम पर विचार करो।
  • क्रोध से धनी व्यक्ति घृणा और निर्धन तिरस्कार का पात्र होता है।
  • क्रोध मूर्खता से प्रारम्भ और पश्चाताप पर खत्म होता है।
  • क्रोध के सिंहासनासीन होने पर बुद्धि वहां से खिसक जाती है।
  • जो मन की पीड़ा को स्पष्ट रूप में नहीं कह सकता, उसी को क्रोध अधिक आता है।
  • क्रोध मस्तिष्क के दीपक को बुझा देता है। अतः हमें सदैव शांत व स्थिरचित्त रहना चाहिए।
  • क्रोध से मूढ़ता उत्पन्न होती है, मूढ़ता से स्मृति भ्रांत हो जाती है, स्मृति भ्रांत हो जाने से बुद्धि का नाश हो जाता है और बुद्धि नष्ट होने पर प्राणी स्वयं नष्ट हो जाता है।
  • क्रोध यमराज है।
  • क्रोध एक प्रकार का क्षणिक पागलपन है।
  • क्रोध में की गयी बातें अक्सर अंत में उलटी निकलती हैं।
  • जो मनुष्य क्रोधी पर क्रोध नहीं करता और क्षमा करता है वह अपनी और क्रोध करने वाले की महासंकट से रक्षा करता है।
  • सुबह से शाम तक काम करके आदमी उतना नहीं थकता जितना क्रोध या चिन्ता से पल भर में थक जाता है।
  • क्रोध में हो तो बोलने से पहले दस तक गिनो, अगर ज़्यादा क्रोध में तो सौ तक।
  • क्रोध क्या हैं ? क्रोध भयावह हैं, क्रोध भयंकर हैं, क्रोध बहरा हैं, क्रोध गूंगा हैं, क्रोध विकलांग है।
  • क्रोध की फुफकार अहं पर चोट लगने से उठती है।
  • क्रोध करना पागलपन हैं, जिससे सत्संकल्पो का विनाश होता है।
  • क्रोध में विवेक नष्ट हो जाता है।

पढ़ेंविमल गांधी जी कि शिक्षाप्रद कविताओं का विशाल संग्रह।

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अगर कुछ बदलना है ताे सबसे पहले अपने सोच, कर्म व अपने आप काे बदलें।

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

~KMSRAJ51

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एक माँ का सन्देश।

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ϒ एक माँ का सन्देश। ϒ

सब माँओ की तरह मैं भी अपनी माँ से बहुत प्यार करती हूँ, उनका बहुत सम्मान करती हूँ। आज जब मैं स्वयं दो प्यारी बेटियों कि माँ हूँ, तो मैं उस अहसास को अच्छी तरह समझ सकती हूँ जो एक बेटी को स्वावलंबी बनाने के लिए आवश्यक है।

मेरी माँ ने मुझे पढ़ाया लिखाया और आत्मनिर्भर बनाया व यह सिखाया कि “शिक्षा” (Education) से बढ़कर कुछ नहीं है। शिक्षा ही मनुष्य को सही मायनों में मानवाेचित गुण जैसे – प्रेम, करुणा, त्याग, देश प्रेम आदि सिखाती है। एक बेटी को पढ़ाना और अधिक अनिवार्य है क्योकि आने वाले समय में वह एक परिवार का, एक नये समाज का सृजन करेगी। बेटी को पढ़ाना अत्यधिक अनिवार्य है काम है क्योकि हमारे भारत में अभी भी लड़कियों की शिक्षा की तरफ अधिक ध्यान नहीं दिया जाता।

तो ये नीचे लिखी कुछ पंक्तियाँ या याें कहाे की कुछ छाेटे-छाेटे संदेश उन सब के लिए हैं जाे बेटियाें की शिक्षा काे व्यर्थ मानते हैं …..

