मस्तिष्क में रिक्त जगह।

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ϒ मस्तिष्क में रिक्त जगह।~सुमित वत्स। ϒ

एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं …..

उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी बरनी ( जार ) टेबल पर रखा और उसमें, टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची।

उन्होंने छात्रों से पूछा – क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ …
आवाज आई …
फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे – छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये धीरे – धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी, समा गये।

फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्या अब बरनी भर गई है, छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ … कहा
अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले – हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया, वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई, अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे।
फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ
….. अब तो पूरी भर गई है ….. सभी ने एक स्वर में कहा …..

सर ने टेबल के नीचे से …..
चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली, चाय भी रेत के बीच स्थित…
थोडी सी जगह में सोख ली गई …..

प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया।

इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो ….

टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान, परिवार, बच्चे, मित्र, स्वास्थ्य और शौक हैं।

छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी, कार, बडा़ मकान आदि हैं, और …..

रेत का मतलब और भी छोटी – छोटी बेकार सी बातें, मनमुटाव, झगडे़ है …..

अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती, या
कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते, रेत जरूर आ सकती थी।
ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है …..

यदि तुम छोटी – छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे।
और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय
नहीं रहेगा …..

मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है। अपने …..
बच्चों के साथ खेलो, बगीचे में पानी डालो, सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ।
घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको, मेडिकल चेक – अप करवाओ …..
टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो, वही महत्वपूर्ण है ….. पहले तय करो कि क्या जरूरी है।
….. बाकी सब तो रेत है …..
छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे।

अचानक एक ने पूछा, सर लेकिन आपने यह नहीं बताया
कि ” चाय के दो कप ” क्या हैं ?

प्रोफ़ेसर मुस्कुराये, बोले ….. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया …..
इसका उत्तर यह है कि, जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे, लेकिन…..
अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये।

© सुमित वत्स।

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सुमित वत्स।

हम दिल से आभारी हैं सुमित वत्स जी के प्रेरणादायक हिन्दी कहानी साझा करने के लिए।

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

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“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की व्यर्थ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51

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स्वामी विवेकानंद जी की मुंशी फैज अलि के साथ हुई धार्मिक चर्चा।

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swami vivekananda - kms

Swami Vivekananda

आज देश में धर्म और जाति को लेकर अनेक विवाद विद्यमान हैं। मानवीय संवेदना धार्मिक और जातिय बंधन में इस तरह बंध गई है कि इंसानियत का अस्तित्व कहीं खोता हुआ नज़र आ रहा है। ऐसे में स्वामी विवेकानंद जी के प्रेरणादायी प्रसंग इन जातिय और धार्मिक बंधनो को खोल सकते हैं जिससे इंसानियत पुनः स्वंतत्र वातावरण में पल्लवित हो सकती है। भारत  भ्रमण के दौरान राजस्थान में स्वामी जी की मुलाकात मुंशी फैज अली  से हुई थी।  मुशी  फैज अली और स्वामी विवेकानंद जी के मध्य धर्म को लेकर जो वार्तालाप  हुई,  उसी  का एक अंश आप सबसे सांझा करने का प्रयास कर रहे हैं।

मुशीं फैज अली ने स्वामी जी से पूछा कि, स्वामी जी हमें बताया गया है कि अल्लहा एक ही है। यदि वह एक ही है, तो फिर संसार उसी ने बनाया होगा।

स्वामी जी बोले, “सत्य है।”

मुशी जी बोले ,”तो फिर इतने प्रकार के मनुष्य क्यों बनाये। जैसे कि हिन्दु, मुसलमान, सिख्ख, ईसाइ और सभी को अलग-अलग धार्मिक ग्रंथ भी दिये। एक ही जैसे इंसान बनाने में उसे यानि की अल्लाह को क्या एतराज था। सब एक होते तो न कोई लङाई और न कोई झगङा होता।”

स्वामी हँसते हुए बोले, “मुंशी जी वो सृष्टी कैसी होती जिसमें एक ही प्रकार के फूल होते। केवल गुलाब होता, कमल या रंजनिगंधा या गेंदा जैसे फूल न होते!”

