Q. A. W. – KMSRAJ51 – Ep.- 4th / 23-April-2017

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

ϒ Q. A. W. ~ KMSRAJ51 ϒ

ओम गंग गणपतये नमः 

श्री गणेश मंत्र ~

ऊँ वक्रतुण्ड़ महाकाय सूर्य कोटि समप्रभं।
निर्विघ्नं कुरू मे देव, सर्व कार्येषु सर्वदा।।

रविवार, 23 अप्रैल – विश्व पुस्तक दिवस 2017

Sunday, 23 April – World Book Day 2017

मेरे प्यारे दोस्तों और पाठकों –
आज – विश्व पुस्तक दिवस है – “इस संसार में सिर्फ किताबें ही किसी भी इंसान के सच्चे मित्र(दोस्त) हैं, जाे सदैव ही निस्वार्थ भाव से सिर्फ लाभ ही पहुचाती है, बिना किसी भेदभाव के” ….. KMSRAJ51

Q. 1 .⇒  क्या करें, जब कोई हमारे सपनों (dreams) काे तोड़ता हैं ?
                                                                  या
            अपने Mind को कैसे Control करें, जब अपने ही हमारे सपनों (Dreams) को ताेड़ते हैं ?

  या      अपने सपनों (Dreams) के जुनून (आग) को कैसे बरकरार रखें ?
                                                                                                         -मनीषा अग्निहोत्री, गोवा

                                                                                                         -प्रियंका पांडे, हाथरस (उत्तर प्रदेश)

A. 1 .⇒ एक बात सदैव ही – याद रखें ….. 

“”ये समाज कभी न छोड़े आपको।”

“The society will never leave you.

यह बिल्कुल सत्य है कि हमारे सपनों (Dreams) को सबसे ज्यादा अपने ही ताेड़ते हैं ? जान-पहचान के लाेग व रिश्तेदार ताे ताेड़ते की कोशिश (प्रयत्न) करते ही है, लेकिन सबसे ज्यादा – हमारे अपने ही हमारे सपनों (Dreams) को ताेड़ते हैं ?

  • जब भी कभी आपके सपनों को तोड़ने वाली बातें कोई भी कहे आपसे उसे (उस बात काे) अपने Mind के अंदर प्रवेश
    न करने दे, अर्थात – सुनते हुए भी अनसुना कर दें।
  • अपने सपनों (Dreams) की आग को अपने अंदर सदैव ही जलाये रखें। इस आग को कभी भी बुझने न दें।
  • अपने सपनों (Dreams) काे प्राप्त करने के लिए संपूर्ण रूप से, सच्चे मन से आपकाे – तन, मन व धन, से लग जाने पर ही प्राप्त हाेगा, आपका अपना Dreams.
  • किसी के सपनों को तोड़ना महापाप है। अगर आप किसी को प्रोत्साहित नहीं कर सकते तो – कम से कम उनके सपनों को तो न तोड़े।
  • अगर आपको अपने व अपने कार्य के ऊपर संपूर्ण विश्वास हैं ताे – आपके सारे सपनें अवश्य पुरें हाेगें। बस लगातार सच्चे तन, मन व धन, से लगे रहें अपने कार्य काे करने में।

काैन कहता है – कि आपके सपनें सच नहीं हाे सकते।
सच्चे मन से अपने सपनों को पाने के लिए आगे ताे बढ़ाें॥

आगे रास्ते ख़ुद-ब-ख़ुद बनते चले जायेगे – अर्थांत प्रकृति भी आपकी मदद(Help) करने लगती है। प्रकृति आपकाे आपके लक्ष्य तक पहुंचाने में सदैव ही मदद करती हैं।

अपने अवचेतन मन व चेतन मन दाेनाे काे बहुत ही ज्यादा शांत रखने की कोशिश करें। जब आपका मन पूर्ण शांत हाेगा – तभी आपकी आंतरिक(अंदरूनी) ऊर्जा बाहर निकलेगी और आप अपने सपनों(Dreams) काे सरलता पूर्वक प्राप्त कर लेगें।

चाहे अपने हाे या काेई बाहर का व्यक्ति जब भी आपके सपनों काे ताेड़ने वाली बातें आपसे करें, उनकी बातों पर जरा भी ध्यान न दें। याद रखें कि – उनकी बातें सिर्फ कचरा हैं, कचरे को अपने Mind में प्रवेश न करने दें, नहीं ताे सब कचरा-कचरा हाे जायेगा।

“कभी मैदान न छोड़े” – समस्याएं जीवन का हिस्सा है। जब तक हमें इस धरती पर रहने का सौभाग्य मिला है, हमें उन बाधाओं और चुनौतियों के साथ लगातार जूझने की कीमत चुकाना हाेगा।

जो जिंदगी हमारे सामने पेश करती है। बहरहाल अगर हम सिर्फ लगन से काम करे तो हम जित सकते है। “कभी हार न माने!”

अक्सर लक्ष्य उससे अधिक करीब होता है जो अशक्त और लड़खड़ाते आदमी को नज़र आता है। अक्सर संघर्ष करने वाला व्यक्ति हार मान लेता है, जब वह विजेता का कप जित सकता था, और उसे यह बहुत देर बाद पता चलता है, कि वह सोने के ताज के कितने करीब था।

सफलता विफलता का ही उल्टा रूप है, शंका के बदलो की सुनहरी किनारी है और आप कभी नही बता सकते की आप कितने करीब है। जब यह दूर दिखती है तो यह पास भी हो सकती है।

इसलिए जब आपको सबसे ज्यादा चोट पहुंचे तो जूझते रहे, जब चीजे ख़राब दिख रही हो – तो कभी भी मैदान न छोड़े।

एक पुरानी कहावत है कि “विजेता कभी मैदान नही छोड़ते और मैदान छोड़ने वाले कभी नही जीतते।” महान बनने के लिए आपको लगनशील बनना होगा और अपने सपनों को साकार करने की राह में कभी हार नहीं मानना।

याद रखे – जब आप हारते है, तो जीवन ख़त्म नहीं होता। जीवन तब ख़त्म होता है, जब आप मैदान छोड़ देते हैं।

याद रखे – अगर आप किसी काम का सपना देख सकते है तो आप उसे कर सकते हैं। आपको एक बेहतरीन दिन मुबारक हों।

मैंने पाया है कि महानता की सच्ची परिभाषा हैं : जब साधारण लोग असाधारण काम करें, लगातार जुटे रहे और हार मानने से इंकार कर दें। लगन हर कमी और सीमा की भरपाई कर देती हैं, जो आम तौर पर लोगो को अपने सपनों का पीछा करने से रोकती हैं। लगन वो पूंजी है – कर्म का वह कदम हैं, जो आपके सपनों को हकीकत में बदलता हैं। संकल्प एक नजरिया है, परन्तु लगन एक कर्म हैं। “कभी हार न मानने का कर्म।”

Q. 2 .⇒  अपने संकीर्ण सोच को विस्तार कैसे दें ?  या
                                         अपनी छोटी सोच को हम कैसे बड़ी करें ?  या
अपनी सकारात्मक सोच को कर्म में कैसे बदले ?  या
                                       अपने बड़े सोच को कर्म में कैसे लागू करें ?

