साहित्य का सहज अर्थ…..

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मेरे कुछ आंतरिक शाब्दिक विचार।

साहित्य का सहज अर्थ है अपनी सभ्यता-संस्कृति,अपने परिवेश को अपने शब्दों में अपने दृष्टिकोण के साथ पाठकों, श्रोताओं के मध्य प्रस्तुत करना  . पर यदि दृष्टिकोण,शब्द कृत्रिम आधुनिकता या आवेश से बाधित हो तो उसे साहित्य का दर्जा नहीं दे सकते।  साहित्य, जो सोचने पर मजबूर कर दे,उत्कंठा से भर दे।
प्राचीन ह‍िन्दी साहित्य की परंपरा काफी समृद्ध और विशाल रही है और आज भी है। ह‍िन्दी साहित्य को सुशोभित-समृद्ध करने में मुंशी प्रेमचंद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा, पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, रामवृक्ष बेनीपुरी, डॉ. हरिवंशराय बच्चन, कबीर, रसखान, मलिक मोहम्मद जायसी, रविदास (रैदास), रमेश दिविक, रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, पं. माखनलाल चतुर्वेदी, डॉ. धर्मवीर भारती, जयशंकर प्रसाद, डॉ. शिवमंगलसिंह सुमन, अज्ञेय, अमीर खुसरो, अमृतलाल नागर, असगर वजाहत, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, आचार्य रजनीश, अवधेश प्रधान, अमृत शर्मा, असगर वजाहत, अनिल जनविजय, अश्विनी आहूजा, देवकीनंदन खत्री, भारतेंदु हरी‍शचंद्र, भीष्म साहनी, रसखान, अवनीश सिंह चौहान आदि का कमोबेश महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
मोहम्मद इक़बाल की इन दो पंक्तियों को आज भी हम उदहारण मानते हैं –
“नहीं है नाउम्मीद इक़बाल अपनी किश्ते-वीरां से
ज़रा नम हो तो ये मिट्टी बड़ी ज़रखेज़ है साक़ी”
प्रकृति से जुड़े हैं कवि पंत के साथ –
“प्रथम रश्मि का आना रंगिणी तूने कैसे पहचाना
कहाँ-कहाँ हे बाल विहंगिणी पाया तूने यह गाना”
और रहस्यवाद से छायावाद तक की परिक्रमा करते हैं
रहस्य का अर्थ है -“ऐसा तत्त्व जिसे जानने का प्रयास करके भी अभी तक निश्चित रूप से कोई जान नहीं सका। ऐसा तत्त्व है परमात्मा। काव्य में उस परमात्म-तत्त्व को जानने की, जानकर पाने की और मिलने पर उसी में मिलकर खो जाने की प्रवृत्ति का नाम है-रहस्यवाद।”
छायावाद को आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने शैली की पद्धतिमात्र स्वीकारा है तो नंददुलारे वाजपेयी ने अभिव्यक्ति की एक लाक्षणिक प्रणाली के रूप में अपनाया है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे रहस्यवाद के भुल-भुलैया में डाल दिया तो डॉ. नगेंद्र ने ‘स्थूल के विरुद्ध सूक्ष्म का विद्रोह’ कहा। आलोचकों ने छायावाद की किसी न किसी प्रवृत्ति के आधार पर उसे जानने-समझने का प्रयास किया। छायावाद संबंधी विद्वानों की परिभाषाएँ या तो अधूरी हैं या एकांगी। इस संदर्भ में नामवर सिंह का छायावाद (1955) संबंधी ग्रंथ विशेष अर्थ रखता है। उन्होंने एक नए एंगल से छायावाद को देखा। उनके शब्दों में – ‘छायावाद उस राष्ट्रीय जागरण की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है जो एक ओर पुरानी रूढ़ियों से मुक्ति चाहता था और दूसरी ओर विदेशी पराधीनता से। इस जागरण में जिस तरह क्रमशः विकास होता गया, इसकी काव्यात्मक अभिव्यक्ति भी विकसित होती गई और इसके फलस्वरूप छायावाद संज्ञा का भी अर्थ विस्तार होता गया।’1
परिभाषाओं से इतर है हमारी कल्पना – जिसमें रहस्य भी है, छायावाद भी, नौ रसों का अद्भुत स्वाद भी  … किसी भी युग का एक दृष्टिकोण नहीं, न धर्म का – अर्थ वही है, जो आपकी दिशा बदल दे, आपको सोचने पर मजबूर करे  … इसी उद्देश्य में मेरे कुछ आंतरिक शाब्दिक विचार –
बातें अनगिनत होती हैं
कुछ मन को सहलाती हैं
कुछ बिंधती हैं
कुछ समझाती हैं  …
समझते समझते मन को सहलाना खुद आ जाता है
क्योंकि सहलानेवाली बातेँ खत्म हो जाती हैं – अचानक !
इसी समापन के आगे शब्द भाव जन्म लेते हैं
मन को सहलाते हुए
कब ये वृक्ष बढ़ने लगते हैं
कब ख्यालों के पंछी
अपनी अभिव्यक्ति के कलरव से
धऱती आकाश गुंजायमान करते हैं  … कुछ भी पता नहीं चलता और एक दिन ‘पहचान’ मिल जाती है !
इसी ठहराव सी पहचान के लिए मैं कहना चाहती हूँ –
रिश्ता,प्यार,दोस्ती