फैज अली ने कहा सच कहा आपने यदि एक ही दाल होती तो खाने का स्वाद भी एक ही होता। दुनिया तो बङी फीकी सी हो जाती!

स्वामी जी ने कहा, मुंशी जी!  इसीलिये तो ऊपर वाले ने अनेक प्रकार के जीव-जंतु और इंसान बनाए ताकि हम पिंजरे का भेद भूलकर जीव की एकता को पहचाने।

मुशी जी ने पूछा, इतने मजहब क्यों ?
स्वामी जी ने कहा, ” मजहब तो मनुष्य ने बनाए हैं, प्रभु ने तो केवल धर्म बनाया है।” 
मुशी जी ने कहा कि, ” ऐसा क्यों है कि एक मजहब में कहा गया है कि गाय और सुअर खाओ और दूसरे में कहा गया है कि गाय मत खाओ, सुअर खाओ एवं तीसरे में कहा गया कि गाय खाओ सुअर न खाओ;  इतना ही नही कुछ लोग तो ये भी कहते हैं कि मना करने पर जो इसे खाये उसे अपना दुश्मन समझो।”
स्वामी जी जोर से हँसते हुए मुंशी जी से पूछे कि,  “क्या ये सब  प्रभु ने कहा है ?”
मुंशी जी बोले नही, “मजहबी लोग यही कहते हैं।”
स्वामी जी बोले,  “मित्र! किसी भी देश या प्रदेश का भोजन वहाँ की जलवायु की देन है।  सागर तट पर बसने वाला व्यक्ति वहाँ खेती नही कर सकता, वह सागर से पकङ कर मछलियां ही खायेगा।  उपजाऊ भूमि के प्रदेश में खेती हो सकती है।  वहाँ अन्न फल एवं शाक-भाजी उगाई जा सकती है। उन्हे अपनी खेती के लिए गाय और बैल बहुत उपयोगी लगे।  उन्होने गाय को अपनी माता माना, धरती को अपनी माता माना और नदी को माता माना क्योंकि ये सब उनका पालन पोषण माता के समान ही करती हैं।”

“अब जहाँ मरुभूमि है वहाँ खेती कैसे होगी? खेती नही होगी तो वे गाय और बैल का क्या करेंगे?  अन्न है नही तो खाद्य के रूप में पशु को ही खायेंगे। तिब्बत में कोई शाकाहारी कैसे हो सकता है? वही स्थिति अरब देशों में है।  जापान में भी इतनी भूमि नही है कि कृषि पर निर्भर रह सकें।”

