आयुर्वेदिक काढ़ा।

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ϒ आयुर्वेदिक काढ़ा। ϒ

मेरे सभी प्रिय पाठक मित्रों,

सर्दियों का माैसम आ गया हैं।

अच्छा स्वास्थ्य बनाने के लिए सर्दियों का माैसम Other माैसम की अपेक्षा ज्यादा लाभप्रद हाेता है। सर्दियों के माैसम में लगभग हरेक हरी सब्जियों का खजाना प्रकृति की आेर से हम मनुष्याें काे उपहार स्वरूप मिलता हैं।

सर्दियों के माैसम में स्वास्थ्य संबंधित बीमारियां भी बहुत ज्यादा हाेती हैं। सर्दी, जुक़ाम, कफ, खांसी और बुखार(ज्वर) आम बात हैं।

क्या कारण है जाे इस माैसम में सर्दी, जुक़ाम, कफ, खांसी और बुखार(ज्वर) इतनी जल्दी-जल्दी हाे जाती हैं। इसका मुख्य कारण है रोग प्रतिरोधक क्षमता(Immunity) का ज़रूरत से ज्यादा कम हाे जाना। अर्थात जब-जब शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता(Immunity) कम हाे जाती है बीमारियाें के जीवाणु अटैक कर देते है और शरीर बीमार हाे जाता हैं।

अब आप सभी के मन में सबसे बड़ा प्रश्न चल रहा हाेगा की आखिरकार – रोग प्रतिरोधक क्षमता काे कैसे संतुलित रखा जाए।

आज मैं आप सभी काे “रोग प्रतिरोधक क्षमता” काे संतुलित रखने के लिए, घर का बना “आयुर्वेदिक काढ़ा” बनाने का तरीका Step by Step बताऊगां।

“आयुर्वेदिक काढ़ा” बनाने का तरीका Step by Step  

“आयुर्वेदिक काढ़ा” बनाने के लिए जिन सामग्रियों की ज़रूरत पड़ती है ओ इस तरह से हैः

काली तुलसी की पत्ती, लाैंग, काली मिर्च, इलायची, अदरक, गुड़, चायपत्ती और पानी।

एक व्यक्ति के लिए सामग्रियों की मात्राः

काली तुलसी की पत्तीः कम से कम १५ – २० पत्ते।

लाैंगः कम से कम ३ – ५ पीसी हुई ।

काली मिर्चः कम से कम ४ – ६ पीसी हुई।

इलायचीः कम से कम २ पीसी हुई छोटी इलायची।

अदरकः १५ – २० ग्राम पीसी हुई।

गुड़ः स्वादानुसार।

चायपत्तीः कम से कम १ छोटा चम्मच।

पानीः ४०० मिलीलीटर(400 ML)।

“आयुर्वेदिक काढ़ा” बनाने की विधि।

सबसे पहले गैस स्टोव पर बर्तन में पानी चढ़ायें(रखें), जब पानी उबलने लगे तब उसमें सबसे पहले पीसी हुई लाैंग, काली मिर्च, इलायची, अदरक, और स्वादानुसार गुड़ ड़ाले, इन सब के ड़ालने के २ मिनट के बाद काली तुलसी की पत्ती ड़ाले, इसके ३-४ मिनट के बाद चायपत्ती ड़ाले, इन सब सामग्रियों काे ड़ालने के बाद तब तक पकाए – जब तक पानी की मात्रा लगभग १७५ मिलीलीटर(ml) रह जायें, इसे गैस स्टोव से उतार कर चाय छन्नी से कप या गिलास में छान लें। आपका “आयुर्वेदिक काढ़ा” बनकर तैयार हैं।

अब इसे गर्म चाय या कॉफी की तरह फुक-फुक कर पी लें।

सुबह की शुरूआत आयुर्वेदिक काढ़ें के साथ करें – बीमारियां आपसे काेसाें दुर हाेगीं।

अच्छी सेहत के लिए याद रखें।

संयमित व नियमित आहार लें।

⇒ खाने के साथ सलाद जरूर लें।

⇒ मौसम के अनुसार फलों का जूस व साबुत फल खाना ना भुलें।

 रात के खाने के बाद कम से कम १०० कदम अवश्य चलें।

 दिन में खाने के बाद कम से कम २०-३० मिनट तक आराम करें।

⇒ प्रतिदिन स्नान करें।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञानध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं।~Kmsraj51

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

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निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

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आयुर्वेद-अशोक वृक्ष के लाभ।

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ϒ आयुर्वेद – अशोक वृक्ष के लाभ। ϒ

ashok tree

यह भारतीय वनौषधियों में एक दिव्य रत्न है। भारत वर्ष में इसकी कीर्ति का गान बहुत प्राचीन काल से हो रहा है। प्राचीन काल में शोक को दूर करने और प्रसन्नता के लिए अशोक वाटिकाओं एवं उद्यानों का प्रयोग होता था, और इसी आश्रय से इसके नाम शोकनाश, विशोक, अपशोक आदि रखे गए हैं। सनातनी वैदिक लोग तो इस पेड़ को पवित्र एवं आदरणीय मानते ही हैं, किन्तु बौद्ध भी इसे विशेष आदर की दॄष्टि से देखते हैं क्यूंकि कहा जाता है की भगवान बुद्ध का जन्म अशोक वृक्ष के नीचे हुआ था। अशोक के  वृक्ष भारत वर्ष में सर्वत्र बाग़ बगीचों में तथा सड़कों के किनारे सुंदरता के लिए लगाए जाते हैं। भारत के हिमालयी क्षेत्रों तथा पश्चिमी प्रायद्वीप में ७५० मीटर की ऊंचाई पर मुख्यतः पूर्वीबंगाल, बिहार, उत्तराखंड, कर्नाटक एवं महाराष्ट्र में साधारणतया नहरों के किनारे व सदाहरित वनों में पाया जाता है। मुख्यतया अशोक की दो प्रजातियां होती हैं, जिनका प्रयोग चिकित्सा के लिए किया जाता है।