 सिर्फ इन्हें ही नहीं निभाना होता

अपमान भी निभाना पड़ता है !
प्यार का सम्मान ज़रूरी है
तो शांति से जीने के लिए
अपमान का सम्मान कहीं अधिक ज़रूरी है !
निःसंदेह,
अपमान ग्राह्य नहीं होता
पर जीवन का बहुत बड़ा
गहन, गंभीर अध्याय
इसे ग्राह्य बनाता है
कितने भी हाथ-पाँव मार लो विरोध के
ग्राह्य बनाना पड़ता है !
कोई जवाब देने से पहले
अपनी अंतरात्मा के घायल वजूद को देखो
और चिंतन करो
– कब
कहाँ
कितनी बार
तुमने परिस्थिति के अपमानजनक हिस्से को
अपनी मुस्कान दी है
आवभगत किया है  …
शर्मिंदगी की बात नहीं
ज़िन्दगी की शिक्षा
इन्हीं परिस्थितियों की चुभन से मिलती है  …
जब तक सूरज पूरब की ओर से
सर के ऊपर तक होता है
ज़िन्दगी का फलसफा अबोध होता है
हम – तुम
बड़ी बड़ी बातें करते हैं
पर पश्चिम तक बढ़ते
अस्ताचल तक पहुँचते मार्ग में
समझौते ही समझौते होते हैं
 अपमान का गरल पीकर
नीलकंठ बनकर
मुस्कुराना ही होता है
अतिथि देवो भवः कहकर
घातक दुश्मन को गले लगाना ही होता है
….
मुश्किलों को आसान बनाने के लिए
अपमान को निभाना ही होता है !!!
सूक्तियों के कोलाहल में मुझे पूछना है – 
अन्याय करना पाप है

तो अन्याय सहना भी  …
बिल्कुल !
लेकिन अन्याय करना अन्यायी का स्वभाव है
अन्याय सहना स्वभाव नहीं
परिस्थिति की न्यायिक माँग है !
कोर्ट में मसले वर्षों की फाइल में मर जाते हैं
पर जीता हुआ सत्य
पेट की आग
परिवार की सूक्ति
समाज की भर्तस्ना में
खामोश बुत हो जाता है !
इस बुत पर हाथ उठाओ
या घसीटते जाओ
यह मूक रहता है
हँसी भी इसकी शमशान जैसी होती है
उसकी भी आलोचना भरपूर होती है  …
‘मेरे टुकड़ों पर पलती है’ कहता पति हाथ उठाता है
निकल जाए जो स्त्री स्वाभिमान के साथ
तो – कई फिकरे !!!
स्वाभिमान का तमाशा जब होता है
तब उसके विरोध में कोई कैंडल मार्च नहीं होता
सबके अपने व्यक्तिगत कारण होते हैं
‘विरोध करके हम अपना रिश्ता क्यूँ बिगाड़ें’
‘माहौल नहीं था कहने का’  …
सही है
तो  … अन्याय सहने की स्थिति को पाप मत कहो
यह पाप करने की ताकत में
सब मिलकर अन्याय का घृत डालते हैं
यानी पाप करते हैं
इसलिए ……धर्म के मायने पूछने से पहले
अपने धर्म का खाता खोलिए
देखिये, अधर्मी की लिस्ट में आपका नाम तो नहीं !!!
निःसंदेह शिक्षा,परिवर्तन और आधुनिकता का व्यापक शोर है, पर सत्य जो है वह टिमटिमाता हुआ  … कुछ इस तरह,
वर्तमान की देहरी पर
ख़ामोशी जब भयावह हो उठती है