स्वामी जी फैज अलि की तरफ मुखातिब होते हुए बोले, ” हिन्दु कहते हैं कि मंदिर में जाने से पहले या पूजा करने से पहले स्नान करो। मुसलमान नमाज पढने से पहले वाजु करते हैं। क्या अल्लहा ने कहा है कि नहाओ मत, केवल लोटे भर पानी से हांथ-मुँह धो लो?”
फैज अलि बोला, क्या पता कहा ही होगा!
स्वामी जी ने आगे कहा, नहीं, अल्लहा ने नही कहा! अरब देश में इतना पानी कहाँ है कि वहाँ पाँच समय नहाया जाए।  जहाँ पीने के लिए पानी बङी मुश्किल से मिलता हो वहाँ कोई पाँच समय कैसे नहा सकता है।  यह तो भारत में ही संभव है, जहाँ नदियां बहती हैं, झरने बहते हैं, कुएँ जल देते हैं। तिब्बत में यदि पानी हो तो वहाँ पाँच बार व्यक्ति यदि नहाता है तो ठंड के कारण ही मर जायेगा। यह सब प्रकृति ने सबको समझाने के लिये किया है।”
स्वामी विवेका नंद जी ने आगे समझाते हुए कहा कि, ” मनुष्य की मृत्यु होती है।  उसके शव का अंतिम संस्कार करना होता है। अरब देशों में वृक्ष नही होते थे, केवल रेत थी अतः वहाँ मृतिका समाधी का प्रचलन हुआ, जिसे आप दफनाना कहते हैं। भारत में वृक्ष बहुत बङी संख्या में थे, लकडी. पर्याप्त उपलब्ध थी अतः भारत में अग्निसंस्कार का प्रचलन हुआ।  जिस देश में जो सुविधा थी वहाँ उसी का प्रचलन बढा।  वहाँ जो मजहब पनपा उसने उसे अपने दर्शन से जोङ लिया।”
फैज अलि   विस्मित होते हुए   बोला!  “स्वामी जी इसका मतलब है कि हमें शव का अंतिम संस्कार  प्रदेश और देश के अनुसार करना चाहिये। मजहब के अनुसार नही।”
स्वामी जी बोले , “हाँ!  यही उचित है।” किन्तु अब लोगों ने उसके साथ धर्म को जोङ दिया। मुसलमान ये मानता है कि उसका ये शरीर कयामत के दिन उठेगा इसलिए वह शरीर को जलाकर समाप्त नही करना चाहता। हिन्दु मानता है कि  उसकी आत्मा फिर से नया शरीर धारण करेगी इसलिए उसे मृत शरीर से एक क्षंण भी मोह नही होता।”
फैज अलि ने पूछा कि, “एक मुसलमान के शव को जलाया जाए और एक हिन्दु के शव को दफनाया जाए तो क्या प्रभु नाराज नही होंगे?”
स्वामी जी ने कहा,” प्रकृति के नियम ही प्रभु का आदेश हैं।  वैसे प्रभु कभी रुष्ट नही होते वे प्रेम सागर हैं, करुणा सागर है।”
फैज अलि ने पूछा तो हमें उनसे डरना नही चाहिए?
स्वामी जी बोले, “नही!  हमें तो ईश्वर से प्रेम करना चाहिए वो तो पिता समान है, दया का सागर है फिर उससे भय कैसा। डरते तो उससे हैं हम जिससे हम प्यार नही करते।”
मुंशी जी को समझाते हुए स्वामी विवेकानंद जी की पलकें बंद थीं और अश्रु टपक रहे थे। फैज अली स्वामी जी का ये रूप देखकर स्तब्ध रह गए।  प्रेम का ये स्वरूप तो उन्होने पहली बार देखा था। वे वहीं आश्चर्य से खङे रहे और स्वामी जी के पलक खोलने का इंतजार करने लगे। स्वामी जी ये कहते हुए अपनी आँखे खोले कि, “उस परम् पिता को कठोर मानना अपराध है। “
फैज अलि ने हाँथ जोङकर स्वामी विवेकानंद जी से पूछा, “तो फिर मजहबों के कठघरों से मुक्त कैसे हुआ जा सकता है?”स्वामी जी ने फैज अलि की तरफ  देखते हुए मुस्कराकर कहा, “क्या तुम सचमुच कठघरों से मुक्त होना चाहते हो?” फैज अलि ने स्वीकार करने की स्थिति में अपना सर हिला दिया।स्वामी जी ने आगे समझाते हुए कहा, “फल की दुकान पर जाओ, तुम  देखोगे वहाँ आम, नारियल, केले, संतरे, अंगूर आदि अनेक फल बिकते हैं; किंतु वो दुकान तो फल की दुकान ही कहलाती है। वहाँ अलग-अलग नाम से फल ही रखे होते हैं। ” फैज अलि ने हाँ में सर हिला दिया। स्वामी विवेकानंद जी ने आगे कहा कि, “अंश से अंशी की ओर चलो। तुम पाओगे कि सब उसी प्रभु के रूप हैं।” 
फैज अलि अविरल आश्चर्य से स्वामी विवेकानंद जी को देखते रहे और बोले “स्वामी जी मनुष्य ये सब क्यों नही समझता?”स्वामी विवेकानंद जी ने शांत स्वर में कहा, मित्र! प्रभु की माया को कोई नही समझता। मेरा मानना तो यही है कि, “सभी धर्मों का गंतव्य स्थान एक है। जिस प्रकार विभिन्न मार्गो से बहती हुई नदियां समुंद्र में जाकर गिरती हैं, उसी प्रकार सब मत मतान्तर परमात्मा की ओर ले जाते हैं। मानव धर्म एक है, मानव जाति एक है।” मित्रों! हम सबको धर्म और जाति से परे मानवीय संवेदनाओं को यर्थात में अपनाना चाहिये क्योंकि प्रत्येक सजीव जगत में उस सर्व शक्तिमान का वास है; जिसे हम सब ईश्वर, अल्लाह, गुरुनानक या ईशा कहते हैं। ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि,  हमें मानव सेवा में ही ईश्वर सेवा की भावना को वास्तविक रूप में अपनाना चाहिए और यही भावांजली स्वामी विवेकानंद जी के प्रति सच्ची श्रद्धा होगी। 