बेटी फूल है नहीं है शूल।
बेटी पढ़ना मत जाना भूल।

पड़ेगी बेटी तो जागेगा परिवार।
भारत ही नहीं, देखेगा संसार।

बेटी अबला नहीं, आलंबन है।
पढ़ाई से उसका, स्वावलंबन है।

 बेटी पढ़ेगी ताे पढ़ेगा इंडिया।
हर कदम पर आगे बढ़ेगा इंडिया।

भारत की बेटी पर, हर किसी को नाज़ होगा।
और भारत के सिर पर “जगतगुरु” का फिर वही ताज होगा।

हर भारतवासी को अपना फर्ज़ निभाना है।
और बेटों से पहले बेटी को बचाना और पढ़ाना है।

मेरी कही हुई इन बातों से यदि भारत की एक बेटी को भी शिक्षा प्राप्त हो गई तो मैं ये समझूंगी की मेरा प्रयास सार्थक हो गया, मेरा लेखन प्रामाणिक हो गया(My writing became authentic)

©- विदुषी शर्मा जी, दिल्ली 

ID : neerjasharma98@gmail.com

विदुषी शर्मा जी।

हम दिल से आभारी हैं विदुषी शर्मा जी के प्रेरणादायक हिन्दी Poem साझा करने के लिए।

विदुषी शर्मा जी के लिए मेरे विचार:

“विदुषी शर्मा जी” की कविताआे के हर एक शब्द में अलाैकिक सार भरा हैं। जाे हर एक शब्द पर विचार सागर-मंथन कर हृदयसात करने योग्य हैं। कविताऐं छोटी और सरल शब्दाे में हाेते हुँये भी हृदयसात करने योग्य हैं। जाे भी इंसान इन कविताओं काे गहराई(हर शब्दाे का सार) से समझकर आत्मसात करें, उसका जीवन धन्य हाे जायें।

पढ़ें – विमल गांधी जी कि शिक्षाप्रद कविताओं का विशाल संग्रह।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

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संयम की महिमा।

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ϒ संयम की महिमा। ϒ

शरीर से व मन, वचन और कर्म से पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें।

– Kmsraj51

संयमी पुरुष की स्मरणशक्ति, मेधा, आयु, आरोग्यता, पुष्टि, इन्द्रियों की शक्ति, शुक्र, कीर्ति और शक्ति सभी बढ़ी हुई रहती है तथा उसको बुढ़ापा देर से आता है।

– अष्टांगहृदय सूत्रः 7.71

अति यौन क्रिया से मनुष्य को सदा बचना चाहिए वरना शूल, खांसी, बुखार, श्वासरोग, दुबलापन, पीलिया, क्षय, आक्षेपक (ऐंठन) आदि व्याधियाँ ऐसे व्यक्ति को दबोच लेती है।

– चरक संहिताः 24.11

धर्म के अनुकूल, यश देने वाला, आयुवर्धक, दोनों लोकों में रसायन की तरह हितकारी और सर्वथा निर्मल ऐसे ब्रह्मचर्य का तो हम सदैव अनुमोदन करते हैं।

– अष्टांगहृदयसूत्र उत्तरः 40.4

“संग, दर्शन और श्रवण का प्रभाव अवश्य पड़ता हैष सावधान !”

“काम-वासना को पूरी तरह से वशीभूत करने की कोशिश करो। ऐसा करने में यदि कोई सफल हो सके तो उसके भीतर मेधा नाम की एक नई सूक्ष्म नाड़ी जागृत होती है। वह अधोगामी शक्ति को ऊर्ध्वगामी बनाती है। इस मेधा नाड़ी के खुलने के बाद सर्वोच्च परमात्मज्ञान प्राप्त होता है।”

– श्री रामकृष्ण परमहंस

जिसके मन से कामिनी-कांचन की आसक्ति मिट गई वह तो जिस क्षेत्र में सफल होना चाहे, हो सकता है। और तो क्या ? वह परब्रह्म परमात्मा को भी पा लेता है।

– अज्ञात

ब्रह्मचर्य वास्तव में एक बहुमूल्य रत्न है। यह एक सर्वाधिक प्रभावशाली औषध है, वास्तव में अमृत है जो रोग, जरा तथा मृत्यु को विनष्ट करता है। शांति, तेज, स्मृति, ज्ञान, स्वास्थ्य तथा आत्म-साक्षात्कार की प्राप्ति के लिए व्यक्ति को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए जो परम धर्म है। ब्रह्मचर्य सर्वोत्तम ज्ञान है, सर्वश्रेष्ठ बल है। वह आत्मा वास्तव में ब्रह्मचर्यस्वरूप है और यह ब्रह्मचर्य में ही निवास करती है। मैं प्रथम ब्रह्मचर्य को नमस्कार करके ही असाध्य रोगों का उपचार करता हूँ। ब्रह्मचर्य सभी अशुभ लक्षणों को मिटा सकता है।

