सन् 1600 बनाम सन् 2014 – 40।

kmsraj51 की कलम से …..

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सन् 1600 बनाम सन् 2014-40 ….. 

वर्तमान दौर चाहे वह राजनीति का हो या आर्थिक या फिर इस देश के चिर-संस्कारों से निर्मित नैतिक मूल्यों का ये सभी एक बहुत ही भयावह दौर से गुजर रहे हैं शायद कुछ लोग जो विद्वता के धनी है इसे संक्रमण काल के नाम से भी जानते हैं तो कुछ लोग इसे विभिन्न क्षेत्रों में प्रयोगवाद कह रहे हैं लेकिन यह समय मात्र और मात्र एक सच्चे भारतीय जो इसकी अखंडता एवं गौरवमयी इतिहास से थोड़ा भी सरोकार रखता है, के लिए बहुत ही विषम एवं चिंताजनक है स्पष्ट रुप में कहें तो बहुत ही भयावह है।


इतिहास गवाह है कि इस देश की मिट्टी इतनी उपजाऊ है कि इसने एक से एक संस्कारी महापुरुष तथा देशभक्त पैदा किए हैं लेकिन यह इस मिट्टी का दुर्भाग्य है कि विनाशकारी खरपतवार के रुप में यहां जयचंदों ने भी जन्म लिया है तथा इस पावन धरा को कलंकित किया है। आज का भारत भी इसी दौर से गुजर रहा है जहां ख्ररपतवार इतना बढ़ गया है कि अब पोषक फसलें नज़र ही नहीं आती और यह स्थिती केवल राजनीति ही नहीं कमोबेश हर क्षेत्र की हैं। इसका मात्र और एक मात्र कारण हमारे चिर-संस्कारों एवं मूल्यों का ह्रास होना है। मूल्यों एवं आदर्शों का प्रवाह सदैव शीर्ष से होता है और कहा भी है कि यथा राजा-तथा प्रजा लेकिन आज अपने क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति के लिए हमारे देश के कर्णधार नेतृत्व कर्ताओं ने इस उक्ति को ही बदल दिया और बयान दिया कि जैसी जनता है वैसे ही नेतृत्व कर्ता बनेंगे अर्थात ये लोग जनता के इच्छानुसार ही अपने हित साधन के लिए सारे अपराध एवं भ्रष्ट तंत्र को बढ़ावा दे रहे हैं। आखिर वो कौन सी प्रजा या जनता है जिसने राजा को भ्रष्ट एवं डकैत बनने के लिए जनादेश दिया? शायद इसका उत्तर यह है कि इस देश में जनता या नागरिक नाम की कोई व्यवस्था अब अस्तित्व में ही नहीं है यहां केवल उपभोक्तावादी संस्कृति के पोषक मतदाता रहते हैं जिन्हें कोई भी खरीद सकता है तथा ये तथाकथित मतदाता भोली चिड़ियाओं की भांति किसी भी बहेलिए के जाल में फंसने को आतुर है। फिर चाहे वह बहेलिए देशी हो या विदेशी इससे इनको कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि लालच ने संवेदनाओं को मृत प्राय: कर दिया है। इन चिड़ियाओं को स्वतंत्र आसमान से बेहतर सुख-सुविधा युक्त वो स्वप्निल सोने का पिंजड़ा अधिक रास आने लगा है जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं और जो मात्र और मात्र एक छलावा भर है।

