इंसानी दिलों में प्यार बना रहे।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

ϒ इंसानी दिलों में प्यार बना रहे। ϒ

प्यारे दोस्तों –

एक बार एक लड़का अपने स्कूल की फीस भरने के लिए एक दरवाजे से दूसरे दरवाजे तक कुछ सामान बेचा करता था। एक दिन उसका कोई सामान नहीं बिका और उसे बड़े जोर से भूख भी लग रही थी। उसने तय किया कि अब वह जिस भी दरवाजे पर जायेगा, उससे खाना मांग लेगा। दरवाजा खटखटाते ही एक लड़की ने दरवाजा खोला। जिसे देखकर वह घबरा गया और बजाय खाने के उसने पीने के लिए एक गिलास पानी माँगा।

making-love-in-the-human-heart-kmsraj51लड़की ने भांप लिया था कि वह भूखा है, इसलिए वह एक बड़ा गिलास दूध का ले आई, लड़के ने धीरे-धीरे दूध पी लिया। “कितने पैसे दूं?” लड़के ने पूछा,” “पैसे किस बात के? लड़की ने जवाव में कहा।” माँ ने मुझे सिखाया है कि जब भी किसी पर दया करो तो उसके पैसे नहीं लेने चाहिए। तो फिर मैं आपको दिल से धन्यबाद देता हूँ।

जैसे ही उस लड़के ने वह घर छोड़ा, उसे न केवल शारीरिक तौर पर शक्ति मिल चुकी थी बल्कि उसका भगवान और आदमी पर भरोसा और भी बढ़ गया था।

सालों बाद वह लड़की गंभीर रूप से बीमार पड़ गयी। लोकल डॉक्टर ने उसे शहर के बड़े अस्पताल में इलाज के लिए भेज दिया। विशेषज्ञ डॉक्टर होवार्ड केल्ली को मरीज देखने के लिए बुलाया गया। जैसे ही उसने लड़की के कस्वे का नाम सुना, उसकी आँखों में चमक आ गयी। वह एकदम सीट से उठा और उस लड़की के कमरे में गया। उसने उस लड़की को देखा, एकदम पहचान लिया और तय कर लिया कि वह उसकी जान बचाने के लिए जमीन-आसमान एक कर देगा।

उसकी मेहनत और लग्न रंग लायी और उस लड़की कि जान बच गयी। डॉक्टर ने अस्पताल के ऑफिस में जा कर उस लड़की के इलाज का बिल लिया। उस बिल के कौने में एक नोट लिखा और उसे उस लड़की के पास भिजवा दिया। लड़की बिल का लिफाफा देखकर घबरा गयी। उसे मालूम था कि बीमारी से तो वह बच गयी है, लेकिन बिल की रकम जरूर उसकी जान ले लेगी। फिर भी उसने धीरे से बिल खोला, रकम को देखा और फिर अचानक उसकी नज़र बिल के कौने में पेन से लिखे नोट पर गयी। जहाँ लिखा था “एक गिलास दूध द्वारा इस बिल का भुगतान किया जा चुका है।” नीचे डॉक्टर होवार्ड केल्ली के हस्ताक्षर थे।

ख़ुशी और अचम्भे से उस लड़की के गालों पर आंसू टपक पड़े उसने ऊपर कि ओर दोनों हाथ उठा कर कहा – “हे भगवान! आपका बहुत-बहुत धन्यवाद, आपका प्यार इंसानों के दिलों और हाथों द्वारा न जाने कहाँ-कहाँ फैल चुका है।

सीख – निस्वार्थ स्नेह व सच्चें प्यार का Return सदैव श्रेष्ठ(उत्तम) ही मिलता हैं। जब भी किसी कि मदद करें निस्वार्थ भाव से करें।

प्यारे दोस्तों – आपको यह सच्ची कहानी कैसी लगी, Comment`s कर जरूर बताये।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

 ~Kmsraj51

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

* अपनी आदतों को कैसे बदलें।

निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

क्या करें – क्या ना करें।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

* विचारों का स्तर श्रेष्ठ व पवित्र हो।

* अच्छी आदतें कैसे डालें।

KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

kmsraj51- C Y M T

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

~KMSRAJ51

 

