सफल जीवन के अनमोल सूत्र।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

ϒ सफल जीवन के अनमोल सूत्र। ϒ

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम् , भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ||

जीवन॰

  • जब तुम पैदा हुए थे तो तुम रोए थे जबकि पूरी दुनिया ने जश्न मनाया था। अपना जीवन ऐसे जियो कि तुम्हारी मौत पर पूरी दुनिया रोए और तुम जश्न मनाओ।

The successful formula of life-KMSRAJ51

कठिनाइया॰

  • जब तक आप अपनी समस्याओं एंव कठिनाइयों की वजह दूसरों को मानते है, तब तक आप अपनी समस्याओं एंव कठिनाइयों को मिटा नहीं सकते। क्योंकि अपनी समस्याओं एंव कठिनाइयों की वजह आप स्वयं हैं।

असंभव॰

  • इस दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं। हम वो सब कुछ कर सकते है, जो हम सोच सकते है और हम वो सब सोच सकते है, जो आज तक हमने नहीं सोचा।

हार ना मानना॰

  • बीच रास्ते से लौटने का कोई फायदा नहीं क्योंकि लौटने पर आपको उतनी ही दूरी तय करनी पड़ेगी, जितनी दूरी तय करने पर आप लक्ष्य तक पहुँच सकते है। इसलिए लक्ष्य की ओर बढ़ें।

अर्थ- हार व जीत का॰

  • सफलता हमारा परिचय दुनिया को करवाती है और असफलता हमें दुनिया का सहीं परिचय करवाती है।

सच्चा आत्मविश्वास॰

  • अगर किसी चीज़ को आप सच्चे दिल से चाहो तो पूरी कायनात उसे तुमसे मिलाने में लग जाती हैं।

सच्ची महानता॰

  • सच्ची महानता कभी न गिरने में नहीं बल्कि हर बार गिरकर फिर से उठ जाने में हैं।

गलतियां॰

  • अगर आप समय पर अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं करते है तो आप एक और गलती कर बैठते है। आप अपनी गलतियों से तभी सीख सकते है जब आप अपनी गलतियों को स्वीकार करते है।

चिन्ता॰

  • अगर आप उन बातों एंव परिस्थितियों की वजह से चिंतित हो जाते है, जो आपके नियंत्रण में नहीं हैं तो इसका परिणाम समय की बर्बादी एवं भविष्य में पछतावा है।

शक्ति॰

  • ब्रह्माण्ड की सारी शक्तियां पहले से हमारी हैं। वो हम हैं जो अपनी आँखों पर हाथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि कितना अन्धकार है।

मेहनत॰

  • हम चाहें तो अपने आत्मविश्वास और मेहनत के बल पर अपना भाग्य खुद लिख सकते है और अगर हमको अपना भाग्य लिखना नहीं आता तो परिस्थितियां व समय हमारा भाग्य लिख ही देंगी।

सपने॰

  • सच कहे ताे सपने वो नहीं है जो हम नींद में देखते है, सपने ताे वो है जो हमको नींद हीं न आने दें।

समय॰

  • आप यह नहीं कह सकते कि आपके पास समय नहीं है क्योंकि आपको भी दिन में उतना ही समय (२४ घंटे) मिलता है जितना समय महान एंव सफल लोगों को मिलता है। समय सभी काे एक समान ही मिलता हैं।

विश्वास॰

  • विश्वास में वो शक्ति है जिससे उजड़ी हुई दुनिया में प्रकाश लाया जा सकता है। विश्वास पत्थर को भगवान बना सकता है और अविश्वास भगवान के बनाए इंसान को भी पत्थर दिल बना सकता हैं। विश्वास की नीव पर टिके है सारे रिश्तें।

सफलता॰

  • दूर से हमें आगे के सभी रास्ते बंद नजर आते हैं क्योंकि सफलता के रास्ते हमारे लिए तभी खुलते हैं जब हम उसके बिल्कुल करीब पहुँच जाते हैं।

सोच॰

  • बारिश के दौरान सारे पक्षी आश्रय की तलाश करते है लेकिन बाज़ बादलों के ऊपर उडकर बारिश को ही Avoid कर देते है। समस्याए Common है, लेकिन आपका नजरिया इनमे Difference पैदा करता है। इसलिए अपने सोचने के नजरिये काे Change करें।

प्रसन्नता॰

  • यहा पहले से निर्मित कोई चीज नहीं है… ये आप ही के कर्मों से आती है …. आपके कर्मं ही निमित्त बनते हैं।

निमित्त भाव॰

  • आप सिर्फ निमित्त मात्र हैं इस संसार में। यह संसार एक रंगमंच हैं – सभी मनुष्य आत्मायें अपना-अपना Part Play कर रही हैं। जाे आत्मा अपना Part निमित्त भाव से Play कर रही है, ओ आनंद में हैं।

याद रखेंः – जीवन में सच्चा आनंद और शांति ताे सिर्फ व सिर्फ ईश्वरीय ध्यान `या` परमात्म याद (Godly Meditation) में ही हैं। चाहे अरबाे-खरबाे (Billions – trillions) इकट्ठा कर लाे फिर भी सच्चा आनंद और शांति कभी ना मिलेगी।

ॐ शांति ॐ शांति ॐ शांति ॐ शांति ॐ शांति॥
ॐ शांति ॐ शांति ॐ शांति ॐ शांति ॐ शांति॥

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

* विचारों का स्तर श्रेष्ठ व पवित्र हो।

* अच्छी आदतें कैसे डालें।

KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

~KMSRAJ51

 

विचारों का स्तर श्रेष्ठ व पवित्र हो।

Kmsraj51 की कलम से…..

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ϒ विचारों का स्तर श्रेष्ठ व पवित्र हो। ϒ

सर्वप्रथम काेई भी कर्म मन में_ब्लू-प्रिंट(विचारों) के रूप में तैयार हाेता हैं, और यही ब्लू-प्रिंट(विचार) कर्म के रूप मे प्रत्यक्ष हाेता हैं। जब ब्लू-प्रिंट(विचारों) सकारात्मक हाेगें ताे कर्म भी सुकर्म(अच्छे कर्म) हाेगें, और जब ब्लू-प्रिंट(विचारों) नकारात्मक हाेगें ताे कर्म भी विकर्म(बुरें) हाेगें।

जैसे बीज के अभाव में वृक्ष का जन्म नहीं हो सकता, ठीक वैसे ही उच्च विचारों के अभाव में उच्च कर्म घटित नहीं हो सकता। शुभ कर्म और अशुभ कर्म दोनों कर्मों के पीछे जो कारण है वह विचार ही है। हमारे विचारों का स्तर जितना श्रेष्ठ और पवित्र होगा हमारे कर्म भी उतने ही श्रेष्ठ और पवित्र होंगे।

Holy thoughts - kmsraj51

कोई चोर तब तक चोरी नहीं कर सकता, जब तक कि वह पहले उसका विचार न कर लें। अत: हमारा कोई भी कर्म, कार्य करने से पहले विचारों में घटित हो जाता है। विचारों का स्तर हमारे संग पर निर्भर करता है, हमारी संगति जितनी अच्छी होगी हम उतने ही अच्छे विचारों के धनी होंगे।

जब तक हमारे विचार शुद्ध नहीं होंगे तब तक हमारे कर्म भी शुद्ध नहीं हो सकते। इसलिए विचारों को शुद्ध किये बिना कर्म की शुद्धि का प्रयास करना व्यर्थ है। जिसके विचार पवित्र हों उससे बुरा कर्म कभी हो ही नहीं सकता है।

 याद रखेंः – सत्य है कि लोहे से ही लोहे को काटा जा सकता है और पत्थर से ही पत्थर को तोडा जा सकता है। मगर ह्रदय चाहे कितना भी कठोर क्यों ना हो उसको पिघलाने के लिए कभी भी कठोर वाणी कारगर नहीं हो सकती क्योंकि वह केवल और केवल नरम वाणी से ही पिघल सकता है।

  • क्रोध को क्रोध से नहीं जीता जा सकता, बोध से जीता जा सकता है।
  • अग्नि कभी भी अग्नि से नहीं बुझती जल से ही बुझती है।
  • समझदार व्यक्ति बड़ी से बड़ी बिगड़ती स्थितियों को दो शब्द प्रेम के बोलकर संभाल लेते हैं।
  • हर स्थिति में संयम रखो, संयम ही आपको क्लेशों से बचा सकता है।
  • आँखों में शर्म रहे और वाणी नरम रहे तो समझ लेना परम सुख आपसे दूर नहीं।

कहते हैः-

रूठते हैं शब्द भी अपने गलत इस्तेमाल होने पर।
देखा है हमने शब्दों को भी अकसर रूठते हुए॥

जब आपके विचारों का स्तर श्रेष्ठ व पवित्र होगा ताे आपके हर कर्म श्रेष्ठ व पवित्र होगें। और जब आपके हर कर्म श्रेष्ठ व पवित्र होगें तभी आप आंतरिक शांति का अनुभव महसूस कर सकेगें।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

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* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

* अच्छी आदतें कैसे डालें।

KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

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चमत्कारिक है ओ३म् का उच्चारण।

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चमत्कारिक है ओ३म् का उच्चारण।

OM-KMSRAJ51

चमत्कारिक है ओ३म् का उच्चारण।

१- ओ३म् के उच्चारण मात्र से मृत कोशिकाएँ जीवित हो जाती है।

२- मन के नकारात्मक भाव सकारात्मक में परिवर्तित हो जाते है।

३- तनाव से मुक्ति मिलती है।

४- स्टेरॉयड का स्तर कम हो जाता है।

५- चेहरे के भाव तथा हमारे आसपास के वातावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

६- मस्तिष्क में सकारात्मक परिवर्तन होते हैं तथा हृदय स्वस्थ होता है।

७- मन में संकल्पाें(विचारों) की संख्या कम हाेने लगती हैं, और जब मन में संकल्पाें(विचारों) की संख्या कम हाेते हैं तब मन धीरे-धीरे शांत हाेने लगता हैं।

८- मन शांत हाेने से निर्णय शक्ति मजबूत(शक्तिशाली) हाे जाती हैं।

९- ओ३म् के उच्चारण मात्र से आत्मा की सुषुप्त आंतरिक शक्तियाँ जाग जाती हैं। और आत्मा की सुषुप्त हुँई शक्तियाें के जग जाने पर इस जहान(संसार) का काेई भी कार्य करना असंभव नहीं हाेता आपके लिए। अर्थात हरेक कार्य सरलता पूर्वक आप कर सकते हैं।

१०- ओ३म के लंबे समय तक उच्चारण मात्र से आपके मन, वचन(बाेल) और कर्म में पवित्रता आने लगती हैं।

११- ओ३म के लंबे समय तक उच्चारण मात्र से आपके शरीर के सारे रोम-छिद्र खुल जाते हैं। शरीर के अंदर रक्त-प्रसार तेजी से हाेने लगता हैं। आपके शरीर की त्वचा में कसावट आने लगता हैं। जिससे आपका शरीर पहले की अपेक्षा धीरे-धीरे बहुत सुंदर हाे जाता हैं।

अर्थात- केवल ओ३म के लंबे समय तक उच्चारण मात्र से आपके तन, मन, वचन(बाेल) और कर्म में पवित्रता (Purity) आ जाती हैं।

Source: “तू ना हो निराश कभी मन से” किताब(महाग्रंथ) से।

“तू ना हो निराश कभी मन से” 

cymt-kmsraj51

Coming soon book (जल्द ही आ रहा महाग्रंथ(किताब))…..

कृष्ण मोहन सिंह द्वारा लिखित महाग्रंथ (किताब) “तू ना हो निराश कभी मन से” बहुत जल्द ही आप सभी के पास हाेगा।

एक ऐसा महाग्रंथ जाे किसी भी साधारण इंसान काे इतना शक्तिशाली बना दें, की हर असंभव कार्य भी सरलता पूर्वक संभव कार्य में बदल दें।

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* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

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* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

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* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

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* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

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* चांदी की छड़ी।

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

-KMSRAJ51

किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए हिम्मत और उमंग-उत्साह बहुत जरूरी है।

जहाँ उमंग-उत्साह नहीं होता वहाँ थकावट होती है और थका हुआ कभी सफल नहीं होता।

 ~KMSRAJ51

 

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मुस्कुराहट को अपनी आदत बनाओ, मजबूरी नहीं।

Kmsraj51 की कलम से…..

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संसार में खिले फूल और खिले चेहरे पसन्द किए जाते हैं। अगर आप चाहते हैं कि दुनियाँ का प्यार आपको भी मिले तो उसके लिए अपनी मुस्कान को मत छोड़ना। हर हाल में मुस्कुराइये इससे आपकी कई समस्याएँ हल हो जायेंगी।

मुस्कुराहट को अपनी आदत बनाओ, मजबूरी नहीं। मजबूरी में मुस्कुराना, मुस्कुराना नहीं अपितु मात्र दूसरों को दिखाना है और याद रखना दिखावा कभी टिकता नहीं। यह दिखावा आपके काम न आयेगा। दिखावा आपको दुनिया का चहेता नहीं बनाता अपितु दुनियाँ वालों की नजरों में आप चतुर, चालाक जरूर बन जाते हैं।

मुस्कान से मात्र आपका चित्र ही सुन्दर नहीं लगता, आपका व्यक्तित्व भी सुन्दर बनता है। सच्ची मुस्कान मात्र आपके आवरण को ही सुन्दर नहीं बनाती अपितु आपके आचरण को भी सुन्दर बनाती है।

Quotes by: Sri Sri Ravi Shankar Ji(Art of Living) 

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अधूरापन ज़रूरी है जीने के लिए।

Kmsraj51 की कलम से…..

Kmsraj51-CYMT-Oct-14-1

अधूरापन ज़रूरी है जीने के लिए

kmsraj51-G-of-Water

Incompleteness is necessary to live

अधूरापन शब्द सुनते ही मन में एक negative thought आ जाती है. क्योंकि यह शब्द अपने आप में जीवन की किसी कमी को दर्शाता है। पर सोचिये कि अगर ये थोड़ी सी कमी जीवन में ना हो तो जीवन खत्म सा नहीं हो जायेगा?

अगर आप ध्यान दीजिए तो आदमी को काम करने के लिए प्रेरित ही यह कमी करती है. कोई भी कदम, हम इस खालीपन को भरने की दिशा में ही उठाते हैं। Psychologists का कहना है कि मनुष्य के अंदर कुछ जन्मजात शक्तियां होती हैं जो उसे किसी भी नकारात्मक भाव से दूर जाने और available options में से best option चुनने के लिए प्रेरित करती हैं। कोई भी चीज़ जो life में असंतुलन लाती है, आदमी उसे संतुलन की दिशा में ले जाने की कोशिश करता है।

“अगर कमी ना हो तो ज़रूरत नहीं होगी, ज़रूरत नहीं होगी तो आकर्षण नहीं होगा, और अगर आकर्षण नहीं होगा तो लक्ष्य भी नहीं होगा।”

अगर भूख ना लगे तो खाने की तरफ जाने का सवाल ही नहीं पैदा होता। इसलिए अपने जीवन की किसी भी कमी को negative ढंग से देखना सही नहीं है।असल बात तो ये है कि ये कमी या अधूरापन हमारे लिए एक प्रेरक का काम करता है।

कमियां सबके जीवन में होती हैं बस उसके रूप और स्तर अलग-अलग होते हैं, और इस दुनिया का हर काम उसी कमी को पूरा करने के लिए किया जाता रहा है, और किया जाता रहेगा। चाहे जैसा भी व्यवहार हो , रोज का काम हो, office जाना हो, प्रेम सम्बन्ध हो या किसी से नए रिश्ते बनाने हो सारे काम जीवन के उस खालीपन को भरने कि दिशा में किये जाते है। हाँ, ये ज़रूर हो सकता है कि कुछ लोग उस कमी के पूरा हो जाने के बाद भी उसकी बेहतरी के लिए काम करते रहते हैं।

आप किसी भी घटना को ले लीजिए आज़ादी की लड़ाई, कोई क्रांति, छोटे अपराध, बड़े अपराध या कोई परोपकार, हर काम किसी न किसी अधूरेपन को दूर करने के लिए हैं। कई शोधों से तो ये तक proof हो चुका है कि व्यक्ति किस तरह के कपड़े पहनता है, किस तरह कि किताब पढता है, किस तरह का कार्यक्रम देखना पसंद करता है और कैसी संस्था से जुड़ा है ये सब अपने जीवन की उस कमी को दूर करने से सम्बंधित है।

महान psychologist Maslow (मैस्लो) ने कहा है कि व्यक्ति का जीवन पांच प्रकार कि ज़रूरतों के आस – पास घूमता है।

पहली मौलिक ज़रूरतें – भूख, प्यास और सेक्स की।
दूसरी – सुरक्षा की।
तीसरी – संबंधों या प्रेम की।
चौथी आत्मा – सम्मान की।
और पांचवी – आत्म सिद्धि (Self-accomplishment) की जिसमे व्यक्ति अपनी क्षमताओं का पूरा प्रयोग करता है।

ज़रूरी नहीं की हम अपने जीवन में Maslow’s Hierarchy of needs में बताई गयी सारी stages तक पहुँच पाएं और हर कमी को दूर कर पाएं, पर प्रयास ज़रूर करते हैं.
कई घटनाएँ ऐसी सुनने में आती हैं जहाँ लोगों ने अपने जीवन की कमियों को अपनी ताकत में बदला हैं और जिसके कारण पूरी दुनियां उन्हें जानती है जिसमे Albert Einstein और Abraham Lincoln का नाम सबसे ऊपर आता है.
Albert Einstein जन्म से ही learning disability का शिकार थे , वह चार साल तक बोल नहीं पाते थे और नौ साल तक उन्हें पढ़ना नहीं आता था। College Entrance के पहले attempt में वो fail भी हो गए थे. पर फिर भी उन्होंने जो कर दिखाया वह अतुलनीय है।
Abraham Lincoln ने अपने जीवन में health से related कई problems face कीं। उन्होंने अपने जीवन में कई बार हार का मुंह देखा यहाँ तक की एक बार उनका nervous break-down भी हो गया, पर फिर भी वे 52 साल की उम्र में अमेरिका के सोलहवें राष्ट्रपति बने।

“सच ही है अगर इंसान चाहे तो अपने जीवन के अधूरेपन को ही अपनी प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत बना सकता है।
जो अधूरापन हमें जीवन में कुछ कर गुजरने की प्रेरणा दे , भला वह Negative कैसे हो सकता है।”

“ज़रा सोचिये! कि अगर ये थोडा सा अधूरापन हमारे जीवन में न हो तो जीवन कितना अधूरा हो जाये।”

In English

– Incompleteness is necessary to live –

Adhurapna shabd melody is a negative thought in mind. Because the term itself refers to a loss of life. But imagine that if it’s not in the slightest bit short life will not end life?

If you give notice to the person to work it does lack. Any steps we take in the direction of filling emptiness.Psychologists say that humans have innate powers which something inside her move away from any negative sense and available options to choose the best option simulates. Any thing life brings imbalance in men it is carrying koshishkarta towards balance.
If not then do not need shortage won’t have the draw will not, and will not, will not target if charm. if hunger took the side of the asylum right question arises. Therefore lack any of your life watching negative manner is not correct. The real thing is that these lack or incompleteness of a motivator for us.
Drawbacks are just as her life and everybody levels vary. And of this world every thing is to meet the shortage and will continue to be. Even as the work of the practice day, go to office, love relationship or a new relationship may only fill the emptiness of all things life that are made in that direction. Yes, these may of course that some people even after the reduction is completed his work for better living.
You collect any event freely fight, no revolution, no big small crime, guilt or benevolence, nailed every thing adhurepan to remove these from the proof many are oversees research has been that person wears, what kind of fabric that is, what kind of program book padhta likes to watch and what institution is connected to all of your life to overcome the constraints associated with the Is.
The great psychologist Maslow (maislo) said that five types of life that revolve around needs – pass.
Pahlimaulik needs; Hunger, thirst, and sex.
Dusrisurksha chauthiatma-tisrisambandhon or of love, honor aurpanchaviatmasiddhi (self-actualization) of which uses his abilities of the person.
Not we your life Maslow Hierarchy of needs ‘ s added in all the stages reached by e-mail and every vulnerability able, make sure to try on.
Many events in such hearing where people in your life are changed and the shortcomings of its strength due to which the whole world’s best parathas Albert Einstein and Abraham Lincoln that they know the name comes at the top.
Albert Einstein was a victim of the learning disability since birth, she cannot speak and four years nine years did not read them. In the first attempt fail College Entrance were also. Still, he showed that he is incomparable.
Abraham Lincoln did face many problems related to health in their lives did. He looked lost at times in my life mouth even once his nervous break-down is also done, but still they are 52-year-old American President as sixteenths.
True if the person wants your life adhurepan your motivation could make the largest source.
Do the things in life that inspire the passage of incompleteness give us, how could he not negative.
“Just imagine! If it’s a little bit not incompleteness in our lives should be so incomplete life!