                                                 रवि रंजन शुक्ला, सूरत (गुजरात) भूमिका गांगुली, कोलकाता (पश्चिम बंगाल),
                                                     ♦ नवनीत गुप्ता, पटना (बिहार),  निकिता शर्मा, नोएडा (उत्तर प्रदेश)

A. 2 .⇒  इस

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

* अपनी आदतों को कैसे बदलें।

निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

क्या करें – क्या ना करें।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

* विचारों का स्तर श्रेष्ठ व पवित्र हो।

* अच्छी आदतें कैसे डालें।

KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

kmsraj51- C Y M T

“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

~KMSRAJ51

 

 

 

 

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चालाक बगुला और केकड़ा।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

ϒ चालाक बगुला और केकड़ा। ϒ

बहुत समय पहले कि बात है घने जंगल में एक तालाब किनारे बहुत सारे जलीय जीव जब सुबह की धूप सेकने आए तो अपने शत्रु बगुले को एक टांग पर खड़े प्रार्थना करते देखा। आज उसने उन पर आक्रमण भी नहीं किया था।

clever-hern-and-crab-kmsraj51सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ – कि इस बगुले को क्या हुआ।
कुछ साहसी मछलियां – कछुए और केकड़े इकट्टे होकर उसके पास पहुंचे और पूछा – “क्या बात है बगुले दादा, आज किस चिंता में हो?”

“भाई लोगो – मैंने आज से भगताई शुरू कर दी है। कल ही मुझे स्‍वप्‍न आया कि दुनिया खत्म होने वाली है, इसलिए क्यों न भगवान का नाम लिया जाए और सुनो, यह तालाब भी सूखने वाला है। तुम लोग जल्दी ही किसी दूसरी जगह चले जाओ।”

“क्या तुम सच कह रहे हो।”

“हां भाई – मैं भला झूठ क्यों बोलूंगा। तुम देख ही रहे हो कि अब मैं तुम लोगों का शिकार भी नहीं कर रहा हूं, क्योंकि मैंने मांस खाना भी छोड़ दिया है। राम…राम…राम….।” बगुले का साधुपन देखकर सबको भरोसा आ गया कि बगुला भगत जो कह रहे हैं, सच है।

“बगुला भगत जी – अगर यह तालाब सूख गया तो हमारे बाल बच्चे तो तड़प-तड़पकर मर जाएंगे।” मेंढक ने कहा – “कोई उपाय करो।”

“भाई मैं आज रात ईश्वर से बात करता हूं, फिर जैसा वह कहेंगे तुम्हें बता दूंगा, मानना न मानना तुम्हारी मर्जी।”

सभी लोग बगुला भगत के पांव छूकर चले गए। दूसरे दिन बगुला भगत ने बताया कि भगवान ने कहा है कि अगर आप सब बगल वाले जंगल के तालाब में चले जाओ तो बच जाओगे।

मगर हम वहां जाएंगे कैसे? सबने चिन्ता जाहिर की। यदि यहां से वहां तक एक सुरंग खोद ली जाए तो….. – एक कछुआ बोला। अरे भाई ये क्या आसान काम है? केकड़ा बोला – और फिर इतनी लम्बी सुरंग कौन खोदेगा।

तभी एक मछली बोली – एक और भी उपाय है। बगुला भगत जी हमें अपनी पीठ पर बैठाकर वहां छोड़ आएं। यह सुनते ही बगुला भगत बोला – “मैं तो अब बूढ़ा हो गया हूं। इतना बोझा भला।”

“भगत जी – आप हमें एक-एक करके वहां ले जाओ।” आप तो अब साधु हो गए हैं और साधु का काम है दूसरों की रक्षा करना। सबने गुहार लगाई। अब जब आप इतना कह रहे हैं तो ठीक है। आओ, ये शुभ काम मैं आज से ही शुरू कर दूं। आओ, तुममें से एक मछली मेरी पीठ पर बैठ जाए।

एक चतुर मछली फौरन उछलकर उसकी पीठ पर बैठ गई। बगुला भगत उसे लेकर फौरन उड़ गया। इसी प्रकार कई दिन गुजर गए। बगुला रोज दो – तीन मछलियों, मेंढकों, कछुओं आदि को ले जाता रहा। एक दिन केकड़े की बारी आई – केकड़ा उसकी पीठ पर सवार था। बगुला भगत सोच रहा था, आज तो मजा आ जाएगा। केकड़े का बढि़या मांस खाने को मिलेगा।

उधर – एक पहाड़ी पर से गुजरते हुए केकड़े को ढेर सारी मछलियों की हडिृयां, कछुओं के खोल और मेंढकों के पिंजर पड़े दिखाई दिए तो वह बगुले भगत की सारी चालाकी समझ गया और बिना एक पल गंवाए उसने बगुले की गरदन दबोच ली।

“अरे केकड़े भाई, क्या करते हो?” बगुला चिल्लाया …

“पाखण्डी बगुले” – फौरन मुझे मेरे तालाब पर वापस लेकर चल वरना बेमौत मारा जाएगा। मैं तेरी सारी चालाकी समझ गया हूँ। अब चूंकि तू बूढ़ा हो चुका है, इसलिए तुझसे शिकार नहीं होता। इसीलिए तूने यह चाल चली और भोली-भाली मछलियों को यहां लाकर खा गया। अब अगर जिंदगी चाहता है तो वापस चल वरना तेरी कब्र भी यहीं बन जाएगी।

बगुला “मरता क्या न करता।” वह वापस पलटा और उसी तालाब पर आ गया। उसका ख्याल था कि केकड़ा उसे छोड़ देगा, मगर केकड़े ने उसे छोड़ा नहीं। उसने उसकी गरदन काट दी और तालाब में जाकर सबको उसकी हकीकत बता दी।

मौत के मुंह से बच गए सभी जीव केकड़े का धन्यवाद करने लगे।

प्यारे दोस्तों – जिसका स्वभाव धूर्तता का हो, अर्थात जाे धूर्त हाे उस पर भरोसा करने से धोखा ही मिलेगा। इसलिए कभी भी ज़िन्दगी में धूर्ताें पर विश्वास न करें।

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* चांदी की छड़ी।

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असीमित ऊर्जा आत्मिक-प्रेम में।

Kmsraj51 की कलम से…..

KMSRAJ51-CYMT

∇ असीमित ऊर्जा आत्मिक-प्रेम में।Θ

दोस्तों,

आत्मिक-प्रेम में वह शक्ति निहित है, जिससे शत्रु भी मित्र बन जाते हैं। प्रेम ताे वैसे ढाई आखर(ढाई अक्षर) का ही हाेता हैं। लेकिन इस ढाई आखर(ढाई अक्षर) में इतनी असीमित शक्ति निहित हैं, जिससे असंभव काे भी सरलता पूर्वक संभव में परिवर्तित किया जा सके।

“प्रेम” आत्मा(Soul) के ७ माैलिक गुणाें में से एक हैं। “प्रेम” माना आत्मा और परमात्मा(ईश्वर) के बीच संबंध।

आत्मा(Soul) के ७ माैलिक गुण यह हैं…..

