हमारा अच्छा व्यवहार ही जीवन का निर्माण करता है।

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बैलोन-विक्रेता।

हमारा अच्छा व्यवहार ही जीवन का निर्माण करता है।

एक आदमी गुब्बारे बेच कर जीवन-यापन करता था। वह गांव के आस-पास लगने वाली हाटों में जाता और गुब्बारे बेचता। बच्चों को लुभाने के लिए वह तरह-तरह के गुब्बारे रखता। और जब कभी उसे लगता कि बिक्री कम हो रही है, वह झट से एक गुब्बारा हवा में छोड़ देता। यह देखकर बच्चे खुश हो जाते और गुब्बारे खरीदने के लिए पहुंच जाते।

एक दिन वह हाट में गुब्बारे बेच रहा था और बिक्री बढ़ाने के लिए बीच-बीच में गुब्बारे उड़ा रहा था। पास ही खड़ा एक छोटा बच्चा यह सब बड़ी जिज्ञासा से देख रहा था। इस बार जैसे ही गुब्बारे वाले ने एक सफेद गुब्बारा उड़ाया वह तुरंत उसके पास पहुंचा और मासूमियत से बोला,’अगर आप यह काला वाला गुब्बारा छोड़ेंगे तो क्या वह भी ऊपर जाएगा?’

गुब्बारा वाले ने अचरज के साथ उसे देखा और बोला, ‘बिलकुल जाएगा। गुब्बारे का ऊपर जाना इस बात पर निर्भर नहीं करता कि वह किस रंग का है, निर्भर इस पर करता है कि उसके अंदर क्या है।’

ठीक इसी तरह हम इंसानों पर भी यह बात लागू होती है। कोई अपने जीवन में क्या हासिल करेगा, यह उसके बाहरी रंग-रूप पर निर्भर नहीं करता। बल्कि इस पर निर्भर करता है कि उसके अंदर क्या है। हमारा व्यवहार ही हमारा जीवन निर्माण करता है।

एक बूढ़े किसान को सामान ढोने के लिए गधे की जरूरत थी। वह कुम्हार के पास गधा मांगने के लिए गया। कुम्हार गधा नहीं देना चाहता था। उसने कहा- ‘गधा चरने के लिए गया है और रात को देरी से आएगा। गधा यहां होता तो मुझे देने में खुशी होती। पड़ोसी के काम पड़ोसी नहीं तो क्या परदेसी आएगा।’ दोनों के बीच बातचीत का क्रम चल ही रहा था कि बाड़े में बंधे गधे ने एक लंबा आलाप लिया। किसान ने कहा- ‘गधा तो भीतर बंधा है, तुम बहाना बनाने की बजाय सीधे मना कर देते तो मुझे बुरा नहीं लगता।’ कुम्हार ने हंसते हुए कहा- ‘तुम भी अजीब आदमी हो। तुम्हें आदमी की जबान से गधे की जबान पर ज्यादा भरोसा है।’ किसान ने सरलता से कहा- ‘झूठ बोलने वाले आदमी से पशु ज्यादा भरोसेमंद होता है।’ किसान की बात सुनकर कुम्हार बोला- ‘तुम ठीक कहते हो। अब भविष्य में मैं दैनिक जीवन व्यवहार में झूठ बोलने की बजाय सच्ची बात कहना पसंद करूंगा।’ इस तरह की व्यवहार-कुशलता का संकल्प व्यक्ति को हर दृष्टि से बहुत ऊंचा उठा देती है। अपने परिवार के निकट अथवा दूरस्थ व्यक्तियों के साथ, पड़ोसियों के साथ, अपने कर्मचारियों के साथ, सामाजिक सम्पर्कों वाले सभी व्यक्तियों के साथ आप उचित व्यवहार का निर्वाह करते हैं तो व्यवहार कुशल माने जाएंगे। अगर व्यवहार में संवेदनशीलता है, सहयोगी दृष्टिकोण है, आत्मीयता और उदारतापूर्ण व्यवहार है तो आपका व्यक्तित्व और अधिक निखरेगा।