Priyank Dubey

Roorkee-Uttarakhand

We are grateful to Priyank Dubey Ji for sharing this inspirational Hindi Quotes-Story with KMSRAJ51 readers.

“अगर सच्चे-मन से जीवन में कुछ करने की ठान लाे, ताे सफलता आपकाे जरुर मिलेगी। -KMSRAJ51”

Note::-

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सफलता कठोर मेहनत और खुद पर भरोसा करने से मिलती है।

यह गिफ्ट में या धनी परिवार में पैदा होने से नहीं मिलती है।

-Kmsraj51

– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

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* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

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* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

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* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

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* चांदी की छड़ी।

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सर्व श्रेष्ठ सम्पत्तिवान काैन?

Kmsraj51 की कलम से…..

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सर्व श्रेष्ठ सम्पत्तिवान काैन?

किसी के पास अगर सिर्फ स्थूल सम्पत्ति है तो भी सदा सन्तुष्ट नहीं रह सकते। स्थूल सम्पत्ति के साथ अगर सर्व गुणों की सम्पत्ति, सर्व शक्तियों की सम्पत्ति और ज्ञान की श्रेष्ठ सम्पत्ति नहीं है तो सन्तुष्टता सदा नहीं रह सकती।  दुनिया वाले सिर्फ स्थूल सम्पत्ति वाले को सम्पत्तिवान समझते हैं।

सर्व श्रेष्ठ सम्पत्तिवान वह हैं जिसके पास स्थूल सम्पत्ति के साथ अगर सर्व गुणों की सम्पत्ति, सर्व शक्तियों की सम्पत्ति और ज्ञान की श्रेष्ठ सम्पत्ति है

वाे ही सर्व श्रेष्ठ सम्पत्तिवान है।

किसी भी मनुष्य की तीन मुख्य-सम्पत्ति (Property)

  1. गुणों की सम्पत्ति,
  2. ज्ञान की श्रेष्ठ सम्पत्ति,
  3. आत्मिक शक्तियों की सम्पत्ति,

ये तीनाे शक्तिया जिस मनुष्य के पास “न” हाे, सिर्फ स्थूल सम्पत्ति है तो भी सदा सन्तुष्ट नहीं रह सकता।

कर्म-अकर्म-विकर्म की गति को जान विकर्मों से बचना ही ज्ञान हाेने का बाेध कराता है।

साभार-

“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से

Note::-

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“तू ना हो निराश कभी मन से”

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“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की व्यर्थ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51 

खुद को साबित करने के लिए मौका मिलने के आप हकदार हैं। सफलता की नींव आप खुद हैं। 

दूसरे क्या सोच रहे हैं, इस बारे में अनुमान लगाते रहना नकारात्मक सोच की निशानी है।

 

 

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हिंदी और अंग्रेजी में मुरली

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हिंदी मुरली (19-Sep-2014)

मुरली सार:- “मीठे बच्चे – तुम सर्व आत्माओं को कर्मबन्धन से सैलवेज़ करने वाले सैलवेशन आर्मी हो, तुम्हें कर्मबन्धन में नहीं फँसना है”

प्रश्न:- कौन-सी प्रैक्टिस करते रहो तो आत्मा बहुत-बहुत शक्तिशाली बन जायेगी?
उत्तर:- जब भी समय मिले तो शरीर से डिटैच होने की प्रैक्टिस करो। डिटैच होने से आत्मा में शक्ति वापिस आयेगी, उसमें बल भरेगा। तुम अण्डर-ग्राउण्ड मिलेट्री हो, तुम्हें डायरेक्शन मिलता है – अटेन्शन प्लीज़ अर्थात् एक बाप की याद में रहो, अशरीरी हो जाओ।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) लाइट हाउस बन सबको शान्तिधाम, सुखधाम का रास्ता बताना है। सबकी नईया को दु:खधाम से निकालने की सेवा करनी है। अपना भी कल्याण करना है।
2) अपने शान्त स्वरूप स्थिति में स्थित हो शरीर से डिटैच होने का अभ्यास करना है, याद में आंखे खोलकर बैठना है, बुद्धि से रचता और रचना का सिमरण करना है।

वरदान:- कोई भी बात कल्याण की भावना से देखने और सुनने वाले परदर्शन मुक्त भव
जितना संगठन बड़ा होता जाता है, बातें भी उतनी बड़ी होंगी। लेकिन अपनी सेफ्टी तब है जब देखते हुए न देखें, सुनते हुए न सुनें। अपने स्वचिंतन में रहें। स्वचिंतन करने वाली आत्मा परदर्शन से मुक्त हो जाती है। अगर किसी कारण से सुनना पड़ता है, अपने आपको जिम्मेवार समझते हो तो पहले अपनी ब्रेक को पावरफुल बनाओ। देखा-सुना, जहाँ तक हो सका कल्याण किया और फुल स्टॉप।

स्लोगन:- अपने सन्तुष्ट, खुशनुम: जीवन से हर कदम में सेवा करने वाले ही सच्चे सेवाधारी हैं।

English Murli (19-Sep-2014)

Essence: Sweet children, you are the Salvation Army who will salvage all souls from their karmic bondages. You must not become trapped in karmic bondages.

Question: What should you continue to practise so that the soul becomes very powerful?
Answer: Whenever you have time, practise becoming detached from the body. By becoming detached, the soul will regain power and become filled with strength. You are the underground military and are given the direction, “Attention please!”, that is, “Stay in remembrance of the one Father and become bodiless.”

Essence for dharna:
1. Become a lighthouse and show everyone the way to the land of peace and the land of happiness. Do the service of removing everyone’s boat from the land of sorrow. Also benefit yourself.
2. Remain stable in your peaceful form and practise becoming detached from your body. Sit in remembrance with your eyes open. Remember the Creator and creation with your intellect.

Blessing: May you be free from looking at others, and have feelings of benevolence when seeing or hearing about any situation.
The bigger the gathering, the bigger the situations will be. However, your safety lies in looking but not seeing and hearing but not listening. Maintain pure and positive thoughts for the self. Souls who maintain pure and positive thoughts for the self remain free from looking at others. If due to any reason you have to listen to anything and you consider yourself to be responsible, then, first of all, make your brake powerful. You saw, you heard and brought as much as benefit possible and put a full stop.

Slogan: Those who do service at every step through their contented and happy lives are true servers.

आध्यात्मिक सेवा में ब्रह्मकुमारी,

In Spiritual Service Brahmakumari,

Note::-

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In-English…..

Purity is the foundation of true peace & happiness,

It is your most valuable Property in your life,

Preserve it at any cast. !!

 

In-Hindi…..

पवित्रता सच शांति और खुशी का आधार है.

यह आपके जीवन में सबसे मूल्यवान संपत्ति है.

यह किसी भी कलाकार की रक्षा करता है!!

~KMSRAJ51

CYMT-Beautiful Flower-kmsraj51

आप कुछ भी कर सकते हैं, स्वयं पर विश्वास करना सीखें।

You can also learn to trust themselves.

-कृष्ण मोहन सिंह ५१

 

 

 

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Understanding The Different Types Of Thoughts That The Mind Creates

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Understanding The Different Types Of Thoughts That The Mind Creates – Part 1

By understanding each one of the thoughts that the mind creates we can keep the beneficial thoughts and discard those which are useless or harmful. Today we explain:

Necessary Thoughts
Necessary thoughts are those relating to your daily routine, such as, * What am I going to have for dinner? * What time am I picking up the children from school? * What is the number of my bank account? * What have I got to do today? They are also thoughts connected with your profession or job. These necessary thoughts relating to your daily life come into your mind according to your responsibilities and needs at a more physical, material and professional level. When these thoughts are repeated over and over again, they become unnecessary or waste thoughts.

– Message –

To make thoughts as pure as the actions is to be truly elevated.

Projection: There is usually attention on the self not to perform any negative acts. There is also considerable attention not to speak any words that are harmful or negative. But very rarely is there that attention on the thoughts. Because of this a lot of negative thoughts tend to remain in the intellect causing trouble for me.

Solution: I need to understand the fact that my thoughts form the basis for my words and actions. The more I pay attention to make my thoughts positive, the more it will make a positive impact on my words and actions too. Constant awareness of a positive thought enables me to maintain my own inner positivity.

Understanding The Different Types Of Thoughts That The Mind Creates – Part 2

Unnecessary (Waste) Thoughts
Unnecessary thoughts are thoughts that are produced at untimely moments that fill us with worry and anxiety when they appear in our minds. They have no constructive use. Unnecessary and useless thoughts are quick and repetitive which lead you nowhere. Often they refer to things from the past: * If this hadn’t happened? * Why did she have to say that to me? Too many thoughts are about things that we cannot change, or worries about the future, like: * What will happen tomorrow? * How will it happen? * What will I do if I find myself on my own? * If I had been there at the time, this disaster would not have happened. * If I had had this information at the time, I would have won the case. * When I get the qualification, I will be more respected by my superiors.

Your ability to concentrate is weakened by these useless thoughts. If you have a lot of these thoughts you use more energy and time to undertake each task. The origins of negativity also reside in them.

From the time that the past has already passed and the future is yet to come, these kinds of thoughts are not useful and they also weaken your inner strength and exhaust you. It is vital that we learn to avoid this pattern of thinking. In this way you will be more focused and your decision making capacity will improve.

– Message –

To be successful I need to have the balance between the head and the heart.

Projection: In my interactions with others, I sometimes only use my head, i.e., my logic. I am very logical and understand the facts very clearly. But if I keep myself limited only to the facts, I tend to forget to use my heart. I then am not available to the other person and fail to understand him.

Solution: In order to be successful in my interactions with others I need to have the right balance between my head and my heart. I need to see beyond what the facts say and try to listen and understand the other person too. When I do this I will not hurt people with my attitude but will be able to maintain harmonious relationships.

Understanding The Different Types Of Thoughts That The Mind Creates – Part 3

Negative Thoughts
Negative thoughts harm you and are not good for you. As well as the impact they may have on others, these thoughts disturb your peace and weaken your inner strength. If these thoughts occur on a regular basis, they can cause health problems, both physical and mental. They can even become destructive.

Negative thoughts are based on the five vices primarily – lust, anger, greed, ego, attachment. They are chiefly caused by selfish and harmful reasons, without taking into account the values and inner qualities of the person.
* If he speaks to me again in that way I’ll beat him up (rage), * I think they should pay me more without having to do any more work to earn it (greed).

Negative thoughts also arise from unsatisfied expectations, in disagreements, in laziness, vengeance, racism, jealousy, criticism, hate and an excess of power.
* My boss never appreciates my work but he always values my colleagues more (jealousy). * An eye for an eye, a tooth for a tooth or * He who lives by the sword, shall die by the sword (vengeance).

– Message –

The one who fulfills promises with determination is the one who overcome all problems.

Projection: When I see some weakness working within me I usually make a promise to myself with a lot of enthusiasm. But if I face even a little opposition or difficulty in fulfilling this promise, I tend to lose hope and usually give up trying altogether.

Solution: In order to bring about a change in me and fulfill my promise, I need to use the virtue of determination. Every time I find myself becoming careless in it, I need to remind myself strongly of the importance of the promise that I had made. Then I will be able to win over all the obstacles that come my way in bringing my thoughts and words to actions.

Understanding The Different Types Of Thoughts That The Mind Creates – Part 4

Negative Thoughts (cont.)

If your thoughts are based on the five vices or related emotions (as explained yesterday), it is as if you had poisoned your own mind and the atmosphere around you. However much you may be right, it does not matter. By thinking negatively you will always be the loser, since negative thoughts take away the respect you have for yourself and others respecting you. Generally speaking, people who think very negatively about others will often find themselves alone, even though they have many relationships. Other people will try to avoid someone who has angry thoughts since anger is like a fire that destroys and causes damage, and nobody wants to approach this fire.

A negative person who only sees the negative side of things causes disharmony in their immediate environment. These types of thoughts are more prevalent in people today, and are one of the causes of stress, fragmentation, aggressiveness and suffering in our current society.

At a practical level, negative thoughts make you lose energy and weaken you. They are a form of inner pollution that must be cleansed so that your mind becomes a more efficient tool.

– Message –

The one who is free from desire is the one who is able to maintain positivity.

Projection: When I put forth my ideas to others I expect them to listen to me. My idea changes to desire and when it is not accepted I then tend to become irritated. And along with it also comes jealousy or dislike for the others and I find myself caught up in negativity.

Solution: I need to make sure that I share my ideas with others but at the same time I need to keep myself free from any selfish motive. When I put forth my idea in a detached way, I too will be open to learning and I will be able to accept any criticism or rejectance that comes my way. Thus I will be free from negativity.

Understanding The Different Types Of Thoughts That The Mind Creates – Part 5

Positive Thoughts
Positive thoughts are those thoughts which give us and others the experience of our original virtues like peace, love, bliss, happiness, etc. They enable you to accumulate inner strength and equip you to be constructive. Positive thoughts are always beneficial in all circumstances, without trapping you in the external appearance of a situation.

Thinking positively does not mean ignoring the reality of your world and living in a fantasy or longing to be another person. For example, if you were to repeat over and over again, “I am well, am well,” when you were ill, this is not what we mean by positive thinking.

Thinking positively involves looking at problems and recognizing reality, but at the same time being able to find solutions without becoming obsessed or confused. This often requires tolerance, patience and common sense.

A person who thinks positively is aware of the weaknesses of others, but even then will direct their attention towards their positive characteristics.

– Message –

The power of posititivity helps finish all negativity.

Projection: When I am faced with negativity in people or in situations, I too usually tend to have negative thoughts. When my mind is caught up with negativity of any kind-fear, anger or tension, I cannot think anything positive. I then find myself totally caught up in the situation finding no solution.

Solution: The only way to finish negativity is to work with positivity. I need to make a conscious effort to look at some positive aspect in the situation or person with whom I am facing difficulty. When I do this I can relate to them with this positivity which will slowly make the situation better again.

Understanding The Different Types Of Thoughts That The Mind Creates -Part 6

Positive thoughts make you happy and as a result your expectations of others decrease. This does not mean that they do not matter to you, but that you no longer demand love, respect, recognition, or even calm, from them, and it makes your relationships that much easier. This is the best way to create long-lasting and harmonious relationships. When you have inner happiness, you have the strength to accept other people as they are without wanting them to be different. This acceptance produces more peaceful relationships. With the positive attitude you create, you can offer yourself to other people just the way you are, with your virtues and limitations, without pretence.

Your body also benefits greatly, since when you have a balanced, harmonious mind you are less susceptible to illnesses. A person who has many useless thoughts will often feel very tired because they are spending their energy in creating thousands of unnecessary and inefficient thoughts.

Your mind is strengthened and healed by being nourished with positive thoughts. A healthy mind is the basis of a balanced personality.

– Message –

The right kind of support makes people independent.

Projection: When I provide help and support to others, sometimes I find that they become dependent on me. They continue to expect the same kind of support that they had got from me before, when I am not in a position to give. Then my good gesture becomes a bondage or difficulty for me.

Solution: When I am providing help to someone, I need to check the kind of help that I am providing. True help is to provide assistance in such a way that slowly the person learns to rely on his own resources and becomes independent. Then there will be no expectations from me.

In Spiritual Service,
Brahma Kumaris

Mera Baba

मेरा बाबा

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“तू ना हो निराश कभी मन से”

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आप कुछ भी कर सकते हैं, स्वयं पर विश्वास करना सीखें।

-कृष्ण मोहन सिंह ५१

 

“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की व्यर्थ के लिए समय ही ना बचे” -Kmsraj51 

 

 

 

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स्वामी विवेकानन्द के अनमोल वचन

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उठो, जागो और तब तक रुको नहीं जब तक मंज़िल प्राप्त न हो जाये।

जो सत्य है, उसे साहसपूर्वक निर्भीक होकर लोगों से कहो – उससे किसी को कष्ट होता है या नहीं, इस ओर ध्यान मत दो। दुर्बलता को कभी प्रश्रय मत दो। सत्य की ज्योति ‘बुद्धिमान’ मनुष्यों के लिए यदि अत्यधिक मात्रा में प्रखर प्रतीत होती है, और उन्हें बहा ले जाती है, तो ले जाने दो – वे जितना शीघ्र बह जाएँ उतना अच्छा ही है।

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तुम अपनी अंत:स्थ आत्मा को छोड़ किसी और के सामने सिर मत झुकाओ। जब तक तुम यह अनुभव नहीं करते कि तुम स्वयं देवों के देव हो, तब तक तुम मुक्त नहीं हो सकते।

ईश्वर ही ईश्वर की उपलब्धि कर सकता है। सभी जीवंत ईश्वर हैं – इस भाव से सब को देखो। मनुष्य का अध्ययन करो, मनुष्य ही जीवन्त काव्य है। जगत में जितने ईसा या बुद्ध हुए हैं, सभी हमारी ज्योति से ज्योतिष्मान हैं। इस ज्योति को छोड़ देने पर ये सब हमारे लिए और अधिक जीवित नहीं रह सकेंगे, मर जाएंगे। तुम अपनी आत्मा के ऊपर स्थिर रहो।

ज्ञान स्वयमेव वर्तमान है, मनुष्य केवल उसका आविष्कार करता है।

मानव – देह ही सर्वश्रेष्ठ देह है, एवं मनुष्य ही सर्वोच्च प्राणी है, क्योंकि इस मानव – देह तथा इस जन्म में ही हम इस सापेक्षिक जगत से संपूर्णतया बाहर हो सकते हैं – निश्चय ही मुक्ति की अवस्था प्राप्त कर सकते हैं, और यह मुक्ति ही हमारा चरम लक्ष्य है।

जो मनुष्य इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त करना चाहता है, उसे एक ही जन्म में हज़ारों वर्ष का काम करना पड़ेगा। वह जिस युग में जन्मा है, उससे उसे बहुत आगे जाना पड़ेगा, किन्तु साधारण लोग किसी तरह रेंगते-रेंगते ही आगे बढ़ सकते हैं।

जो महापुरुष प्रचार – कार्य के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं, वे उन महापुरुषों की तुलना में अपेक्षाकृत अपूर्ण हैं, जो मौन रहकर पवित्र जीवनयापन करते हैं और श्रेष्ठ विचारों का चिन्तन करते हुए जगत की सहायता करते हैं। इन सभी महापुरुषों में एक के बाद दूसरे का आविर्भाव होता है – अंत में उनकी शक्ति का चरम फलस्वरूप ऐसा कोई शक्तिसम्पन्न पुरुष आविर्भूत होता है, जो जगत को शिक्षा प्रदान करता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से विकसित हो चुकने पर धर्मसंघ में बना रहना अवांछनीय है। उससे बाहर निकलकर स्वाधीनता की मुक्त वायु में जीवन व्यतीत करो।

मुक्ति – लाभ के अतिरिक्त और कौन सी उच्चावस्था का लाभ किया जा सकता है ? देवदूत कभी कोई बुरे कार्य नहीं करते, इसलिए उन्हें कभी दंड भी प्राप्त नहीं होता, अतएव वे मुक्त भी नहीं हो सकते। सांसारिक धक्का ही हमें जगा देता है, वही इस जगत्स्वप्न को भंग करने में सहायता पहुँचाता है। इस प्रकार के लगातार आघात ही इस संसार से छुटकारा पाने की अर्थात् मुक्ति-लाभ करने की हमारी आकांक्षा को जाग्रत करते हैं।

हमारी नैतिक प्रकृति जितनी उन्नत होती है, उतना ही उच्च हमारा प्रत्यक्ष अनुभव होता है, और उतनी ही हमारी इच्छा शक्ति अधिक बलवती होती है।

मन का विकास करो और उसका संयम करो, उसके बाद जहाँ इच्छा हो, वहाँ इसका प्रयोग करो – उससे अति शीघ्र फल प्राप्ति होगी। यह है यथार्थ आत्मोन्नति का उपाय। एकाग्रता सीखो, और जिस ओर इच्छा हो, उसका प्रयोग करो। ऐसा करने पर तुम्हें कुछ खोना नहीं पड़ेगा। जो समस्त को प्राप्त करता है, वह अंश को भी प्राप्त कर सकता है।

पहले स्वयं संपूर्ण मुक्तावस्था प्राप्त कर लो, उसके बाद इच्छा करने पर फिर अपने को सीमाबद्ध कर सकते हो। प्रत्येक कार्य में अपनी समस्त शक्ति का प्रयोग करो।

सभी मरेंगे- साधु या असाधु, धनी या दरिद्र – सभी मरेंगे। चिर काल तक किसी का शरीर नहीं रहेगा। अतएव उठो, जागो और संपूर्ण रूप से निष्कपट हो जाओ। भारत में घोर कपट समा गया है। चाहिए चरित्र, चाहिए इस तरह की दृढ़ता और चरित्र का बल, जिससे मनुष्य आजीवन दृढ़व्रत बन सके।

संन्यास का अर्थ है, मृत्यु के प्रति प्रेम। सांसारिक लोग जीवन से प्रेम करते हैं, परन्तु संन्यासी के लिए प्रेम करने को मृत्यु है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम आत्महत्या कर लें। आत्महत्या करने वालों को तो कभी मृत्यु प्यारी नहीं होती है। संन्यासी का धर्म है समस्त संसार के हित के लिए निरंतर आत्मत्याग करते हुए धीरे – धीरे मृत्यु को प्राप्त हो जाना।

हे सखे, तुम क्यों रो रहे हो ? सब शक्ति तो तुम्हीं में हैं। हे भगवन, अपना ऐश्वर्यमय स्वरूप को विकसित करो। ये तीनों लोक तुम्हारे पैरों के नीचे हैं। जड़ की कोई शक्ति नहीं प्रबल शक्ति आत्मा की हैं। हे विद्वान! डरो मत; तुम्हारा नाश नहीं हैं, संसार-सागर से पार उतरने का उपाय हैं। जिस पथ के अवलम्बन से यती लोग संसार-सागर के पार उतरे हैं, वही श्रेष्ठ पथ मैं तुम्हें दिखाता हूँ!