आज इस देश की जनता को देश के प्रोफाईल से अधिक अपना हाई प्रोफाईल प्रिय है कमोबेश आज हमारा देश गुलामी से पहले के उसी दौर से गुजर रहा हैं। जनता विभिन्न मुद्दों पर आपस में बंटी हुई है चाहे वो आरक्षण का मुद्दा हो या राज्यवाद या फिर धर्म या जातिवाद का चारों और विघटनकारी शक्तियों का बोलबाला हैं हर आदमी ने अपने चारों और अपने स्वार्थों का एक घेरा बना रखा है तथा इस घेरे या उसके क्षुद्र स्वार्थों को नुकसान पहुंचाने वाला हर आदमी उसका शत्रु है। इस देश में अपनी जातिगत गौरव गाथा गाने वाले इतने जातिगत व धार्मिक सामाजिक संगठन है जिनको शायद गिनना भी संभव नहीं होगा लेकिन दुर्भाग्य है कि वे महापुरुष जो राष्ट्र के लिए एक होकर लड़े उनको भी इन कम्बख्तों ने अपने स्वार्थ के अनुरुप बांट दिया । आज कहीं भी अखिल भारतीय समाज नाम की कोई संस्था नही है क्योंकि सभी ने अपने आपको कई सांचों में बांट लिया है तथा सभी के अपने अपने हित हैं जिनके लिए वे लड़ रहे है उनकी तरफ से देश भले गर्त में जाए कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन उन्हें यह पता नही कि जब तक यह देश अखंड एवं सुरक्षित है तभी तक उनका या उनके समाज का अस्तित्व है: आज की युवा पीढ़ी को एक अदद नौकरी और सुख सुविधा युक्त घर से अधिक सोचने की जरूरत महसूस नहीं होती देश के विषय में या अपनी सभ्यता संस्कृति के बारे में मनन करने का कोई औचित्य नहीं हैं अपने घर की बनी रोटी भी यदि विदेशी पेकिंग में दी जाती है तो खुशी होती है। आज कमोबेश हर दूसरा आदमी मानसिक गुलामी के दौर से गुजर रहा है राष्ट्र छद्म अराजकता के वातावरण से गुजर रहा है। क्या यही स्वतंत्रता है? विकास के नाम पर अपने स्वाभिमान, राष्ट्रीय संस्कृति को भूलाना तथा भौतिकता के चकाचौंध में प्राकृतिक संसाधनों का बंदरबांट कर देश को रसातल की और ले जाना, क्या आजादी का यही मतलब है?

आज के दौर की तुलना भारत के राजपूतकालीन समय से की जा सकती है जब भारत कई छोटी- छोटी रियासतों में बंटा हुआ था तथा ये रियासतें छुद्र स्वार्थों की पूर्ती हेतु आपस में लड़ती रहती थीं। विलासिता एवं अकर्मण्यता की पर्याय बन चुकी ये रियासतें अंदर से जर्जर हो चुकी थी।परिणामस्वरूप ये रियासतें कमजोर होती गईं विदेशी आक्रांताओं ने अपनी हवस एवं बेलगाम क्षुधा की पूर्ति हेतु इसा पावन धरा को कलुषित किया ताकत का एक बड़ा भाग भारतीय समाज कई बुराईयों जैसे छुआछुत, उच्श्रंखल जातिवाद , संप्रदायवाद इत्यादि में जकड़ा हुआ था तो क्या आज कमोबेश हमारे सामने वही परिदृश्य नहीं दिखाई दे रहा है। किसी ने क्या खूब कहा है कि इतिहास अपनी पुनरावृत्ति करता है पर क्या इतने कम अंतराल पर और क्या हम इससे सीख लेने के बजाय इसकी पुनरावृति होने देंगें। आज ये छोटे-छोटे राज्य जो कि नदी के पानी, भाषा, खनिजों के आधिपत्य के लिए न्यायालय में हाजिरी दे रहे हैं और सैकड़ों पार्टियां जो क्षुद्र स्वार्थों के लिए जनता को सब्ज बाग दिखा कर उनका वोटा हासिल कर रही हैं तत्पश्चात उसी जनता का शोषण तो क्या ये आजादी और उससे भी पूर्व अंग्रेजों के आगमन के समय का परिदृश्य प्रस्तुत नहीं कर रही है तथा जनता लाचार कई मतभेदों में उलझी हुई निरिह बनी सब कुछ सहने को विवश है।अगर इसी का नाम आजादी है तो वह दिन दूर नहीं जब इस देश के गद्दार इस देश की अमूल संपदा के साथ-साथ यहां के कथित मतदाताओं के भविष्य का भी किसी विदेशी के हाथों सौदा कर दें तथा बाद में कहें कि जीडीपी बढ़ाने के लिए यह जरूरी था।
जिस देश के पड़ोसी ताकतवर, कूटनीतिक एवं साम्राज्यवादी हों उस देश का राजनैतिक व नैतिक पतन की ओर अग्रसर होना उसके दुश्मनों के मार्ग को और सुगम बना देता है तथा वह देश बिना किसी युद्ध के ही गुलाम बनाया जा सकता है क्योंकि किसी देश का नेतृत्व ही उस देश की समृद्धि और ताकत का आईना होता है जिसमें उस देश की बाकी आवाम की झलक देखी जा सकती है।

संजय मिश्र “सदांश”