 

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सबसे बड़ा पुण्य।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ सबसे बड़ा पुण्य। ϒ

मानव सेवा ही प्रभु (GOD) सेवा हैं। “जो लोग निष्काम होकर संसार की सेवा करते हैं, जो लोग संसार के उपकार में अपना जीवन अर्पण करते हैं। जो लोग मुक्ति का लोभ भी त्यागकर प्रभु के निर्बल संतानो की सेवा-सहायता में अपना योगदान देते हैं उन त्यागी महापुरुषों का भजन स्वयं ईश्वर करता है।” प्यारे दोस्तों … मुझे एक सच्ची कहानी याद आ रही है, कहानी कुछ इस तरह से हैं। बहुत समय पहले कि बात है…..

the-biggest-virtue-kmsraj51

एक राजा बहुत बड़ा प्रजापालक था। हमेशा प्रजा के हित में प्रयत्नशील रहता था। वह इतना कर्मठ था कि अपना सुख, ऐशो – आराम सब छोड़कर सारा समय जन-कल्याण में ही लगा देता था। यहाँ तक कि जो मोक्ष का साधन है अर्थात भगवत-भजन, उसके लिए भी वह समय नहीं निकाल पाता था।

एक सुबह राजा वन की तरफ भ्रमण करने के लिए जा रहा था कि उसे एक देव के दर्शन हुए। राजा ने देव को प्रणाम करते हुए उनका अभिनन्दन किया और देव के हाथों में एक लम्बी-चौड़ी पुस्तक देखकर उनसे पूछा…..

“महाराज, आपके हाथ में यह क्या है?”

देव बोले –  “राजन! यह हमारा बहीखाता है, जिसमे सभी भजन करने वालों के नाम हैं।”

राजा ने निराशायुक्त भाव से कहा – “कृपया देखिये तो इस किताब में कहीं मेरा नाम भी है या नहीं?”

देव महाराज किताब का एक-एक पृष्ठ उलटने लगे, परन्तु राजा का नाम कहीं भी नजर नहीं आया।

राजा ने देव को चिंतित देखकर कहा –  “महाराज ! आप चिंतित ना हों , आपके ढूंढने में कोई भी कमी नहीं है. वास्तव में ये मेरा दुर्भाग्य है कि मैं भजन-कीर्तन के लिए समय नहीं निकाल पाता, और इसीलिए मेरा नाम यहाँ नहीं है।”

उस दिन राजा के मन में आत्म-ग्लानि-सी उत्पन्न हुई लेकिन इसके बावजूद उन्होंने इसे नजर-अंदाज कर दिया और पुनः परोपकार की भावना लिए दूसरों की सेवा करने में लग गए।

कुछ दिन बाद राजा फिर सुबह वन की तरफ टहलने के लिए निकले तो उन्हें वही देव महाराज के दर्शन हुए, इस बार भी उनके हाथ में एक पुस्तक थी। इस पुस्तक के रंग और आकार में बहुत भेद था, और यह पहली वाली से काफी छोटी भी थी।

राजा ने फिर उन्हें प्रणाम करते हुए पूछा – “महाराज! आज कौन सा बहीखाता आपने हाथों में लिया हुआ है?”

देव ने कहा –  “राजन! आज के बहीखाते में उन लोगों का नाम लिखा है जो ईश्वर को सबसे अधिक प्रिय हैं!”

राजा ने कहा –  “कितने भाग्यशाली होंगे वे लोग? निश्चित ही वे दिन रात भगवत-भजन में लीन रहते होंगे! क्या इस पुस्तक में कोई मेरे राज्य का भी नागरिक है?”

देव महाराज ने बहीखाता खोला, और ये क्या, पहले पन्ने पर पहला नाम राजा का ही था।

राजा ने आश्चर्यचकित होकर पूछा – “महाराज, मेरा नाम इसमें कैसे लिखा हुआ है, मैं तो मंदिर भी कभी-कभार ही जाता हूँ?