बडे-बडे दिग्गज बह जायेंगे। छोटे – मोटे की तो बात ही क्या है! तुम लोग कमर कसकर कार्य में जुट जाओ, हुंकार मात्र से हम दुनिया को पलट देंगे। अभी तो केवल मात्र प्रारम्भ ही है। किसी के साथ विवाद न कर हिल-मिलकर अग्रसर हो – यह दुनिया भयानक है, किसी पर विश्वास नहीं है। डरने का कोई कारण नहीं है, माँ मेरे साथ हैं – इस बार ऐसे कार्य होंगे कि तुम चकित हो जाओगे। भय किस बात का? किसका भय? वज्र जैसा हृदय बनाकर कार्य में जुट जाओ।

किसी बात से तुम उत्साहहीन न होओ; जब तक ईश्वर की कृपा हमारे ऊपर है, कौन इस पृथ्वी पर हमारी उपेक्षा कर सकता है? यदि तुम अपनी अन्तिम साँस भी ले रहे हो तो भी न डरना। सिंह की शूरता और पुष्प की कोमलता के साथ काम करते रहो।

लोग तुम्हारी स्तुति करें या निन्दा, लक्ष्मी तुम्हारे ऊपर कृपालु हो या न हो, तुम्हारा देहान्त आज हो या एक युग मे, तुम न्यायपथ से कभी भ्रष्ट न हो।

वीरता से आगे बढो। एक दिन या एक साल में सिद्धि की आशा न रखो। उच्चतम आदर्श पर दृढ रहो। स्थिर रहो। स्वार्थपरता और ईर्ष्या से बचो। आज्ञा-पालन करो। सत्य, मनुष्य जाति और अपने देश के पक्ष पर सदा के लिए अटल रहो, और तुम संसार को हिला दोगे। याद रखो – व्यक्ति और उसका जीवन ही शक्ति का स्रोत है, इसके सिवाय अन्य कुछ भी नहीं।

मैं चाहता हूँ कि मेरे सब बच्चे, मैं जितना उन्नत बन सकता था, उससे सौगुना उन्न्त बनें। तुम लोगों में से प्रत्येक को महान शक्तिशाली बनना होगा- मैं कहता हूँ, अवश्य बनना होगा। आज्ञा-पालन, ध्येय के प्रति अनुराग तथा ध्येय को कार्यरूप में परिणत करने के लिए सदा प्रस्तुत रहना। इन तीनों के रहने पर कोई भी तुम्हे अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सकता।

जिस तरह हो, इसके लिए हमें चाहे जितना कष्ट उठाना पडे- चाहे कितना ही त्याग करना पडे यह भाव (भयानक ईर्ष्या) हमारे भीतर न घुसने पाये- हम दस ही क्यों न हों- दो क्यों न रहें- परवाह नहीं परन्तु जितने हों, सम्पूर्ण शुद्धचरित्र हों।

शक्तिमान, उठो तथा सामर्थ्यशाली बनो। कर्म, निरन्तर कर्म; संघर्ष, निरन्तर संघर्ष! अलमिति। पवित्र और निःस्वार्थी बनने की कोशिश करो – सारा धर्म इसी में है।

शत्रु को पराजित करने के लिए ढाल तथा तलवार की आवश्यकता होती है। इसलिए अंग्रेज़ी और संस्कृत का अध्ययन मन लगाकर करो।

बच्चों, धर्म का रहस्य आचरण से जाना जा सकता है, व्यर्थ के मतवादों से नहीं। सच्चा बनना तथा सच्चा बर्ताव करना, इसमें ही समग्र धर्म निहित है। जो केवल प्रभु – प्रभु की रट लगाता है, वह नहीं, किन्तु जो उस परम पिता के इच्छानुसार कार्य करता है वही धार्मिक है। यदि कभी कभी तुमको संसार का थोडा-बहुत धक्का भी खाना पडे, तो उससे विचलित न होना, मुहूर्त भर में वह दूर हो जायगा तथा सारी स्थिति पुनः ठीक हो जायगी।

‘जब तक जीना, तब तक सीखना’ – अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है।

जिस प्रकार स्वर्ग में, उसी प्रकार इस नश्वर जगत में भी तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो, क्योंकि अनन्त काल के लिए जगत में तुम्हारी ही महिमा घोषित हो रही है एवं सब कुछ तुम्हारा ही राज्य है।

पवित्रता, दृढता तथा उद्यम- ये तीनों गुण मैं एक साथ चाहता हूँ।

‘पवित्रता, धैर्य तथा प्रयत्न’ के द्वारा सारी बाधाएँ दूर हो जाती हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि महान कार्य सभी धीरे धीरे होते हैं।

साहसी होकर काम करो। धीरज और स्थिरता से काम करना – यही एक मार्ग है। आगे बढो और याद रखो धीरज, साहस, पवित्रता और अनवरत कर्म। जब तक तुम पवित्र होकर अपने उद्देश्य पर डटे रहोगे, तब तक तुम कभी निष्फल नहीं होओगे – माँ तुम्हें कभी न छोडेगी और पूर्ण आशीर्वाद के तुम पात्र हो जाओगे।

बच्चों, जब तक तुम लोगों को भगवान तथा गुरु में, भक्ति तथा सत्य में विश्वास रहेगा, तब तक कोई भी तुम्हें नुक़सान नहीं पहुँचा सकता। किन्तु इनमें से एक के भी नष्ट हो जाने पर परिणाम विपत्तिजनक है।

महाशक्ति का तुममें संचार होगा – कदापि भयभीत मत होना। पवित्र होओ, विश्वासी होओ, और आज्ञापालक होओ।

बिना पाखण्डी और कायर बने सबको प्रसन्न रखो। पवित्रता और शक्ति के साथ अपने आदर्श पर दृढ रहो और फिर तुम्हारे सामने कैसी भी बाधाएँ क्यों न हों, कुछ समय बाद संसार तुमको मानेगा ही।

धीरज रखो और मृत्युपर्यन्त विश्वासपात्र रहो। आपस में न लड़ो! रुपये – पैसे के व्यवहार में शुद्ध भाव रखो। हम अभी महान कार्य करेंगे। जब तक तुममें ईमानदारी, भक्ति और विश्वास है, तब तक प्रत्येक कार्य में तुम्हें सफलता मिलेगी।

जो पवित्र तथा साहसी है, वही जगत में सब कुछ कर सकता है। माया-मोह से प्रभु सदा तुम्हारी रक्षा करें। मैं तुम्हारे साथ काम करने के लिए सदैव प्रस्तुत हूँ एवं हम लोग यदि स्वयं अपने मित्र रहें तो प्रभु भी हमारे लिए सैकडों मित्र भेजेंगे, आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुः।

ईर्ष्या तथा अंहकार को दूर कर दो – संगठित होकर दूसरों के लिए कार्य करना सीखो।

पूर्णतः निःस्वार्थ रहो, स्थिर रहो, और काम करो। एक बात और है। सबके सेवक बनो और दूसरों पर शासन करने का तनिक भी यत्न न करो, क्योंकि इससे ईर्ष्या उत्पन्न होगी और इससे हर चीज़ बर्बाद हो जायेगी। आगे बढ़ो, तुमने बहुत अच्छा काम किया है। हम अपने भीतर से ही सहायता लेंगे अन्य सहायता के लिए हम प्रतीक्षा नहीं करते। मेरे बच्चे, आत्मविशवास रखो, सच्चे और सहनशील बनो।

यदि तुम स्वयं ही नेता के रूप में खडे हो जाओगे, तो तुम्हे सहायता देने के लिए कोई भी आगे न बढेगा। यदि सफल होना चाहते हो, तो पहले ‘अहं’ ही नाश कर डालो।

यदि कोई तुम्हारे समीप अन्य किसी साथी की निन्दा करना चाहे, तो तुम उस ओर बिल्कुल ध्यान न दो। इन बातों को सुनना भी महान पाप है, उससे भविष्य में विवाद का सूत्रपात होगा।

गम्भीरता के साथ शिशु सरलता को मिलाओ। सबके साथ मेल से रहो। अहंकार के सब भाव छोड दो और साम्प्रदायिक विचारों को मन में न लाओ। व्यर्थ विवाद महापाप है।

बच्चे, जब तक तुम्हारे हृदय में उत्साह एवं गुरु तथा ईश्वर में विश्वास – ये तीनों वस्तुएँ रहेंगी – तब तक तुम्हें कोई भी दबा नहीं सकता। मैं दिनोदिन अपने हृदय में शक्ति के विकास का अनुभव कर रहा हूँ। हे साहसी बालकों, कार्य करते रहो।

किसी को उसकी योजनाओं में हतोत्साह नहीं करना चाहिए। आलोचना की प्रवृत्ति का पूर्णतः परित्याग कर दो। जब तक वे सही मार्ग पर अग्रसर हो रहे हैं; तब तक उन्के कार्य में सहायता करो; और जब कभी तुमको उनके कार्य में कोई ग़लती नज़र आये, तो नम्रतापूर्वक ग़लती के प्रति उनको सजग कर दो। एक दूसरे की आलोचना ही सब दोषों की जड है। किसी भी संगठन को विनष्ट करने में इसका बहुत बड़ा हाथ है।

किसी बात से तुम उत्साहहीन न होओ; जब तक ईश्वर की कृपा हमारे ऊपर है, कौन इस पृथ्वी पर हमारी उपेक्षा कर सकता है? यदि तुम अपनी अन्तिम साँस भी ले रहे हो तो भी न डरना। सिंह की शूरता और पुष्प की कोमलता के साथ काम करते रहो।

क्या तुम नहीं अनुभव करते कि दूसरों के ऊपर निर्भर रहना बुद्धिमानी नहीं है। बुद्धिमान व्यक्ति को अपने ही पैरों पर दृढता पूर्वक खडा होकर कार्य करना चहिए। धीरे धीरे सब कुछ ठीक हो जाएगा।

आओ हम नाम, यश और दूसरों पर शासन करने की इच्छा से रहित होकर काम करें। काम, क्रोध एंव लोभ – इस त्रिविध बन्धन से हम मुक्त हो जायें और फिर सत्य हमारे साथ रहेगा।

न टालो, न ढूँढों – भगवान अपनी इच्छानुसार जो कुछ भेजें, उसके लिए प्रतिक्षा करते रहो, यही मेरा मूलमंत्र है।

शक्ति और विश्वास के साथ लगे रहो। सत्यनिष्ठा, पवित्र और निर्मल रहो, तथा आपस में न लडो। हमारी जाति का रोग ईर्ष्या ही है।

एक ही आदमी मेरा अनुसरण करे, किन्तु उसे मृत्युपर्यन्त सत्य और विश्वासी होना होगा। मैं सफलता और असफलता की चिन्ता नहीं करता। मैं अपने आन्दोलन को पवित्र रखूँगा, भले ही मेरे साथ कोई न हो। कपटी कार्यों से सामना पडने पर मेरा धैर्य समाप्त हो जाता है। यही संसार है कि जिन्हें तुम सबसे अधिक प्यार और सहायता करो, वे ही तुम्हे धोखा देंगे।

मेरा आदर्श अवश्य ही थोडे से शब्दों में कहा जा सकता है – मनुष्य जाति को उसके दिव्य स्वरूप का उपदेश देना, तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उसे अभिव्यक्त करने का उपाय बताना।

जब कभी मैं किसी व्यक्ति को उस उपदेशवाणी (श्री रामकृष्ण के वाणी) के बीच पूर्ण रूप से निमग्न पाता हूँ, जो भविष्य में संसार में शान्ति की वर्षा करने वाली है, तो मेरा हृदय आनन्द से उछलने लगता है। ऐसे समय मैं पागल नहीं हो जाता हूँ, यही आश्चर्य की बात है।

‘बसन्त की तरह लोग का हित करते हुए’ – यहि मेरा धर्म है। “मुझे मुक्ति और भक्ति की चाह नहीं। लाखों नरकों में जाना मुझे स्वीकार है, बसन्तवल्लोकहितं चरन्तः – यही मेरा धर्म है।”

हर काम को तीन अवस्थाओं में से गुज़रना होता है – उपहास, विरोध और स्वीकृति। जो मनुष्य अपने समय से आगे विचार करता है, लोग उसे निश्चय ही ग़लत समझते हैं। इसलिए विरोध और अत्याचार हम सहर्ष स्वीकार करते हैं; परन्तु मुझे दृढ और पवित्र होना चाहिए और भगवान में अपरिमित विश्वास रखना चाहिए, तब ये सब लुप्त हो जायेंगे।

यही दुनिया है! यदि तुम किसी का उपकार करो, तो लोग उसे कोई महत्त्व नहीं देंगे, किन्तु ज्यों ही तुम उस कार्य को बन्द कर दो, वे तुरन्त (ईश्वर न करे) तुम्हें बदमाश प्रमाणित करने में नहीं हिचकिचायेंगे। मेरे जैसे भावुक व्यक्ति अपने सगे – स्नेहियों द्वरा सदा ठगे जाते हैं।

न संख्या-शक्ति, न धन, न पाण्डित्य, न वाक चातुर्य, कुछ भी नहीं, बल्कि पवित्रता, शुद्ध जीवन, एक शब्द में अनुभूति, आत्म – साक्षात्कार को विजय मिलेगी! प्रत्येक देश में सिंह जैसी शक्तिमान दस-बारह आत्माएँ होने दो, जिन्होंने अपने बन्धन तोड डाले हैं, जिन्होंने अनन्त का स्पर्श कर लिया है, जिनका चित्र ब्रह्मानुसन्धान में लीन है, जो न धन की चिन्ता करते हैं, न बल की, न नाम की और ये व्यक्ति ही संसार को हिला डालने के लिए पर्याप्त होंगे।

यही रहस्य है। योग प्रवर्तक पंतजलि कहते हैं, “जब मनुष्य समस्त अलौकेक दैवी शक्तियों के लोभ का त्याग करता है, तभी उसे धर्म मेघ नामक समाधि प्राप्त होती है। वह प्रमात्मा का दर्शन करता है, वह परमात्मा बन जाता है और दूसरों को तदरूप बनने में सहायता करता है। मुझे इसी का प्रचार करना है। जगत में अनेक मतवादों का प्रचार हो चुका है। लाखों पुस्तकें हैं, परन्तु हाय! कोई भी किंचित् अंश में प्रत्यक्ष आचरण नहीं करता।

जो सबका दास होता है, वही उनका सच्चा स्वामी होता है। जिसके प्रेम में ऊँच – नीच का विचार होता है, वह कभी नेता नहीं बन सकता। जिसके प्रेम का कोई अन्त नहीं है, जो ऊँच – नीच सोचने के लिए कभी नहीं रुकता, उसके चरणों में सारा संसार लोट जाता है।

अकेले रहो, अकेले रहो। जो अकेला रहता है, उसका किसी से विरोध नहीं होता, वह किसी की शान्ति भंग नहीं करता, न दूसरा कोई उसकी शान्ति भंग करता है।

मेरी दृढ़ धारणा है कि तुममें अन्धविश्वास नहीं है। तुममें वह शक्ति विद्यमान है, जो संसार को हिला सकती है, धीरे – धीरे और भी अन्य लोग आयेंगे। ‘साहसी’ शब्द और उससे अधिक ‘साहसी’ कर्मों की हमें आवश्यकता है। उठो! उठो! संसार दुःख से जल रहा है। क्या तुम सो सकते हो? हम बार – बार पुकारें, जब तक सोते हुए देवता न जाग उठें, जब तक अन्तर्यामी देव उस पुकार का उत्तर न दें। जीवन में और क्या है? इससे महान कर्म क्या है?

तुमने बहुत बहादुरी की है। शाबाश! हिचकने वाले पीछे रह जायेंगे और तुम कूद कर सबके आगे पहुँच जाओगे। जो अपना उद्धार में लगे हुए हैं, वे न तो अपना उद्धार ही कर सकेंगे और न दूसरों का। ऐसा शोर – गुल मचाओ की उसकी आवाज़ दुनिया के कोने कोने में फैल जाय। कुछ लोग ऐसे हैं, जो कि दूसरों की त्रुटियों को देखने के लिए तैयार बैठे हैं, किन्तु कार्य करने के समय उनका पता नहीं चलता है। जुट जाओ, अपनी शक्ति के अनुसार आगे बढ़ो। इसके बाद मैं भारत पहुँच कर सारे देश में उत्तेजना फूँक दूंगा। डर किस बात का है? नहीं है, नहीं है, कहने से साँप का विष भी नहीं रहता है। नहीं नहीं कहने से तो ‘नहीं’ हो जाना पडेगा। खूब शाबाश! छान डालो – सारी दुनिया को छान डालो! अफ़सोस इस बात का है कि यदि मुझ जैसे दो – चार व्यक्ति भी तुम्हारे साथी होते

श्रेयांसि बहुविघ्नानि अच्छे कर्मों में कितने ही विघ्न आते हैं। – प्रलय मचाना ही होगा, इससे कम में किसी तरह नहीं चल सकता। कुछ परवाह नहीं। दुनिया भर में प्रलय मच जायेगा, वाह! गुरु की फ़तह! अरे भाई श्रेयांसि बहुविघ्नानि, उन्ही विघ्नों की रेल पेल में आदमी तैयार होता है। मिशनरी फिशनरी का काम थोडे ही है जो यह धक्का सम्हाले! ….बड़े – बड़े बह गये, अब गड़रिये का काम है जो थाह ले? यह सब नहीं चलने का भैया, कोई चिन्ता न करना। सभी कामों में एक दल शत्रुता ठानता है; अपना काम करते जाओ किसी की बात का जवाब देने से क्या काम? सत्यमेव जयते नानृतं, सत्येनैव पन्था विततो देवयानः (सत्य की ही विजय होती है, मिथ्या की नहीं; सत्य के ही बल से देवयानमार्ग की गति मिलती है।) …धीरे – धीरे सब होगा।

मन और मुँह को एक करके भावों को जीवन में कार्यान्वित करना होगा। इसी को श्री रामकृष्ण कहा करते थे, “भाव के घर में किसी प्रकार की चोरी न होने पाये।” सब विषयों में व्यवहारिक बनना होगा। लोगों या समाज की बातों पर ध्यान न देकर वे एकाग्र मन से अपना कार्य करते रहेंगे क्या तुने नहीं सुना, कबीरदास के दोहे में है – “हाथी चले बाज़ार में, कुत्ता भोंके हज़ार, साधुन को दुर्भाव नहिं, जो निन्दे संसार” ऐसे ही चलना है। दुनिया के लोगों की बातों पर ध्यान नहीं देना होगा। उनकी भली बुरी बातों को सुनने से जीवन भर कोई किसी प्रकार का महत् कार्य नहीं कर सकता।

अन्त में प्रेम की ही विजय होती है। हैरान होने से काम नहीं चलेगा – ठहरो – धैर्य धारण करने पर सफलता अवश्यम्भावी है – तुमसे कहता हूँ देखना – कोई बाहरी अनुष्ठानपध्दति आवश्यक न हो – बहुत्व में एकत्व सार्वजनिन भाव में किसी तरह की बाधा न हो। यदि आवश्यक हो तो “सार्वजनीनता” के भाव की रक्षा के लिए सब कुछ छोडना होगा। मैं मरूँ चाहे बचूँ, देश जाऊँ या न जाऊँ, तुम लोग अच्छी तरह याद रखना कि, सार्वजनीनता- हम लोग केवल इसी भाव का प्रचार नहीं करते कि, “दूसरों के धर्म का द्वेष न करना”; नहीं, हम सब लोग सब धर्मों को सत्य समझते हैं और उनका ग्रहण भी पूर्ण रूप से करते हैं हम इसका प्रचार भी करते हैं और इसे कार्य में परिणत कर दिखाते हैं सावधान रहना, दूसरे के अत्यन्त छोटे अधिकार में भी हस्तक्षेप न करना – इसी भँवर में बड़े-बड़े जहाज़ डूब जाते हैं पूरी भक्ति, परन्तु कट्टरता छोडकर, दिखानी होगी, याद रखना उनकी कृपा से सब ठीक हो जायेगा।

नीतिपरायण तथा साहसी बनो, अन्त:करण पूर्णतया शुद्ध रहना चाहिए। पूर्ण नीतिपरायण तथा साहसी बनो – प्राणों के लिए भी कभी न डरो। कायर लोग ही पापाचरण करते हैं, वीर पुरुष कभी भी पापानुष्ठान नहीं करते – यहाँ तक कि कभी वे मन में भी पाप का विचार नहीं लाते। प्राणिमात्र से प्रेम करने का प्रयास करो। बच्चों, तुम्हारे लिए नीतिपरायणता तथा साहस को छोडकर और कोई दूसरा धर्म नहीं। इसके सिवाय और कोई धार्मिक मत-मतान्तर तुम्हारे लिए नहीं है। कायरता, पाप, असदाचरण तथा दुर्बलता तुममें एकदम नहीं रहनी चाहिए, बाक़ी आवश्यकीय वस्तुएँ अपने आप आकर उपस्थित होंगी।

यदि कोई भंगी हमारे पास भंगी के रूप में आता है, तो छुतही बीमारी की तरह हम उसके स्पर्श से दूर भागते हैं। परन्तु जब उसके सिर पर एक कटोरा पानी डालकर कोई पादरी प्रार्थना के रूप में कुछ गुनगुना देता है और जब उसे पहनने को एक कोट मिल जाता है – वह कितना ही फटा – पुराना क्यों न हो – तब चाहे वह किसी कट्टर से कट्टर हिन्दू के कमरे के भीतर पहुँच जाय, उसके लिए कहीं रोक-टोक नहीं, ऐसा कोई नहीं, जो उससे सप्रेम हाथ मिलाकर बैठने के लिए उसे कुर्सी न दे! इससे अधिक विड़म्बना की बात क्या हो सकता है?