तब खोल देती हूँ अतीत के कब्रिस्तान का दरवाजा

दहला देनेवाली चुप सी चीखें
रेंगता साया
विस्फारित चेहरों की लकीरें  …
अतीत और वर्तमान में
बदलाव तो है
पर उसी तरह –
जिस तरह लड़कियों के जीवन में दिखाई देता है !!!
वक्तव्य ठोस – लड़का लड़की समान
लड़की लड़के से बेहतर !
लड़की कमाने लगी
पर थकान आज भी एक-दो घरों को छोड़
सिर्फ लड़कों की !
दहेज़ की माँग पूर्ववत !
गोरी,काली का भेद नहीं जाता उसकी नौकरी से
और लड़का –
घी का लड्डू टेढ़ो भलो !!!
परिवर्तन का शोर
परिवर्तन –
भाषण और सच के मध्य  बारीक लकीर जैसी …
लड़कियों का उच्चश्रृंखल अंदाज परिवर्तन नहीं
कम कपड़े परिवर्तन नहीं
परिवर्तन है –
नौकरी के लिए घर से बाहर अपनी तलाश
तलाश के आगे कई सपनों की हत्या !
परिवर्तन है –
लड़की का लड़का बन जाना
और उस वेशभूषा में सीख –
कुछ लड़की सा व्यवहार करो !
लड़की लड़का सी हो
या संकुचित सिमटी
या व्यवहारिक  …
आलोचना होती रहती है !
हादसे के बाद उसकी इज़्ज़त नहीँ होती
नहीं होता कोई न्याय
तमाम गलतियों की जिम्मेदार वही होती है
माशाअल्लाह
लड़के में कोई खामी नहीं होती !
वह खून करे
इज़्ज़त छिन ले
शराब पीकर,क्रोध में हाथ उठाये
फिर भी वह दोषी नहीं होता
परस्त्री को देखे
तो पत्नी में कमी
वह बाँधकर रखने में अक्षम है
पुरुष तो भटकेगा ही !!!
है न परिवर्तन में वही सड़ांध ?
…. हाँ लड़कियाँ पढ़-लिख गई हैं
देश-विदेशों में नौकरी करने लगी हैं
…घर से बाहर वह दौड़ रही है अपना अस्तित्व लिए
घर में कमरे के भीतर वह जूझ रही है
अपने अस्तित्व के लिए
यूँ  …. अपवाद कल भी था , आज भी हैं
उदहारण कल भी था, आज भी है
परिवर्तन एक शोर है
संसद भवन जैसा
जहाँ कोई किसी की नहीं सुनता
शहरी सियार की हुआ हुआ है
जो आज भी जंगली है !!!

Note:- “Post share by Mrs. “

संक्षेप में रश्मि प्रभा जी के बारे में-

मेरा लेखन से सम्बन्ध मेरे परिवार की अमूल्य विरासत है, जिसकी कलम मेरे पिता स्व रामचन्द्र प्रसाद ने खरीदी,मेरी अम्मा स्व सरस्वती प्रसाद ने पन्नों को मुखर बनाया । मैं उनसे निर्मित वह पौधा हूँ, जिसे मेरी अम्मा ने सींचा,काट-छाँट की, कवि पंत ने मुझे नाम दिया – मेरे पिता ने कहा -“बेटी, अपने नाम के अनुरूप बनना” … मैं नहीं जानती कि मैंने इस नाम को कितनी सार्थकता दी, पर मेरा प्रयास, मेरा लक्ष्य इस विरासत को पूर्णता देना है . कविता है कवि की आहट उसके जिंदा रहने की सुगबुगाहट उसके सपने उसके आँसू उसकी उम्मीदें उसके जीने के शाब्दिक मायने …

Blog Link :-  http://lifeteacheseverything.blogspot.in/

I am very grateful to श्रीमती – रश्मि प्रभा जी for sharing inspirational “साहित्य का सहज अर्थ है” article.

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आप कुछ भी कर सकते हैं, स्वयं पर विश्वास करना सीखें।

You can also learn to trust themselves.

-कृष्ण मोहन सिंह ५१

 

जाे आपका आैर आपके समय के वैल्यू काे ना समझे।

उसके लिए कभी भी कार्य (Work) ना कराे॥

~KMSRAJ51

 

 

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How Our Thoughts Shape Our Personality And Actions

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How Our Thoughts Shape Our Personality And Actions 

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With your thoughts and feelings you create and perceive the world that surrounds you. According to what your thoughts are, thus will be your feelings and emotions, your attitude and your actions. This process usually happens rapidly, and you are not usually aware that it is taking place. As this process repeats itself often, it is easy for a set of habits to be created.

The effort lies in slowing down this process in the mind, as if you were watching television in slow motion. On the screen of your consciousness you can use meditation as a method to slow down this process and be aware of what you are feeling and thinking, how you are acting and being aware of the result that you obtain. It is important to learn to transform (change) and to avoid, that is, to not create unnecessary thoughts in order to be more centered and energized, and to have more clarity in order to take the right decisions. 

Positive thoughts heal and strengthen the mind. A healthy mind and thought pattern is the basis of a balanced personality finally.

Let us learn to create thoughts of greater quality. They arise out of a wider vision of spirituality. In this way, thanks to those positive thoughts, full of peace, harmony and creativity, the mind will clean itself, and the memory of our innate qualities will be activated once more, replacing, in a natural way, the old habits and negative tendencies.

Message for the day 06-07-2014

The index of change is to have better relationship with others.

Projection: Change or progress for me is usually success in terms of money, status, or name. But usually this does not give an accurate index of the change that is taking place within me.

Solution: Real change can be measured with the quality of my interaction with others. The more I progress, the more I find my relationship with others getting better. Others will also be happy with my progress and me

In Spiritual Service,
Brahma Kumaris

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“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की  व्यथ॔ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51 

 

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Coming soon book (जल्द ही आ रहा किताब)…..