जय भारत – युवा शक्ति

Post inspired by Mrs. अनिता शर्मा जी

Educational & Inspirational VIdeos (9.8 lacs+ Views):  YouTube videos Link

(http://www.youtube.com/channel/UCRh-7JPESNZWesMRfjvegcA?feature=watch)

Blog:  http://roshansavera.blogspot.in/

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अनीता जी नेत्रहीन विद्यार्थियों के सेवार्थ काम करती हैं।

एक अपील

आज कई दृष्टीबाधित बच्चे अपने हौसले से एवं ज्ञान के बल पर अपने भविष्य को सुनहरा बनाने का प्रयास कर रहे हैं। कई दृष्टीबाधित बच्चे तो शिक्षा के माधय्म से अध्यापक पद पर कार्यरत हैं। उनके आत्मनिर्भर बनने में शिक्षा का एवं आज की आधुनिक तकनिक का विशेष योगदान है। आपका साथ एवं नेत्रदान का संकल्प कई दृष्टीबाधित बच्चों के जीवन को रौशन कर सकता है। मेरा प्रयास शिक्षा के माध्यम से दृष्टीबाधित बच्चों को आत्मनिर्भर बनाना है। इस प्रयोजन हेतु, ईश कृपा से एवं परिवार के सहयोग से कुछ कार्य करने की कोशिश कर रहे हैं जिसको YouTube पर “audio for blind by Anita Sharma” लिख कर देखा जा सकता है।

I am grateful to Anita Ji for sharing this wonderful article with KMSRAJ51 Readers.

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कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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“अगर जीवन में सफल हाेना हैं, ताे कभी भी काेई भी कार्य करें ताे पुरें मन से करे।

जीवन में सफलता आपकाे देर से ही सही लेकिन सफलता आपकाे जरुर मिलेगी॥”

 ~KMSRAJ51

“अगर जीवन में सफल हाेना हैं. ताे जहाँ १० शब्दाें से काेई बात बन जाये वहा पर,

१०० शब्द बाेलकर अपनी मानसिक और वाणी की ऊर्जा को नष्ट नहीं करना चाहिए॥”

 ~KMSRAJ51

 

 

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छोटी सी जिंदगी है-हर बात में खुश रहो।

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श्री श्री रवि शंकर जी।

श्री श्री रवि शंकर जी द्वारा रचित एक सुंदर कविता…..

छोटी सी जिंदगी है ,
हर बात में खुश रहो।

जो पास में ना हो ,
उनकी आवाज़ में खुश रहो।

कोई रूठा हो तुमसे ,
उसके इस अंदाज़ में खुश रहो।

जो लौट के नही आने वाले है,
उन लम्हो कि याद में खुशरहो।

कल किसने देखा है ,
अपने आज में खुश रहो।

खुशियों का इन्तेजार किसलिए ,
दुसरो कि मुस्कान में खुश रहो।

क्यूँ तड़पते हो हर पल किसी के साथ को ,
कभी तो अपने आप में खुश रहो।

छोटी सी जिंदगी है ,
हर हाल में खुश रहो।

In-English

There is a verse which is very dear to your own.