प्रायः देखने में आता है कि अच्छे से अच्छे लोगों पर कष्ट और कठिनाइयाँ आ पडती हैं। इसका समाधान न भी हो सके, फिर भी मुझे जीवन में ऐसा अनुभव हुआ है कि जगत में कोई ऐसी वस्तु नहीं, जो मूल रूप में भली न हो। ऊपरी लहरें चाहे जैसी हों, परन्तु वस्तु मात्र के अन्तरकाल में प्रेम एवं कल्याण का अनन्त भण्डार है। जब तक हम उस अन्तराल तक नहीं पहुँचते, तभी तक हमें कष्ट मिलता है। एक बार उस शान्ति-मण्डल में प्रवेश करने पर फिर चाहे आँधी और तूफ़ान के जितने तुमुल झकोरे आयें, वह मकान, जो सदियों की पुरानि चट्टान पर बना है, हिल नहीं सकता।

मेरी केवल यह इच्छा है कि प्रतिवर्ष यथेष्ठ संख्या में हमारे नवयुवकों को चीन, जापान में आना चाहिए। जापानी लोगों के लिए आज भारतवर्ष उच्च और श्रेष्ठ वस्तुओं का स्वप्नराज्य है। और तुम लोग क्या कर रहे हो? … जीवन भर केवल बेकार बातें किया करते हो, व्यर्थ बकवास करने वालों, तुम लोग क्या हो? आओ, इन लोगों को देखो और उसके बाद जाकर लज्जा से मुँह छिपा लो। सठियाई बुद्धिवालों, तुम्हारी तो देश से बाहर निकलते ही जाति चली जायगी! अपनी खोपडी में वर्षों के अन्धविश्वास का निरन्तर वृद्धिगत कूडा – कर्कट भरे बैठे, सैकडों वर्षों से केवल आहार की छुआछूत के विवाद में ही अपनी सारी शक्ति नष्ट करने वाले, युगों के सामाजिक अत्याचार से अपनी सारी मानवता का गला घोटने वाले, भला बताओ तो सही, तुम कौन हो? और तुम इस समय कर ही क्या रहे हो? …किताबें हाथ में लिए तुम केवल समुद्र के किनारे फिर रहे हो। तीस रुपये की मुंशी-गीरी के लिए अथवा बहुत हुआ, तो एक वकील बनने के लिए जी – जान से तडप रहे हो – यही तो भारतवर्ष के नवयुवकों की सबसे बडी महत्त्वाकांक्षा है। जिस पर इन विद्यार्थियों के भी झुण्ड के झुण्ड बच्चे पैदा हो जाते हैं, जो भूख से तडपते हुए उन्हें घेरकर ‘ रोटी दो, रोटी दो ‘ चिल्लाते रहते हैं। क्या समुद्र में इतना पानी भी न रहा कि तुम उसमें विश्वविद्यालय के डिप्लोमा, गाउन और पुस्तकों के समेत डूब मरो ? आओ, मनुष्य बनो! उन पाखण्डी पुरोहितों को, जो सदैव उन्नति के मार्ग में बाधक होते हैं, ठोकरें मारकर निकाल दो, क्योंकि उनका सुधार कभी न होगा, उनके हृदय कभी विशाल न होंगे। उनकी उत्पत्ति तो सैकडों वर्षों के अन्धविश्वासों और अत्याचारों के फलस्वरूप हुई है। पहले पुरोहिती पाखंड को ज़ड – मूल से निकाल फेंको। आओ, मनुष्य बनों। कूपमंडूकता छोडो और बाहर दृष्टि डालो। देखों, अन्य देश किस तरह आगे बढ रहे हैं। क्या तुम्हें मनुष्य से प्रेम है? यदि ‘हाँ’ तो आओ, हम लोग उच्चता और उन्नति के मार्ग में प्रयत्नशील हों। पीछे मुडकर मत देखों; अत्यन्त निकट और प्रिय सम्बन्धी रोते हों, तो रोने दो, पीछे देखो ही मत। केवल आगे बढते जाओ। भारतमाता कम से कम एक हज़ार युवकों का बलिदान चाहती है — मस्तिष्क वाले युवकों का, पशुओं का नहीं। परमात्मा ने तुम्हारी इस निश्चेष्ट सभ्यता को तोडने के लिए ही अंग्रेज़ी राज्य को भारत में भेजा है…[1]

एक महान रहस्य का मैंने पता लगा लिया है – वह यह कि केवल धर्म की बातें करने वालों से मुझे कुछ भय नहीं है। और जो सत्यदृष्ट महात्मा हैं, वे कभी किसी से बैर नहीं करते। वाचालों को वाचाल होने दो! वे इससे अधिक और कुछ नहीं जानते! उन्हें नाम, यश, धन, स्त्री से सन्तोष प्राप्त करने दो। और हम धर्मोपलब्धि, ब्रह्मलाभ एवं ब्रह्म होने के लिए ही दृढव्रत होंगे। हम आमरण एवं जन्म – जन्मान्त में सत्य का ही अनुसरण करेंगें। दूसरों के कहने पर हम तनिक भी ध्यान न दें और यदि आजन्म यत्न के बाद एक, केवल एक ही आत्मा संसार के बन्धनों को तोडकर मुक्त हो सके तो हमने अपना काम कर लिया।

वत्स, धीरज रखो, काम तुम्हारी आशा से बहुत ज़्यादा बढ जाएगा। हर एक काम में सफलता प्राप्त करने से पहले सैंकडों कठिनाइयों का सामना करना पडता है। जो उद्यम करते रहेंगे, वे आज या कल सफलता को देखेंगे। परिश्रम करना है वत्स, कठिन परिश्रम ! काम कांचन के इस चक्कर में अपने आप को स्थिर रखना, और अपने आदर्शों पर जमे रहना, जब तक कि आत्मज्ञान और पूर्ण त्याग के साँचे में शिष्य न ढल जाय निश्चय ही कठिन काम है। जो प्रतीक्षा करता है, उसे सब चीज़े मिलती हैं। अनन्त काल तक तुम भाग्यवान बने रहो।


हर अच्‍छे, श्रेष्‍ठ और महान कार्य में तीन चरण होते हैं, प्रथम उसका उपहास उड़ाया जाता है, दूसरा चरण उसे समाप्‍त या नष्‍ट करने की हद तक विरोध किया जाता है और तीसरा चरण है, स्‍वीकृति और मान्‍यता, जो इन तीनों चरणों में बिना विचलित हुये अडिग रहता है, वह श्रेष्‍ठ बन जाता है और उसका कार्य सर्व स्‍वीकृत होकर अनुकरणीय बन जाता है।

 

Source:- http://bharatdiscovery.org/

 

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CYMT-KMSRAJ51

“तू ना हो निराश कभी मन से”

—–

मन काे कैसे नियंत्रण में करें।

मन के विचारों काे कैसे नियंत्रित करें॥

विचारों के प्रकारएक खुशी जीवन के लिए।

अपनी सोच काे हमेशा सकारात्मक कैसे रखें॥

“मन के बहुत सारे सवालाें का जवाब-आैर मन काे कैसे नियंत्रित कर उसे सहीं तरिके से संचालित कर शांतिमय जीवन जियें”

 

अगर जीवन में सफल हाेना हैं. ताे जहाँ १० शब्दाें से काेई बात बन जाये वहा पर

१०० शब्द बाेलकर अपनी मानसिक और वाणी की ऊर्जा को नष्ट नहीं करना चाहिए॥

-Kmsraj51

 

 

_____ all @rights reserve under Kmsraj51-2013-2014 ______

जीवन परिवर्तक – हिन्दी उद्धरण

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMS

  • संसार की चिंता में पढ़ना तुम्हारा काम नहीं है, बल्कि जो सम्मुख आये, उसे भगवद रूप मानकर उसके अनुरूप उसकी सेवा करो।
  • संसार के सारे दु:ख चित्त की मूर्खता के कारण होते हैं। जितनी मूर्खता ताकतवर उतना ही दुःख मज़बूत, जितनी मूर्खता कम उतना ही दुःख कम। मूर्खता हटी तो समझो दुःख छू-मंतर हो जायेगी।
  • संसार का सबसे बड़ानेता है – सूर्य। वह आजीवन व्रतशील तपस्वी की तरह निरंतर नियमित रूप से अपने सेवा कार्य में संलग्न रहता है।
  • संसार कार्यों से, कर्मों के परिणामों से चलता है।
  • संसार का सबसे बड़ा दीवालिया वह है, जिसने उत्साह खो दिया।
  • संसार में हर वस्तु में अच्छे और बुरे दो पहलू हैं, जो अच्छा पहलू देखते हैं वे अच्छाई और जिन्हें केवल बुरा पहलू देखना आता है वह बुराई संग्रह करते हैं।
  • संसार में सच्चा सुख ईश्वर और धर्म पर विश्वास रखते हुए पूर्ण परिश्रम के साथ अपना कत्र्तव्य पालन करने में है।
  • संसार में रहने का सच्चा तत्त्वज्ञान यही है कि प्रतिदिन एक बार खिलखिलाकर ज़रूर हँसना चाहिए।
  • संसार में केवल मित्रता ही एक ऐसी चीज़ है जिसकी उपयोगिता के सम्बन्ध में दो मत नहीं है।
  • सारा संसार ऐसा नहीं हो सकता, जैसा आप सोचते हैं, अतः समझौतावादी बनो।
  • सात्त्विक स्वभाव सोने जैसा होता है, लेकिन सोने को आकृति देने के लिये थोड़ा – सा पीतल मिलाने कि जरुरत होती है।
  • सन्यासी स्वरुप बनाने से अहंकार बढ़ता है, कपडे मत रंगवाओ, मन को रंगों तथा भीतर से सन्यासी की तरह रहो।
  • सन्यास डरना नहीं सिखाता।
  • संन्यास का अर्थ है, मृत्यु के प्रति प्रेम। सांसारिक लोग जीवन से प्रेम करते हैं, परन्तु संन्यासी के लिए प्रेम करने को मृत्यु है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम आत्महत्या कर लें। आत्महत्या करने वालों को तो कभी मृत्यु प्यारी नहीं होती है। संन्यासी का धर्म है समस्त संसार के हित के लिए निरंतर आत्मत्याग करते हुए धीरे – धीरे मृत्यु को प्राप्त हो जाना।
  • सच्चा दान वही है, जिसका प्रचार न किया जाए।
  • सच्चा प्रेम दुर्लभ है, सच्ची मित्रता और भी दुर्लभ है।
  • सच्चे नेता आध्यात्मिक सिद्धियों द्वारा आत्म विश्वास फैलाते हैं। वही फैलकर अपना प्रभाव मुहल्ला, ग्राम, शहर, प्रांत और देश भर में व्याप्त हो जाता है।
  • सच्ची लगन तथा निर्मल उद्देश्य से किया हुआ प्रयत्न कभी निष्फल नहीं जाता।
  • सच्चाई, ईमानदारी, सज्जनता और सौजन्य जैसे गुणों के बिना कोई मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं हो सकता।
  • समाज में कुछ लोग ताकत इस्तेमाल कर दोषी व्यक्तियों को बचा लेते हैं, जिससे दोषी व्यक्ति तो दोष से बच निकलता है और निर्दोष व्यक्ति क़ानून की गिरफ्त में आ जाता है। इसे नैतिक पतन का तकाजा ही कहा जायेगा।
  • समाज सुधार सुशिक्षितों का अनिवार्य धर्म-कत्र्तव्य है।
  • समाज का मार्गदर्शन करना एक गुरुतर दायित्व है, जिसका निर्वाह कर कोई नहीं कर सकता।
  • सामाजिक और धार्मिक शिक्षा व्यक्ति को नैतिकता एवं अनैतिकता का पाठ पढ़ाती है।
  • सामाजिक, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में जो विकृतियाँ, विपन्नताएँ दृष्टिगोचर हो रही हैं, वे कहीं आकाश से नहीं टपकी हैं, वरन्‌ हमारे अग्रणी, बुद्धिजीवी एवं प्रतिभा सम्पन्न लोगों की भावनात्मक विकृतियों ने उन्हें उत्पन्न किया है।
  • सैकड़ों गुण रहित और मूर्ख पुत्रों के बजाय एक गुणवान और विद्वान पुत्र होना अच्छा है; क्योंकि रात्रि के समय हज़ारों तारों की उपेक्षा एक चन्द्रमा से ही प्रकाश फैलता है।
  • सत्य भावना का सबसे बड़ा धर्म है।
  • सत्य, प्रेम और न्याय को आचरण में प्रमुख स्थान देने वाला नर ही नारायण को अति प्रिय है।
  • सत्य बोलने तक सीमित नहीं, वह चिंतन और कर्म का प्रकार है, जिसके साथ ऊंचा उद्देश्य अनिवार्य जुड़ा होता है।
  • सत्य का पालन ही राजाओं का दया प्रधान सनातन अचार था। राज्य सत्य स्वरुप था और सत्य में लोक प्रतिष्ठित था।
  • सत्य के समान कोई धर्म नहीं है। सत्य से उत्तम कुछ भी नहीं हैं और जूठ से बढ़कर तीव्रतर पाप इस जगत में दूसरा नहीं है।
  • सत्य बोलते समय हमारे शरीर पर कोई दबाव नहीं पड़ता, लेकिन झूठ बोलने पर हमारे शरीर पर अनेक प्रकार का दबाव पड़ता है, इसलिए कहा जाता है कि सत्य के लिये एक हाँ और झूठ के लिये हज़ारों बहाने ढूँढने पड़ते हैं।
  • सत्य परायण मनुष्य किसी से घृणा नहीं करता है।
  • सत्य एक ऐसी आध्यात्मिक शक्ति है, जो देश, काल, पात्र अथवा परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होती।
  • सत्य ही वह सार्वकालिक और सार्वदेशिक तथ्य है, जो सूर्य के समान हर स्थान पर समान रूप से चमकता रहता है।
  • सत्य का मतलब सच बोलना भर नहीं, वरन्‌ विवेक, कत्र्तव्य, सदाचरण, परमार्थ जैसी सत्प्रवृत्तियों और सद्‌भावनाओं से भरा हुआ जीवन जीना है।
  • सुख-दुःख, हानि-लाभ, जय-पराजय, मान-अपमान, निंदा-स्तुति, ये द्वन्द निरंतर एक साथ जगत में रहते हैं और ये हमारे जीवन का एक हिस्सा होते हैं, दोनों में भगवान को देखें।
  • सुख-दुःख जीवन के दो पहलू हैं, धूप व छांव की तरह।
  • सुखी होना है तो प्रसन्न रहिए, निश्चिन्त रहिए, मस्त रहिए।
  • सुख बाहर से नहीं भीतर से आता है।
  • सुखों का मानसिक त्याग करना ही सच्चा सुख है जब तक व्यक्ति लौकिक सुखों के आधीन रहता है, तब तक उसे अलौकिक सुख की प्राप्ति नहीं हों सकती, क्योंकि सुखों का शारीरिक त्याग तो आसान काम है, लेकिन मानसिक त्याग अति कठिन है।
  • स्वर्ग व नरक कोई भौगोलिक स्थिति नहीं हैं, बल्कि एक मनोस्थिति है। जैसा सोचोगे, वैसा ही पाओगे।
  • स्वर्ग और मुक्ति का द्वार मनुष्य का हृदय ही है।
  • ‘स्वर्ग’ शब्द में जिन गुणों का बोध होता है, सफाई और शुचिता उनमें सर्वप्रमुख है।
  • स्वर्ग और नरक कोई स्थान नहीं, वरन्‌ दृष्टिकोण है।
  • स्वर्ग में जाकर ग़ुलामी बनने की अपेक्षा नर्क में जाकर राजा बनना बेहतर है।
  • सभ्यता एवं संस्कृति में जितना अंतर है, उतना ही अंतर उपासना और धर्म में है।
  • सदा, सहज व सरल रहने से आतंरिक खुशी मिलती है।
  • सब कर्मों में आत्मज्ञान श्रेष्ठ समझना चाहिए; क्योंकि यह सबसे उत्तम विद्या है। यह अविद्या का नाश करती है और इससे मुक्ति प्राप्त होती है।
  • सब ने सही जाग्रत्‌ आत्माओं में से जो जीवन्त हों, वे आपत्तिकालीन समय को समझें और व्यामोह के दायरे से निकलकर बाहर आएँ। उन्हीं के बिना प्रगति का रथ रुका पड़ा है।
  • सब जीवों के प्रति मंगल कामना धर्म का प्रमुख ध्येय है।
  • सब कुछ होने पर भी यदि मनुष्य के पास स्वास्थ्य नहीं, तो समझो उसके पास कुछ है ही नहीं।
  • सबसे बड़ा दीन दुर्बल वह है, जिसका अपने ऊपर नियंत्रण नहीं।
  • सबसे धनी वह नहीं है जिसके पास सब कुछ है, बल्कि वह है जिसकी आवश्यकताएं न्यूनतम हैं।
  • सारे काम अपने आप होते रहेंगे, फिर भी आप कार्य करते रहें। निरंतर कार्य करते रहें, पर उसमें ज़रा भी आसक्त न हों। आप बस कार्य करते रहें, यह सोचकर कि अब हम जा रहें हैं बस, अब जा रहे हैं।
  • समय मूल्यवान है, इसे व्यर्थ नष्ट न करो। आप समय देकर धन पैदा कर रखते हैं और संसार की सभी वस्तुएं प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन स्मरण रहे – सब कुछ देकर भी समय प्राप्त नहीं कर सकते अथवा गए समय को वापिस नहीं ला सकते।
  • समय को नियमितता के बंधनों में बाँधा जाना चाहिए।
  • समय उस मनुष्य का विनाश कर देता है, जो उसे नष्ट करता रहता है।
  • समय महान चिकित्सक है।
  • समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता।
  • समय की कद्र करो। प्रत्येक दिवस एक जीवन है। एक मिनट भी फिजूल मत गँवाओ। ज़िन्दगी की सच्ची कीमत हमारे वक़्त का एक-एक क्षण ठीक उपयोग करने में है।
  • समय का सुदपयोग ही उन्नति का मूलमंत्र है।
  • संघर्ष ही जीवन है। संघर्ष से बचे रह सकना किसी के लिए भी संभव नहीं।
  • सेवा का मार्ग ज्ञान, तप, योग आदि के मार्ग से भी ऊँचा है।
  • स्वार्थ, अहंकार और लापरवाही की मात्रा बढ़ जाना ही किसी व्यक्ति के पतन का कारण होता है।
  • स्वार्थ और अभिमान का त्याग करने से साधुता आती है।
  • सत्कर्म की प्रेरणा देने से बढ़कर और कोई पुण्य हो ही नहीं सकता।
  • सद्‌गुणों के विकास में किया हुआ कोई भी त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता।
  • सद्‌भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों से जिनका जीवन जितना ओतप्रोत है, वह ईश्वर के उतना ही निकट है।
  • सारी शक्तियाँ लोभ, मोह और अहंता के लिए वासना, तृष्णा और प्रदर्शन के लिए नहीं खपनी चाहिए।
  • समान भाव से आत्मीयता पूर्वक कर्तव्य -कर्मों का पालन किया जाना मनुष्य का धर्म है।
  • सत्कर्मों का आत्मसात होना ही उपासना, साधना और आराधना का सारभूत तत्व है।
  • सद्‌विचार तब तक मधुर कल्पना भर बने रहते हैं, जब तक उन्हें कार्य रूप में परिणत नहीं किया जाय।
  • सदविचार ही सद्व्यवहार का मूल है।
  • सफल नेतृत्व के लिए मिलनसारी, सहानुभूति और कृतज्ञता जैसे दिव्य गुणों की अतीव आवश्यकता है।
  • सफल नेता की शिवत्व भावना-सबका भला ‘बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय’ से प्रेरित होती है।
  • सफलता अत्यधिक परिश्रम चाहती है।
  • सफलता प्राप्त करने की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती और असफलता कभी अंतिम नहीं होती।
  • सफलता का एक दरवाजा बंद होता है तो दूसरा खुल जाता हैं लेकिन अक्सर हम बंद दरवाज़े की ओर देखते हैं और उस दरवाज़े को देखते ही नहीं जो हमारे लिए खुला रहता है।
  • सफलता-असफलता का विचार कभी मत सोचे, निष्काम भाव से अपने कर्मयुद्ध में डटे रहें अर्जुन की तरह आप सफल प्रतियोगी अवश्य बनेंगे।
  • स्वाधीन मन मनुष्य का सच्चा सहायक होता है।
  • संकल्प जीवन की उत्कृष्टता का मंत्र है, उसका प्रयोग मनुष्य जीवन के गुण विकास के लिए होना चाहिए।
  • संकल्प ही मनुष्य का बल है।
  • सदा चेहरे पर प्रसन्नता व मुस्कान रखो। दूसरों को प्रसन्नता दो, तुम्हें प्रसन्नता मिलेगी।
  • स्वधर्म में अवस्थित रहकर स्वकर्म से परमात्मा की पूजा करते हुए तुम्हें समाधि व सिद्धि मिलेगी।
  • सज्जन व कर्मशील व्यक्ति तो यह जानता है, कि शब्दों की अपेक्षा कर्म अधिक ज़ोर से बोलते हैं। अत: वह अपने शुभकर्म में ही निमग्न रहता है।
  • सज्जनों की कोई भी साधना कठिनाइयों में से होकर निकलने पर ही पूर्ण होती है।
  • सज्जनता ऐसी विधा है जो वचन से तो कम; किन्तु व्यवहार से अधिक परखी जाती है।
  • सज्जनता और मधुर व्यवहार मनुष्यता की पहली शर्ता है।
  • सत्संग और प्रवचनों का – स्वाध्याय और सुदपदेशों का तभी कुछ मूल्य है, जब उनके अनुसार कार्य करने की प्रेरणा मिले। अन्यथा यह सब भी कोरी बुद्धिमत्ता मात्र है।
  • साधना एक पराक्रम है, संघर्ष है, जो अपनी ही दुष्प्रवृत्तियों से करना होता है।
  • समर्पण का अर्थ है – पूर्णरूपेण प्रभु को हृदय में स्वीकार करना, उनकी इच्छा, प्रेरणाओं के प्रति सदैव जागरूक रहना और जीवन के प्रतयेक क्षण में उसे परिणत करते रहना।
  • समर्पण का अर्थ है – मन अपना विचार इष्ट के, हृदय अपना भावनाएँ इष्ट की और आपा अपना किन्तु कर्तव्य समग्र रूप से इष्ट का।
  • सम्भव की सीमा जानने का केवल एक ही तरीका है। असम्भव से भी आगे निकल जाना।
  • सत्कार्य करके मिलने वाली खुशी से बढ़कर और कोई खुशी नहीं होती।
  • सीखना दो प्रकार से होता है, पहला अध्ययन करके और दूसरा बुद्धिमानों से संगत करके।
  • सबसे महान धर्म है, अपनी आत्मा के प्रति सच्चा बनना।
  • सद्‌व्यवहार में शक्ति है। जो सोचता है कि मैं दूसरों के काम आ सकने के लिए कुछ करूँ, वही आत्मोन्नति का सच्चा पथिक है।
  • सलाह सबकी सुनो पर करो वह जिसके लिए तुम्हारा साहस और विवेक समर्थन करे।
  • सलाह सबकी सुनो, पर करो वह जिसके लिए तुम्हारा साहस और विवेक समर्थन करे।
  • सत्प्रयत्न कभी निरर्थक नहीं होते।
  • सादगी सबसे बड़ा फैशन है।
  • ‘स्वाध्यान्मा प्रमद:’ अर्थात्‌ स्वाध्याय में प्रमाद न करें।
  • सम्मान पद में नहीं, मनुष्यता में है।
  • सबकी मंगल कामना करो, इससे आपका भी मंगल होगा।
  • स्वाध्याय एक अनिवार्य दैनिक धर्म कत्र्तव्य है।
  • स्वाध्याय को साधना का एक अनिवार्य अंग मानकर अपने आवश्यक नित्य कर्मों में स्थान दें।
  • स्वाध्याय एक वैसी ही आत्मिक आवश्यकता है जैसे शरीर के लिए भोजन।
  • स्वार्थपरता की कलंक कालिमा से जिन्होंने अपना चेहरा पोत लिया है, वे असुर है।
  • सूर्य प्रतिदिन निकलता है और डूबते हुए आयु का एक दिन छीन ले जाता है, पर माया-मोह में डूबे मनुष्य समझते नहीं कि उन्हें यह बहुमूल्य जीवन क्यों मिला ?
  • सबके सुख में ही हमारा सुख सन्निहित है।
  • सेवा से बढ़कर पुण्य-परमार्थ इस संसार में और कुछ नहीं हो सकता।
  • सेवा में बड़ी शक्ति है। उससे भगवान भी वश में हो सकते हैं।
  • स्वयं उत्कृष्ट बनने और दूसरों को उत्कृष्ट बनाने का कार्य आत्म कल्याण का एकमात्र उपाय है।
  • स्वयं प्रकाशित दीप को भी प्रकाश के लिए तेल और बत्ती का जतन करना पड़ता है बुद्धिमान भी अपने विकास के लिए निरंतर यत्न करते हैं।
  • सतोगुणी भोजन से ही मन की सात्विकता स्थिर रहती है।
  • समस्त हिंसा, द्वेष, बैर और विरोध की भीषण लपटें दया का संस्पर्श पाकर शान्त हो जाती हैं।
  • साहस ही एकमात्र ऐसा साथी है, जिसको साथ लेकर मनुष्य एकाकी भी दुर्गम दीखने वाले पथ पर चल पड़ते एवं लक्ष्य तक जा पहुँचने में समर्थ हो सकता है।
  • साहस और हिम्मत से खतरों में भी आगे बढ़िये। जोखित उठाये बिना जीवन में कोई महत्त्वपूर्ण सफलता नहीं पाई जा सकती।
  • सुख बाँटने की वस्तु है और दु:खे बँटा लेने की। इसी आधार पर आंतरिक उल्लास और अन्यान्यों का सद्‌भाव प्राप्त होता है। महानता इसी आधार पर उपलब्ध होती है।
  • सहानुभूति मनुष्य के हृदय में निवास करने वाली वह कोमलता है, जिसका निर्माण संवेदना, दया, प्रेम तथा करुणा के सम्मिश्रण से होता है।
  • सन्मार्ग का राजपथ कभी भी न छोड़े।
  • स्वच्छता सभ्यता का प्रथम सोपान है।
  • स्वाधीन मन मनुष्य का सच्चा सहायक होता है।
  • साधना का अर्थ है – कठिनाइयों से संघर्ष करते हुए भी सत्प्रयास जारी रखना।
  • सर्दी-गर्मी, भय-अनुराग, सम्पती अथवा दरिद्रता ये जिसके कार्यो मे बाधा नहीं डालते वही ज्ञानवान (विवेकशील) कहलाता है।
  • सभी मन्त्रों से महामंत्र है – कर्म मंत्र, कर्म करते हुए भजन करते रहना ही प्रभु की सच्ची भक्ति है।
  • संयम की शक्ति जीवं में सुरभि व सुगंध भर देती है।