देव ने कहा – “राजन! इसमें आश्चर्य की क्या बात है? जो लोग निष्काम होकर संसार की सेवा करते हैं, जो लोग संसार के उपकार में अपना जीवन अर्पण करते हैं। जो लोग मुक्ति का लोभ भी त्यागकर प्रभु के निर्बल संतानो की सेवा-सहायता में अपना योगदान देते हैं उन त्यागी महापुरुषों का भजन स्वयं ईश्वर करता है। ऐ राजन! … तू मत पछता कि तू पूजा-पाठ नहीं करता, लोगों की सेवा कर तू असल में भगवान की ही पूजा करता है।

परोपकार और निःस्वार्थ लोकसेवा किसी भी उपासना से बढ़कर हैं।

देव ने वेदों का उदाहरण देते हुए कहा – “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छनं समाः एवान्त्वाप नान्यतोअस्ति व कर्म लिप्यते नरे।”

अर्थात – “कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की ईच्छा करो तो कर्मबंधन में लिप्त हो जाओगे। राजन! भगवान दीनदयालु हैं। उन्हें खुशामद नहीं भाती बल्कि आचरण भाता है… सच्ची भक्ति तो यही है कि परोपकार करो। दीन-दुखियों का हित-साधन करो। अनाथ, विधवा, किसान व निर्धन आज अत्याचारियों से सताए जाते हैं इनकी यथाशक्ति सहायता और सेवा करो और यही परम भक्ति है।”

राजा को आज देव के माध्यम से बहुत बड़ा ज्ञान मिल चुका था और अब राजा भी समझ गया कि परोपकार से बड़ा कुछ भी नहीं और जो परोपकार करते हैं वही भगवान के सबसे प्रिय होते हैं।

प्यारे दोस्तों – जो व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा करने के लिए आगे आते हैं, परमात्मा हर समय उनके कल्याण के लिए यत्न करता है। हमारे पूर्वजों ने कहा भी है – “परोपकाराय पुण्याय भवति” अर्थात दूसरों के लिए जीना, दूसरों की सेवा को ही पूजा समझकर कर्म करना, परोपकार के लिए अपने जीवन को सार्थक बनाना ही सबसे बड़ा पुण्य है और जब आप भी ऐसा करेंगे तो स्वतः ही आप … ईश्वर के प्रिय भक्तों में शामिल हो जाएंगे।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

* अपनी आदतों को कैसे बदलें।

निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

क्या करें – क्या ना करें।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

* विचारों का स्तर श्रेष्ठ व पवित्र हो।

* अच्छी आदतें कैसे डालें।

KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

~KMSRAJ51

 

 

चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं।

Kmsraj51 की कलम से…..
Kmsraj51-CYMT-JUNE-15

ϒ चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं। ϒ

एक संत अपने शिष्य के साथ किसी अजनबी नगर में पहुंचे। रात हो चुकी थी और वे दोनों सिर छुपाने के लिए किसी आसरे की तलाश में थे।

उन्होंने एक घर का दरवाजा खटखटाया, वह एक धनिक का घर था और अंदर से परिवार का मुखिया निकलकर आया। वह संकीर्ण वृत्ति का था, उसने कहा – “मैं आपको अपने घर के अंदर तो नहीं ठहरा सकता लेकिन तलघर में हमारा स्टोर बना है। आप चाहें तो वहां रात को रुक सकते हैं, लेकिन सुबह होते ही आपको जाना होगा।”

वह संत अपने शिष्य के साथ तलघर में ठहर गए। वहां के कठोर फर्श पर वे सोने की तैयारी कर रहे थे कि तभी संत को दीवार में एक दरार नजर आई। संत उस दरार के पास पहुंचे और कुछ सोचकर उसे भरने में जुट गए।

शिष्य के कारण पूछने पर संत ने कहा-“चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं।” अगली रात वे दोनों एक गरीब किसान के घर आसरा मांगने पहुंचे।