Shri Shri Ravi Shankar composed a beautiful poem by-ji read more

little life, every thing to be happy.

For those who have not, his voice in happy.

Are you a local, the in happy.

which is not coming back, remember that in lamho happy.

yesterday who is seen today in happy.

what intejar of happiness, be happy in that smile dusro.

Kyun tadpate every moment with anyone, ever, be happy in yourself.

little life, every newly happy.

~ श्री श्री रवि शंकर जी

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दूसरों के साथ अपनी तुलना करके खुद को कमतर न आंकें।

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 दूसरों के साथ अपनी तुलना करके खुद को कमतर न आंकें।

एक कुम्हार घड़ा बना रहा था। पास ही कुछ सुराहियां, दीपक, मूर्तियां और गुल्लकें बनी रखीं थीं। ये सभी आपस में बातें कर रहे थे। घड़े ने दीपकों से कहा- ‘तुम सभी कितने सुंदर हो अलग अलग आकृतियों में। एक हम हैं… सब के सब मोटे-मोटे। जरा-सा ढलक जाएं तो टूट ही जाएं।’ एक दीपक बोला-‘अरे कहां, घड़े काका। हमारा आकार तो देखो आपके आगे कितना छोटा है। किसी सामान के पीछे कब दब कर टूट जाएं, पता भी न चले। ये मूर्तियां हमसे कहीं ज्यादा सुंदर हैं। काश, हम भी मूर्ति होते।’ दीपक और घड़े की बातें सुनकर मूर्तियां भी उदास हो गईं। एक मूर्ति बोली- ‘भैया, ये आप क्या कह रहे हैं! आपको नहीं पता कि हमें इस आकार को पाने के लिए कितनी तकलीफ सहनी पड़ती है। अपने अंगों को जगह-जगह से सुडौल आकार देने की खातिर कितने कष्ट उठाने पड़ते हैं। हमें तो गुल्लक बनना पसंद था। काश, हम गुल्लक होतीं तो सब हमारे भीतर खूब सारे पैसे रखते।’ गुल्लकें काफी देर से सब की बातें सुन रहीं थीं, वे भी विचलित हो उठीं। एक गुल्लक तो बिफर ही पड़ी- ‘आप सब हमारा दर्द नहीं समझ पाएंगे। लोग हमारे भीतर अपनी सबसे प्रिय वस्तु ‘अपना पैसा’ संचित करते हैं ताकि वह इधर-उधर न पड़ा रहे और सुरक्षित रहे, लेकिन इसी पैसे की खातिर वे लोग एक दिन हमें बड़ी निर्ममता से पटक कर फोड़ देते हैं। अब आप ही बताइए, क्या आपको कोई ऐसे तोड़ता है?’

कुम्हार का चाक अपना काम करते हुए इन सभी की तकलीफें सुन रहा था। जब उसका काम पूरा हो गया तो उसने भी बातचीत शुरू कर दी। उसने घड़े को समझाया- ‘तुम बहुत ही उपयोगी हो। अपने शीतल जल से तमाम लोगों की प्यास बुझाते हो और कुछ लोग तो तुम्हारे भीतर अपना अनाज तक रख लेते हैं।’ फिर वह दीपक से बोला- ‘तुम आकार में बेशक छोटे हो, लेकिन तुमसे प्रकाश फूटता है। तुम मंदिरों में जगह पाते हो। घरों और देहरियों को जगमगाते हो।’ इसके बाद चाक ने मूर्तियों की तरफ देखा और कहा- ‘तुम्हारी शोभा इसीलिए है कि तुम इतनी तकलीफ सहती हो। इसीलिए तुम घरों, मंदिरों, ऑफिसों की शोभा बढ़ाती हो।’ आखिर में उसने गुल्लकों की और बड़े प्यार से देखते हुए कहा- ‘तुम सभी बहुत कीमती हो| तुम बच्चों की खुशी हो। तुम लोगों के बुरे वक्त में उनके काम आकर अपना जीवन सार्थक कर देती हो।’