  • मनुष्य को उत्तम शिक्षा अच्चा स्वभाव, धर्म, योगाभ्यास और विज्ञान का सार्थक ग्रहण करके जीवन में सफलता प्राप्त करनी चाहिए।
  • मनुष्य का मन कछुए की भाँति होना चाहिए, जो बाहर की चोटें सहते हुए भी अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ता और धीरे-धीरे मंज़िल पर पहुँच जाता है।
  • मनुष्य की सफलता के पीछे मुख्यता उसकी सोच, शैली एवं जीने का नज़रिया होता है।
  • मनुष्य अपने अंदर की बुराई पर ध्यान नहीं देता और दूसरों की उतनी ही बुराई की आलोचना करता है, अपने पाप का तो बड़ा नगर बसाता है और दूसरे का छोटा गाँव भी ज़रा-सा सहन नहीं कर सकता है।
  • मनुष्य का जीवन तीन मुख्य तत्वों का समागम है – शरीर, विचार एवं मन।
  • मनुष्य जीवन का पूरा विकास ग़लत स्थानों, ग़लत विचारों और ग़लत दृष्टिकोणों से मन और शरीर को बचाकर उचित मार्ग पर आरूढ़ कराने से होता है।
  • मनुष्य के भावों में प्रबल रचना शक्ति है, वे अपनी दुनिया आप बसा लेते हैं।
  • मनुष्य बुद्धिमानी का गर्व करता है, पर किस काम की वह बुद्धिमानी-जिससे जीवन की साधारण कला हँस-खेल कर जीने की प्रक्रिया भी हाथ न आए।
  • मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं, वह उनका निर्माता, नियंत्रणकर्ता और स्वामी है।
  • मनुष्य को आध्यात्मिक ज्ञान और आत्म-विज्ञान की जानकारी हुए बिना यह संभव नहीं है कि मनुष्य दुष्कर्मों का परित्याग करे।
  • मनुष्य की संकल्प शक्ति संसार का सबसे बड़ा चमत्कार है।
  • मनुष्य जन्म सरल है, पर मनुष्यता कठिन प्रयत्न करके कमानी पड़ती है।
  • मनुष्य एक भटका हुआ देवता है। सही दिशा पर चल सके, तो उससे बढ़कर श्रेष्ठ और कोई नहीं।
  • मनुष्य दु:खी, निराशा, चिंतित, उदिग्न बैठा रहता हो तो समझना चाहिए सही सोचने की विधि से अपरिचित होने का ही यह परिणाम है। – वाङ्गमय
  • मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है; परन्तु इनके परिणामों में चुनाव की कोई सुविधा नहीं।
  • मनुष्य परिस्थितियों का ग़ुलाम नहीं, अपने भाग्य का निर्माता और विधाता है।
  • मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है।
  • मनुष्य उपाधियों से नहीं, श्रेष्ठ कार्यों से सज्जन बनता है।
  • मनुष्य का अपने आपसे बढ़कर न कोई शत्रु है, न मित्र।
  • मनुष्य को एक ही प्रकार की उन्नति से संतुष्ट न होकर जीवन की सभी दिशाओं में उन्नति करनी चाहिए। केवल एक ही दिशा में उन्नति के लिए अत्यधिक प्रयत्न करना और अन्य दिशाओं की उपेक्षा करना और उनकी ओर से उदासीन रहना उचित नहीं है।
  • मनुष्यता सबसे अधिक मूल्यवान है। उसकी रक्षा करना प्रत्येक जागरूक व्यक्ति का परम कर्तव्य है।
  • मां है मोहब्बत का नाम, मां से बिछुड़कर चैन कहाँ।
  • माँ का जीवन बलिदान का, त्याग का जीवन है। उसका बदला कोई भी पुत्र नहीं चुका सकता चाहे वह भूमंडल का स्वामी ही क्यों न हो।
  • माँ-बेटी का रिश्ता इतना अनूठा, इतना अलग होता है कि उसकी व्याख्या करना मुश्किल है, इस रिश्ते से सदैव पहली बारिश की फुहारों-सी ताजगी रहती है, तभी तो माँ के साथ बिताया हर क्षण होता है अमिट, अलग उनके साथ गुज़ारा हर पल शानदार होता है।
  • माता-पिता के चरणों में चारों धाम हैं। माता-पिता इस धरती के भगवान हैं।
  • माता-पिता का बच्चों के प्रति, आचार्य का शिष्यों के प्रति, राष्ट्रभक्त का मातृभूमि के प्रति ही सच्चा प्रेम है।
  • ‘मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्यदेवो भव, अतिथिदेवो भव’ की संस्कृति अपनाओ!
  • मृत्यु दो बार नहीं आती और जब आने को होती है, उससे पहले भी नहीं आती है।
  • महान प्यार और महान उपलब्धियों के खतरे भी महान होते हैं।
  • महान उद्देश्य की प्राप्ति के लिये बहुत कष्ट सहना पड़ता है, जो तप के समान होता है; क्योंकि ऊंचाई पर स्थिर रह पाना आसान काम नहीं है।
  • मानसिक शांति के लिये मन-शुद्धी, श्वास-शुद्धी एवं इन्द्रिय-शुद्धी का होना अति आवश्यक है।
  • मन की शांति के लिये अंदरूनी संघर्ष को बंद करना ज़रूरी है, जब तक अंदरूनी युद्ध चलता रहेगा, शांति नहीं मिल सकती।
  • मन का नियन्त्रण मनुष्य का एक आवश्यक कत्र्तव्य है।
  • मन-बुद्धि की भाषा है – मैं, मेरी, इसके बिना बाहर के जगत का कोई व्यवहार नहीं चलेगा, अगर अंदर स्वयं को जगा लिया तो भीतर तेरा-तेरा शुरू होने से व्यक्ति परम शांति प्राप्त कर लेता है।
  • मरते वे हैं, जो शरीर के सुख और इन्द्रीय वासनाओं की तृप्ति के लिए रात-दिन खपते रहते हैं।
  • मस्तिष्क में जिस प्रकार के विचार भरे रहते हैं वस्तुत: उसका संग्रह ही सच्ची परिस्थिति है। उसी के प्रभाव से जीवन की दिशाएँ बनती और मुड़ती रहती हैं।
  • महात्मा वह है, जिसके सामान्य शरीर में असामान्य आत्मा निवास करती है।
  • मानव जीवन की सफलता का श्रेय जिस महानता पर निर्भर है, उसे एक शब्द में धार्मिकता कह सकते हैं।
  • मानवता की सेवा से बढ़कर और कोई बड़ा काम नहीं हो सकता।
  • मांसाहार मानवता को त्यागकर ही किया जा सकता है।
  • मेहनत, हिम्मत और लगन से कल्पना साकार होती है।
  • मुस्कान प्रेम की भाषा है।
  • मैं परमात्मा का प्रतिनिधि हूँ।
  • मैं माँ भारती का अमृतपुत्र हूँ, ‘माता भूमि: पुत्रोहं प्रथिव्या:’।
  • मैं पहले माँ भारती का पुत्र हूँ, बाद में सन्यासी, ग्रहस्थ, नेता, अभिनेता, कर्मचारी, अधिकारी या व्यापारी हूँ।
  • मैं सदा प्रभु में हूँ, मेरा प्रभु सदा मुझमें है।
  • मैं सौभाग्यशाली हूँ कि मैंने इस पवित्र भूमि व देश में जन्म लिया है।
  • मैं अपने जीवन पुष्प से माँ भारती की आराधना करुँगा।
  • मैं पुरुषार्थवादी, राष्ट्रवादी, मानवतावादी व अध्यात्मवादी हूँ।
  • मैं मात्र एक व्यक्ति नहीं, अपितु सम्पूर्ण राष्ट्र व देश की सभ्यता व संस्कृति की अभिव्यक्ति हूँ।
  • मेरे भीतर संकल्प की अग्नि निरंतर प्रज्ज्वलित है। मेरे जीवन का पथ सदा प्रकाशमान है।
  • मेरे पूर्वज, मेरे स्वाभिमान हैं।
  • मेरे मस्तिष्क में ब्रह्माण्ड सा तेज़, मेधा, प्रज्ञा व विवेक है।
  • मनोविकार भले ही छोटे हों या बड़े, यह शत्रु के समान हैं और प्रताड़ना के ही योग्य हैं।
  • मनोविकारों से परेशान, दु:खी, चिंतित मनुष्य के लिए उनके दु:ख-दर्द के समय श्रेष्ठ पुस्तकें ही सहारा है।
  • महानता के विकास में अहंकार सबसे घातक शत्रु है।
  • महानता का गुण न तो किसी के लिए सुरक्षित है और न प्रतिबंधित। जो चाहे अपनी शुभेच्छाओं से उसे प्राप्त कर सकता है।
  • महापुरुषों का ग्रंथ सबसे बड़ा सत्संग है।
  • मात्र हवन, धूपबत्ती और जप की संख्या के नाम पर प्रसन्न होकर आदमी की मनोकामना पूरी कर दिया करे, ऐसी देवी दुनिया मेंं कहीं नहीं है।
  • मजदूर के दो हाथ जो अर्जित कर सकते हैं वह मालिक अपनी पूरी संपत्ति द्वारा भी प्राप्त नहीं कर सकता।
  • मेरा निराशावाद इतना सघन है कि मुझे निराशावादियों की मंशा पर भी संदेह होता है।
  • मूर्ख व्‍यक्ति दूसरे को मूर्ख बनाने की चेष्‍टा करके आसानी से अपनी मूर्खता सिद्ध कर देते हैं।

  • दुनिया में आलस्य को पोषण देने जैसा दूसरा भयंकर पाप नहीं है।
  • दुनिया में भलमनसाहत का व्यवहार करने वाला एक चमकता हुआ हीरा है।
  • दुनिया में सफलता एक चीज़ के बदले में मिलती है और वह है आदमी की उत्कृष्ट व्यक्तित्व।
  • दूसरों की निन्दा और त्रूटियाँ सुनने में अपना समय नष्ट मत करो।
  • दूसरों की निन्दा करके किसी को कुछ नहीं मिला, जिसने अपने को सुधारा उसने बहुत कुछ पाया।
  • दूसरों के साथ वह व्यवहार न करो, जो तुम्हें अपने लिए पसन्द नहीं।
  • दूसरों के साथ सदैव नम्रता, मधुरता, सज्जनता, उदारता एवं सहृदयता का व्यवहार करें।
  • दूसरों के जैसे बनने के प्रयास में अपना निजीपन नष्ट मत करो।
  • दूसरों की सबसे बड़ी सहायता यही की जा सकती है कि उनके सोचने में जो त्रुटि है, उसे सुधार दिया जाए।
  • दूसरों से प्रेम करना अपने आप से प्रेम करना है।
  • दूसरों को पीड़ा न देना ही मानव धर्म है।
  • दूसरों पर भरोसा लादे मत बैठे रहो। अपनी ही हिम्मत पर खड़ा रह सकना और आगे बढ़् सकना संभव हो सकता है। सलाह सबकी सुनो, पर करो वह जिसके लिए तुम्हारा साहस और विवेक समर्थन करे।
  • दूसरे के लिए पाप की बात सोचने में पहले स्वयं को ही पाप का भागी बनना पड़ता है।
  • दुष्कर्मों के बढ़ जाने पर सच्चाई निष्क्रिय हो जाती है, जिसके परिणाम स्वरुप वह राहत के बदले प्रतिक्रया करना शुरू कर देती है।
  • दुष्कर्म स्वत: ही एक अभिशाप है, जो कर्ता को भस्म किये बिना नहीं रहता।
  • दण्ड देने की शक्ति होने पर भी दण्ड न देना सच्चे क्षमा है।
  • दुःख देने वाले और हृदय को जलाने वाले बहुत से पुत्रों से क्या लाभ? कुल को सहारा देने वाला एक पुत्र ही श्रेष्ठ होता है।
  • दु:ख का मूल है पाप। पाप का परिणाम है-पतन, दु:ख, कष्ट, कलह और विषाद। यह सब अनीति के अवश्यंभावी परिणाम हैं।
  • दिन में अधूरी इच्छा को व्यक्ति रात को स्वप्न के रूप में देखता है, इसलिए जितना मन अशांत होगा, उतने ही अधिक स्वप्न आते हैं।
  • दो प्रकार की प्रेरणा होती है- एक बाहरी व दूसरी अंतर प्रेरणा, आतंरिक प्रेरणा बहुत महत्त्वपूर्ण होती है; क्योंकि वह स्वयं की निर्मात्री होती है।
  • दो याद रखने योग्य हैं-एक कर्त्तव्य और दूसरा मरण।
  • दान की वृत्ति दीपक की ज्योति के समान होनी चाहिए, जो समीप से अधिक प्रकाश देती है और ऐसे दानी अमरपद को प्राप्त करते हैं।
  • दरिद्रता कोई दैवी प्रकोप नहीं, उसे आलस्य, प्रमाद, अपव्यय एवं दुर्गुणों के एकत्रीकरण का प्रतिफल ही करना चाहिए।
  • दिल खोलकर हँसना और मुस्कराते रहना चित्त को प्रफुल्लित रखने की एक अचूक औषधि है।
  • दीनता वस्तुत: मानसिक हीनता का ही प्रतिफल है।
  • दुष्ट चिंतन आग में खेलने की तरह है।
  • दैवी शक्तियों के अवतरण के लिए पहली शर्त है – साधक की पात्रता, पवित्रता और प्रामाणिकता।
  • देवमानव वे हैं, जो आदर्शों के क्रियान्वयन की योजना बनाते और सुविधा की ललक-लिप्सा को अस्वीकार करके युगधर्म के निर्वाह की काँटों भरी राह पर एकाकी चल पड़ते हैं।
  • दरिद्रता पैसे की कमी का नाम नहीं है, वरन्‌ मनुष्य की कृपणता का नाम दरिद्रता है।
  • दुष्टता वस्तुत: पह्ले दर्जे की कायरता का ही नाम है। उसमें जो आतंक दिखता है वह प्रतिरोध के अभाव से ही पनपता है। घर के बच्चें भी जाग पड़े तो बलवान चोर के पैर उखड़ते देर नहीं लगती। स्वाध्याय से योग की उपासना करे और योग से स्वाध्याय का अभ्यास करें। स्वाध्याय की सम्पत्ति से परमात्मा का साक्षात्कार होता है।
  • दया का दान लड़खड़ाते पैरा में नई शक्ति देना, निराश हृदय में जागृति की नई प्रेरणा फूँकना, गिरे हुए को उठाने की सामथ्र्य प्रदान करना एवं अंधकार में भटके हुए को प्रकाश देना।
  • दृढ़ता हो, ज़िद्द नहीं। बहादुरी हो, जल्दबाज़ी नहीं। दया हो, कमज़ोरी नहीं।
  • दृष्टिकोण की श्रेष्ठता ही वस्तुत: मानव जीवन की श्रेष्ठता है।
  • दृढ़ आत्मविश्वास ही सफलता की एकमात्र कुंजी है।