Source: http://navbharattimes.indiatimes.com/

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दूसरों के साथ अपनी तुलना करके खुद को कमतर न आंकें।

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 दूसरों के साथ अपनी तुलना करके खुद को कमतर न आंकें।

एक कुम्हार घड़ा बना रहा था। पास ही कुछ सुराहियां, दीपक, मूर्तियां और गुल्लकें बनी रखीं थीं। ये सभी आपस में बातें कर रहे थे। घड़े ने दीपकों से कहा- ‘तुम सभी कितने सुंदर हो अलग अलग आकृतियों में। एक हम हैं… सब के सब मोटे-मोटे। जरा-सा ढलक जाएं तो टूट ही जाएं।’ एक दीपक बोला-‘अरे कहां, घड़े काका। हमारा आकार तो देखो आपके आगे कितना छोटा है। किसी सामान के पीछे कब दब कर टूट जाएं, पता भी न चले। ये मूर्तियां हमसे कहीं ज्यादा सुंदर हैं। काश, हम भी मूर्ति होते।’ दीपक और घड़े की बातें सुनकर मूर्तियां भी उदास हो गईं। एक मूर्ति बोली- ‘भैया, ये आप क्या कह रहे हैं! आपको नहीं पता कि हमें इस आकार को पाने के लिए कितनी तकलीफ सहनी पड़ती है। अपने अंगों को जगह-जगह से सुडौल आकार देने की खातिर कितने कष्ट उठाने पड़ते हैं। हमें तो गुल्लक बनना पसंद था। काश, हम गुल्लक होतीं तो सब हमारे भीतर खूब सारे पैसे रखते।’ गुल्लकें काफी देर से सब की बातें सुन रहीं थीं, वे भी विचलित हो उठीं। एक गुल्लक तो बिफर ही पड़ी- ‘आप सब हमारा दर्द नहीं समझ पाएंगे। लोग हमारे भीतर अपनी सबसे प्रिय वस्तु ‘अपना पैसा’ संचित करते हैं ताकि वह इधर-उधर न पड़ा रहे और सुरक्षित रहे, लेकिन इसी पैसे की खातिर वे लोग एक दिन हमें बड़ी निर्ममता से पटक कर फोड़ देते हैं। अब आप ही बताइए, क्या आपको कोई ऐसे तोड़ता है?’

कुम्हार का चाक अपना काम करते हुए इन सभी की तकलीफें सुन रहा था। जब उसका काम पूरा हो गया तो उसने भी बातचीत शुरू कर दी। उसने घड़े को समझाया- ‘तुम बहुत ही उपयोगी हो। अपने शीतल जल से तमाम लोगों की प्यास बुझाते हो और कुछ लोग तो तुम्हारे भीतर अपना अनाज तक रख लेते हैं।’ फिर वह दीपक से बोला- ‘तुम आकार में बेशक छोटे हो, लेकिन तुमसे प्रकाश फूटता है। तुम मंदिरों में जगह पाते हो। घरों और देहरियों को जगमगाते हो।’ इसके बाद चाक ने मूर्तियों की तरफ देखा और कहा- ‘तुम्हारी शोभा इसीलिए है कि तुम इतनी तकलीफ सहती हो। इसीलिए तुम घरों, मंदिरों, ऑफिसों की शोभा बढ़ाती हो।’ आखिर में उसने गुल्लकों की और बड़े प्यार से देखते हुए कहा- ‘तुम सभी बहुत कीमती हो| तुम बच्चों की खुशी हो। तुम लोगों के बुरे वक्त में उनके काम आकर अपना जीवन सार्थक कर देती हो।’

इस तरह वह चाक उन चीजों के साथ-साथ हम इंसानों को भी ये सीख दे गया कि अपने गुणों को पहचानते हुए खुद का भी सम्मान करना चाहिए। दूसरे लोगों के साथ अपनी तुलना करके बेवजह खुद को कमतर नहीं आंकना चाहिए। अपनी-अपनी जगह पर हम सभी उपयोगी हैं। हमें अपना मोल खुद पहचानना चाहिए।