इस तरह वह चाक उन चीजों के साथ-साथ हम इंसानों को भी ये सीख दे गया कि अपने गुणों को पहचानते हुए खुद का भी सम्मान करना चाहिए। दूसरे लोगों के साथ अपनी तुलना करके बेवजह खुद को कमतर नहीं आंकना चाहिए। अपनी-अपनी जगह पर हम सभी उपयोगी हैं। हमें अपना मोल खुद पहचानना चाहिए।

Source(स्रोत): http://navbharattimes.indiatimes.com/

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प्रभु हममें अपनी मौजूदगी का अहसास हरदम कराते रहते।

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प्रभु हममें अपनी मौजूदगी का अहसास हरदम कराते रहते।

एक संत के आश्रम में दीक्षा ग्रहण समारोह चल रहा था। आश्रम में पधारे महा गुरु ने दीक्षा देने से पहले शिष्यों से प्रश्न किया, ‘ईश्वर कहां बसते हैं?’ किसी ने कहा संसार में तो किसी ने जीव-जंतुओं में। किसी ने पेड़-पौधों में बताया तो किसी ने ब्रहमांड में। शिष्यों के उत्तरों से नाखुश गुरुजी बोले- ‘परमात्मा प्रकृति के रोम-रोम में तो बसते ही हैं, लेकिन वे मनुष्य की अंतरात्मा में सर्वाधिक वास करते हैं। इसीलिए कहा गया है कि आत्मा परमात्मा का एक अंश है।’

हम सभी जानते हैं कि हमारे शरीर में परमात्मा की आत्मा का वास है। हमारा नश्वर शरीर एक दिन पृथ्वी में मिल जाएगा और आत्मा परमात्मा में एक हो जाएगी। अंत में रह जाएंगे तो सिर्फ हमारे द्वारा किए गए सत्कर्म। इसलिए जीवन रहते कुछ न कुछ अच्छा कर जाना जरूरी है। कम से कम जरूरतमंदों की मदद कर कुछ पुण्य ही कमाने का प्रयास करें, ताकि नेक कर्मों द्वारा हम खुद को हासिल कर सकें।

हमारे मन, दिल, और शरीर पर रजस, तमस और सात्विक गुणों का प्रभाव शुरू से ही पड़ने लगता है। जो इंसान अपनी जीवन यात्रा के दौरान इन सभी पर संतुलन रख पाता है वही आगे चलकर अपने इष्ट देवता को खोज पाता है। जिसने सत्कर्मों से खुद को खोज लिया है, उसने दूसरों को भी पा लिया है। ऐसे व्यक्ति शाश्वत परमेश्वर का स्वरूप होते हैं। उनका अपने अहम पर काबू होता है। वे स्वभाव से निर्मल, मन से कोमल, दिल के प्रेमी और आत्मा के मधुर होते हैं। वे हमेशा दूसरों का भला पहले चाहते हैं।

ऐसे लोगों ने स्वयं को खुद से जीत लिया है। वे अपनी आत्मा की आवाज जानते और सुनते हैं। उसमें समाये ईश्वर के स्वरूप को भी पहचानते हैं। वे खुद ईश्वर का प्रतीक हैं। ईश्वर से संवाद करना ऐसे इंसानों के लिए बहुत आसान होता है। यह संभव है तो फिर ईश्वर को कहीं ओर क्यों खोजें? जो लोग ईश्वर को नहीं पहचान पाते, उसे आत्मसात नहीं कर पाते, उन पर दुखों का पहाड़ यहीं गिरता है। वे अंधकार में जीते हैं। अधूरी लालसा पूरा करने के लिए उनकी आत्मा अपने परमात्मा को खोजने में लगी रहती है।