किसान और उसकी पत्नी ने प्रेमपूर्वक उनका स्वागत किया। उनके पास जो कुछ रूखा-सूखा था, वह उन्होंने उन दोनों के साथ बांटकर खाया और फिर उन्हें सोने के लिए अपना बिस्तर दे दिया। किसान और उसकी पत्नी नीचे फर्श पर सो गए।

सवेरा होने पर संत व उनके शिष्य ने देखा कि किसान और उसकी पत्नी रो रहे थे क्योंकि उनका बैल खेत में मरा पड़ा था।

यह देखकर शिष्य ने संत से कहा- ‘गुरुदेव, आपके पास तो कई सिद्धियां हैं, फिर आपने यह क्यों होने दिया?
उस धनिक के पास सब कुछ था, फिर भी आपने उसके तलघर की मरम्मत करके उसकी मदद की, जबकि इस गरीब ने कुछ ना होने के बाद भी हमें इतना सम्मान दिया फिर भी आपने उसके बैल को मरने दिया।”

संत फिर बोले-“चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं।”

उन्होंने आगे कहा- ‘उस धनिक के तलघर में दरार से मैंने यह देखा कि उस दीवार के पीछे स्वर्ण का भंडार था। चूंकि उस घर का मालिक बेहद लोभी और कृपण था, इसलिए मैंने उस दरार को बंद कर दिया, ताकि स्वर्ण भंडार उसके हाथ ना लगे।

इस किसान के घर में हम इसके बिस्तर पर सोए थे। रात्रि में इस किसान की पत्नी की मौत लिखी थी और जब यमदूत उसके प्राण हरने आए तो मैंने रोक दिया। चूंकि वे खाली हाथ नहीं जा सकते थे, इसलिए मैंने उनसे किसान के बैल के प्राण ले जाने के लिए कहा।

अब तुम्हीं बताओ, मैंने सही किया या गलत।

यह सुनकर शिष्य संत के समक्ष नतमस्तक हो गया।

प्रिय दोस्तों,

ठीक इसी तरह “दुनिया हमें वैसी नहीं दिखती जैसी वह हैं, बल्कि वैसे दिखती हैं जैसे हम हैं।” अगर कुछ बदलना है ताे सबसे पहले अपने सोच, कर्म व अपने आप काे बदलें।

Jaya Kishori Ji-kmsraj51

जया शर्मा किशोरी जी।

Post inspired by जया शर्मा किशोरी जी। We are grateful to “Jaya Kishori Ji” for this inspirational Hindi Story for Kmsraj51.com readers.

जया शर्मा किशोरी जी। Facebook Page: Follow Now

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 पढ़ेंविमल गांधी जी कि शिक्षाप्रद कविताओं का विशाल संग्रह।

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अगर कुछ बदलना है ताे सबसे पहले अपने सोच, कर्म व अपने आप काे बदलें।

जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

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* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

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 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

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अपनी मदद स्वयं करें।

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ϒ अपनी मदद स्वयं करें। ϒ

एक बार तीन यात्री पहाड़ की यात्रा पर निकले। मार्ग दुश्वार था, रास्ते में धूप और थकान से उनका गला सूखने लगा। प्यासे यात्रियों की दृष्टि दूर बहते एक झरने पर पड़ी।

एक यात्री ने आसमान की ओर मुख किया और भगवान से प्रार्थना करने लगा कि वह बिना किसी प्रयास के झरने तक पहुंच जाए।

दूसरे ने मेघों को प्रसन्न करने के लिए स्तोत्र पढऩा प्रारंभ कर दिया।

तीसरा चुपचाप झरने की तरफ चल पड़ा और कुछ समय की यात्रा के बाद झरने तक पहुंच गया।
वहां उसने अपनी प्यास बुझाई और आगे की यात्रा पर निकल पड़ा।

♥ सीख ♥

भगवान भी उनकी ही सहायता करते हैं जो अपनी सहायता आप करने को तत्पर रहते हैं।

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सकारात्मक सोच + निरंतर कार्य = सफलता।