  • परमात्मा वास्तविक स्वरुप को न मानकर उसकी कथित पूजा करना अथवा अपात्र को दान देना, ऐसे कर्म क्रमश: कोई कर्म-फल प्राप्त नहीं कराते, बल्कि पाप का भागी बनाते हैं।
  • परमात्मा के गुण, कर्म और स्वभाव के समान अपने स्वयं के गुण, कर्म व स्वभावों को समयानुसार धारण करना ही परमात्मा की सच्ची पूजा है।
  • परमात्मा की सृष्टि का हर व्यक्ति समान है। चाहे उसका रंग वर्ण, कुल और गोत्र कुछ भी क्यों न हो।
  • परमात्मा जिसे जीवन में कोई विशेष अभ्युदय-अनुग्रह करना चाहता है, उसकी बहुत-सी सुविधाओं को समाप्त कर दिया करता है।
  • परमात्मा की सच्ची पूजा सद्‌व्यवहार है।
  • पिता सिखाते हैं पैरों पर संतुलन बनाकर व ऊंगली थाम कर चलना, पर माँ सिखाती है सभी के साथ संतुलन बनाकर दुनिया के साथ चलना, तभी वह अलग है, महान है।
  • पाप आत्मा का शत्रु है और सद्गुण आत्मा का मित्र।
  • पाप अपने साथ रोग, शोक, पतन और संकट भी लेकर आता है।
  • पाप की एक शाखा है – असावधानी।
  • पापों का नाश प्रायश्चित करने और इससे सदा बचने के संकल्प से होता है।
  • पढ़ना एक गुण, चिंतन दो गुना, आचरण चौगुना करना चाहिए।
  • परोपकारी, निष्कामी और सत्यवादी यानी निर्भय होकर मन, वचन व कर्म से सत्य का आचरण करने वाला देव है।
  • प्रेम करने का मतलब सम-व्यवहार ज़रूरी नहीं, बल्कि समभाव होना चाहिए, जिसके लिये घोड़े की लगाम की भाँति व्यवहार में ढील देना पड़ती है और कभी खींचना भी ज़रूरी हो जाता है।
  • पूर्वजों के गुणों का अनुसरण करना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि देना है।
  • पांच वर्ष की आयु तक पुत्र को प्यार करना चाहिए। इसके बाद दस वर्ष तक इस पर निगरानी राखी जानी चाहिए और ग़लती करने पर उसे दण्ड भी दिया जा सकता है, परन्तु सोलह वर्ष की आयु के बाद उससे मित्रता कर एक मित्र के समान व्यवहार करना चाहिए।
  • पूरी दुनिया में 350 धर्म हैं, हर धर्म का मूल तत्व एक ही है, परन्तु आज लोगों का धर्म की उपेक्षा अपने-अपने भजन व पंथ से अधिक लगाव है।
  • परमार्थ मानव जीवन का सच्चा स्वार्थ है।
  • परोपकार से बढ़कर और निरापत दूसरा कोई धर्म नहीं।
  • परावलम्बी जीवित तो रहते हैं, पर मृत तुल्य ही।
  • प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह अंदर से जागती है और उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है।
  • पुण्य की जय-पाप की भी जय ऐसा समदर्शन तो व्यक्ति को दार्शनिक भूल-भुलैयों में उलझा कर संसार का सर्वनाश ही कर देगा।
  • प्रतिभावान्‌ व्यक्तित्व अर्जित कर लेना, धनाध्यक्ष बनने की तुलना में कहीं अधिक श्रेष्ठ और श्रेयस्कर है।
  • पादरी, मौलवी और महंत भी जब तक एक तरह की बात नहीं कहते, तो दो व्यक्तियों में एकमत की आशा की ही कैसे जाए?
  • पग-पग पर शिक्षक मौजूद हैं, पर आज सीखना कौन चाहता है?
  • प्रकृतित: हर मनुष्य अपने आप में सुयोग्य एवं समर्थ है।
  • प्रस्तुत उलझनें और दुष्प्रवृत्तियाँ कहीं आसमान से नहीं टपकीं। वे मनुष्य की अपनी बोयी, उगाई और बढ़ाई हुई हैं।
  • पूरी तरह तैरने का नाम तीर्थ है। एक मात्र पानी में डुबकी लगाना ही तीर्थस्नान नहीं।
  • प्रचंड वायु में भी पहाड़ विचलित नहीं होते।
  • प्रसन्नता स्वास्थ्य देती है, विषाद रोग देते हैं।
  • प्रसन्न करने का उपाय है, स्वयं प्रसन्न रहना।
  • प्रत्येक अच्छा कार्य पहले असम्भव नज़र आता है।
  • प्रकृति के सब काम धीरे-धीरे होते हैं।
  • प्रकृति के अनुकूल चलें, स्वस्थ रहें।
  • प्रकृति जानवरों तक को अपने मित्र पहचानने की सूझ-बूझ दे देती है।
  • प्रत्येक जीव की आत्मा में मेरा परमात्मा विराजमान है।
  • पराक्रमशीलता, राष्ट्रवादिता, पारदर्शिता, दूरदर्शिता, आध्यात्मिक, मानवता एवं विनयशीलता मेरी कार्यशैली के आदर्श हैं।
  • पवित्र विचार-प्रवाह ही जीवन है तथा विचार-प्रवाह का विघटन ही मृत्यु है।
  • पवित्र विचार प्रवाह ही मधुर व प्रभावशाली वाणी का मूल स्रोत है।
  • प्रेम, वासना नहीं उपासना है। वासना का उत्कर्ष प्रेम की हत्या है, प्रेम समर्पण एवं विश्वास की परकाष्ठा है।
  • प्रखर और सजीव आध्यात्मिकता वह है, जिसमें अपने आपका निर्माण दुनिया वालों की अँधी भेड़चाल के अनुकरण से नहीं, वरन्‌ स्वतंत्र विवेक के आधार पर कर सकना संभव हो सके।
  • प्रगति के लिए संघर्ष करो। अनीति को रोकने के लिए संघर्ष करो और इसलिए भी संघर्ष करो कि संघर्ष के कारणों का अन्त हो सके।
  • पढ़ने का लाभ तभी है जब उसे व्यवहार में लाया जाए।
  • परोपकार से बढ़कर और निरापद दूसरा कोई धर्म नहीं।
  • प्रशंसा और प्रतिष्ठा वही सच्ची है, जो उत्कृष्ट कार्य करने के लिए प्राप्त हो।
  • प्रसुप्त देवत्व का जागरण ही सबसे बड़ी ईश्वर पूजा है।
  • प्रतिकूल परिस्थितियों करके ही दूसरों को सच्ची शिक्षा दी जा सकती है।
  • प्रतिकूल परिस्थिति में भी हम अधीर न हों।
  • परिश्रम ही स्वस्थ जीवन का मूलमंत्र है।
  • परिवार एक छोटा समाज एवं छोटा राष्ट्र है। उसकी सुव्यवस्था एवं शालीनता उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितनी बड़े रूप में समूचे राष्ट्र की।
  • परिजन हमारे लिए भगवान की प्रतिकृति हैं और उनसे अधिकाधिक गहरा प्रेम प्रसंग बनाए रखने की उत्कंठा उमड़ती रहती है। इस वेदना के पीछे भी एक ऐसा दिव्य आनंद झाँकता है इसे भक्तियोग के मर्मज्ञ ही जान सकते हैं।
  • प्रगतिशील जीवन केवल वे ही जी सकते हैं, जिनने हृदय में कोमलता, मस्तिष्क में तीष्णता, रक्त में उष्णता और स्वभाव में दृढ़ता का समुतिच समावेश कर लिया है।
  • परमार्थ के बदले यदि हमको कुछ मूल्य मिले, चाहे वह पैसे के रूप में प्रभाव, प्रभुत्व व पद-प्रतिष्ठा के रूप में तो वह सच्चा परमार्थ नहीं है। इसे कत्र्तव्य पालन कह सकते हैं।
  • पराये धन के प्रति लोभ पैदा करना अपनी हानि करना है।
  • पेट और मस्तिष्क स्वास्थ्य की गाड़ी को ठीक प्रकार चलाने वाले दो पहिए हैं। इनमें से एक बिगड़ गया तो दूसरा भी बेकार ही बना रहेगा।
  • पुण्य-परमार्थ का कोई अवसर टालना नहीं चाहिए; क्योंकि अगले क्षण यह देह रहे या न रहे क्या ठिकाना।
  • पराधीनता समाज के समस्त मौलिक निमयों के विरुद्ध है।
  • पति को कभी कभी अँधा और कभी कभी बहरा होना चाहिए।
  • प्रत्येक मनुष्य को जीवन में केवल अपने भाग्य की परिक्षा का अवसर मिलता हे। वही भविष्य का निर्णय कर देता है।
  • प्रत्येक अच्छा कार्य पहले असंभव नजर आता है।
  • पड़े पड़े तो अच्‍छे से अच्‍छे फ़ौलाद में भी जंग लग जाता है, निष्क्रिय हो जाने से, सारी दैवीय शक्तियां स्‍वत: मनुष्‍य का साथ छोड़ देतीं हैं।
  • प्रति पल का उपयोग करने वाले कभी भी पराजित नहीं हो सकते, समय का हर क्षण का उपयोग मनुष्‍य को विलक्षण और अदभुत बना देता है।
  • प्रवीण व्यक्ति वही होता हें जो हर प्रकार की परिस्थितियों में दक्षता से काम कर सके।

  • व्रतों से सत्य सर्वोपरि है।
  • विधा, बुद्धि और ज्ञान को जितना खर्च करो, उतना ही बढ़ते हैं।
  • वह सत्य नहीं जिसमें हिंसा भरी हो। यदि दया युक्त हो तो असत्य भी सत्य ही कहा जाता है। जिसमें मनुष्य का हित होता हो, वही सत्य है।
  • वह स्थान मंदिर है, जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक; किन्तु ज्ञान की चेतनायुक्त देवता निवास करते हैं।
  • वही उन्नति कर सकता है, जो स्वयं को उपदेश देता है।
  • वही सबसे तेज़ चलता है, जो अकेला चलता है।
  • वही जीवति है, जिसका मस्तिष्क ठण्डा, रक्त गरम, हृदय कोमल और पुरुषार्थ प्रखर है।
  • वे माता-पिता धन्य हैं, जो अपनी संतान के लिए उत्तम पुस्तकों का एक संग्रह छोड़ जाते हैं।
  • व्यक्ति का चिंतन और चरित्र इतना ढीला हो गया है कि स्वार्थ के लिए अनर्थ करने में व्यक्ति चूकता नहीं।
  • व्यक्ति दौलत से नहीं, ज्ञान से अमीर होता है।
  • वर्ण, आश्रम आदि की जो विशेषता है, वह दूसरों की सेवा करने के लिए है, अभिमान करने के लिए नहीं।
  • विवेकशील व्यक्ति उचित अनुचित पर विचार करता है और अनुचित को किसी भी मूल्य पर स्वीकार नहीं करता।
  • व्यक्तित्व की अपनी वाणी है, जो जीभ या कलम का इस्तेमाल किये बिना भी लोगों के अंतराल को छूती है।
  • वह मनुष्य विवेकवान्‌ है, जो भविष्य से न तो आशा रखता है और न भयभीत ही होता है।
  • विपरीत प्रतिकूलताएँ नेता के आत्म विश्वास को चमका देती हैं।
  • विपरीत दिशा में कभी न घबराएं, बल्कि पक्की ईंट की तरह मज़बूत बनना चाहिय और जीवन की हर चुनौती को परीक्षा एवं तपस्या समझकर निरंतर आगे बढना चाहिए।
  • विवेक बहादुरी का उत्तम अंश है।
  • विवेक और पुरुषार्थ जिसके साथी हैं, वही प्रकाश प्राप्त करेंगे।
  • विश्वास से आश्चर्य-जनक प्रोत्साहन मिलता है।
  • विचार शहादत, कुर्बानी, शक्ति, शौर्य, साहस व स्वाभिमान है। विचार आग व तूफ़ान है, साथ ही शान्ति व सन्तुष्टी का पैग़ाम है।
  • विचार ही सम्पूर्ण खुशियों का आधार हैं।
  • विचारों की अपवित्रता ही हिंसा, अपराध, क्रूरता, शोषण, अन्याय, अधर्म और भ्रष्टाचार का कारण है।
  • विचारों की पवित्रता ही नैतिकता है।
  • विचारों की पवित्रता स्वयं एक स्वास्थ्यवर्धक रसायन है।
  • विचारों का ही परिणाम है – हमारा सम्पूर्ण जीवन। विचार ही बीज है, जीवनरुपी इस व्रक्ष का।
  • विचारों को कार्यरूप देना ही सफलता का रहस्य है।
  • विचारवान व संस्कारवान ही अमीर व महान है तथा विचारहीन ही कंगाल व दरिद्र है।
  • विचारशीलता ही मनुष्यता और विचारहीनता ही पशुता है।
  • वैचारिक दरिद्रता ही देश के दुःख, अभाव पीड़ा व अवनति का कारण है। वैचारिक दृढ़ता ही देश की सुख-समृद्धि व विकास का मूल मंत्र है।
  • विद्या की आकांक्षा यदि सच्ची हो, गहरी हो तो उसके रह्ते कोई व्यक्ति कदापि मूर्ख, अशिक्षित नहीं रह सकता। – वाङ्गमय
  • विद्या वह अच्छी, जिसके पढ़ने से बैर द्वेष भूल जाएँ। जो विद्वान बैर द्वेष रखता है, यह जैसा पढ़ा, वैसा न पढ़ा।
  • वास्तविक सौन्दर्य के आधर हैं – स्वस्थ शरीर, निर्विकार मन और पवित्र आचरण।
  • विषयों, व्यसनों और विलासों में सुख खोजना और पाने की आशा करना एक भयानक दुराशा है।
  • वत मत करो, जिसके लिए पीछे पछताना पड़े।
  • व्यसनों के वश में होकर अपनी महत्ता को खो बैठे वह मूर्ख है।
  • वृद्धावस्था बीमारी नहीं, विधि का विधान है, इस दौरान सक्रिय रहें।
  • वाणी नहीं, आचरण एवं व्यक्तित्व ही प्रभावशाली उपदेश है
  • व्यक्तिगत स्वार्थों का उत्सर्ग सामाजिक प्रगति के लिए करने की परम्परा जब तक प्रचलित न होगी, तब तक कोई राष्ट्र सच्चे अर्थों में सामथ्र्यवान्‌ नहीं बन सकता है। -वाङ्गमय
  • वासना और तृष्णा की कीचड़ से जिन्होंने अपना उद्धार कर लिया और आदर्शों के लिए जीवित रहने का जिन्होंने व्रत धारण कर लिया वही जीवन मुक्त है।
  • व्यक्तिवाद के प्रति उपेक्षा और समूहवाद के प्रति निष्ठा रखने वाले व्यक्तियों का समाज ही समुन्नत होता है।
  • विपत्ति से असली हानि उसकी उपस्थिति से नहीं होती, जब मन:स्थिति उससे लोहा लेने में असमर्थता प्रकट करती है तभी व्यक्ति टूटता है और हानि सहता है।
  • विपन्नता की स्थिति में धैर्य न छोड़ना मानसिक संतुलन नष्ट न होने देना, आशा पुरुषार्थ को न छोड़ना, आस्तिकता अर्थात्‌ ईश्वर विश्वास का प्रथम चिह्न है।
  • वहाँ मत देखो जहाँ आप गिरे। वहाँ देखो जहाँ से आप फिसले।
  • विद्वत्ता युवकों को संयमी बनाती है। यह बुढ़ापे का सहारा है, निर्धनता में धन है, और धनवानों के लिए आभूषण है।

  • यदि तुम फूल चाहते हो तो जल से पौधों को सींचना भी सीखो।
  • यदि कोई दूसरों की ज़िन्दगी को खुशहाल बनाता है तो उसकी ज़िन्दगी अपने आप खुशहाल बन जाती है।
  • यदि कोई तुम्हारे समीप अन्य किसी साथी की निन्दा करना चाहे, तो तुम उस ओर बिल्कुल ध्यान न दो। इन बातों को सुनना भी महान पाप है, उससे भविष्य में विवाद का सूत्रपात होगा।
  • यदि व्यक्ति के संस्कार प्रबल होते हैं तो वह नैतिकता से भटकता नहीं है।
  • यदि पुत्र विद्वान और माता-पिता की सेवा करने वाला न हो तो उसका धरती पर जन्म लेना व्यर्थ है।
  • यदि ज़्यादा पैसा कमाना हाथ की बात नहीं तो कम खर्च करना तो हाथ की बात है; क्योंकि खर्चीला जीवन बनाना अपनी स्वतन्त्रता को खोना है।
  • यदि सज्जनो के मार्ग पर पुरा नहीं चला जा सकता तो थोडा ही चले। सन्मार्ग पर चलने वाला पुरूष नष्ट नहीं होता।
  • यदि आपको मरने का डर है, तो इसका यही अर्थ है, की आप जीवन के महत्त्व को ही नहीं समझते।
  • यदि आपको कोई कार्य कठिन लगता है तो इसका अर्थ है कि आप उस कार्य को ग़लत तरीके से कर रहे हैं।
  • यदि बचपन व माँ की कोख की याद रहे, तो हम कभी भी माँ-बाप के कृतघ्न नहीं हो सकते। अपमान की ऊचाईयाँ छूने के बाद भी अतीत की याद व्यक्ति के ज़मीन से पैर नहीं उखड़ने देती।
  • यदि मनुष्य कुछ सीखना चाहे, तो उसकी प्रत्येक भूल कुछ न कुछ सिखा देती है।
  • यदि उपयोगी और महत्‍वपूर्ण बन कर विश्‍व में सम्‍मानित रहना है तो सबके काम के बनो और सदा सक्रिय रहो।
  • यह सच है कि सच्चाई को अपनाना बहुत अच्छी बात है, लेकिन किसी सच से दूसरे का नुकसान होता हो तो, ऐसा सच बोलते समय सौ बार सोच लेना चाहिए।
  • यह संसार कर्म की कसौटी है। यहाँ मनुष्य की पहचान उसके कर्मों से होती है।
  • यह आपत्तिकालीन समय है। आपत्ति धर्म का अर्थ है-सामान्य सुख-सुविधाओं की बात ताक पर रख देना और वह करने में जुट जाना जिसके लिए मनुष्य की गरिमा भरी अंतरात्मा पुकारती है।
  • युग निर्माण योजना का लक्ष्य है – शुचिता, पवित्रता, सच्चरित्रता, समता, उदारता, सहकारिता उत्पन्न करना। – वाङ्गमय
  • युग निर्माण योजना का आरम्भ दूसरों को उपदेश देने से नहीं, वरन्‌ अपने मन को समझाने से शुरू होगा।
  • यज्ञ, दान और तप से त्याग करने योग्य कर्म ही नहीं, अपितु अनिवार्य कर्त्तव्य कर्म भी हैं; क्योंकि यज्ञ, दान व तप बुद्धिमान लोगों को पवित्र करने वाले हैं।
  • यथार्थ को समझना ही सत्य है। इसी को विवेक कहते हैं।
  • योग के दृष्टिकोण से तुम जो करते हो वह नहीं, बल्कि तुम कैसे करते हो, वह बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण है।
  • योग्यता आपको सफलता की ऊँचाई तक पहुँचा सकती है किन्तु चरित्र आपको उस ऊँचाई पर बनाये रखती है।
  • या तो हाथीवाले से मित्रता न करो, या फिर ऐसा मकान बनवाओ जहां उसका हाथी आकर खड़ा हो सके।