– धन्वंतरि

ध्यान के लिए ब्रह्मचर्य-व्रत आवश्यक है। ब्रह्मचारिव्रते स्थितः।

– गीताः 6.14

अच्छी बातें कहना वाणी का ब्रह्मचर्य है। अच्छी बातें सुनना कानों का ब्रह्मचर्य है। अच्छी चीजें देखना आँखों को ब्रह्मचर्य है।

– श्री उड़िया बाबा

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गायत्री महामंत्र और उसका अर्थ।

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गायत्री महामंत्र और उसका अर्थ। 

Gayatri Mantra-Kmsraj51

गायत्री महामंत्र :
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

भावार्थ :
उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।

ध्यान दें –

👇 👇 👇

गायत्री उपासना के फलस्वरूप साधक में असंयम के लिए स्थान नहीं रहता, अतएव बीमारी और कमजोरी से भी उसे छुटकारा मिल जाता है। जो बीमारियाँ बहुत दिनों से शरीर में प्रवेश किए हुए थीं, बहुत दवा-दारू करने पर भी ठीक नहीं हो रही थीं, वे गायत्री उपासना से अपने आप ठीक होती देखी गई हैं। असाध्य रोगी मृत्यु के मुँह में से वापस लौटते देखे गए हैं। साधना द्वारा शरीर में सतोगुण की वृद्धि करना एक ऐसी रामबाण औषधि है, जिसके सामान सारे चिकित्सा शास्त्र में अन्य कोई वस्तु नहीं मिल सकती।


© युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य। ®

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* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

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 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

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चैत्र शुक्लपक्ष प्रतिपदा का ऐतिहासिक महत्व।

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ϒ चैत्र शुक्लपक्ष प्रतिपदा का ऐतिहासिक महत्व। ϒ

आज 31 मार्च, 2014 (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ) से संवत्सर 2071 से नए संवत्सर का उदय होगा। इस नए संवत्सर का नाम `प्लवंग’ है।

समय भागता हुआ वह कालपुरुष है, जिसके सिर के पीछे बाल नहीं हैं। इस दृष्टांत का तात्पर्य यह है कि समय को पकड़ पाना संभव नहीं है क्योंकि गतिमान होने के साथ-साथ वह अनंत और असीम है। किंतु हमारे त्रिकालदर्शी ऋषियों ने समय को मापने का भरपूर प्रयत्न किया था। उन्होंने समय की सर्वाधिक सूक्ष्म इकाई (त्रुटि) से लेकर महायुग, कल्प, ब्राह्म वर्ष आदि वृहद इकाईयों में समय की गणना करके काल का निर्धारण किया है। लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व भारतीय ज्योतिषियों ने ऋषि परंपरा के अनुरूप कालगणना की वैज्ञानिक पद्धति का विकास कर लिया था जो आज विश्व के वैज्ञानिकों के लिए प्रेरणाप्रद है।

चैत्रे मासि जगद् ब्रह्म ससर्ज प्रथमे अहनि, शुक्ल पक्षे समग्रेतु तु सदा सूर्योदयो सति। ब्रह्म पुराण में वर्णित इस श्लोक के अनुसार चैत्र मास के प्रथम सूर्योदय पर ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी। इसी दिन से विक्रमी संवत की शुरुआत होती है। आज भले ही ग्रेगेरियन कैलेंडर के अनुसार एक जनवरी को मनाया जाने वाला नववर्ष ज्यादा चर्चित हो, लेकिन इससे कहीं पहले से अस्तित्व में आया हिंदू विक्रमी संवत आज भी धार्मिक अनुष्ठानों और मांगलिक कार्यों में तिथि व काल की गणना का आधार बना हुआ है। अपनी सांस्कृतिक एवं धार्मिक विरासत को याद करते हुए एक नजर नवसंवत्सर पर-