स्वयं पर और स्व-कर्माे पर विश्वास माना सफलता का आधार(नींव) मज़बूत।

 ~KMSRAJ51

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

 ~KMSRAJ51

“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की व्यर्थ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51

 ~KMSRAJ51

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जीतने की प्रबल इच्छा।

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ϒ जीतने की प्रबल इच्छा। ϒ

Strong desire to win-Kmsraj51

यह बात बहुत समय पहले कि है, एक महान शुरवीर योद्धा अपने दुश्मन राज्य से जब युद्ध करने जा रहा था, ताे उसने देखा की उसके सैनिकों में दुश्मनाें से युद्ध करने काे लेकर भय हैं। भय का मुख्य कारण था, दुश्मन राज्य के सैनिकों की संख्या बहुत अधिक थी।

युद्ध करने के लिए सागर के पार जाना था। वह महान शुरवीर योद्धा अपने सभी सैनिकों के साथ बड़े समुद्री जहाजाें व बड़े नावाें से सागर के किनारे पहुँचने पर सारे जहाजाें और नावाें काे जला दिया।

फिर उस महान शुरवीर योद्धा ने अपने सैनिकों का उत्साह बढ़ाते हुए बाेला अगर आप सभी काे वापस घर जाना है, ताे हर हाल में हम सभी काे दुश्मनाें से जीतना ही हाेगा, क्योंकी वापस जाने के लिए नाव व जहाज अब नहीं रहे । अगर हम सभी दुश्मनाें से युद्ध ना जीत पाए ताे यही मारे जायेगे। इसलिए हर हाल में हम सभी काे दुश्मनाें से युद्ध जीतना ही हैं।

साेचियें मित्रों क्या हुआँ हाेगा।

वह महान शुरवीर योद्धा, युद्ध जीत गया था। सभी सैनिकों काे आंतरिक प्रबल इच्छा शक्ति का एहसास हाे गया था।

सीख: अगर किसी भी कार्य काे करने की प्रबल आंतरिक दृढ़ इच्छा हाे, ताे सफलता जरूर मिलेगीं।

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सकारात्मक सोच + निरंतर कार्य = सफलता।

स्वयं पर और स्व-कर्माे पर विश्वास माना सफलता का आधार(नींव) मज़बूत।

 ~KMSRAJ51

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

 ~KMSRAJ51

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 ~KMSRAJ51

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माँ के दिल जैसा दुनिया मेँ कोई दिल नहीं।

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KMSRAJ51-CYMT

ϒ माँ का दिल।~सुमित वत्स। ϒ

एक १६ साल के लड़के ने
अपनी मम्मी से कहा की
मम्मी मुझे मेरे १८ वे साल के
जन्मदिन पर क्या गिफ्ट
दोगी?
तो उस लड़के की मम्मी ने
उस से कहा की जब
तेरा १८
सालवा आएगा तो अलमारी के
ऊपर देख लेना उसमे
तेरा गिफ्ट
रहेगा। अभी बता दूंगी तो
गिफ्ट
का मज़ा नहीं आएगा।
कुछ दिन बाद
वो लड़का बीमार
हो गया उसके
मम्मी पापा उसको अस्पताल
लेकर गए।

जाँच के बाद डॉक्टर ने
लड़के के माता-पिता से
कहा की इसके दिल में छेद
है ये अब २ महीने से
ज्यादा नही जी पायेगा।

२ साल भर बाद लड़का ठीक
होकर घर गया।
तो उसे पता चला की उसकी
माँ नही रही।
उसे ये पता चलते ही उसने
अलमारी खोली और उसने देखा की
अलमारी में एक गिफ्ट
पड़ा था। उसने जल्दी से
वो गिफ्ट खोला
उस गिफ्ट में एक
चिठ्ठी थी उस चिट्टी में
लिखा था की

” मेरे जिगर के टुकड़े अगर तू
ये चिठ्ठी पढ़ रहा है
तो तू बिलकुल ठीक
होगा तुझे याद है जब तू
बीमार हुआ था तब हम तुझे
अस्पताल लेकर गए थे।