नोट: यह रचना किसी विशेष वर्ग, समुदाय या व्यक्ति विशेष पर आधारित नहीं है, न ही हमारा उद्देश्य किसी के दिल को ठेस पहुंचाना है । यह लेख पूर्ण रुप से मां भारती को समर्पित है। यदि कोई तथ्य किसी से मिलता है तो यह संयोग मात्र होगा।


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** संजय मिश्रा **

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

http://wp.me/p3gkW6-1dk

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

http://wp.me/p3gkW6-mn

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

http://wp.me/p3gkW6-1dD

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

http://wp.me/p3gkW6-Ig

* चांदी की छड़ी।

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वर्तमान दौर चाहे वह राजनीति का हो या आर्थिक या फिर इस देश के चिर-संस्कारों से निर्मित नैतिक मूल्यों का ये सभी एक बहुत ही भयावह दौर से गुजर रहे हैं शायद कुछ लोग जो विद्वता के धनी है इसे संक्रमण काल के नाम से भी जानते हैं तो कुछ लोग इसे विभिन्न क्षेत्रों में प्रयोगवाद कह रहे हैं लेकिन यह समय मात्र और मात्र एक सच्चे भारतीय जो इसकी अखंडता एवं गौरवमयी इतिहास से थोड़ा भी सरोकार रखता है, के लिए बहुत ही विषम एवं चिंताजनक है स्पष्ट रुप में कहें तो बहुत ही भयावह है।
इतिहास गवाह है कि इस देश की मिट्टी इतनी उपजाऊ है कि इसने एक से एक संस्कारी महापुरुष तथा देशभक्त पैदा किए हैं लेकिन यह इस मिट्टी का दुर्भाग्य है कि विनाशकारी खरपतवार के रुप में यहां जयचंदों ने भी जन्म लिया है तथा इस पावन धरा को कलंकित किया है। आज का भारत भी इसी दौर से गुजर रहा है जहां ख्ररपतवार इतना बढ़ गया है कि अब पोषक फसलें नज़र ही नहीं आती और यह स्थिती केवल राजनीति ही नहीं कमोबेश हर क्षेत्र की हैं। इसका मात्र और एक मात्र कारण हमारे चिर-संस्कारों एवं मूल्यों का ह्रास होना है। मूल्यों एवं आदर्शों का प्रवाह सदैव शीर्ष से होता है और कहा भी है कि यथा राजा-तथा प्रजा लेकिन आज अपने क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति के लिए हमारे देश के कर्णधार नेतृत्व कर्ताओं ने इस उक्ति को ही बदल दिया और बयान दिया कि जैसी जनता है वैसे ही नेतृत्व कर्ता बनेंगे अर्थात ये लोग जनता के इच्छानुसार ही अपने हित साधन के लिए सारे अपराध एवं भ्रष्ट तंत्र को बढ़ावा दे रहे हैं। आखिर वो कौन सी प्रजा या जनता है जिसने राजा को भ्रष्ट एवं डकैत बनने के लिए जनादेश दिया? शायद इसका उत्तर यह है कि इस देश में जनता या नागरिक नाम की कोई व्यवस्था अब अस्तित्व में ही नहीं है यहां केवल उपभोक्तावादी संस्कृति के पोषक मतदाता रहते हैं जिन्हें कोई भी खरीद सकता है तथा ये तथाकथित मतदाता भोली चिड़ियाओं की भांति किसी भी बहेलिए के जाल में फंसने को आतुर है। फिर चाहे वह बहेलिए देशी हो या विदेशी इससे इनको कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि लालच ने संवेदनाओं को मृत प्राय: कर दिया है। इन चिड़ियाओं को स्वतंत्र आसमान से बेहतर सुख-सुविधा युक्त वो स्वप्निल सोने का पिंजड़ा अधिक रास आने लगा है जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं और जो मात्र और मात्र एक छलावा भर है।