बाइबल में लिखा है- ‘क्या आप यह नहीं जानते कि आपका शरीर पवित्र आत्मा का मंदिर है? वह आप में निवास करता है और आपको ईश्वर से मिला है।’ अगर हम अपने भीतर बसने वाले ईश्वर को पहचान लें तो हमारी आत्मा का मिलन परमात्मा से हो जाएगा। जरूरत है बस अपने अंदर झांकने की। क्योंकि प्रभु हममें अपनी मौजूदगी का अहसास बराबर कराते रहते हैं। बस जरा ध्यान देने की जरूरत है? आप ही परमात्मा हैं, आपके द्वारा किए गए सभी कार्य परम हैं। आइये, संसार में परमत्व लाएं और क्यों न कुछ अच्छा कर जाएं।

Source: http://navbharattimes.indiatimes.com/

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परोपकारी बनें, स्वार्थी नहीं।

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परोपकारी बनें, स्वार्थी नहीं।

परोपकारी बनें, स्वार्थी नहीं।

एक दिन मैं किसी काम से कहीं जा रहा था। रास्ते में बहुत से लोग आते-जाते दिखे, लेकिन तभी एक बुजुर्ग महिला मुझे मिलीं। उन्होंने मुझसे कहा, ‘बेटा, मुझे मेट्रो स्टेशन के गेट तक छोड़ दो।’ मैंने उनका हाथ पकड़ा और उन्हें मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियों के पास तक छोड़ दिया। वह प्रेम से सौ रुपये देने लगीं तो मैंने लेने से इनकार कर दिया और कहा, ‘ये रुपये आप उस जरूरतमंद इंसान को दे दीजिए, जिसे इसकी जरूरत हो।’ इस पर वह मुझे बहुत गौर से देखने लगीं और कहने लगीं- ‘बेटा, तुम हमेशा यही कोशिश करना और जरूरतमंदों की मदद करते रहना।’

वह दिन आज तक मुझे याद है। स्वार्थ भावना से रहित दूसरों के कल्याण के लिए मन, वचन और कर्म से किया गया कार्य परोपकार कहलाता है। पारस्परिक विरोध की भावना का नाश करना और प्रेम-भाव को बढ़ाना परोपकार कहलाता है। प्रकृति हमें निरंतर यह संदेश देती रहती है। पवन, प्राण वायु देकर हमारी गति को संचालित करता है। नदियां अपना अनंत जल जगत के लिए अर्पित कर देती हैं। वृक्ष अपनी छाया और फल दूसरों के लिए प्रस्तुत करते हैं।

यदि हम महान लोगों के इतिहास को देखें तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और मदर टेरेसा की याद आना स्वाभाविक है। गांधी जी ने देश के हित के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर दिया और मदर ने अनगिनत अनाथों, विकलागों और रोगियों को अपने सीने से लगाया। लेकिन आज का मनुष्य इंसानियत को भूलता जा रहा है। वह परोपकारी लोगों को मूर्ख समझने लगा है। ऐसे लोग उसके लिए हंसी का पात्र बन जाते हैं।

आमतौर पर लोगों के हृदय से दया, करुणा और सहानुभूति जैसी मानवीय प्रवृत्तियां निकल भागी हैं। आज का मनुष्य स्वार्थ की जीती जागती परिभाषा बनकर रह गया है। राह चलते सड़क पर अगर कोई असहाय मिल जाए तो उसे देखते ही लोग अपना मुंह मोड़ लेते हैं। सड़क पर पड़ा कराहता घायल और दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति जैसे उसके लिए ध्यान देने का विषय ही नहीं रह गया है। जबकि सच यह है कि इंसान इस संसार में परोपकार के लिए ही जन्म लेता है।

मानव जीवन की सार्थकता इसी में है कि अपने बारे में सोचने के साथ-साथ हम दूसरों के बारे में भी सोचें। परोपकार करने से खुद को भी खुशी मिलती है। कभी किसी जरूरतमंद की मदद करके देखिए, आप पाएंगे कि अपने जीने की सार्थकता का अहसास होने लगा है। परोपकारी व्यक्ति दुखियों के प्रति उदार, निर्बलों के रक्षक और जन-कल्याण की भावना से ओत-प्रोत होते हैं। परोपकार से जो आनंद हमें मिलता है, वह एकदम अलौकिक होता है। इसीलिए परोपकारी व्यक्ति खुद भी सुखी रहता है और दूसरों में भी सुख बांटता चलता है। वह खुद तो ऐसा करता ही है, दूसरों को भी प्रेरित करता है।