डॉक्टर ने कहा की तेरे
दिल में छेद है तो उस दिन
मै बहुत रोई और
फैसला किया की मेरा दिल
तुजे दूंगी याद है एक दिन
तूने कहा था की मम्मी मुझे
१८ साल वे जन्मदिन पर
क्या दोगी तो बेटा मैं तुझे
अपना दिल दे रही हुँ,
उसको हमेशा संभाल कर
रखना। ……

“हैप्पी बर्थडे बेटा”

सार : एक माँ इसलिए मर
गयी क्यों की उसका बेटा जी
सके।
दुनिया में माँ से बड़ा दिल
किसी का नही।

माँ के दिल जैसा दुनिया मेँ
कोई दिल नहीं।

© सुमित वत्स।

Sumit Vats-kmsraj51

सुमित वत्स।

हम दिल से आभारी हैं सुमित वत्स जी के प्रेरणादायक हिन्दी कहानी साझा करने के लिए।

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

 ~KMSRAJ51

“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की व्यर्थ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51

 ~KMSRAJ51

 

 

 

 

अलग-अलग दृष्टिकोण।

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अलग-अलग दृष्टिकोण।

मास्टर जी क्लास में पढ़ा रहे थे, तभी पीछे से दो बच्चों के आपस में झगड़ा करने की आवाज़ आने लगी। “क्या हुआ तुम लोग इस तरह झगड़ क्यों रहे हो ? ” मास्टर जी ने पूछा।

राहुल : सर, अमित अपनी बात को लेकर अड़ा है और मेरी सुनने को तैयार ही नहीं है।

अमित : नहीं सर, राहुल जो कह रहा है वो बिलकुल गलत है इसलिए उसकी बात सुनने से कोई फायदा नही।

और ऐसा कह कर वे फिर तू-तू मैं-मैं करने लगे।

मास्टर जी ने उन्हें बीच में रोकते हुए कहा, एक मिनट तुम दोनों यहाँ मेरे पास आ जाओ।

राहुल तुम डेस्क की बाईं और अमित तुम दाईं तरफ खड़े हो जाओ।

इसके बाद मास्टर जी ने कवर्ड से एक बड़ी सी गेंद निकाली और डेस्क के बीचो-बीच रख दी।

मास्टर जी : राहुल तुम बताओ, ये गेंद किस रंग की है।

राहुल : जी ये सफ़ेद रंग की है।

मास्टर जी : अमित तुम बताओ ये गेंद किस रंग की है ?

अमित : जी ये बिलकुल काली है। दोनों ही अपने जवाब को लेकर पूरी तरह कॉंफिडेंट थे की उनका जवाब सही है, और एक बार फिर वे गेंद के रंग को लेकर एक दुसरे से बहस करने लगे।

मास्टर जी ने उन्हें शांत कराते हुए कहा, “ठहरो, अब तुम दोनों अपने अपने स्थान बदल लो और फिर बताओ की गेंद किस रंग की है ?”
दोनों ने ऐसा ही किया, पर इस बार उनके जवाब भी बदल चुके थे।

राहुल ने गेंद का रंग काला तो अमित ने सफ़ेद बताया।

अब मास्टर जी गंभीर होते हुए बोले , “बच्चों, ये गेंद दो रंगो से बनी है और जिस तरह यह एक जगह से देखने पे काली और दूसरी जगह से देखने पर सफ़ेद दिखती है उसी प्रकार हमारे जीवन में भी हर एक चीज को अलग – अलग दृष्टिकोण से देखा जा सकता है।”

ये ज़रूरी नहीं है, की जिस तरह से आप किसी चीज को देखते हैं।

उसी तरह दूसरा भी उसे देखे….. इसलिए अगर कभी हमारे बीच विचारों को लेकर मतभेद हो तो ये ना सोचें की सामने वाला बिलकुल गलत है बल्कि चीजों को उसके नज़रिये से देखने और उसे अपना ‪‎नजरिया‬ समझाने का प्रयास करें। तभी आप एक अर्थपूर्ण संवाद कर सकते हैं।

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Krishna Mohan Singh(KMS)
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