“गृहस्थी का आधार सिर्फ धन या वासना ना रहे”

kmsraj51 की कलम से …..

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“गृहस्थी का आधार सिर्फ धन या वासना ना रहे”


SOLUTION

समाज या देश कोई भी हो, अक्सर लोगों का वैवाहिक जीवन दो ही चीजों पर टिक जाता है अर्थ और काम। या तो रिश्ते को अर्थ की भूख ढंक लेती है या पति-पत्नी वासना की चादर ओढ़ लेते हैं। दोनों ही परिस्थितियों में गृहस्थी केवल एक समझौता हो जाती है। दाम्पत्य एक दिव्य संबंध होता है, जो सीधे परमात्मा से जोड़ता है। अपनी गृहस्थी को मंदिर बनाइए। इसमें जैसे ही परमात्मा का प्रवेश होगा, ये सांसारिकता से ऊपर उठ जाएगी।
विवाह केवल शारीरिक आवश्यकता या वंश वृद्धि के लिए नहीं होता। भागवत के प्रसंग में चलिए। जहां सृष्टि का निर्माण हुआ। पहले पुरुष मनु और पहली स्त्री शतरूपा का जन्म हुआ। उन पर ही मानव वंश की वृद्धि का भार भी था लेकिन उन्होंने कभी अपने रिश्ते का आधार वासना को नहीं बनाया। उन्होंने संतान उत्पत्ति को भी परमात्मा को समर्पित किया। घोर तपस्या की। ब्रह्मा को प्रसन्न किया। वरदान मांगा देव तुल्य संतानों की उत्पत्ति का।
मनु और शतरूपा ने ही सारे मानव और देव वंश को आगे बढ़ाया लेकिन उनके संबंध में न तो अर्थ था और ना ही कभी काम आया। दोनों ही भाव उनसे दूर रहे। दोनों ने अपने दाम्पत्य में कुछ कड़े नियम तय किए। जैसे संभोग सिर्फ संतान उत्पत्ति का साधन रहे, ना कि वो पूरे रिश्ते का आधार बने। देव पूजा नियमित हो, जो भी संतान उत्पन्न हो उसमें उच्च संस्कारों का संचार किया जाए। इसलिए मनु को आदि पुरुष माना गया है। जिन्होंने समाज को पूरी व्यवस्था दी।

हम भी गृहस्थी में रहें तो पति-पत्नी दोनों अपने लिए कुछ नियम तय करें। जिसमें परिवार, संतान, समाज और परमात्मा सभी के लिए कुछ सकारात्मक और रचनात्मक हो। तभी दाम्पत्य सफल भी होगा।

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