“तू ना हो निराश कभी मन से”

 

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LIFESTYLE: ZUMBA—WHAT YOU DIDN’T KNOW

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LIFESTYLE: ZUMBA—WHAT YOU DIDN’T KNOW

Looking for an intense workout without feeling like you are actually working out? Zumba, which is a crazy fun combination of Latin dance, hip hop moves, fast-paced music and even Bollywood jhatkas, is perfect in this case. You dance your way into squats, lunges and abs and won’t even realise that each of those muscles are being worked out until after class. This high energy workout gives you the obvious benefits of getting in shape, losing weight, building stamina, increasing endurance and core strengthening but there are so many other wonderful benefits too. Read on to know why Zumba is so much more than just another workout.

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Improved co-ordination
Ladies, if you can move your arms and legs in unison with the music, change the movement every couple of seconds and have fun while not hitting someone –well, how can you not end up improving your co-ordination?

Combatting stage fear
Zumba is sexy, requires a lot of moves that you may not initially be comfortable with and really involves you getting rid of any inhibitions. This group exercise will certainly bring you out of your shell and make you a people person in no time.

Better immunity
Zumba involves rapid movements and is an amazing workout. Since it builds stamina in the process, with regular classes you will see that you are feeling healthier on the inside and falling sick less often.

New friend alert
Zumba classes are a great way to meet people and who knows, maybe you’ll end up meeting yourspecial someone in a Zumba class?

Improved dance skills
The only way to Zumba effectively is to do it to the beat – and keep the beat every time. So when you are out there doing fitness moves to great music, you are also improving your dance skills.

Personality development
With that great body that you get by being regular at Zumba, comes an enormous amount of confidence. You know confidence is very, very sexy, don’t you?

Stress therapy
You know how they say you need to find a hobby to direct all your stress at? Find a happy place where you can work through that tension? Nothing better than a Zumba class for it. We promise you will feel much calmer post a class.

So grab your Zumba shoes today, and get your groove on!

Source: http://www.bebeautiful.in/

 

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100 शब्द  या  10 शब्द – एक सफल जीवन के लिए –

(100 Word “or” Ten Word For A Successful Life )

“तू न हो निराश कभी मन से” किताब => लेखक कृष्ण मोहन सिंह (kmsraj51)

 

“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की  व्यथ॔ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51

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“हमारी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि हम अपने जीवन का कुछ सेकंड, प्रतिघंटा और प्रतिदिन कैसे बिताते हैं”
-KMSRAJ51

-A Message To All-

मत करो हतोत्साहित अपने शब्दों से ……आने वाली नयी पीढ़ी को ,
वो भी करेंगे कुछ ऐसा एक दिन…. जिसे देखेगा ज़माना ….पकड़ती हुई नयी सीढ़ी को ॥

95+ देश के पाठकों द्वारा पढ़ा जाने वाला हिन्दी वेबसाइट है,, –

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मैं अपने सभी प्रिय पाठकों का आभारी हूं…..  

I am grateful to all my dear readers …..

“तू न हो निराश कभी मन से” book

~Change your mind thoughts~

 

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Meditation – Experiencing My Original Home

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Meditation – Experiencing My Original Home (Part 1)

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In meditation, I focus my mind and intellect on that region which is called by names like soul world, paramdham, nirvandham, shantidham and so on. In fact, this is the region where the soul stays, when it has no body. Here the soul stays in the form of a star-like point of light, untouched by matter (five elements including the body). In this world, there exists neither thought, word nor action; just complete stillness, sweet silence and peace. When I first take a physical body, it is from here that I the soul come down into the material world i.e. the earth, which is the field of action.

With the practice of meditation, my third eye (eye of the mind) opens; and I see and experience my original home as an infinite (very large, unmeasurable) world of very subtle (light) golden-red light, situated beyond the physical world of five elements, beyond the sun, moon and stars.


 

Meditation – Experiencing My Original Home (Part 2)

Along with reading over the following words slowly and silently, make a sincere effort to create images of them in the eye of your mind:

I focus myself on the self, the soul, a golden point of light……..
I stay between the eyebrows in the middle of the forehead……..
I radiate golden rays of peace, purity and love in all directions……..
In this awareness of I the soul, with the power of my mind I can travel beyond the limits of my physical organs……..
I visualize myself gradually going out from this physical body……..
I, the sparkling star like energy, fly into the night sky……..
I see myself floating above thousands of buildings and lights……..
Slowly I rise higher and higher to enter space……..
I am surrounded by millions of stars and planets……..
Slowly I see myself flying beyond the world of five elements……..
I, the golden star, enter another world, a soft golden-red light world……..
A world of sweet silence and peace……..
full of peaceful light stretching very very far away……..
I feel pure warmth here, surrounded by light……..
I the point of light shine in this sixth element……..
I am free of all tensions, extremely light………
This is where I belong,
This is my home……..
I recognize this place……..
I had forgotten it, but now I have rediscovered it……..
Spend a few minutes in this positive experience and then gradually come downwards to take your seat back in the physical body.