1. शांति (Shanti),

2. सुख (Sukh),

3. प्रेम (Prem),

4. शक्ति (Power),

5. ज्ञान (Gyan),

6. पवित्रता (शुद्धि-Purity),

7. आनंद (आत्मिक खुशी-Anand),

काेई भी मनुष्य आपके साथ कितना भी बुरा बर्ताव करें फिर भी आप “प्रेम” कि शक्ति काे ना छाेडे़, आपकी कोशिश यही हाे कि आप उसके साथ भी प्रेमपूर्ण व्यवहार हि करें। एक ना एक दिन आपका शत्रु, आपके चरणाें में हाेगा।

आत्मिक-प्रेम हमे मनुष्याें से सच्चा स्नेह करना सीखाती हैं। आत्मिक-प्रेम से मनुष्य कें अंदर शहनशीलता, दया और करुणा स्वतः ही आ जाती हैं।

आज के समय में मनुष्याें के पास पैसा(Money) ताे बहुत है, लेकिन वर्तमान समय में मनुष्याें के पास ना ताे सच्ची शांति हैं, ना हि सच्चा सुख हैं। ऐसा इसलिए क्योंकी मनुष्याें के अंदर आत्मिक-प्रेम नहीं हैं।

जब तक मनुष्याें का मनुष्याें से आत्मिक-प्रेम नहीं हाेगा तब तक सच्चा सुख और सच्ची शांति ना मिलेगी।

दोस्तों,

सभी मनुष्याें काे यह समझना हाेगा कि…..

सभी मनुष्याें काे सभी मनुष्याें से आत्मिक-प्रेम के साथ स्नेह भरा व्यवहार करना हाेगा तभी सच्चा सुख और सच्ची शांति मिलेगी।

ओम शांति!!

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

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Conquering The Emotion Of Jealousy

Kmsraj51 की कलम से…..

Kmsraj51-CYMT04

Conquering The Emotion Of Jealousy – Part 1

Man was handed the master key of the knowledge of good and evil karma by God. He used the key to perform good karma for some time. That was the day of humanity. Over a period of time, while playing the game of different roles in the world theatre, the key was lost and man started to perform evil karma. The evil man started identifying with evil so much that he forgot his original good self and thought that evil is the eternal self. That was and is the night of humanity. That is why in the scriptures, mistakenly it is said that even angels used to sometimes feel jealous. In Indian scriptures, devis and devtas, the original good men and women, have mistakenly been shown to possess the emotion of jealousy at times. Poor perception of the evil men, who made the scriptures and temples in the remembrance of the good men and women, the angels, after they had ceased to exist! The good men and women were nothing but our early births as we started our journey of birth and rebirth as flawless beings.

Today humans are empowered beings who have the capacity to experience so many emotions, both positive and negative. Sadness, anger, happiness, sympathy and the list is endless. Out of all these one very powerful and dominating emotion is jealousy.When we see different players in this game of life playing different roles, sometimes while seeing them with the spectacles of role consciousness, feelings of jealousy or a desire to be like the other are experienced. Comparisons emerge in our minds.

While being competitive and having aspirations to succeed are absolutely fine and there is no doubt that to do that sometimes we have to look at the other or even others and this drive helps us meet life’s challenges also, but when this look at the other is accompanied by comparisons and feelings of low self esteem as a result and takes the form of jealousy; it gets out of control and starts having an adverse effect on our relationships, that steps should be taken to curb those feelings.

– Message –

To forgive the self is to have the ability to forgive others too.

Expression: I sometimes find it very difficult to forgive the mistakes committed by others. I do try to understand but am not able to understand the other person’s behaviour and so find it difficult to forgive them.

Experience: When I have love for myself and am able to learn from all that happens, I am able to forgive myself. When I know to do this, I can understand the other person too from his perspective and can easily forgive him.

Conquering The Emotion Of Jealousy – Part 2

In the 21st century, there are so many mediums which inculcate the feeling of jealousy in a person. Social Media is one such platform. While Facebook and Twitter rule the roost, commonly people wonder * How does he get so many likes? * How is she so photogenic? * Again a ‘check in’! * His life is so eventful. You never know how and when these thoughts start affecting your life, mental peace and behavior greatly.

Jealousy is a complex emotion, which often stems from insecurity or a fear of losing control. Everybody expresses and handles jealousy in a different way, but certain universal techniques can be used to help conquer it. Being aware of jealous feelings is the first step towards keeping it under control. Also conquering jealousy requires an honest conversation about how you feel. It’s far healthier to talk about your negative feelings than to reveal them through your actions. The more you communicate with them, and seek reassurance the more your feelings of jealousy will subside.

Hold a strong and determined belief inside yourself that jealousy is an emotion you will never face. Your idol or perfect self just doesn’t deserve the existence of the emotion. For instance, if you have an acquaintance of yours who is extremely pretty and sometimes, you envy her. That is the time when you need to firmly tell yourself that this is just not your perfect self. You can’t feel that way. Take a few minutes tostand back mentally from the person. The next step is to observe your thoughts as if you were an onlooker or a detached observer. Being as silent as possible, ask yourself as if the thoughts you are having are the ones you wish to keep, if they are going where you would choose them to go. In the resulting silence, steer (change direction) your thinking to where you want it to be; perhaps to personal affirmations (positive thoughts) you use to establish yourself on your seat of self-respect. The affirmations can be: * I am aware of myself as a special person with my own unique specialties or * I am aware of myself as internally rich, full of many invisible treasures, * I am aware of myself as a content being and overflowing with happiness, etc. This technique changes our attitudes and feelings and influences us positively.

– Message –

To have learnt means to bring about a practical change.

Expression: From all that happens, I usually understand a lot of things and take important lessons. But sometimes I find myself making the same mistakes again and again. So I am not able to bring about real change.

Experience: Once I realise and learn from a mistake that has happened, I need to spend some time in understanding it even further. I need to ensure I don’t ever repeat the same mistake. This will enable me to bring about real change.

Conquering The Emotion Of Jealousy – Part 3

Internal contentment or satisfaction is the antidote (neutralizer or healing agent) for jealousy. People with strong self-esteem and self-respect are the ones who remain satisfied or content and away from the emotion of jealousy while coming in contact with different people with their own unique specialties, virtues and attainments.