आज इस देश की जनता को देश के प्रोफाईल से अधिक अपना हाई प्रोफाईल प्रिय है कमोबेश आज हमारा देश गुलामी से पहले के उसी दौर से गुजर रहा हैं। जनता विभिन्न मुद्दों पर आपस में बंटी हुई है चाहे वो आरक्षण का मुद्दा हो या राज्यवाद या फिर धर्म या जातिवाद का चारों और विघटनकारी शक्तियों का बोलबाला हैं हर आदमी ने अपने चारों और अपने स्वार्थों का एक घेरा बना रखा है तथा इस घेरे या उसके क्षुद्र स्वार्थों को नुकसान पहुंचाने वाला हर आदमी उसका शत्रु है। इस देश में अपनी जातिगत गौरव गाथा गाने वाले इतने जातिगत व धार्मिक सामाजिक संगठन है जिनको शायद गिनना भी संभव नहीं होगा लेकिन दुर्भाग्य है कि वे महापुरुष जो राष्ट्र के लिए एक होकर लड़े उनको भी इन कम्बख्तों ने अपने स्वार्थ के अनुरुप बांट दिया । आज कहीं भी अखिल भारतीय समाज नाम की कोई संस्था नही है क्योंकि सभी ने अपने आपको कई सांचों में बांट लिया है तथा सभी के अपने अपने हित हैं जिनके लिए वे लड़ रहे है उनकी तरफ से देश भले गर्त में जाए कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन उन्हें यह पता नही कि जब तक यह देश अखंड एवं सुरक्षित है तभी तक उनका या उनके समाज का अस्तित्व है: आज की युवा पीढ़ी को एक अदद नौकरी और सुख सुविधा युक्त घर से अधिक सोचने की जरूरत महसूस नहीं होती देश के विषय में या अपनी सभ्यता संस्कृति के बारे में मनन करने का कोई औचित्य नहीं हैं अपने घर की बनी रोटी भी यदि विदेशी पेकिंग में दी जाती है तो खुशी होती है। आज कमोबेश हर दूसरा आदमी मानसिक गुलामी के दौर से गुजर रहा है राष्ट्र छद्म अराजकता के वातावरण से गुजर रहा है। क्या यही स्वतंत्रता है? विकास के नाम पर अपने स्वाभिमान, राष्ट्रीय संस्कृति को भूलाना तथा भौतिकता के चकाचौंध में प्राकृतिक संसाधनों का बंदरबांट कर देश को रसातल की और ले जाना, क्या आजादी का यही मतलब है?

आज के दौर की तुलना भारत के राजपूतकालीन समय से की जा सकती है जब भारत कई छोटी- छोटी रियासतों में बंटा हुआ था तथा ये रियासतें छुद्र स्वार्थों की पूर्ती हेतु आपस में लड़ती रहती थीं। विलासिता एवं अकर्मण्यता की पर्याय बन चुकी ये रियासतें अंदर से जर्जर हो चुकी थी।परिणामस्वरूप ये रियासतें कमजोर होती गईं विदेशी आक्रांताओं ने अपनी हवस एवं बेलगाम क्षुधा की पूर्ति हेतु इसा पावन धरा को कलुषित किया ताकत का एक बड़ा भाग भारतीय समाज कई बुराईयों जैसे छुआछुत, उच्श्रंखल जातिवाद , संप्रदायवाद इत्यादि में जकड़ा हुआ था तो क्या आज कमोबेश हमारे सामने वही परिदृश्य नहीं दिखाई दे रहा है। किसी ने क्या खूब कहा है कि इतिहास अपनी पुनरावृत्ति करता है पर क्या इतने कम अंतराल पर और क्या हम इससे सीख लेने के बजाय इसकी पुनरावृति होने देंगें। आज ये छोटे-छोटे राज्य जो कि नदी के पानी, भाषा, खनिजों के आधिपत्य के लिए न्यायालय में हाजिरी दे रहे हैं और सैकड़ों पार्टियां जो क्षुद्र स्वार्थों के लिए जनता को सब्ज बाग दिखा कर उनका वोटा हासिल कर रही हैं तत्पश्चात उसी जनता का शोषण तो क्या ये आजादी और उससे भी पूर्व अंग्रेजों के आगमन के समय का परिदृश्य प्रस्तुत नहीं कर रही है तथा जनता लाचार कई मतभेदों में उलझी हुई निरिह बनी सब कुछ सहने को विवश है।अगर इसी का नाम आजादी है तो वह दिन दूर नहीं जब इस देश के गद्दार इस देश की अमूल संपदा के साथ-साथ यहां के कथित मतदाताओं के भविष्य का भी किसी विदेशी के हाथों सौदा कर दें तथा बाद में कहें कि जीडीपी बढ़ाने के लिए यह जरूरी था।
जिस देश के पड़ोसी ताकतवर, कूटनीतिक एवं साम्राज्यवादी हों उस देश का राजनैतिक व नैतिक पतन की ओर अग्रसर होना उसके दुश्मनों के मार्ग को और सुगम बना देता है तथा वह देश बिना किसी युद्ध के ही गुलाम बनाया जा सकता है क्योंकि किसी देश का नेतृत्व ही उस देश की समृद्धि और ताकत का आईना होता है जिसमें उस देश की बाकी आवाम की झलक देखी जा सकती है।