आज हम आपको अशोक के कुछ औषधीय गुणों से अवगत कराएंगे –

१- श्वास – ६५ मिलीग्राम अशोक बीज चूर्ण को पान के बीड़े में रखकर खिलाने से श्वासरोग में लाभ होता है।

२- रक्तातिसार – अशोक के तीन-चार ग्राम फूलों को जल में पीसकर पिलाने से रक्तातिसार (खूनीदस्त ) में लाभ होता है।

३- रक्तार्श ( बवासीर ) – अशोक की छाल और इसके फूलों को बराबर की मात्रा में लेकर दस ग्राम मात्रा को रात्रि में एक गिलास पानी में भिगोकर रख दें , सुबह पानी छानकर पीलें इसी प्रकार सुबह का भिगोया हुआ शाम को पीलें, इससे खूनी बवासीर में शीघ्र लाभ मिलता है।

४- अशोक के १-२ ग्राम बीज को पानी में पीसकर दो चम्मच की मात्रा में पीसकर पीने से पथरी के दर्द में आराम मिलता है।

५- प्रदर – अशोक छालचूर्ण और मिश्री को संभाग खरलकर, तीन ग्राम की मात्रा में लेकर गो-दुग्ध प्रातः -सायं सेवन करने से श्वेत -प्रदर में लाभ होता है।

=> अशोक के २-३ ग्राम फूलों को जल में पीसकर पिलाने से रक्त प्रदर में लाभ होता है।

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पूज्य आचार्य बाल कृष्ण जी महाराज।

मैं श्री आचार्य बाल कृष्ण जी महाराज का बहुत आभारी हूँ!!

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क्या करें – क्या ना करें।

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* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

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* चांदी की छड़ी।

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“तू ना हो निराश कभी मन से”

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मन काे कैसे नियंत्रण में करें।

मन के विचारों काे कैसे नियंत्रित करें॥

विचारों के प्रकार-एक खुशी जीवन के लिए।

अपनी सोच काे हमेशा सकारात्मक कैसे रखें॥

“मन के बहुत सारे सवालाें का जवाब-आैर मन काे कैसे नियंत्रित कर उसे सहीं तरिके से संचालित कर शांतिमय जीवन जियें।”

“तू ना हो निराश कभी मन से”

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“तू ना हो निराश कभी मन से”

 

 

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अजीर्ण (अपच)-

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पाचन तंत्र में किसी गड़बड़ी के कारण भोजन न पचने को अजीर्ण या अपच कहते हैं | कई बार समय-असमय भोजन करने से,कभी-भी,कहीं-भी,कुछ-भी खाने-पीने तथा बार-बार खाते रहने से पहले खाया हुआ भोजन ठीक से पच नहीं पाता है और दूसरा भोजन पेट में पहुँच जाता है | ऐसे में पाचनतंत्र भोजन को पूर्ण रूप से नहीः पचा पाता जो अजीर्ण का मुख्य कारण है | अधिक तला-भुना या मिर्च मसाले युक्त भोजन के सेवन से भी अजीर्ण या अपच हो जाता है |
इस रोग में रोगी को भूख नहीं लगती,खट्टी डकारें आती हैं,छाती में तेज़ जलन होती है,पेट में भारीपन महसूस होता है तथा बैचैनी सी होती रहती है | रोगी को पसीना अधिक आता है , नींद भी नहीं आती और कभी-कभी अतिसार [दस्त ] भी होता है | 

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अजीर्ण का विभिन्न औषधियों द्वारा उपचार —

१-अजवायन तथा सौंठ पीसकर चूर्ण बना लें | यह चूर्ण दिन में दो बार शहद के साथ चाटने से अपच में आराम मिलता है |
२-छाछ गरिष्ठ वस्तुओं को पचाने में बहुत लाभकारी होता है | छाछ में सेंधा नमक , भुना जीरा तथा कालीमिर्च मिलाकर सेवन करने से अजीर्ण रोग दूर होता है |
३-अजवायन -200 ग्राम , हींग -4 ग्राम और कालानमक -20 ग्राम को एक साथ पीसकर चूर्ण बना लें | यह चूर्ण 2 -2 ग्राम की मात्रा में सुबह -शाम गुनगुने पानी से खाने से लाभ होता है |
४-मेथी को पीस कर चूर्ण बना लें | इस चूर्ण को दिन में तीन बार 1-1 चम्मच गर्म पानी से खाने से अपच , पेटदर्द व भूख न लगना आदि दूर होता है |
५-प्रतिदिन पके हुए बेल का शर्बत पीने से अजीर्ण रोग ठीक होता है |
६-ताज़े पानी में आधे नींबू का रस , एक चम्मच अदरक का रस और चुटकी भर नमक मिलाकर पीने से अपच दूर होता है |
७-हरड़ , पिप्पली व सौंठ बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें | यह चूर्ण 3 -3 ग्राम दिन में दो बार , पानी के साथ सेवन करने से अजीर्ण में लाभ होता है |

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पूज्य आचार्य बाल कृष्ण जी महाराज

मैं श्री आचार्य बाल कृष्ण जी महाराज का बहुत आभारी हूँ!!

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“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की  व्यथ॔ के लीये समय ही ना बचे” Kmsraj51 

 

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