Self-respect or self-esteem depends on knowing who I am, knowing my eternal (ageless), internal self. When I have found that sense of internal identity, I feel I have a right to be here, to exist. Without this dimension, it is very difficult to really respect myself deeply. If I base my self-respect on identifying with the superficial (artificial) aspects of my being: my looks, personality, wealth, success, my friends, intelligence or my role, I will never have a stable sense of self-respect, because all these aspects are changeable. Thus I will end up fluctuating all the time.To stay stable in my self-respect, I need to have a deeper understanding of my internal self and tap into those riches that are within me forever, waiting to blossom, like the flower from the seed. As I become internally aware, those riches and resources start flowing out of me. The more stable I am in my self-respect, the more I radiate what I truly am. I feel a deep sense of contentment and I am happy to be me, however I am. I accept myself as I am.

Let us be honest a person who is jealous just cannot sit stably on the seat of self-respect – they keep moving i.e. fluctuating. Today they meet a person with lesser specialties or attainments than them and they are on top of the world – they rise above the seat of self-respect and enter the dimension of ego. Tomorrow they meet a person with more specialties or attainments than them and that is a bad day for them – they go underneath the seat of self-respect and enter the dimension of low self-esteem. What a shallow way of living! The ideal way of living – in both cases, remain in self-respect and give respect to the other. Remember that the jealous, the angry, the bitter and the egotistical are the first to race to the top of mountains. A confident and internally content person enjoys the journey, the people they meet along the way and sees life not as a competition. They reach the summit last because they know God isn’t at the top waiting for them. He is down below helping his followers to understand that the view is glorious where ever you stand.

– Message –

The ability to find solutions comes when I know the art of listening.

Expression: I normally get to hear a lot of things and tend to get coloured by all that I hear. The more I hear about negative things, the more difficult it becomes to maintain my own positivity. Yet I can do nothing to ignore the things that make me feel negative.

Experience: I need to know to listen to people rather than just hearing them. To know to listen means the ability to transform negative into positive. Just as a doctor listens to all the negative aspects about the disease etc and still knows only to give the medicine, I too need to listen in order to give what is required.

In Spiritual Service,
Brahma Kumaris

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अगर जीवन में सफल हाेना हैं. ताे जहाँ १० शब्दाें से काेई बात बन जाये वहा पर

१०० शब्द बाेलकर अपनी मानसिक और वाणी की ऊर्जा को नष्ट नहीं करना चाहिए॥

-Kmsraj51

 

 

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Overcoming The Fear Of Interaction Or Socializing

Kmsraj51 की कलम से…..

Kmsraj51-CYMT04

Overcoming The Fear Of Interaction Or Socializing

There are various activities that you are perhaps afraid of doing, but that you know they are very useful activities to indulge in e.g. if you are afraid of socializing or interacting with people, either on a one-to-one basis or in a group. In a party or a situation where lots are people are enjoying the company of each other or in a meeting with your boss for e.g., you feel out of place and uncomfortable. The problem might lie in a negative image of the self or low self-esteem, lack of confidence, fear of the other’s opinion about you, lack of spiritual strength, past failure in having done so, being influenced by the other person’s role or position etc. How do you overcome this fear? By interacting with more and more people. The more you interact and mix up with them and express your viewpoint fearlessly, you realize that it is not a problem. Even if you make a mistake or you feel unsure, with practice you will see that there is no problem.

Most of our fears are overcome with the practice of doing what you are afraid of. If you do not make a brave step forward in order to overcome the fear of expressing yourself, you will continue to be the victim of this fear. This fear is then a negative energy that paralyses your intellect as a result of which your concentration and your decision-making power reduces. It also disorganizes your ideas, and confuses you whenever you express yourself in front of a person or people. What is more, fear produces clumsiness in your words, body movements and actions and makes you lose your image of credibility. It gives an impression of nervousness and low self-respect to the other. You have to overcome it, and you will manage to do it with practice and by changing the vision that you have of others: they are not a threat, they are not judges who are going to pass a judgment against you, they are offering you the opportunity to express yourself. If you value yourself, you will not be afraid of not being appreciated by them and others will finally appreciate you. If you do not value yourself, the opposite will happen.

– Message –

The one who is free from expectations is the one who is constantly cheerful.

Expression: Usually I am quick to percieve my own desires and I do realise that desires give sorrow. So I make effort to overcome them. But most often I am not able to recognise my own expectations that I have from people which destroy my own cheer. My expectations from others prevent me from bringing about a positive change in myself.

Experience: I need to recognise that each and every individual is unique with his own unique specialities and values. When I recognise this uniqueness I will not expect people to behave according to what I feel is right but will respect them for what they are. Thus I’ll be able to be constantly cheerful.

In Spiritual Service,
Brahma Kumaris

Watch Peace of Mind TV (Peaceful Spiritual TV Channel) on following DTH
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In-English…..

Purity is the foundation of true peace & happiness,

It is your most valuable Property in your life,

Preserve it at any cast. !!

 

In-Hindi…..

पवित्रता सच शांति और खुशी का आधार है.

यह आपके जीवन में सबसे मूल्यवान संपत्ति है.

यह किसी भी कलाकार की रक्षा करता है!!

 ~KMSRAJ51

CYMT-kmsraj51-New

अगर जीवन में सफल हाेना हैं, ताे कभी भी काेई भी कार्य करें ताे पुरें मन से करे।

जीवन में सफलता आपकाे देर से ही सही लेकिन सफलता आपकाे जरुर मिलेगी॥

 ~KMSRAJ51

 

 

 

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“प्रेरणादायक हिन्दी उद्धरण और विचार”

Coming Soon Public Book …..

“तू ना हो निराश कभी मन से”
baby-TU NA HO NIRASH KABHI MAN SE

Some Topic of “तू ना हो निराश कभी मन से”

Change your mind thoughts “अपने मन के विचारों को बदलें”

“सफल लोग अपने मस्तिष्क को इस तरह का बना लेते हैं कि उन्हें हर चीज सकारात्मक व खूबसूरत लगती है।”

“हमेशा अपनी आत्मा की पहली आवाज सुनो”

“प्रत्येक कार्य आत्मा की पहली आवाज के अनुसार करो”

“एक अच्छा दिमाग हमेशा जानने के लिए उत्सुक …..”

“कुछ भी आप के लिए संभव है”

“ज्ञान हमेशा शुद्ध और पूरा हो”

“खुशी और सफल जीवन का मार्ग”

“अपने जीवन में निराशाजनक कुछ भी नहीं”

“अपने जीवन में हमेशा सफलता के निकटतम …..