संजय मिश्र “सदांश”

नोट: यह रचना किसी विशेष वर्ग, समुदाय या व्यक्ति विशेष पर आधारित नहीं है, न ही हमारा उद्देश्य किसी के दिल को ठेस पहुंचाना है । यह लेख पूर्ण रुप से मां भारती को समर्पित है। यदि कोई तथ्य किसी से मिलता है तो यह संयोग मात्र होगा।

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पर ** दिल से धन्यवाद संजय भाई !! **
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** संजय मिश्रा **

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Soul Sustenance ‘or’ Soul Voice !!


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Experiencing Positive Thoughts

Positive thoughts emerge from your values and may be experienced as:

Confidence
Contentment
Cooperation
Enthusiasm
Generosity
Happiness
Harmony
Honesty
Hope
Love
Mercy
Peace
Respect
Solidarity
Tolerance
Trust

Let’s look at some examples of positive thoughts (with respect to the above values):

Happiness: Happiness raises the spirit of whoever possesses it, and brings out a smile in others.
Love: Be as enthusiastic with the success of others as you are with your own.
Honesty: If I am honest in all my actions, I will never be afraid.
Respect: The only way of receiving respect is to give it first.
Mercy: Do not lose hope in those that have lost hope.

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Message for the day 08-03-2014
—————————————–

To make big things small is to remain in peace.

Expression: Many times life brings situations, which are difficult and seem impossible to work on. But there should be the ability to transform something as big as a mountain into something as small as a grain of sand. To do this means to look for solutions instead of looking at problems. It also means to make effort to find the right answers for the problems.

Experience: When I have the ability to look at things lightly, I will be able to make even big things as small. This gives me the courage to deal with situations with ease. Then I am able to remain in peace. Such a state of mind is naturally able to bring out the best solutions under all circumstances.

In Spiritual Service,
Brahma Kumaris

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सन् 1600 बनाम सन् 2014 – 40 ~ Year 1600 vs. Year 2014 – 40 !!

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वर्तमान दौर चाहे वह राजनीति का हो या आर्थिक या फिर इस देश के चिर-संस्कारों से निर्मित नैतिक मूल्यों का ये सभी एक बहुत ही भयावह दौर से गुजर रहे हैं शायद कुछ लोग जो विद्वता के धनी है इसे संक्रमण काल के नाम से भी जानते हैं तो कुछ लोग इसे विभिन्न क्षेत्रों में प्रयोगवाद कह रहे हैं लेकिन यह समय मात्र और मात्र एक सच्चे भारतीय जो इसकी अखंडता एवं गौरवमयी इतिहास से थोड़ा भी सरोकार रखता है, के लिए बहुत ही विषम एवं चिंताजनक है स्पष्ट रुप में कहें तो बहुत ही भयावह है।
इतिहास गवाह है कि इस देश की मिट्टी इतनी उपजाऊ है कि इसने एक से एक संस्कारी महापुरुष तथा देशभक्त पैदा किए हैं लेकिन यह इस मिट्टी का दुर्भाग्य है कि विनाशकारी खरपतवार के रुप में यहां जयचंदों ने भी जन्म लिया है तथा इस पावन धरा को कलंकित किया है। आज का भारत भी इसी दौर से गुजर रहा है जहां ख्ररपतवार इतना बढ़ गया है कि अब पोषक फसलें नज़र ही नहीं आती और यह स्थिती केवल राजनीति ही नहीं कमोबेश हर क्षेत्र की हैं। इसका मात्र और एक मात्र कारण हमारे चिर-संस्कारों एवं मूल्यों का ह्रास होना है। मूल्यों एवं आदर्शों का प्रवाह सदैव शीर्ष से होता है और कहा भी है कि यथा राजा-तथा प्रजा लेकिन आज अपने क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति के लिए हमारे देश के कर्णधार नेतृत्व कर्ताओं ने इस उक्ति को ही बदल दिया और बयान दिया कि जैसी जनता है वैसे ही नेतृत्व कर्ता बनेंगे अर्थात ये लोग जनता के इच्छानुसार ही अपने हित साधन के लिए सारे अपराध एवं भ्रष्ट तंत्र को बढ़ावा दे रहे हैं। आखिर वो कौन सी प्रजा या जनता है जिसने राजा को भ्रष्ट एवं डकैत बनने के लिए जनादेश दिया? शायद इसका उत्तर यह है कि इस देश में जनता या नागरिक नाम की कोई व्यवस्था अब अस्तित्व में ही नहीं है यहां केवल उपभोक्तावादी संस्कृति के पोषक मतदाता रहते हैं जिन्हें कोई भी खरीद सकता है तथा ये तथाकथित मतदाता भोली चिड़ियाओं की भांति किसी भी बहेलिए के जाल में फंसने को आतुर है। फिर चाहे वह बहेलिए देशी हो या विदेशी इससे इनको कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि लालच ने संवेदनाओं को मृत प्राय: कर दिया है। इन चिड़ियाओं को स्वतंत्र आसमान से बेहतर सुख-सुविधा युक्त वो स्वप्निल सोने का पिंजड़ा अधिक रास आने लगा है जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं और जो मात्र और मात्र एक छलावा भर है।