In Spiritual Service,
Brahma Kumaris

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100 शब्द  या  10 शब्द – एक सफल जीवन के लिए –

 

(100 Word “or” Ten Word For A Successful Life )

 

“तू न हो निराश कभी मन से” किताब => लेखक कृष्ण मोहन सिंह (kmsraj51)

 

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“सफल लोग अपने मस्तिष्क को इस तरह का बना लेते हैं कि उन्हें हर चीज सकारात्मक व खूबसूरत लगती है।”
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“हमारी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि हम अपने जीवन का कुछ सेकंड, प्रतिघंटा और प्रतिदिन कैसे बिताते हैं”
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मत करो हतोत्साहित अपने शब्दों से ……आने वाली नयी पीढ़ी को ,
वो भी करेंगे कुछ ऐसा एक दिन…. जिसे देखेगा ज़माना ….पकड़ती हुई नयी सीढ़ी को ॥

कुछ भी आप के लिए संभव है ॥

जीवन मंदिर सा पावन हाे, बाताें में सुंदर सावन हाे।

स्वाथ॔ ना भटके पास ज़रा भी, हर दिन मानो वृंदावन हाे॥

~kmsraj51

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जीवन वृक्ष की शाखाओं को जाने!!

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Letting Go Of The Branches Of The Life Tree

Colorful Carnations

 

 

 

 

A very common habit that has become deeply embedded inside us is the habit of possessing, to which we succumb repeatedly. We come in contact with different people, material comforts, roles, positions, experiences, achievements and of course our own physical body etc. on an external level and our own thoughts, viewpoints, beliefs, memories, etc. on an internal level etc. throughout our life. All of these are like branches that make up our life tree. Possession is like clinging on to one or the other of these different branches from time to time, as we fly from one branch to another, while covering our life journey. The spiritual point of view on this habit is clear and very straight forward. It is not possible to possess anything. If we do try to do so, we lose our freedom. To experience the freedom, we need to dare to let go of the branches, which does not mean to lose or leave them because the branches are always going to be there. We can return to any of them to rest or pause whenever we want. But, it is about being aware and alert, because the moment a pause on a branch turns into a stop, the stop turns into a brake and, after that, the brake turns into a blockage. As a result, like the bird whose flying agility degrades on a physical level if it does the same; our intellectual and emotional agility starts to degrade.

When we learn to let go of one branch at a time, we are always welcoming new positive and empowering experiences in our life, one at a time. Like the birds, by letting go of one branch, we are then able to spend the rest of your lives trying and discovering many other branches, one branch at a time, and so we can enjoy the view from each new vantage point.We can choose between a life of flying and soaring or be stuck on one or the other branch, seeing others as they fly past and enjoy a life of freedom where they do visit their life tree from time to time and their life does revolve around the tree but they don’t try and possess it or any of its branches.

 

Message for the day 18-05-2014

To recognize the uniqueness of one’s own role is to be free from negativity. Expression: When we find things going wrong with us, we sometimes wish for a change in our role. We begin to compare ourselves with others or wish for something better in our life, which makes us lose all our enthusiasm. We, then, make no effort to better our role.

Experience: We need to recognize the importance of our own role. Like an actor who doesn’t make effort to change his role but brings perfection to his own role, we, too, need to concentrate on our own role. The recognition of the importance of our own role and the desire to bring excellence to it makes us free from negativity.

In Spiritual Service,
Brahma Kumaris

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100 शब्द  या  10 शब्द – एक सफल जीवन के लिए –

 

(100 Word “or” Ten Word For A Successful Life )

 

“तू न हो निराश कभी मन से” किताब => लेखक कृष्ण मोहन सिंह (kmsraj51)

 

“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की  व्यथ॔ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51

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“सफल लोग अपने मस्तिष्क को इस तरह का बना लेते हैं कि उन्हें हर चीज सकारात्मक व खूबसूरत लगती है।”
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“हमारी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि हम अपने जीवन का कुछ सेकंड, प्रतिघंटा और प्रतिदिन कैसे बिताते हैं”
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मत करो हतोत्साहित अपने शब्दों से ……आने वाली नयी पीढ़ी को ,
वो भी करेंगे कुछ ऐसा एक दिन…. जिसे देखेगा ज़माना ….पकड़ती हुई नयी सीढ़ी को ॥

कुछ भी आप के लिए संभव है ॥

जीवन मंदिर सा पावन हाे, बाताें में सुंदर सावन हाे।

स्वाथ॔ ना भटके पास ज़रा भी, हर दिन मानो वृंदावन हाे॥

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एक सफल जीवन के लिए-आत्मा का दैनिक भोजन-08-May-2014

kmsraj51 की कलम से…..

Soulword_kmsraj51 - Change Y M TFor a successful life the daily food of the soul-08-May-2014

English Murli

Essence: Sweet children, the Father has come to change thorns into flowers. The biggest thorn is body consciousness. It is through this that all other vices come. Therefore, become soul conscious.

Question: Due to not understanding which of the Father’s tasks have devotees considered Him to be omnipresent?
Answer: The Father is the One with many forms and, wherever there is a need, He enters any child in a second and benefits the soul in front of that one. He grants visions to devotees. He is not omnipresent but is a very fast rocket. It doesn’t take the Father long to come and go. Due to not understanding this, devotees say that He is omnipresent.