Source: http://navbharattimes.indiatimes.com/

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निष्काम कर्म से जीवन सफल।

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निष्काम कर्म से जीवन सफल।

एक कलाकार के सामने बिक्री के लिए लगभग एक जैसी दो लकड़ी की मूर्तियां रखी हुई थीं। एक मूर्ति की कीमत थी दो हजार रुपए और दूसरी की कीमत थी पांच हजार रुपए। मूर्तियों की कीमतों में भारी अंतर के विषय में पूछने पर कलाकार ने बताया कि जो ज्यादा कीमती मूर्ति है उसकी लकड़ी बहुत अच्छी है और उसके रेशों की बनावट ऐसी है कि उस पर की गई खुदाई एकदम साफ और सुंदर दिखाई पड़ती है। लेकिन जो कम दाम की मूर्ति है, उस पर किया गया काम भी उतना सुंदर और साफ नहीं है।

ये पूछने पर कि बढ़िया मूर्ति को बनाने में समय भी ज्यादा लगा होगा, कलाकार ने उत्तर दिया, ‘समय तो बराबर ही लगता है। लकड़ी अच्छी निकल आए तो काम जल्दी और अच्छा हो जाता है और दाम भी अच्छे मिल जाते हैं।’ ‘काम जल्दी और अच्छा हो और दाम भी अच्छे मिल जाएं, इसलिए आप हमेशा अच्छी लकड़ी का चुनाव क्यों नहीं करते?’ कलाकार ने बताया कि कोशिश तो होती है, लेकिन यह हमेशा संभव नहीं हो पाता। एक ही प्रजाति में हर पेड़ की लकड़ी की क्वालिटी में भी काफी अंतर मिल जाता है। कई बार लकड़ी पर कुछ काम करने के बाद लकड़ी टूट या फट जाती है। इससे सारी मेहनत बेकार चली जाती है।

जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी ऐसा ही होता है। कहा जाता है कि जितना गुड़़ डालोगे उतना ही मीठा होगा, लेकिन जीवन में यह हमेशा संभव नहीं होता। आज अधिकांश माता-पिता बच्चों की शिक्षा और पढ़ाई-लिखाई को लेकर बहुत चिंतित रहते हैं। वे इसके लिए कोई कसर नहीं छोड़ते। और जब बच्चा उनकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता तो वे मायूस हो जाते हैं। जरूरी है कि हमारे लक्ष्य ऊंचे हों और हम उन्हें पाने के प्रयास करें। हमारे प्रयास महत्वपूर्ण होते हैं जबकि अपेक्षाएं कर्म के लिए उत्प्रेरक तत्व।

अलग-अलग प्रकार की लकड़ियों के रेशों की बनावट की तरह ही हर बच्चे के व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों की बनावट भी अलग और विशिष्ट होती है। हर बच्चे को एक जैसा तथाकथित बड़ा आदमी बनाना संभव नहीं, लेकिन हर बच्चे को किसी न किसी निश्चित आकार में ढालना तो संभव है ही। यही स्वीकार करने को हम तैयार नहीं होते और इसी से पैदा होती हैं ज्यादातर समस्याएं।

हम किसी भी धातु, पत्थर या लकड़ी के टुकड़े को बेशक बेशकीमती कलाकृति में न परिवर्तित कर सकें, लेकिन यदि उसे एक उपयोगी आकार और स्थान ही उपलब्ध करवा दें तो यह कलात्मकता ही होगी। कलात्मकता महत्वपूर्ण है न कि कलाकृति की कीमत। गीता में कहा गया अकारण नहीं है कि हम कर्म करें, फल की इच्छा नहीं। फल चाहे जो भी हो निष्काम कर्म के द्वारा हम जीवन में उत्कृष्टता ही पाते हैं।

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