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kmsraj51 की कलम से …..
Indian Flag

“विचार से कार्य की उत्पत्ति होती है, कर्म से आदत की उत्पत्ति होती है और चरित्र से आपके भाग्य की उत्पत्ति होती है।”
– बौद्ध कहावत

“हर सुबह मैं अपनी आँखे खोलता हूँ उस भविष्य को सँवारने के लिए जो मेरे लिए खास है। हर रात मैं अपनी आँखे बंद कर लेता हूँ और देखता हूँ कि मेरा लक्ष्य थोड़ा और मेरे पास है।”
-kmsraj51

“सफल लोग अपने मस्तिष्क को इस तरह का बना लेते हैं कि उन्हें हर चीज सकारात्मक व खूबसूरत लगती है।”
-kmsraj51

“असल में सफल लोग अपने निरंतर विश्वास से जीतते हैं लेकिन वे असफलताओं का मुकाबला भी उसी विश्वास से करते हैं। सफलता के लिए विश्वास पैदा कीजिये। असफल होने पर भी उस विश्वास को कायम रखिये।”
-kmsraj51

“सफल व्यक्ति सकारात्मक ढंग से प्रशंसा करते हैं और हँसी मजाक पर बुरा नहीं मानते। वे उत्साह फैलाते हैं। उनकी सकारात्मकता चारो तरफ़ फैलती है और उसकी खुशबु हर जगह बिखरती रहती है।”
-kmsraj51

“सफल लोग सबकी परवाह करते हैं। उनका यह लिहाज भी उन्हें दूसरों से अलग बनाता है।”
-kmsraj51

“प्रयासों को प्रोत्साहित कीजिये। तुम मुझे प्रोत्साहित करो, में तुम्हें कभी नहीं भूलूंगा।”
-kmsraj51

“बदलती मनः स्थिति ही एक स्वस्थ व रचनाशील व्यक्तित्त्व की निशानी है।”
-kmsraj51

“प्रयास करें अपने मन के छिद्रों को पहचान कर उन्हें भरने का”
-kmsraj51

“सोचें और लिखें : मेरी विशेषताएँ बदलाव की आवश्यकता मैं कैसे बदलाव करना चाहता हूँ जीवन में।”
-kmsraj51

“हम जो भी हैं, जो कुछ भी करते हैं, वह तभी होता है जब हम उसे वास्तव में करना चाहते हैं।”
-kmsraj51

जहाज समंदर के किनारे सर्वाधिक सुरक्षित रहता है। मगर क्या आप नहीं जानते कि उसे किनारे के लिए नहीं, बल्कि समंदर के बीच में जाने के लिए बनाया गया है ?
-kmsraj51

“हमारी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि हम अपने जीवन का कुछ सेकंड, प्रतिघंटा और प्रतिदिन कैसे बिताते हैं”
-kmsraj51

“जिसने अपने को वश में कर लिया है, उसकी जीत को देवता भी हार में नहीं बदल सकते”
– महात्मा बुद्ध

“अपनी सृजनात्मकता को तराशते रहिये।”
-kmsraj51

“सफलता सार्वजनिक उत्सव है, जबकि असफलता व्यक्तिगत शोक।”
-kmsraj51

“एकाग्र रहने वाला सदा सफलता का वरण करता है”
-kmsraj51

“कोई भी काम एक दिन में नहीं सफल होता। काम एक पेड़ की तरह होता है। पहले उसकी आत्मा में एक बीज बोया जाता है, हिम्मत की खाद से उसे पोषित किया जाता है और मेहनत के पानी से उसे सींचा जाता है, तब जाकर सालों बाद वह फल देने के लायक होता है”
-kmsraj51

“सफलता के लिए इन्तजार करना आना चाहिए। पौधे से फल की इच्छा रखना मूर्खता से अधिक कुछ भी नही है”
-kmsraj51

“असफलता सफलता प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। अपने मस्तिष्क को अपना रास्ता स्वयं खोजने की शक्ति दीजिये।
मेहनत कीजिये लेकिन बिना योजना के नहीं”
-kmsraj51

“आकांक्षा क्षणिक नहीं होती, न ही उन्मादी होती है। आवेग कहता है,- रुको मत, चलते रहो। ढ्लो मत, निखरते रहो।”
-kmsraj51

“किसी से अत्यधिक नफ़रत करने का सबसे बुरा असर यह होता है कि आप भी उस व्यक्ति की तरह बनने लगते है।”
– kmsraj51

“ये जरुरी बात नहीं है कि जो लोग आपके सामने आपके बारे में अच्छा बोलते है, वह आपके पीछे भी आपके बारे में यही राय रखते हों।”
-kmsraj51

“जीवन में जोश इस भावना से आता है कि आप उस काम का हिस्सा है जिसमें आप विश्वास रखते है, कुछ ऐसा जो अपने आप से भी बड़ा है।”
-kmsraj51

“अपने गुणों पे घमंड के कारण, व्यक्ति दूसरों के अवगुणों को देखता है और दूसरों के अवगुणों को देख कर, व्यक्ति का घमंड और अधिक मजबूत हो जाता है।”
-kmsraj51

“जब आप एक कठिन दौर से गुजरते हैं, जब सब कुछ आप का विरोध करने लगता है, जब आपको लगता है कि आप एक मिनट भी सहन नहीं कर सकते हैं, कभी हार न माने ! क्योंकि यही वह समय और स्थान है जब आपका अच्छा समय शुरू होगा”
-रूमी

“अगर आप उम्मीद नहीं करेंगे तो आप वह हासिल नहीं कर पाएंगे जो उम्मीद से ज्यादा है। ”
-kmsraj51

“जीवन में कभी भी आशा को न छोड़े क्योंकि आप कभी यह नहीं जान सकते कि आने वाला कल आपके लिए क्या लाने वाला है”
-kmsraj51

“असफलताएँ जीवन का एक हिस्सा है, अगर आप कभी असफल नहीं होंगे तो आप कभी सीखेगें नहीं। जब आप सीखेगें नहीं, परिणाम सवरूप आप में बदलाब नहीं आएगा और न ही आप नई चीज़े सीख पाएंगे ।”
-kmsraj51


“सभी शक्ति तुम्हारे भीतर है, आप उस में विश्वास कर सकते हैं”
-kmsraj51

“हर स्कूल अपने छात्रों के चरित्र में परिलक्षित हो जाता है”
-kmsraj51

“जो तुम्हारी बात सुनते हुए इधर-उधर देखे, उस पर कभी विश्वास न करो”
-चाणक्य

“मेरा ‘डर’ मेरा ही एक हिस्सा है और शायद सबसे सुंदर हिस्सा”
-फ्रांज़ काफ्का”

“जीवन में सफल होना इस लिए भी मुश्किल है कि ज्यादातर लोग आपको आगे बढ़ाने की जगह पीछे खींचना पसंद करते है”
-kmsraj51

“जब ये आपका अपना जीवन है तो आप इसको अपने तरीके से क्यों नहीं जी रहे है”
-kmsraj51

“जिंदगी कितनी खुबसूरत है ये देखने के लिए हमें ज्यादा दूर जाने की जरुरत नहीं है, जहाँ हम अपनी आंखे खोल ले वहीँ हम इसे देख सकते है”
-kmsraj51


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95 kmsraj51 readers

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बेनाम रिश्ता।

Kmsraj51 की कलम से…..