Essence for dharna:
1. In order to become worthy and sensible, become pure. Do service with the Father in order to change the whole world from hell into heaven. Become a helper of God.
2. Renounce the systems of the iron-aged world, the opinion of society and the code of conduct of the family and observe the true code of conduct. Become full of divine virtues and establish the deity community.

Blessing: May you be truthful and, with the foundation of truth, give the experience of divinity through your face and your activity.
In the world, many souls are called truthful or consider themselves to be truthful, but complete truthfulness is based on purity. Where there is no purity, there cannot be truth. The foundation of truth is purity and the practical proof of truth is the divinity on your face and in your activity. On the basis of purity, there is naturally and easily the form of truth. When both the soul and body become pure, you would then be said to be truthful, that is, you would be a deity who is filled with divinity.

Slogan: Remain busy in unlimited service and there will automatically be unlimited disinterest.


 

Hindi Murli-हिन्दी मुरली

मुरली सार:- “मीठे बच्चे – बाप आये हैं कांटों को फूल बनाने, सबसे बड़ा कांटा है देह-अभिमान, इससे ही सब विकार आते हैं, इसलिए देहीअभिमानी बनो”

प्रश्न:- भक्तों ने बाप के किस कर्त्तव्य को न समझने के कारण सर्वव्यापी कह दिया है?
उत्तर:- बाप बहुरूपी है, जहाँ आवश्यकता होती सेकण्ड में किसी भी बच्चे में प्रवेश कर सामने वाली आत्मा का कल्याण कर देते हैं। भक्तों को साक्षात्कार करा देते हैं। वह सर्वव्यापी नहीं लेकिन बहुत तीखा राकेट है। बाप को आने-जाने में देरी नहीं लगती। इस बात को न समझने के कारण भक्त लोग सर्वव्यापी कह देते हैं।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) लायक और समझदार बनने के लिए पवित्र बनना है। सारी दुनिया को हेल से हेविन बनाने के लिए बाप के साथ सर्विस करनी है। खुदाई खिदमतगार बनना है।
2) कलियुगी दुनिया की रस्म-रिवाज, लोक-लाज, कुल की मर्यादा छोड़ सत्य मर्यादाओं का पालन करना है। दैवीगुण सम्पन्न बन दैवी सम्प्रदाय की स्थापना करनी है।

वरदान:- सत्यता के फाउण्डेशन द्वारा चलन और चेहरे से दिव्यता की अनुभूति कराने वाले सत्यवादी भव
दुनिया में अनेक आत्मायें अपने को सत्यवादी कहती वा समझती हैं लेकिन सम्पूर्ण सत्यता पवित्रता के आधार पर होती है। पवित्रता नहीं तो सदा सत्यता नहीं रह सकती। सत्यता का फाउण्डेशन पवित्रता है और सत्यता का प्रैक्टिकल प्रमाण चेहरे और चलन में दिव्यता होगी। पवित्रता के आधार पर सत्यता का स्वरूप स्वत: और सहज होता है। जब आत्मा और शरीर दोनों पावन होंगे तब कहेंगे सम्पूर्ण सत्यवादी अर्थात् दिव्यता सम्पन्न देवता।

स्लोगन:- बेहद की सेवा में बिजी रहो तो बेहद का वैराग्य स्वत: आयेगा।


 

Hinglish Murli

Murli Saar : – Meethe Bacche – Baap Aaye Hai Kaanton Ko Phul Banane, Sabse Bada Kaanta Hai Deh – Abhiman, Isse Hi Sab Vikaar Aate Hai, Isliye Dehi – Ahimani Banno”

Prashna : – Bhakto Ne Baap Ke Kis Kartavya Ko Na Samajhne Ke Karan Sarvavyapi Kah Dia Hai ?

Uttar : – Baap Bahurupi Hai, Jaha Aavasyak Hoti Second Mei Kisi Bhi Bacche Mei Pravesh Kar Samne Vaali Atma Ka Kalyan Kar Dete Hai. Bhakto Ko Sakshatkar Kara Dete Hai. Vah Sarvavyapi Nahi Lekin Bahut Teekha Rocket Hai. Baap Ko Aane – Jane Mei Dairi Nahi Lagti. Is Baat Ko Na Samajhne Ke Karan Bhakt Log Sarvavyapi Kah Dete Hai.

Dharan Ke Liye Mukhya Saar : –

1 ) Layak Aur Samajdar Banne Ke Liye Pavitra Bannna Hai. Saari Dunia Ko Hell Se Heaven Banane Ke Liye Baap Ke Saath Service Karni Hai. Khudayi Khidmadgar Bannna Hai.

2 ) Kaliyugi Dunia Ki Rasm – Rivaz, Lok – Laaz, Kul Ki Maryada Chod Satya Maryadaon Ka Palan Karna Hai. Daivigun Sampann Ban Daivi Sampradaye Ki Stapna Karni Hai.