  • खूबी ⇒
    विक्रमी संवत का संबंध किसी भी धर्म से न होकर सारे विश्व की प्रकृति, खगोल सिद्घांत और ब्रह्मांड के ग्रहों एवं नक्षत्रों से है। इसलिए भारतीय काल गणना पंथ निरपेक्ष होने के साथ सृष्टि की रचना और राष्टर की गौरवशाली परम्पराओं को दर्शाती है। यही नहीं, ब्रह्मांड के सबसे पुरातन ग्रंथ वेदों में भी इसका वर्णन है। नवसंवत यानी संवत्सरों का वर्णन यजुर्वेद के 27वें एवं 30वें अध्याय के मंत्र क्रमांक क्रमश: 45 व 15 मिनट में विस्तार से दिया गया है। विश्व में सौर मंडल के ग्रहों एवं नक्षत्रों के चाल, उनकी निरंतर बदलती स्थिति पर भी हमारे दिन, महीने, साल और उनके सूक्ष्मतम भाग आधारित होते हैं।
  • विक्रमी संवत ⇒
    ग्रेगेरियन कैलेंडर से अलग देश में कई संवत प्रचलित है। इसमें विक्रम संवत, शक संवत, बौद्घ एवं जैन संवत और तेलुगू संवत प्रमुख है। इन हर एक संवत का अपना एक नया साल होता है। देश में सर्वाधिक प्रचलित विक्रम और शक संवत है।
  • शुरुआत ⇒
    विक्रम संवत को सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को पराजित करने के उपलक्ष्य में 57 ईसा पूर्व शुरू किया था। विक्रम संवत चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होता है। भारतीय पंचांग और काल निर्धारण का आधार विक्रम संवत है।
  • अपना ही श्रेष्ठ ⇒
    विक्रम संवत के वैज्ञानिक आधार के कारण ही पश्चिमी देशों की संस्कृति के अंधानुकरण के बावजूद आज भी हम किसी भी शुभ लग्न चाहे वह बच्चे के जन्म की बात हो, नामकरण की बात हो, गृह प्रवेश या व्यापार करने की बात हो, सभी में हम पंडित के पास जाकर शुभ मुहूर्त पूछते है।
  • राष्ट्रीय कैलेंडर ⇒
    आजादी के बाद नवंबर, 1952 में वैज्ञानिक और औद्योगिक परिषद के द्वारा पंचाग सुधार समिति की स्थापना की गई। समिति ने 1955 में सौंपी अपनी रिपोर्ट में विक्रमी संवत को भी स्वीकार करने की सिफारिश की थी, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के आग्रह पर ग्रेगेरियत कैलेंडर को ही सरकारी कामकाज हेतु उपयुक्त मानकर 22 मार्च, 1957 को इसे राष्टï्रीय कैलेंडर के रूप में स्वीकार किया गया।
  • चैत्र शुक्लपक्ष प्रतिपदा का ऐतिहासिक महत्व ⇒
    – चैत्र शुक्लपक्ष प्रतिपदा से एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 113 साल पहले इसी दिन को ब्रह्मा जी ने सृष्टि का सृजन किया था।
    – सम्राट विक्रमादित्य ने 2071 साल पहले इसी दिन राज्य स्थापित कर विक्रम संवत की शुरुआत की।
    – लंका में राक्षसों का संहार कर अयोध्या लौटे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का राज्याभिषेक इसी दिन किया गया।
    – शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात नवरात्र स्थापना का पहला दिन यही है। प्रभु राम के जन्मदिन रामनवमी से पूर्व नौ दिन उत्सव मनाने का प्रथम दिन।
    – शालिवाहन संवत्सर का प्रारंभ दिवस। विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु इसी दिन का चयन किया।
    – समाज को अच्छे मार्ग पर ले जाने के लिए स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन आर्य समाज की स्थापना की।
    – सिख परंपरा के द्वितीय गुरु अंगददेव का जन्म दिवस।
    – सिंध प्रांत के प्रसिद्घ समाज रक्षक वरुणावतार संत झूलेलाल इसी दिन प्रकट हुए।
    – युगाब्द संवत्सर का प्रथम दिन, 5116 वर्ष पूर्व युधिष्ठिर का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ।
    – इसी दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव राव बलीराम हेडगेवार का जन्मदिवस भी है।
  • प्राकृतिक महत्व ⇒
    – वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है, जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चहुं ओर पुष्पों की सुगंध से भरी होती है।
    – फसल पकने का प्रारंभ यानी किसान की मेहनत का फल मिलने का समय भी यही होता है।
    – नक्षत्र शुभ स्थिति में होते है। यानी किसी भी कार्य प्रारंभ करने के लिए शुभ मुहूर्त होता है।