  • बुद्धिमान बनने का तरीका यह है कि आज हम जितना जानते हैं, भविष्य में उससे अधिक जानने के लिए प्रयत्नशील रहें।
  • बुद्धिमान वह है, जो किसी को ग़लतियों से हानि होते देखकर अपनी ग़लतियाँ सुधार लेता है।
  • बड़प्पन बड़े आदमियों के संपर्क से नहीं, अपने गुण, कर्म और स्वभाव की निर्मलता से मिला करता है।
  • बड़प्पन सुविधा संवर्धन में नहीं, सद्‌गुण संवर्धन का नाम है।
  • बड़प्पन सादगी और शालीनता में है।
  • बाहर मैं, मेरा और अंदर तू, तेरा, तेरी के भाव के साथ जीने का आभास जिसे हो गया, वह उसके जीवन की एक महान व उत्तम प्राप्ति है।
  • बिना गुरु के ज्ञान नहीं होता।
  • बिना सेवा के चित्त शुद्धि नहीं होती और चित्तशुद्धि के बिना परमात्मतत्व की अनुभूति नहीं होती।
  • बिना अनुभव के कोरा शाब्दिक ज्ञान अंधा है।
  • बहुमूल्य समय का सदुपयोग करने की कला जिसे आ गई उसने सफलता का रहस्य समझ लिया।
  • बहुमूल्य वर्तमान का सदुपयोग कीजिए।
  • बच्चे की प्रथम पाठशाला उसकी माता की गोद में होती है।
  • ब्रह्म विद्या मनुष्य को ब्रह्म – परमात्मा के चरणों में बिठा देती है और चित्त की मूर्खता छुडवा देती है।
  • बुरी मंत्रणा से राजा, विषयों की आसक्ति से योगी, स्वाध्याय न करने से विद्वान, अधिक प्यार से पुत्र, दुष्टों की संगती से चरित्र, प्रदेश में रहने से प्रेम, अन्याय से ऐश्वर्य, प्रेम न होने से मित्रता तथा प्रमोद से धन नष्ट हो जाता है; अतः बुद्धिमान अपना सभी प्रकार का धन संभालकर रखता है, बुरे समय का हमें हमेशा ध्यान रहता है।
  • बुराई मनुष्य के बुरे कर्मों की नहीं, वरन्‌ बुरे विचारों की देन होती है।
  • बुराई के अवसर दिन में सौ बार आते हैं तो भलाई के साल में एकाध बार।
  • बहुमत की आवाज़ न्याय का द्योतक नहीं है।
  • बाह्य जगत में प्रसिद्धि की तीव्र लालसा का अर्थ है-तुम्हें आन्तरिक सम्रध्द व शान्ति उपलब्ध नहीं हो पाई है।
  • बुढ़ापा आयु नहीं, विचारों का परिणाम है।
  • बलिदान वही कर सकता है, जो शुद्ध है, निर्भय है और योग्य है।
  • बातचीत का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू यह होता है कि ध्यानपूर्वक यह सुना जाए कि कहा क्या जा रहा है।

  • शुभ कार्यों को कल के लिए मत टालिए, क्योंकि कल कभी आता नहीं।
  • शुभ कार्यों के लिए हर दिन शुभ और अशुभ कार्यों के लिए हर दिना अशुभ है।
  • शक्ति उनमें होती है, जिनकी कथनी और करनी एक हो, जो प्रतिपादन करें, उनके पीछे मन, वचन और कर्म का त्रिविध समावेश हो।
  • शालीनता बिना मूल्य मिलती है, पर उससे सब कुछ ख़रीदा जा सकता है।
  • शत्रु की घात विफल हो सकती है, किन्तु आस्तीन के साँप बने मित्र की घात विफल नहीं होती।
  • शत्रु को पराजित करने के लिए ढाल तथा तलवार की आवश्यकता होती है। इसलिए अंग्रेज़ी और संस्कृत का अध्ययन मन लगाकर करो।
  • शरीर स्वस्थ और निरोग हो, तो ही व्यक्ति दिनचर्या का पालन विधिवत कर सकता है, दैनिक कार्य और श्रम कर सकता है।
  • शरीर और मन की प्रसन्नता के लिए जिसने आत्म-प्रयोजन का बलिदान कर दिया, उससे बढ़कर अभागा एवं दुबुद्धि और कौन हो सकता है?
  • शिक्षा का स्थान स्कूल हो सकते हैं, पर दीक्षा का स्थान तो घर ही है।
  • शिक्षक राष्ट्र मंदिर के कुशल शिल्पी हैं।
  • शिक्षक नई पीढ़ी के निर्माता होत हैं।
  • शूरता है सभी परिस्थितियों में परम सत्य के लिए डटे रह सकना, विरोध में भी उसकी घोषण करना और जब कभी आवश्यकता हो तो उसके लिए युद्ध करना।

ज्ञ

  • ज्ञान मूर्खता छुडवाता है और परमात्मा का सुख देता है। यही आत्मसाक्षात्कार का मार्ग है।
  • ज्ञान अक्षय है। उसकी प्राप्ति मनुष्य शय्या तक बन पड़े तो भी उस अवसर को हाथ से न जाने देना चाहिए।
  • ज्ञान ही धन और ज्ञान ही जीवन है। उसके लिए किया गया कोई भी बलिदान व्यर्थ नहीं जाता।
  • ज्ञान और आचरण में बोध और विवेक में जो सामञ्जस्य पैदा कर सके उसे ही विद्या कहते हैं।
  • ज्ञान के नेत्र हमें अपनी दुर्बलता से परिचित कराने आते हैं। जब तक इंद्रियों में सुख दीखता है, तब तक आँखों पर पर्दा हुआ मानना चाहिए।
  • ज्ञान से एकता पैदा होती है और अज्ञान से संकट।
  • ज्ञान का अर्थ मात्र जानना नहीं, वैसा हो जाना है।
  • ज्ञान का अर्थ है – जानने की शक्ति। सच को झूठ को सच से पृथक्‌ करने वाली जो विवेक बुद्धि है- उसी का नाम ज्ञान है।
  • ज्ञान अक्षय है, उसकी प्राप्ति शैय्या तक बन पड़े तो भी उस अवसर को हाथ से नहीं जाने देना चाहिए।
  • ज्ञानदान से बढ़कर आज की परिस्थितियों में और कोई दान नहीं।
  • ज्ञान की आराधना से ही मनुष्य तुच्छ से महान बनता है।
  • ज्ञान की सार्थकता तभी है, जब वह आचरण में आए।
  • ज्ञान का जितना भाग व्यवहार में लाया जा सके वही सार्थक है, अन्यथा वह गधे पर लदे बोझ के समान है।
  • ज्ञान का अंतिम लक्ष्य चरित्र निर्माण ही है।
  • ज्ञान और आचरण में जो सामंजस्य पैदा कर सके, उसे ही विद्या कहते हैं।
  • ज्ञान मुक्त करता है, पर ज्ञान का अभिमान नरकों में ले जाता है।
  • ज्ञानयोगी की तरह सोचें, कर्मयोगी की तरह पुरुषार्थ करें और भक्तियोगी की तरह सहृदयता उभारें।
  • ज्ञानीजन विद्या विनय युक्त ब्राम्हण तथा गौ हाथी कुत्ते और चाण्डाल मे भी समदर्शी होते हैं।

  • न तो दरिद्रता में मोक्ष है और न सम्पन्नता में, बंधन धनी हो या निर्धन दोनों ही स्थितियों में ज्ञान से मोक्ष मिलता है।
  • न तो किसी तरह का कर्म करने से नष्ट हुई वस्तु मिल सकती है, न चिंता से। कोई ऐसा दाता भी नहीं है, जो मनुष्य को विनष्ट वस्तु दे दे, विधाता के विधान के अनुसार मनुष्य बारी-बारी से समय पर सब कुछ पा लेता है।
  • नेतृत्व पहले विशुद्ध रूप से सेवा का मार्ग था। एक कष्ट साध्य कार्य जिसे थोड़े से सक्षम व्यक्ति ही कर पाते थे।
  • नेतृत्व ईश्वर का सबसे बड़ा वरदान है, क्योंकि वह प्रामाणिकता, उदारता और साहसिकता के बदले ख़रीदा जाता है।
  • नेतृत्व का अर्थ है वह वर्चस्व जिसके सहारे परिचितों और अपरिचितों को अंकुश में रखा जा सके, अनुशासन में चलाया जा सके।
  • निश्चित रूप से ध्वंस सरल होता है और निर्माण कठिन है।
  • नरक कोई स्थान नहीं, संकीर्ण स्वार्थपरता की और निकृष्ट दृष्टिकोण की प्रतिक्रिया मात्र है।
  • नेता शिक्षित और सुयोग्य ही नहीं, प्रखर संकल्प वाला भी होना चाहिए, जो अपनी कथनी और करनी को एकरूप में रख सके।
  • नास्तिकता ईश्वर की अस्वीकृति को नहीं, आदर्शों की अवहेलना को कहते हैं।
  • निरंकुश स्वतंत्रता जहाँ बच्चों के विकास में बाधा बनती है, वहीं कठोर अनुशासन भी उनकी प्रतिभा को कुंठित करता है।
  • निष्काम कर्म, कर्म का अभाव नहीं, कर्तृत्व के अहंकार का अभाव होता है।
  • ‘न’ के लिए अनुमति नहीं है।
  • निन्दक दूसरों के आर-पार देखना पसन्द करता है, परन्तु खुद अपने आर-पार देखना नहीं चाहता।
  • नित्य गायत्री जप, उदित होते स्वर्णिम सविता का ध्यान, नित्य यज्ञ, अखण्ड दीप का सान्निध्य, दिव्यनाद की अवधारणा, आत्मदेव की साधना की दिव्य संगम स्थली है- शांतिकुञ्ज गायत्री तीर्थ।
  • निरभिमानी धन्य है; क्योंकि उन्हीं के हृदय में ईश्वर का निवास होता है।
  • निकृष्ट चिंतन एवं घृणित कर्तृत्व हमारी गौरव गरिमा पर लगा हुआ कलंक है। – वाङ्गमय
  • नैतिकता, प्रतिष्ठाओं में सबसे अधिक मूल्यवान्‌ है।
  • नर और नारी एक ही आत्मा के दो रूप है।
  • नारी का असली शृंगार, सादा जीवन उच्च विचार।
  • नाव स्वयं ही नदी पार नहीं करती। पीठ पर अनेकों को भी लाद कर उतारती है। सन्त अपनी सेवा भावना का उपयोग इसी प्रकार किया करते हैं।
  • नौकर रखना बुरा है लेकिन मालिक रखना और भी बुरा है।
  • निराशापूर्ण विचार ही आपकी अवनति के कारण है।
  • न्याय नहीं बल्कि त्याग और केवल त्याग ही मित्रता का नियम है।

  • हर शाम में एक जीवन का समापन हो रहा है और हर सवेरे में नए जीवन की शुरुआत होती है।
  • हर व्यक्ति संवेदनशील होता है, पत्थर कोई नहीं होता; लेकिन सज्जन व्यक्ति पर बाहरी प्रभाव पानी की लकीर की भाँति होता है।
  • हर व्यक्ति जाने या अनजाने में अपनी परिस्थितियों का निर्माण आप करता है।
  • हर दिन वर्ष का सर्वोत्तम दिन है।
  • हर चीज़ बदलती है, नष्ट कोई चीज़ नहीं होती।
  • हर मनुष्य का भाग्य उसकी मुट्ठी में है।
  • हर वक्त, हर स्थिति में मुस्कराते रहिये, निर्भय रहिये, कत्र्तव्य करते रहिये और प्रसन्न रहिये।
  • हमारा शरीर ईश्वर के मन्दिर के समान है, इसलिये इसे स्वस्थ रखना भी एक तरह की इश्वर – आराधना है।
  • हीन से हीन प्राणी में भी एकाध गुण होते हैं। उसी के आधार पर वह जीवन जी रहा है।
  • हमें अपने अभाव एवं स्वभाव दोनों को ही ठीक करना चाहिए; क्योंकि ये दोनों ही उन्नति के रास्ते में बाधक होते हैं।
  • हमारे शरीर को नियमितता भाती है, लेकिन मन सदैव परिवर्तन चाहता है।
  • हमारे वचन चाहे कितने भी श्रेष्ठ क्यों न हों, परन्तु दुनिया हमें हमारे कर्मों के द्वारा पहचानती है।
  • हमारे सुख-दुःख का कारण दूसरे व्यक्ति या परिस्थितियाँ नहीं अपितु हमारे अच्छे या बूरे विचार होते हैं।
  • हमारा जीना व दुनिया से जाना ही गौरवपूर्ण होने चाहिए।
  • हँसती-हँसाती ज़िन्दगी ही सार्थक है।
  • हम क्या करते हैं, इसका महत्त्व कम है; किन्तु उसे हम किस भाव से करते हैं इसका बहुत महत्त्व है।
  • हम अपनी कमियों को पहचानें और इन्हें हटाने और उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियाँ स्थापित करने का उपाय सोचें इसी में अपना व मानव मात्र का कल्याण है।
  • हम कोई ऐसा काम न करें, जिसमें अपनी अंतरात्मा ही अपने को धिक्कारे। – वाङ्गमय
  • हम आमोद-प्रमोद मनाते चलें और आस-पास का समाज आँसुओं से भीगता रहे, ऐसी हमारी हँसी-खुशी को धिक्कार है।
  • हम मात्र प्रवचन से नहीं अपितु आचरण से परिवर्तन करने की संस्कृति में विश्वास रखते हैं।
  • हम किसी बड़ी खुशी के इन्तिजार में छोटी-छोटी खुशियों को नजरअन्दाज कर देते हैं किन्तु वास्तविकता यह है कि छोटी-छोटी खुशियाँ ही मिलकर एक बड़ी खुशी बनती है। इसलिए छोटी-छोटी खुशियों का आनन्द लीजिए, बाद में जब आप उन्हें याद करेंगे तो वही आपको बड़ी खुशियाँ लगेंगी।
  • हमारी कितने रातें सिसकते बीती हैं – कितनी बार हम फूट-फूट कर रोये हैं इसे कोई कहाँ जानता है? लोग हमें संत, सिद्ध, ज्ञानी मानते हैं, कोई लेखक, विद्वान, वक्ता, नेता, समझा हैं। कोई उसे देख सका होता तो उसे मानवीय व्यथा वेदना की अनुभूतियों से करुण कराह से हाहाकार करती एक उद्विग्न आत्मा भर इस हड्डियों के ढ़ाँचे में बैठी बिलखती दिखाई पड़ती है।
  • हम स्वयं ऐसे बनें, जैसा दूसरों को बनाना चाहते हैं। हमारे क्रियाकलाप अंदर और बाहर से उसी स्तर के बनें जैसा हम दूसरों द्वारा क्रियान्वित किये जाने की अपेक्षा करते हैं।
  • हे मनुष्य! यश के पीछे मत भाग, कत्र्तव्य के पीछे भाग। लोग क्या कहते हैं यह न सुनकर विवेक के पीछे भाग। दुनिया चाहे कुछ भी कहे, सत्य का सहारा मत छोड़।
  • हाथी कभी भी अपने दाँत को ढोते हुए नहीं थकता।

  • धर्म का मार्ग फूलों सेज नहीं, इसमें बड़े-बड़े कष्ट सहन करने पड़ते हैं।
  • धर्म अंत:करण को प्रभावित और प्रशासित करता है, उसमें उत्कृष्टता अपनाने, आदर्शों को कार्यान्वित करने की उमंग उत्पन्न करता है। – वाङ्गमय
  • धर्म की रक्षा और अधर्म का उन्मूलन करना ही अवतार और उसके अनुयायियों का कत्र्तव्य है। इसमें चाहे निजी हानि कितनी ही होती हो, कठिनाई कितनी ही उइानी पड़ती हो।
  • धर्म को आडम्बरयुक्त मत बनाओ, वरन्‌ उसे अपने जीवन में धुला डालो। धर्मानुकूल ही सोचो और करो। शास्त्र की उक्ति है कि रक्षा किया हुआ धर्म अपनी रक्षा करता है और धर्म को जो मारता है, धर्म उसे मार डालता है, इस तथ्य को।
  • धर्मवान्‌ बनने का विशुद्ध अर्थ बुद्धिमान, दूरदर्शी, विवेकशील एवं सुरुचि सम्पन्न बनना ही है।
  • धीरे बोल, जल्दी सोचों और छोटे-से विवाद पर पुरानी दोस्ती कुर्बान मत करो।
  • धन अच्छा सेवक भी है और बुरा मालिक भी।
  • ध्यान-उपासना के द्वारा जब तुम ईश्वरीय शक्तियों के संवाहक बन जाते हो, तब तुम्हें निमित्त बनाकर भागवत शक्ति कार्य कर रही होती है।
  • धन अपना पराया नहीं देखता।
  • धनवाद नहीं, चरित्रवान सुख पाते हैं।
  • धैर्य, अनुद्वेग, साहस, प्रसन्नता, दृढ़ता और समता की संतुलित स्थिति सदेव बनाये रखें।
  • धरती पर स्वर्ग अवतरित करने का प्रारम्भ सफाई और स्वच्छता से करें।
  • ध्यान में रखकर ही अपने जीवन का नीति निर्धारण किया जाना चाहिए।
  • धन्य है वे जिन्होंने करने के लिए अपना काम प्राप्त कर लिया है और वे उसमें लीन है। अब उन्हें किसी और वरदान की याचना नहीं करना चाहिए।

  • भगवान से निराश कभी मत होना, संसार से आशा कभी मत करना; क्योंकि संसार स्वार्थी है। इसका नमूना तुम्हारा खुद शरीर है।
  • भगवान‌ की दण्ड संहिता में असामाजिक प्रवृत्ति भी अपराध है।
  • भगवान‌ को घट-घट वासी और न्यायकारी मानकर पापों से हर घड़ी बचते रहना ही सच्ची भक्ति है।
  • भगवान को अनुशासन एवं सुव्यवस्थितपना बहुत पसंद है। अतः उन्हें ऐसे लोग ही पसंद आते हैं, जो सुव्यवस्था व अनुशासन को अपनाते हैं।
  • भगवान प्रेम के भूखे हैं, पूजा के नहीं।
  • भगवान सदा हमें हमारी क्षमता, पात्रता व श्रम से अधिक ही प्रदान करते हैं।
  • भगवान जिसे सच्चे मन से प्यार करते हैं, उसे अग्नि परीक्षाओं में होकर गुजारते हैं।
  • भगवान के काम में लग जाने वाले कभी घाटे में नहीं रह सकते।
  • भगवान की सच्ची पूजा सत्कर्मों में ही हो सकती है।
  • भगवान आदर्शों, श्रेष्ठताओं के समूच्चय का नाम है। सिद्धान्तों के प्रति मनुष्य के जो त्याग और बलिदान है, वस्तुत: यही भगवान की भक्ति है।
  • भगवान भावना की उत्कृष्टता को ही प्यार करता है और सर्वोत्तम सद्‌भावना का एकमात्र प्रमाण जनकल्याण के कार्यों में बढ़-चढ़कर योगदान करना है।
  • भगवान का अवतार तो होता है, परन्तु वह निराकार होता है। उनकी वास्तविक शक्ति जाग्रत्‌ आत्मा होती है, जो भगवान का संदेश प्राप्त करके अपना रोल अदा करती है।
  • भाग्य को मनुष्य स्वयं बनाता है, ईश्वर नहीं।
  • भाग्य साहसी का साथ देता है।
  • भाग्य पर नहीं, चरित्र पर निर्भर रहो।
  • भाग्य भरोसे बैठे रहने वाले आलसी सदा दीन-हीन ही रहेंगे।
  • भाग्यशाली होते हैं वे, जो अपने जीवन के संघर्ष के बीच एक मात्र सहारा परमात्मा को मानते हुए आगे बढ़ते जाते हैं।
  • भले बनकर तुम दूसरों की भलाई का कारण भी बन जाते हो।
  • भले ही आपका जन्म सामान्य हो, आपकी मृत्यु इतिहास बन सकती है।
  • भीड़ में खोया हुआ इंसान खोज लिया जाता है, परन्तु विचारों की भीड़ के बीहड़ में भटकते हुए इंसान का पूरा जीवन अंधकारमय हो जाता है।
  • भलमनसाहत का व्यवहार करने वाला एक चमकता हुआ हीरा है।
  • भूत लौटने वाला नहीं, भविष्य का कोई निश्चय नहीं; सँभालने और बनाने योग्य तो वर्तमान है।
  • भूत इतिहास होता है, भविष्य रहस्य होता है और वर्तमान ईश्वर का वरदान होता है।