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समाज के सहयोग के बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते।

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समाज के सहयोग के बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते।

अक्सर कुछ लोग शिकायत करते हैं कि हमें अपने मां-बाप से विरासत में कुछ नहीं मिला। वे खुद को सेल्फ मेड कहते और मानते हैं। यह भ्रम ही नहीं, अहंकार भी है। प्रश्न उठता है कि क्या मात्र धन-दौलत या पैसा ही वास्तविक विरासत है? कुछ लोगों को तो मां-बाप से ही नहीं, पूरे समाज से शिकायत होती है। उनका कहना है कि दुनिया ने उनके लिए कुछ नहीं किया। उनके लिए सबकी जिम्मेदारी होती है लेकिन वे खुद किसी के लिए जिम्मेदार नहीं होते। वे कभी ये सोचने की जहमत नहीं उठाते कि उन्होंने समाज के लिए क्या किया है।

यह सही है कि आपने खुद अपना विकास किया। आपने अपने समय का सदुपयोग किया, खूब मेहनत करके पढ़ाई की, लेकिन एक विद्यार्थी को भी पढ़ने-लिखने और आगे बढ़ने के लिए कापी-किताब और कलम-दवात आदि न जाने कितनी चीजों की जरूरत पड़ती है। उनके लिए वह दूसरों पर निर्भर होता है। यह ठीक है कि आपने पुरुषार्थ किया और एक अच्छी सी नौकरी पा गए या अपना एक अच्छा-सा व्यवसाय स्थापित कर लिया। यदि पुरुषार्थ नहीं करते तो आपका ही अहित होता। पुरुषार्थ करके आपने अपने लिए अच्छा किया, लेकिन क्या प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से अनेक व्यक्तियों और समाज ने आपको आगे बढ़ने के अवसर उपलब्ध नहीं कराए?

बड़ी-बड़ी चीजों की बात छोड़िए, छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी हम दूसरों पर निर्भर होते हैं। एक मामूली सी लगने वाली कमीज जो हमने पहन रखी है, उसे हमारे तन पर सुशोभित करने में सैकड़ों लोगों का योगदान है। खेत में बीज बोने से लेकर पौधे उगने और उनसे कपास मिलने फिर कपास से कपड़ा और कमीज बनने के बीच असंख्य हाथों का परिश्रम है। कपड़े से कमीज बनाने के लिए एक सिलाई मशीन की जरूरत पड़ती है। वह लोहे और कई दूसरे पदार्थों से बनती है। खनिकों द्वारा लोहा और अन्य खनिज पदार्थ खानों से निकाले जाते हैं। बड़े-बड़े करखानों में मजदूरों द्वारा लोहा साफ किया जाता है। फिर दूसरे बड़े-बड़े करखानों में लोहे से बड़ी-बड़ी मशीनों द्वारा छोटी मशीनें बनती हैं। उन्हीं में से एक मशीन पर कारीगर कपड़े से एक कमीज सिलकर आपको पहनाता है।

यदि कमीज में बटन न लगे हों तो कैसा लगे। एक बटन जैसी अल्प मूल्य की वस्तु भी ऐसे ही नहीं बन जाती। उसके लिए भी न जाने कितने हाथों के सहारे की जरूरत पड़ती है। एक बटन टांकने के लिए सबसे जरूरी यंत्र सुई है। इस छोटी सी चीज को भी हम स्वयं नहीं बना सकते। सच तो ये है कि हम सब एक दूसरे के सहयोग के बिना अधूरे हैं। हमारे विकास में हमारा पुरुषार्थ ही नहीं, अन्य सभी का सहयोग भी अपेक्षित है। माता-पिता, भाई-बंधु, समाज, विरोधी-प्रतिद्वंद्वी और प्रकृति के मिले जुले प्रयासों से हमारा जीवन गति पाता है।

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