Vardan : – Satyata Ke Foundation Dwara Chalan Aur Chehre Se Divyata Ki Anubhuti Karane Wale Satyavadi Bhav

Dunia Mei Anek Atmae Apne Ko Satyavadi Kehti Va Samajti Hai Lekin Sampurn Satyata Pavitrata Ke Aadhar Par Hoti Hai. Pavitrata Nahi Toh Sada Satyata Nahi Rah Sakti. Satyata Ka Foundation Pavitrata Hai Aur Satyata Ka Practical Praman Chehre Aur Chalan Mei Divyata Hogi. Pavitrata Ke Aadhar Par Satyata Ka Swarup Swatah : Aur Sahaj Hota Hai. Jab Atma Aur Sharir Dono Paavan Honge Tab Kahenge Sampurn Satyavadi Arthat Divyata Sampann Devta.

Slogan : – Behad Ki Seva Mei Busy Raho Toh Behad Ka Vairagya Swatah : Aayega.

 

आध्यात्मिक सेवा में, 
ब्रह्माकुमारी

brahmakumaris-kmsraj51

Note::-

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love-rose-kmsraj51Picture Quotes By- “तू न हो निराश कभी मन से” किताब से

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100 शब्द  या  10 शब्द – एक सफल जीवन के लिए –

(100 Word “or” Ten Word For A Successful Life )

“तू न हो निराश कभी मन से” किताब => लेखक कृष्ण मोहन सिंह (kmsraj51)

“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की  व्यथ॔ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51

Soulword_kmsraj51 - Change Y M T

“सफल लोग अपने मस्तिष्क को इस तरह का बना लेते हैं कि उन्हें हर चीज सकारात्मक व खूबसूरत लगती है।”
-KMSRAJ51

“हमारी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि हम अपने जीवन का कुछ सेकंड, प्रतिघंटा और प्रतिदिन कैसे बिताते हैं”
-KMSRAJ51

-A Message To All-

मत करो हतोत्साहित अपने शब्दों से ……आने वाली नयी पीढ़ी को ,
वो भी करेंगे कुछ ऐसा एक दिन…. जिसे देखेगा ज़माना ….पकड़ती हुई नयी सीढ़ी को ॥

कुछ भी आप के लिए संभव है ॥

जीवन मंदिर सा पावन हाे, बाताें में सुंदर सावन हाे।

स्वाथ॔ ना भटके पास ज़रा भी, हर दिन मानो वृंदावन हाे॥

~kmsraj51

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एक सफल जीवन के लिए-आत्मा का दैनिक भोजन-07-May-2014

kmsraj51 की कलम से…..

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English Murli

Essence: Sweet children, the Father is the saccharine of love of all relationships. Remember the one sweet Beloved and your intellect will move away from all other directions.

Question: What is the easy effort you make and way to become karmateet?
Answer: Make effort for your vision of brotherhood to become firm. Forget everything except the one Father from your intellect. When you don’t remember any bodily relationships, you can become karmateet. The destination of your effort is to consider yourselves to be souls, brothers. By considering yourselves to be brothers, body-conscious vision and all vicious thoughts will end.

Essence for dharna:
1. In order to attain a first-class beautiful body in the golden age, make the soul pure now. Remove the rust. Do not follow artificial fashion.
2. In order to become ever pure, practise not remembering anyone except the one Father. You should even forget that body of yours. Make the vision of brotherhood firm and natural.

Blessing: May you become filled with all treasures and a bestower who bestows by being aware of your form of one who has a right to the kingdom and then worthy of worship.

Constantly maintain the awareness: I am a worthy-of-worship soul and a bestower who gives to others; not one who takes (levta), but one who gives (a deity – devta). Just as the Father gave to all of you by Himself, in the same way, become a master bestower and continue to give, do not ask for anything. Maintain the awareness of your form of one with a right to the kingdom and one who is worthy of worship. Until today, people have been going to your non-living images and have continued to ask for something and to be saved. So, you are the ones who save others, not those who cry out to be saved. However, in order to become a bestower, become filled with all treasures through remembrance, service, good wishes and pure feelings.

Slogan: Happiness on your face and in your activity is the sign of a spiritual personality.


 

Hindi Murli

मुरली सार:- “मीठे बच्चे – बाप है सर्व सम्बन्धों के प्यार की सैक्रीन, एक मीठे माशुक को याद करो तो बुद्धि सब तरफ से हट जायेगी”

प्रश्न:- कर्मातीत बनने का सहज पुरूषार्थ वा युक्ति कौन-सी है?
उत्तर:- भाई-भाई की दृष्टि को पक्का करने का पुरूषार्थ करो। बुद्धि से एक बाप के सिवाए और सब कुछ भूल जाये। कोई भी देहधारी सम्बन्ध याद न आये तब कर्मातीत बनेंगे। अपने को आत्मा भाई-भाई समझना – यही पुरूषार्थ की मंज़िल है। भाई-भाई सम¬झने से देह की दृष्टि, विकारी ख्यालात ख़त्म हो जायेंगे।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) सत¬युग में फर्स्ट¬क्लास सुन्दर शरीर प्राप्त करने के लिए अभी आत्मा को पावन बनाना है, कट उतार देनी है। आर्टीफि¬शल फैशन नहीं करना है।
2) एवर पवित्र बनने के लिए प्रैक्टिस करनी है कि एक बाप के सिवाए कुछ भी याद न आये। यह देह भी भूली हुई हो। भाई-भाई की दृष्टि नैचु¬रल पक्की हो।