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♣♥ बेनाम रिश्ता। ♣♥

-मृदुला सिन्हा।

चित्राजी निमंत्रण-पत्र के साथ हाथ से लिखे मनुहार पत्र के हर अक्षर को अपनी नजरों से आँकती उनमें अंतर्निहित भावों को सहलाने लगीं। कई बार पढ़े पत्र। सोचा विवाह में इकट्ठे लोग पूछेंगे—मैं कौन हूँ? क्या रिश्ता है शालिग्रामजी से मेरा? क्या जवाब दूँगी मैं? क्या जवाब देंगे शालिग्रामजी? दोनों के बीच बने संबंध को मैंने कभी मानस पर उतारा भी नहीं। नाम देना तो दूर की बात थी। बार-बार फटकारने के बाद भी वह अनजान, अबोल और बेनाम रिश्ता चित्राजी को जाना-पहचाना और बेहद आत्मीय लगने लगा था। कभी-कभी उसके बड़े भोलेपन से भयभीत अवश्य हो जाती थीं और तब उस रिश्ते के नामकरण के लिए मानो अपने शब्द भंडार में इकट्ठे हजारों शब्दों को खँगाल जातीं। नहीं मिला था नाम। और जब नाम ही नहीं मिला तो पुकारें कैसे?

इसलिए सच तो यही था कि उन्होंने कभी उस रिश्ते को आवाज नहीं दी। रिश्ते के जन्म और अपनी जिंदगी के रुक जाने के समय पर भी नहीं। जिंदगी के पुनःचालित होकर उसकी भाग-दौड़ में भी नहीं। शालिग्रामजी को कभी स्मरण नहीं किया। शालिग्रामजी ने ही बेनाम रिश्ते को याद रखने की पहल की थी।

बहुत सोच-विचार करने के बाद चित्राजी ने भोपाल जाना तय कर लिया। बहुत दूर जाना था। बस, और फिर ट्रेन की यात्रा। वह भी गरमी में। शालिग्रामजी ने दूरभाष पर ही विश्वास दिलाया था—‘आपको कोई दिक्कत नहीं होगी। मेहमानों को ठहराने की व्यवस्था करते समय भी हमने मौसम का ध्यान रखा है। मैं समझता हूँ, हमारे मेहमानों को कोई कष्ट नहीं होगा। और आप तो खास मेहमान हैं।’

चित्राजी कुछ नहीं बोलीं। उन्होंने जब जाने का निश्चय ही कर लिया था तो कष्ट और आराम का क्या? शिमला बस स्टैंड पर वॉल्वो बस में बैठ गई थीं। मोबाइल की घंटी बजी। शालिग्रामजी का फोन था। उन्होंने कहा, ‘‘आपकी बस के दिल्ली बस अड्डे पर रुकते ही हमारा एक आदमी मिलेगा। उसका नाम राकेश है। उसके पास आपकी रेल टिकट होगी।’’

चित्राजी ने कुछ नहीं कहा। इतना भी नहीं कि मैंने टिकट ले रखी है। और वैसा ही हुआ। उनकी बस के रुकते ही एक व्यक्ति अंदर घुसा। उसकी खोजी नजर ने चित्राजी को पहचान लिया। उनकी अटैची नीचे उतारकर बोला, ‘‘आपके पास यदि कोई टिकट है तो मुझे दे दीजिए। मैं उसे कैंसिल करवा दूँ। ए.सी. द्वितीय श्रेणी की यह टिकट रख लीजिए। ट्रेन शाम को निजामुद्दीन स्टेशन से जाती है। मैं आपको लेने आ जाऊँगा। मैं भी आपके साथ चल रहा हूँ।’’

चित्राजी ने उस व्यक्ति को स्लीपर क्लास की टिकट निकालकर दे दी। वे थ्री-व्हीलर में बैठकर गोल मार्केट स्थित अपनी एक सहेली के क्वार्टर में चली गईं। शाम को सबकुछ वैसे ही घटा जैसा राकेश ने बताया था।

सुबह-सुबह गाड़ी के भोपाल जंक्शन पर रुकते ही एक नौजवान उनकी सीट तक आ गया। उनके पैर छूकर बोला, ‘‘मैं दीपक हूँ। मेरे पिता का नाम शालिग्राम कश्यप है।’’

चित्राजी ने ‘खुश रहने’ का आशीष दिया और उसके पीछे चल पड़ीं। गाड़ी आगे बढ़ रही थी। रोड पर भीड़ के कारण कभी-कभी उसका हॉर्न बजता। अंदर पूरी शांति बनी रही। कोई कुछ नहीं बोला। चित्राजी उस नौजवान से बातें करना चाहती थीं, पर शुरुआत कैसे करें।
उस घर की चौहद्दी, आबादी, संस्कार और स्थितियाँ, कुछ भी तो नहीं जानती थीं। भोपाल शहर के बारे में पूछने ही जा रही थीं कि दीपक बोल पड़ा—‘‘मैं आपको आंटी कहूँ ?’’

‘‘हुँ’’
‘‘तो आंटी! बारात आज शाम को आ रही है, लोकल बारात है, इसलिए समय से ही आ जाएगी। मैंने सुना कि आप कल ही लौट रही हैं। आपके पास समय बहुत कम है। पिताजी ने कहा है कि आप भोपाल शहर पहली बार आ रही हैं। इसलिए भोपाल भी तो देखना चाहेंगी। बड़ा सुंदर शहर है हमारा। आप जल्दी से तैयार हो जाएँ। आपको मेरा मौसेरा भाई घुमाने ले जाएगा।’’

‘‘ठीक है।’’ इतना ही बोल पाईं चित्राजी। मन तो उस व्यक्ति के प्रति आभार प्रकट करने को बन आया था। उनकी इतनी चिंता करनेवाले नौजवान को शाबासी भी दी जा सकती थी। पर वे कुछ नहीं बोलीं। दीपक बोला, ‘‘मेरे पिताजी आपकी बहुत प्रशंसा करते हैं। कहते हैं, आप साक्षात् देवी की अवतार हैं। पर पता नहीं क्यों, न आप कभी भोपाल आईं, न हमें शिमला बुलाया। कुछ देर पहले ही आपके बारे में बताया। आपसे मिलने की चाहत पनप आई। इसलिए कई काम छोड़कर स्वयं स्टेशन आ गया।’’

चित्राजी कुछ बोलने के लिए जिह्वा पर शब्द सजाने लगीं कि ड्राइवर ने गाड़ी में ब्रेक लगा दिया था। गाड़ी किसी गेस्ट हाउस के सामने रुकी। गाड़ी से उनका सामान निकालकर दीपक आगे बढ़ा। वे पीछे-पीछे। उन्हें अंदर तक पहुँचाकर बोला, ‘‘आंटी! आप यहाँ नहा-धो लें। नाश्ता घर पर ही करना है। फिर आप भोपाल दर्शन के लिए निकलेंगी। दोपहर का भोजन भी घर पर ही है। भोजन के बाद फिर यहाँ आराम करिएगा। शाम को तो शादी ही है।’’