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Post Inspired by : Poojya Acharya Bal Krishan Ji Maharaj
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Bal Krishna Ji

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

* अपनी आदतों को कैसे बदलें।

निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

क्या करें – क्या ना करें।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

* विचारों का स्तर श्रेष्ठ व पवित्र हो।

* अच्छी आदतें कैसे डालें।

KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

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“ॐ” – OM या AUM – के जाप से होता है शारीरिक लाभ।

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ϒ “ॐ” के जाप से होता है शारीरिक लाभ। ϒ

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“ॐ” केवल एक पवित्र ध्वनि ही नहीं, अपितु अनंत शक्ति का प्रतीक है। अर्थात् ओउम् तीन अक्षरों से बना है, जो सर्व विदित है । अ उ म् । “अ” का अर्थ है आर्विभाव या उत्पन्न होना, “उ” का तात्पर्य है उठना, उड़ना अर्थात् विकास, “म” का मतलब है मौन हो जाना अर्थात् “ब्रह्मलीन” हो जाना । सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और पूरी सृष्टि का द्योतक है । ॐ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों का प्रदायक है । मात्र का जप कर कई साधकों ने अपने उद्देश्य की प्राप्ति कर ली। कोशीतकी ऋषि निस्संतान थे, संतान प्राप्तिके लिए उन्होंने सूर्यका ध्यान कर का जाप किया तो उन्हे पुत्र प्राप्ति हो गई । गोपथ ब्राह्मण ग्रन्थ में उल्लेख है कि जो “कुश” के आसन पर पूर्व की ओर मुख कर एक हज़ार बार रूपी मंत्र का जाप करता है, उसके सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं।

उच्चारण की विधि : प्रातः उठकर पवित्र होकर ओंकार ध्वनि का उच्चारण करें। ॐ का उच्चारण पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन, वज्रासन में बैठकर कर सकते हैं। इसका उच्चारण 5, 7, 10, 21 बार अपने समयानुसार कर सकते हैं। ॐ जोर से बोल सकते हैं, धीरे-धीरे बोल सकते हैं। ॐ जप माला से भी कर सकते हैं।

के उच्चारण से शारीरिक लाभ –

1. अनेक बार ॐ का उच्चारण करने से पूरा शरीर तनाव-रहित हो जाता है।

2. अगर आपको घबराहट या अधीरता होती है तो ॐ के उच्चारण से उत्तम कुछ भी नहीं।

3. यह शरीर के विषैले तत्त्वों को दूर करता है, अर्थात तनाव के कारण पैदा होने वाले द्रव्यों पर नियंत्रण करता है।

4. यह हृदय और ख़ून के प्रवाह को संतुलित रखता है।

5. इससे पाचन शक्ति तेज़ होती है।

6. इससे शरीर में फिर से युवावस्था वाली स्फूर्ति का संचार होता है।

7. थकान से बचाने के लिए इससे उत्तम उपाय कुछ और नहीं।

8. नींद न आने की समस्या इससे कुछ ही समय में दूर हो जाती है।
रात को सोते समय नींद आने तक मन में इसको करने से निश्चित नींद आएगी।

9. कुछ विशेष प्राणायाम के साथ इसे करने से फेफड़ों में मज़बूती आती है।

10. के पहले शब्द का उच्चारण करने से कंपन पैदा होती है।
इन कंपन से रीढ़ की हड्डी प्रभावित होती है और इसकी क्षमता बढ़ जाती है।

11. के दूसरे शब्द का उच्चारण करने से गले में कंपन पैदा होती है जो कि थायरायड ग्रंथी पर प्रभाव डालता है।

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