  • लोगों को चाहिए कि इस जगत में मनुष्यता धारण कर उत्तम शिक्षा, अच्छा स्वभाव, धर्म, योग्याभ्यास और विज्ञान का सम्यक ग्रहण करके सुख का प्रयत्न करें, यही जीवन की सफलता है।
  • लोग तुम्हारी स्तुति करें या निन्दा, लक्ष्मी तुम्हारे ऊपर कृपालु हो या न हो, तुम्हारा देहान्त आज हो या एक युग मे, तुम न्यायपथ से कभी भ्रष्ट न हो।
  • लोग क्या कहते हैं – इस पर ध्यान मत दो। सिर्फ़ यह देखो कि जो करने योग्य था, वह बनपड़ा या नहीं?
  • लोकसेवी नया प्रजनन बंद कर सकें, जितना हो चुका उसी के निर्वाह की बात सोचें तो उतने भर से उन समस्याओं का आधा समाधान हो सकता है जो पर्वत की तरह भारी और विशालकाय दीखती है।
  • लोभ आपदा की खाई है संतोष आनन्द का कोष।
  • लज्जा से रहित व्यक्ति ही स्वार्थ के साधक होते हैं।
  • लकीर के फ़कीर बनने से अच्‍छा है कि आत्‍महत्‍या कर ली जाये, लीक लीक गाड़ी चले, लीक ही चलें कपूत । लीक छोड़ तीनों चलें शायर, सिंह, सपूत ।।

  • रोग का सूत्रपान मानव मन में होता है।
  • राष्ट्र निर्माण जागरूक बुद्धिजीवियों से ही संभव है।
  • राष्ट्रोत्कर्ष हेतु संत समाज का योगदान अपेक्षित है।
  • राष्ट्र को समृद्ध और शक्तिशाली बनाने के लिए आदर्शवाद, नैतिकता, मानवता, परमार्थ, देश भक्ति एवं समाज निष्ठा की भावना की जागृति नितान्त आवश्यक है।
  • राष्ट्रीय स्तर की व्यापक समस्याएँ नैतिक दृष्टि धूमिल होने और निकृष्टता की मात्रा बढ़ जाने के कारण ही उत्पन्न होती है।
  • राष्ट्र के नव निर्माण में अनेकों घटकों का योगदान होता है। प्रगति एवं उत्कर्ष के लिए विभिन्न प्रकार के प्रयास चलते और उसके अनुरूप सफलता-असफलताएँ भी मिलती हैं।
  • राष्ट्रों, राज्यों और जातियों के जीवन में आदिकाल से उल्लेखनीय धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक क्रान्तियाँ हुई हैं। उन परिस्थितियों में श्रेय भले ही एक व्यक्ति या वर्ग को मार्गदर्शन को मिला हो, सच्ची बात यह रही है कि बुद्धिजीवियों, विचारवान्‌ व्यक्तियों ने उन क्रान्तियों को पैदा किया, जन-जन तक फैलाया और सफल बनाया।
  • राष्ट्र का विकास, बिना आत्म बलिदान के नहीं हो सकता।
  • राग-द्वेष की भावना अगर प्रेम, सदाचार और कर्त्तव्य को महत्त्व दें तो, मन की सभी समस्याओं का समाधान हो सकता है।
  • राष्ट्र को बुराइयों से बचाये रखने का उत्तरदायित्व पुरोहितों का है।
  • राजा यदि लोभी है तो दरिद्र से दरिद्र है और दरिद्र यदि दिल का उदार है तो राजा से भी सुखी है।

श्र

  • श्रम और तितिक्षा से शरीर मज़बूत बनता है।
  • श्रेष्ठता रहना देवत्व के समीप रहना है।
  • श्रद्धा की प्रेरणा है – श्रेष्ठता के प्रति घनिष्ठता, तन्मयता एवं समर्पण की प्रवृतित। परमेश्वर के प्रति इसी भाव संवेदना को विकसित करने का नमा है-भक्ति।
  • श्रेष्ठ मार्ग पर क़दम बढ़ाने के लिए ईश्वर विश्वास एक सुयोग्य साथी की तरह सहायक सिद्ध होता है।

  • तुम सेवा करने के लिए आये हो, हुकूमत करने के लिए नहीं। जान लो कष्ट सहने और परिश्रम करने के लिए तुम बुलाये गये हो, आलसी और वार्तालाप में समय नष्ट करने के लिए नहीं।
  • तीनों लोकों में प्रत्येक व्यक्ति सुख के लिये दौड़ता फिरता है, दुखों के लिये बिल्कुल नहीं, किन्तु दुःख के दो स्रोत हैं-एक है देह के प्रति मैं का भाव और दूसरा संसार की वस्तुओं के प्रति मेरेपन का भाव।
  • तुम्हारा प्रत्येक छल सत्य के उस स्वच्छ प्रकाश में एक बाधा है जिसे तुम्हारे द्वारा उसी प्रकार प्रकाशित होना चाहिए जैसे साफ़ शीशे के द्वारा सूर्य का प्रकाश प्रकाशित होता है।
  • तर्क से विज्ञान में वृद्धि होती है, कुतर्क से अज्ञान बढ़ता है और वितर्क से अध्यात्मिक ज्ञान बढ़ता है।

  • फूलों की तरह हँसते-मुस्कराते जीवन व्यतीत करो।
  • फल की सुरक्षा के लिये छिलका जितना जरूरी है, धर्म को जीवित रखने के लिये सम्प्रदाय भी उतना ही काम का है।
  • फल के लिए प्रयत्न करो, परन्तु दुविधा में खड़े न रह जाओ। कोई भी कार्य ऐसा नहीं जिसे खोज और प्रयत्न से पूर्ण न कर सको।

Source:- http://bharatdiscovery.org/

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“तू ना हो निराश कभी मन से”

 

—–

मन काे कैसे नियंत्रण में करें।

मन के विचारों काे कैसे नियंत्रित करें॥

विचारों के प्रकार-एक खुशी जीवन के लिए।

अपनी सोच काे हमेशा सकारात्मक कैसे रखें॥

“मन के बहुत सारे सवालाें का जवाब-आैर मन काे कैसे नियंत्रित कर उसे सहीं तरिके से संचालित कर शांतिमय जीवन जियें”

अगर जीवन में सफल हाेना हैं. ताे जहाँ १० शब्दाें से काेई बात बन जाये वहा पर

१०० शब्द बाेलकर अपनी मानसिक और वाणी की ऊर्जा को नष्ट नहीं करना चाहिए

-Kmsraj51

“तू ना हो निराश कभी मन से”

 

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तीन बातें-अनमोल वचन

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-kmsraj51-New

अनमोल वचन

तीन बातें

तीन बातें कभी न भूलें – प्रतिज्ञा करके, क़र्ज़ लेकर और विश्वास देकर। – महावीर

तीन बातें करो – उत्तम के साथ संगीत, विद्वान् के साथ वार्तालाप और सहृदय के साथ मैत्री। – विनोबा

तीन अनमोल वचन – धन गया तो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य गया तो कुछ गया और चरित्र गया तो सब गया। – अंग्रेजी कहावत

तीन से घृणा न करो – रोगी से, दुखी से और निम्न जाती से। – मुहम्मद साहब

तीन के आंसू पवित्र होते हैं – प्रेम के, करुना के और सहानुभूति के। – बुद्ध

तीन बातें सुखी जीवन के लिए- अतीत की चिंता मत करो, भविष्य का विश्वास न करो और वर्तमान को व्यर्थ मत जाने दो।

तीन चीज़ें किसी का इन्तजार नहीं करती – समय, मौत, ग्राहक।

तीन चीज़ें जीवन में एक बार मिलती है – मां, बांप, और जवानी।

तीन चीज़ें पर्दे योग्य है – धन, स्त्री और भोजन।

तीन चीजों से सदा सावधान रहिए – बुरी संगत, परस्त्री और निन्दा।

तीन चीजों में मन लगाने से उन्नति होती है – ईश्वर, परिश्रम और विद्या।

तीन चीजों को कभी छोटी ना समझे – बीमारी, कर्जा, शत्रु।

तीनों चीजों को हमेशा वश में रखो – मन, काम और लोभ।

तीन चीज़ें निकलने पर वापिस नहीं आती – तीर कमान से, बात जुबान से और प्राण शरीर से।

तीन चीज़ें कमज़ोर बना देती है – बदचलनी, क्रोध और लालच।

 

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“तू ना हो निराश कभी मन से”

CYMT-TU NA HO NIRASH K M S

 

“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की व्यर्थ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51 

 

 

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Negative Control And Positive Influence

kmsraj51 की कलम से…..

Soulword_kmsraj51 - Change Y M T

Negative Control And Positive Influence 

The power of influence in relationships is extraordinary, but it practically disappears when we try to exercise control and force.

You can influence anyone positively in many ways:

• encouraging,

• sharing,

• listening,

• communicating in the right way. 

In negative control we generate stress, frustration and anger. In positive influence the energy flows in a relaxed way with harmony and is not threatening, respecting each one for their specialty and allowing each one to be as they are.

In order to influence positively we need the power of discrimination and judgement in relation to what to say and what to do e.g. when you believe that the other person is the problem; generally the problem is not what others say or do, but rather how you perceive them. The way that you judge is what creates your negative feelings about them. We have the choice to perceive others as a threat, as a problem, or as an opportunity; an opportunity for learning, for change, for dialogue and understanding. We can choose to have compassion (kindness); to feel that the other is a problem indicates a lack of compassion.

Message for the day 08-07-2014

The way to control the mind is to talk to it with love.

Projection: Whenever I find my mind wandering I try to control it with force. I try to pull the mind and order it not to think about something. Yet I find that, the more I try to force the mind not to go in a particular direction, the more it tends to go there.

Solution: The only way to control the mind is to talk to it with love. Just as I would explain to a child, I need to explain to it with love. This will make my mind my friend and I will be able to concentrate even in any undesirable situations.

In Spiritual Service,
Brahma Kumaris

 

 

The Subtle Role Play Of Thoughts And Images

kmsraj51 की कलम से

Soulword_kmsraj51 - Change Y M T

kmsraj51 की कलम से …..

Coming soon book (जल्द ही आ रहा किताब)…..

“तू ना हो निराश कभी मन से”

“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की  व्यथ॔ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51 

जीवन मंदिर सा पावन हाे, बाताें में सुंदर सावन हाे।

स्वाथ॔ ना भटके पास ज़रा भी, हर दिन मानो वृंदावन हाे॥

-KMSRAJ51



The Subtle Role Play Of Thoughts And Images

The human soul is a subtle (non-physical) stage on which a subtle role play of thoughts and images constantly takes place throughout the day and even while sleeping. We have explained in our older messages how thoughts are of 4 main different types – positive which are based on virtues, necessary related to day-to-day activities, waste which are mainly unnecessary and related to the past and future and negative which are related to vices and other weaknesses. In the same way, we also constantly create images or scenes, which are of the same 4 types, which is why we commonly use the term ‘the eye of the mind’. The mind not only thinks or speaks subtly but visualizes or sees subtly too, almost all the time.
These two processes function, sometimes independent of each other as well as sometimes dependent on each other i.e. influencing each other e.g. think of peace and that leads to visualizations related to the same. Visualize an unpleasant scene of anger and hatred, and your thoughts are led in that direction. Sometimes these two processes function at the same time and sometimes one at a time. Sometimes neither functions at all, which happens much more frequently while sleeping as compared to when we are awake. This subtle, physically invisible role play is the foundation of the physical role play of words and actions that is visible to the self and everyone else around you.

 

What the quality of a soul’s thoughts and images (or scenes) that it creates, depends on the soul’s sanskaras. Depending on the quality, the soul experiences the various different emotions, whether positive or negative. When the soul first incarnates on the physical world stage from the soul world, the quality of this role play of thoughts and images is high, pure and positive, hence it experiences only positive emotions. As it plays its different roles and comes down in the birth-rebirth cycle, this quality reduces, leading to the experience of emotions like sorrow, peacelessness, etc.
A point worth noting is that the key to any deep emotional experience, whether positive or negative is the creation of thoughts as well as images related to that particular emotion at the same time e.g. think and visualize at the same time, the death of a close relative that took place ten years ago and you immediately have a deep experience of sorrow. Think and visualize together, a loving hug of your mother that took place in your childhood, and you immediately experience deep happiness. This type of co-ordination between these two subtle processes is true concentration. The key to any type of spiritual upliftment is the upliftment of these two processes. The meditation that is taught at the Brahma Kumaris is nothing but a spiritual thought process accompanied by a spiritual visualization process, whereby thoughts and images of the subtle, spiritual self (or soul) and the Supreme Being (or Supreme Soul) are created together to experience the original qualities of the spiritual self and the eternal qualities of the Supreme Being – purity, peace, love, happiness and power.

 

brahmakumaris-kmsraj51In Spiritual Service,
Brahma Kumaris

 



 

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जाे आपका आैर आपके समय के वैल्यू काे ना समझे।

उसके लिए कभी भी कार्य (Work) ना कराे॥

-Kmsraj51

“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की  व्यथ॔ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51

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जीवन वृक्ष की शाखाओं को जाने!!

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Letting Go Of The Branches Of The Life Tree

Colorful Carnations

 

 

 

 

A very common habit that has become deeply embedded inside us is the habit of possessing, to which we succumb repeatedly. We come in contact with different people, material comforts, roles, positions, experiences, achievements and of course our own physical body etc. on an external level and our own thoughts, viewpoints, beliefs, memories, etc. on an internal level etc. throughout our life. All of these are like branches that make up our life tree. Possession is like clinging on to one or the other of these different branches from time to time, as we fly from one branch to another, while covering our life journey. The spiritual point of view on this habit is clear and very straight forward. It is not possible to possess anything. If we do try to do so, we lose our freedom. To experience the freedom, we need to dare to let go of the branches, which does not mean to lose or leave them because the branches are always going to be there. We can return to any of them to rest or pause whenever we want. But, it is about being aware and alert, because the moment a pause on a branch turns into a stop, the stop turns into a brake and, after that, the brake turns into a blockage. As a result, like the bird whose flying agility degrades on a physical level if it does the same; our intellectual and emotional agility starts to degrade.

When we learn to let go of one branch at a time, we are always welcoming new positive and empowering experiences in our life, one at a time. Like the birds, by letting go of one branch, we are then able to spend the rest of your lives trying and discovering many other branches, one branch at a time, and so we can enjoy the view from each new vantage point.We can choose between a life of flying and soaring or be stuck on one or the other branch, seeing others as they fly past and enjoy a life of freedom where they do visit their life tree from time to time and their life does revolve around the tree but they don’t try and possess it or any of its branches.

 

Message for the day 18-05-2014

To recognize the uniqueness of one’s own role is to be free from negativity. Expression: When we find things going wrong with us, we sometimes wish for a change in our role. We begin to compare ourselves with others or wish for something better in our life, which makes us lose all our enthusiasm. We, then, make no effort to better our role.

Experience: We need to recognize the importance of our own role. Like an actor who doesn’t make effort to change his role but brings perfection to his own role, we, too, need to concentrate on our own role. The recognition of the importance of our own role and the desire to bring excellence to it makes us free from negativity.

In Spiritual Service,
Brahma Kumaris

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love-rose-kmsraj51Picture Quotes By- “तू न हो निराश कभी मन से” किताब से

Book-Red-kmsraj51

100 शब्द  या  10 शब्द – एक सफल जीवन के लिए –

 

(100 Word “or” Ten Word For A Successful Life )

 

“तू न हो निराश कभी मन से” किताब => लेखक कृष्ण मोहन सिंह (kmsraj51)

 

“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की  व्यथ॔ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51

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“सफल लोग अपने मस्तिष्क को इस तरह का बना लेते हैं कि उन्हें हर चीज सकारात्मक व खूबसूरत लगती है।”
-KMSRAJ51

“हमारी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि हम अपने जीवन का कुछ सेकंड, प्रतिघंटा और प्रतिदिन कैसे बिताते हैं”
-KMSRAJ51

-A Message To All-

मत करो हतोत्साहित अपने शब्दों से ……आने वाली नयी पीढ़ी को ,
वो भी करेंगे कुछ ऐसा एक दिन…. जिसे देखेगा ज़माना ….पकड़ती हुई नयी सीढ़ी को ॥

कुछ भी आप के लिए संभव है ॥

जीवन मंदिर सा पावन हाे, बाताें में सुंदर सावन हाे।

स्वाथ॔ ना भटके पास ज़रा भी, हर दिन मानो वृंदावन हाे॥

~kmsraj51

95+ देश के पाठकों द्वारा पढ़ा जाने वाला हिन्दी वेबसाइट है,, –

https://kmsraj51.wordpress.com/

मैं अपने सभी प्रिय पाठकों का आभारी हूं…..  I am grateful to all my dear readers …..

“तू न हो निराश कभी मन से” book

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एक सफल जीवन के लिए-आत्मा का दैनिक भोजन (ब्रह्माकुमारी-हिन्दी मुरली)

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Coming Soon book,,

जल्द ही आ रहा, पुस्तक,

“तू न हो निराश कभी मन से” book

~Change your mind thoughts~

 

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मेरे प्रिय पाठकों / मित्रों,

मैं शुरू कर रहा हूँ, एक मन परिवर्तक दैनिक आधार स्तम्भ !!

एक सफल जीवन  के लिए मंत्र – मुक्त मन तनाव के लिए मंत्र !!

 आत्मा का दैनिक भोजन (ब्रह्माकुमारी-हिन्दी मुरली)-


 

मुरली सार:- “मीठे बच्चे – याद में रहकर भोजन बनाओ तो खाने वाले का हृदय शुद्ध हो जायेगा, तुम ब्राह्मणों का भोजन बहुत ही शुद्ध होना चाहिए”

प्रश्न:- सतयुग में तुम्हारे दर पर कभी भी काल नहीं आता है – क्यों?
उत्तर:- क्योंकि संगम पर तुम बच्चों ने बाप द्वारा जीते जी मरना सीखा है। जो अभी जीते जी मरते हैं उनके दर पर कभी काल नहीं आ सकता है। तुम यहाँ आये हो मरना सीखने। सतयुग है अमर-लोक, वहाँ काल किसी को खाता नहीं। रावण राज्य है मृत्युलोक, इसलिए यहाँ सभी की अकाले मृत्यु होती रहती है।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बन्धन मुक्त बनने वा अपनी उन्नति करने के लिए बुद्धि ज्ञान से सदा भरपूर रखनी है। मास्टर ज्ञान सागर बन, स्वदर्शन चक्रधारी होकर याद में बैठना है।
2) नींद को जीतने वाला बन याद और सेवा का बल जमा करना है। कमाई में कभी सुस्ती नहीं करनी है। झुटका नहीं खाना है।

वरदान:- इस अलौकिक जीवन में संबंध की शक्ति से अविनाशी स्नेह और सहयोग प्राप्त करने वाली श्रेष्ठ आत्मा भव
इस अलौ¬किक जीवन में संबंध की शक्ति आप बच्चों को डबल रूप में प्राप्त है। एक बाप द्वारा सर्व संबंध, दूसरा दैवी परिवार द्वारा संबंध। इस संबंध से सदा नि:स्वार्थ स्नेह, अविनाशी स्नेह और सहयोग सदा प्राप्त होता रहता है। तो आपके पास संबंध की भी शक्ति है। ऐसी श्रेष्ठ अलौकिक जीवन वाली शक्ति सम्पन्न वरदानी आत्मायें हो इसलिए अर्जी करने वाले नहीं, सदा राज़ी रहने वाले बनो।

स्लोगन:- कोई भी प्लैन विदेही, साक्षी बन सोचो और सेकण्ड में प्लेन स्थिति बनाते चलो।

आध्यात्मिक सेवा में,
ब्रह्माकुमारी

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