चित्राजी कुछ नहीं बोलीं। दीपक के कमरे से निकलने पर अवश्य उसके पीछे गईं। आँखों की पहुँच से उसकी काया ओझल हो जाने पर पीछे लौट कमरे की सिटकिनी बंद कर बिस्तर पर बैठ गईं। सोचने लगीं—दीपक कितना लायक लड़का है। उन्नीस-बीस वर्ष का होगा। इतना जिम्मेदार और पितृभक्त! समाज नाहक परेशान है कि युवा पीढ़ी बिगड़ गई। मेरे साथ थोड़ी देर गुजारकर इस युवा ने मेरे मन में जगह बना ली। पर श्रेय तो इसके पिता को ही जाता है, शालिग्रामजी को। उनका ध्यान आते ही चित्राजी उठ बैठीं। अपना ध्यान बँटाने के लिए तैयार होने लगीं। चित्राजी के नहा-धोकर तैयार होते ही नरेश आ गया था। उन्हें नाश्ते के लिए ले जाते हुए पूछा, ‘‘आप दीपक की बुआजी हैं? उसकी दो बुआओं से मिल चुका हूँ। आपसे पहली बार मिला। दीपक का मैं मित्र हूँ।’’

शालिग्रामजी शीघ्रता से गेट पर पहुँचे। उन्होंने चित्राजी का अभिवादन किया। नरेश ने कहा, ‘‘घुमा लाया आंटी को भोपाल। इन्हें तीनों ताल अच्छे लगे।’’

नरेश इतना नहीं कहता तो शायद चित्राजी सामने खड़े व्यक्ति को पहचान भी नहीं पातीं। कुछ दरक गया था चित्राजी के अंदर। उन्होंने अपने को सँभाला। हाथ जोड़कर उनके अभिवादन का उत्तर देते हुए चेहरे पर भी मुसकान थी। नाश्ते का इंतजाम फ्लैट के बाहरवाले हिस्से में ही किया गया था। कुछ लोग नाश्ता समाप्त कर चुके थे, कुछ का जारी था, कुछ आनेवाले थे। शालिग्रामजी को चित्राजी को लेकर नाश्ते के स्थान पर पहुँचने में दो मिनट भी नहीं लगे होंगे, पर वहाँ उपस्थित नाश्ता कर रहे मेहमानों के प्लेट में पडें स्वादिष्ट व्यंजनों में मानो एक विशेष व्यंजन आ टपका।

‘‘ये कौन हैं?’’ प्रश्न पसरा।
‘‘इन्हें तो पहले कभी नहीं देखा।’’ स्वाद लेने लगे लोग।
आपस में प्रश्नों का आदान-प्रदान हो रहा था। उत्तर किसी के पास नहीं था। शालिग्रामजी की पत्नी माला भी आ गईं। रिश्तेदारों से नाश्ता का स्वाद पूछतीं, कुछ और लेने का आग्रह करतीं, आगे बढ़ रही थीं। किसी ने पूछ ही लिया—‘‘वे कौन हैं? कोटा की साड़ी में वे सुंदर सी महिला?’’
माला ने इधर-उधर आँखें दौड़ाईं। दूसरी ने स्वर दाबकर ही कहा, ‘‘वही, जो शालिग्रामजी के साथ हैं। उन्हें शालिग्रामजी ने स्वयं अपने हाथों से प्लेट लगाकर दी है। देखिए!’’ ठीक ही तो कहा था सबने। माला ने भी यही देखा। चाय का प्याला लिये खड़े थे शालिग्रामजी। सौम्य आकृति, लगभग उसकी ही हम-उम्र, बड़े सलीके से नाश्ता कर रही, कौन है यह महिला? शालिग्रामजी ने तो कभी इसका जिक्र नहीं किया। आमंत्रण भेजनेवाली सूची भी माला ने पढ़ी थी। किसी अनजान महिला का नाम नहीं था। फिर कौन है यह?

प्रश्न तो अनेक थे। पर वह अवसर नहीं था पति से प्रश्न पूछने का। जबकि अधिकांश मेहमानों के बीच यही प्रश्न बॉल की भाँति दिन भर उछलता उसकी पाली में भी आता रहा। रीति-रिवाज और रस्म अदाएगी में सब एक-दूसरे से पूछते रहे। दोपहर के लंच के समय भी चित्राजी आ गईं थीं।
शालिग्रामजी की एक साली उनके पास गई। पूछा, ‘‘आप कहाँ से आई हैं?’’

दूसरा प्रश्न पूछने ही वाली थी—‘‘आप मेरे जीजाजी को कैसे जानती हैं?’’
इस बीच स्वयं जीजाजी उपस्थित हो गए थे। उन्होंने अपनी साली को किसी और विशेष मेहमान की खातिरदारी में लगा दिया था।
गेस्ट हाउस में आराम करते हुए चित्राजी का मन कई मसलों में उलझ गया था। बहुत दिनों बाद पच्चीस वर्ष पूर्व घटी घटना का संपूर्ण दृश्य नजरों के सामने रूढ़ हो गया। शिमला से गाड़ी में पति-पत्नी और दोनों बच्चे का कुल्लु-मनाली के लिए प्रस्थान। थोड़ी दूरी पर जाते ही गाड़ी का खड्डे में गिरना। पति के सिर में चोट आना। उनका होश नहीं लौटना। डॉक्टर से बातचीत। बेहाल-बेहोश चित्राजी के सामने डॉक्टर की एक माँग। माँग पर शीघ्रता से विचार करने का आग्रह। अकेली खड़ी चित्राजी। दो नन्हे बच्चे माँ से चिपके। अपना-पराया कोई साथ न था। निर्णय लेना था चित्राजी को। सबकुछ चला गया था। जो बचा था, उसकी माँग थी। चित्राजी ने वह वस्तु देना स्वीकार कर लिया, जो उनकी थी। डॉक्टर का सुझाव। और फिर मृत्यु के करीब गया व्यक्ति जीवित हो गया।

स्मृतियों में जीवित था सब दृश्य। कभी-कभी जीवंत हो जाता। पर चित्राजी ने दृढ़ निश्चय कर उन यादों को नजर के सामने से हटा दिया था। शुभ-शुभ का अवसर था। ‘जो बीत गई, वह बात गई’ कविता वे क्लास में पढ़ाती आई हैं। जिस लड़की का विवाह है, उसके लिए शुभ सोचना है। अवसर और समय की वही माँग थी।

बारात दरवाजे लगी। स्वागत में खड़े स्त्री-पुरुष तिरछी नजरों से चित्राजी की ओर अवश्य देखते रहे। प्रश्न वही—‘‘कौन है यह?’’, ‘‘क्या रिश्ता है शालिग्रामजी से?’’