वरदान:- अपने राज्य अधिकारी वा पूज्य स्वरूप की स्मृति से दाता बन देने वाले सर्व खजानों से सम्पन्न भव
सदा इसी स्मृति में रहो कि मैं पूज्य आत्मा औरों को देने वाली दाता हूँ, लेवता नहीं, देवता हूँ। जैसे बाप ने आप सबको आपेही दिया है ऐसे आप भी मास्टर दाता बन देते चलो, मांगो नहीं। अपने राज्य अधि¬कारी वा पूज्य स्वरूप की स्मृति में रहो। आज तक आपके जड़ चित्रों से जाकर मांगनी करते हैं, कहते हैं हमको बचाओ। तो आप बचाने वाले हो, बचाओ-बचाओ कहने वाले नहीं। परन्तु दाता बनने के लिए याद से, सेवा से, शुभ भावना, शुभ कामना से सर्व खजानों में सम्पन्न बनो।

स्लोगन:- चलन और चेहरे की प्रस¬न्नता ही रूहानी पर्स¬नै¬लिटी की निशानी है।


Hinglish Murli

Murli Saar : – Meethe Bacche – Baap Hai Sarva Sambandho Ke Pyaar Ki Sakrine, Ek Mithe Mashuk Ko Yaad Karo Toh Buddhi Sab Taraf Se Hat Jayegi”

Prashna : – Karmatit Banne Ka Sahaj Pursharth Va Yukti Kaun – Si Hai ?

Uttar : – Bhai – Bhai Ki Dhrishti Ko Pakka Karne Ka Pursharth Karo. Buddhi Se Ek Baap Ke Sivay Aur Sab Kuch Bhul Jaye. Koi Bhi Deh Dhari Sambandh Yaad Na Aaye Tab Karmatit Banenge. Apne Ko Atma Bhai – Bhai Samjhna – Yahi Pursharth Ki Manzil Hai. Bhai – Bhai Samajhne Se Deh Ki Dhrishti, Vikari Khayalat Khtsm Ho Jayenge.

Dharan Ke Liye Mukhya Saar : –

1 ) Satyug Mei Firstclass Sundar Sharir Prapt Karne Ke Liye Abhi Atma Ko Paavan Banana Hai, Kat Utaar Deni Hai. Artificial Faishan Nahi Karna Hai.

2 ) Ever Pavitra Banne Ke Liye Practise Karni Hai Ki Ek Baap Ke Sivay Kuch Bhi Yaad Na Aaye. Yah Deh Bhi Bhuli Hui Ho. Bhai – Bhai Ki Dhrishti Natural Pakki Ho.

Vardan : – Apne Rajya Adhikari Va Pujya Swarup Ki Smruti Se Data Ban Dene Wale Sarva Khazano Se Sampann Bhav

Sada Issi Smruti Mei Raho Ki Mei Pujya Atma Aoro Ko Dene Vaali Data Hu, Levta Nahi, Devta Hu. Jaise Baap Ne Aap Sabko Aapehi Dia Hai Aise Aap Bhi Master Data Ban Dete Chalo, Mango Nahi. Apne Rajya Adhikari Va Pujya Swarup Ki Smruti Mei Raho. Aaj Tak Aapke Jad Chitro Se Jaakar Maagni Karte Hai, Kahte Hai Humko Bachao. Toh Aap Bachane Wale Ho, Bachao – Bachao Kahne Wale Nahi. Parantu Data Banne Ke Liye Yaad Se, Seva Se, Shubh Bhaavna, Shubh Kamna Se Sarva Khazano Mei Sampann Banno.

Slogan : – Chalan Aur Chehre Ki Prasanata Hi Ruhani Personality Ki Nishani Hai.

आध्यात्मिक सेवा में, 
ब्रह्माकुमारी

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100 शब्द  या  10 शब्द – एक सफल जीवन के लिए –

(100 Word “or” Ten Word For A Successful Life )

“तू न हो निराश कभी मन से” किताब => लेखक कृष्ण मोहन सिंह (kmsraj51)

“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की  व्यथ॔ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51 

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“सफल लोग अपने मस्तिष्क को इस तरह का बना लेते हैं कि उन्हें हर चीज सकारात्मक व खूबसूरत लगती है।”
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“हमारी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि हम अपने जीवन का कुछ सेकंड, प्रतिघंटा और प्रतिदिन कैसे बिताते हैं”
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मत करो हतोत्साहित अपने शब्दों से ……आने वाली नयी पीढ़ी को ,
वो भी करेंगे कुछ ऐसा एक दिन…. जिसे देखेगा ज़माना ….पकड़ती हुई नयी सीढ़ी को ॥

कुछ भी आप के लिए संभव है ॥

जीवन मंदिर सा पावन हाे, बाताें में सुंदर सावन हाे।

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