शालिग्रामजी ने द्वार पर ही अपने समधी से चित्राजी का परिचय कराया था। उनकी दो सालियाँ अपने पतियों के साथ वहीं खड़ी थीं। उनका परिचय नहीं करवाया। और यह खबर उस भीड़ भरे स्थल पर भी आसानी से यात्रा कर गई। सबको मिल आई।

बराती और घराती के भोजनापरांत विवाह के रस्म पूरे किए जाने लगे। शालिग्रामजी को पंडितजी द्वारा मंडप पर कन्यादान के लिए बुलाया गया। मंडप पर बैठने के पूर्व उन्होंने चारों ओर निगाहें घुमाईं। उनकी दृष्टि के सम्मुख वह चेहरा नहीं आया, जिसकी उन्हें खोज थी। उनके आस-पास मंडप पर बैठी उनकी बहनों और सालियों ने भाँप लिया था। दो-तीन एक साथ बोल पड़ीं—‘‘वहाँ हैं आपकी मेहमान।’’

देखा माला ने भी। मानो खीझकर बोली, ‘‘अब बैठ जाइए। मनचित्त लगाकर कन्यादान करिए। इसी काम के लिए मेहमान और सारा इंतजाम है। बैठिए!’’

शालिग्रामजी ने ऊँची आवाज में कहा, ‘‘चित्राजी! आप इधर आइए। मंडप पर बैठिए। मेरी बेटी को आपका विशेष आशीर्वाद चाहिए।’’
चित्राजी अंदर से हिल गईं। ऊपर से उपस्थित जनों की निगाहों के तीरों से बिंध गईं। वे परेशान तो थी हीं। अपने स्थान पर खड़ी होकर बोलीं, ‘‘आप लोग शुभ कार्य के लिए वहाँ उपस्थित हुए हैं। बेटी का कन्यादान करिए। मुझे यहीं बैठना है। मैं विधवा हूँ। मेरा सुहाग नहीं है। समाज ऐसी महिला को किसी सौभाग्याकांक्षिणी को सुहाग देने की मनाही करता है। मैं दिल से आपकी बेटी का शुभ चाहती हूँ। इसलिए दूर बैठी हूँ। आप अपना पुनीत काम पूरा करें। मेरी चिंता छोड़ दें।’’ वे बैठ गईं।

‘‘मैं नहीं मानता ऐसे समाज के विधान को। मेरे परिवार के लिए, मेरी बेटी के लिए आपसे बढ़कर कोई शुभ नहीं हो सकता। आपकी कृपा के बिना तो न मैं होता न मेरी बेटी। आइए! आप मेरी प्रार्थना मानकर मेरी बेटी का कन्यादान करिए।’’ फिर तो पंडितजी भी परेशान हो गए। बोले, ‘‘शालिग्रामजी! आपकी मेहमान महिला ठीक कह रही हैं। आप कन्यादान करिए। अपनी पत्नी को साथ बैठाइए। मंडप पर बैठी सभी महिलाएँ सुहागन ही हैं।’’

शालिग्रामजी बिफर पड़े—‘‘आप सब आज सुबह से चित्राजी का परिचय जानने के लिए परेशान हैं। आपके बीच तरह-तरह की अटकलें लग रही हैं। कार्य व्यस्तता में भी मैं आपके प्रश्नों के बाणों से बिंधता रहा। जब तक मैं उनका परिचय न दे दूँ, आप सबों का ध्यान भी विवाह के रस्म-रिवाजों पर केंद्रित नहीं होगा। तो सुनिए!’’ और जो कुछ शालिग्रामजी ने सुनाया, सुनकर वहाँ बैठे उपस्थित लोगों के प्रश्न तो चुके ही, वे सब चित्राजी के प्रति नतमस्तक हो गए। वे अवाक् रह गए। ‘‘पच्चीस वर्ष पूर्व एक दुर्घटना में चित्राजी के पति घायल हो गए। उनके मस्तिष्क ने काम करना बंद कर दिया था। जिस अस्पताल में उन्हें लाया गया, उसी के एक कमरे में मैं ऑपरेशन बेड पर लेटा था। मेरे दिल ने काम करना बंद कर दिया था। चिकित्सकों ने निर्णय लिया था—किसी का धड़कता दिल मिलने पर प्रत्यारोपण हो सकता है। आँख दान, किडनी दान जैसे अंग दान की बात तो सुनी गई थी। देहदान भी होने लगा था। पर हृदय दान तो तभी हो जब वह धड़कता हो, और जब तक दिल धड़कता है, आदमी जिंदा है। भला जीवित का हृदय कोई क्यों दान करे।

चित्राजी के पति का दिल धड़क रहा था। मस्तिष्क ने कार्य करना बंद कर दिया था। डॉक्टर शर्मा ने इनसे अनुरोध किया—‘‘आपके पति को अब हम नहीं बचा सकते। पर आपकी सहमति हो तो इनका दिल किसी और के शरीर में प्रत्यारोपित किया जा सकता है। वह जिंदा हो सकता है।

‘‘सुझाव सुनकर चित्राजी पर क्या बीती, मुझे नहीं मालूम। और किसी ने जानने की कोशिश भी की कि नहीं, मालूम नहीं। चित्राजी ने अनुमति दे दी थी। मेरा दिल पिछले पच्चीस वर्षों से धड़क रहा है, यह मेरा नहीं, इनके पति का दिल है। पर पिछले पच्चीस वर्षों में इन्होंने एक बार भी एहसान नहीं जताया। इन्होंने तो मुझे तब भी नहीं जाना, न देखा था। मैंने भी नहीं। इन्होंने कभी मुझे ढूँढ़ने की कोशिश भी नहीं की। पर मैं बहुत बेचैन था। जीवन देनेवाली के प्रति आभार भी नहीं प्रगट कर सका। दो वर्ष पूर्व इनके शहर में गया। डॉ. शर्मा मिल गए। मेरा दुर्भाग्य कि इनसे तब भी भेंट नहीं हो सकी। डॉ. शर्मा से इनका मोबाइल नंबर मिल गया। फोन पर ही मैंने इन्हें अपना परिचय दिया। मनुहार पत्र भेजा। फिर निमंत्रण। बहुत आग्रह करने पर ये मेरी बेटी के विवाह पर आईं हैं। मैंने भी इनको आज सुबह ही पहली बार देखा। अब आप ही सोचिए पंडितजी! हमारे परिवार के लिए इनसे बढ़कर शुभ और कौन होगा। मेरे विवाह और मेरे बच्चे होने के पीछे भी यही तो हैं। मैं हूँ, तभी तो सब है।’’

कन्यादान के रस्म के समय तो सबकी आँखें भरती हैं। शालिग्रामजी ने तो कन्यादान के पूर्व ही उपस्थित सभी आँखों में पानी भर दिया।
माला मंडप पर से उठी। सीधे चित्राजी के पास पहुँची। पैर छूकर आशीष लिये और हाथ पकड़कर मंडप पर ले आई। महिलाओं के झुंड ने आँसू पोंछकर गाना प्रारंभ किया —‘शुभ हो शुभ, आज मंगल का दिन है, शुभ होे शुुभ। शुभ बोलू अम्मा, शुभ बोलू पापा, शुभ नगरी के लोग सब, शुभ हो शुभ!’’

रिश्ते को नामकरण की आवश्यकता नहीं पड़ी। अनेक रिश्तों से भरा था प्रांगण। पर सबसे ऊँचा हो गया था शालिग्रामजी और चित्राजी का रिश्ता। बेनाम था तो क्या?

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“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

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