आज इस देश की जनता को देश के प्रोफाईल से अधिक अपना हाई प्रोफाईल प्रिय है कमोबेश आज हमारा देश गुलामी से पहले के उसी दौर से गुजर रहा हैं। जनता विभिन्न मुद्दों पर आपस में बंटी हुई है चाहे वो आरक्षण का मुद्दा हो या राज्यवाद या फिर धर्म या जातिवाद का चारों और विघटनकारी शक्तियों का बोलबाला हैं हर आदमी ने अपने चारों और अपने स्वार्थों का एक घेरा बना रखा है तथा इस घेरे या उसके क्षुद्र स्वार्थों को नुकसान पहुंचाने वाला हर आदमी उसका शत्रु है। इस देश में अपनी जातिगत गौरव गाथा गाने वाले इतने जातिगत व धार्मिक सामाजिक संगठन है जिनको शायद गिनना भी संभव नहीं होगा लेकिन दुर्भाग्य है कि वे महापुरुष जो राष्ट्र के लिए एक होकर लड़े उनको भी इन कम्बख्तों ने अपने स्वार्थ के अनुरुप बांट दिया । आज कहीं भी अखिल भारतीय समाज नाम की कोई संस्था नही है क्योंकि सभी ने अपने आपको कई सांचों में बांट लिया है तथा सभी के अपने अपने हित हैं जिनके लिए वे लड़ रहे है उनकी तरफ से देश भले गर्त में जाए कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन उन्हें यह पता नही कि जब तक यह देश अखंड एवं सुरक्षित है तभी तक उनका या उनके समाज का अस्तित्व है: आज की युवा पीढ़ी को एक अदद नौकरी और सुख सुविधा युक्त घर से अधिक सोचने की जरूरत महसूस नहीं होती देश के विषय में या अपनी सभ्यता संस्कृति के बारे में मनन करने का कोई औचित्य नहीं हैं अपने घर की बनी रोटी भी यदि विदेशी पेकिंग में दी जाती है तो खुशी होती है। आज कमोबेश हर दूसरा आदमी मानसिक गुलामी के दौर से गुजर रहा है राष्ट्र छद्म अराजकता के वातावरण से गुजर रहा है। क्या यही स्वतंत्रता है? विकास के नाम पर अपने स्वाभिमान, राष्ट्रीय संस्कृति को भूलाना तथा भौतिकता के चकाचौंध में प्राकृतिक संसाधनों का बंदरबांट कर देश को रसातल की और ले जाना, क्या आजादी का यही मतलब है?

आज के दौर की तुलना भारत के राजपूतकालीन समय से की जा सकती है जब भारत कई छोटी- छोटी रियासतों में बंटा हुआ था तथा ये रियासतें छुद्र स्वार्थों की पूर्ती हेतु आपस में लड़ती रहती थीं। विलासिता एवं अकर्मण्यता की पर्याय बन चुकी ये रियासतें अंदर से जर्जर हो चुकी थी।परिणामस्वरूप ये रियासतें कमजोर होती गईं विदेशी आक्रांताओं ने अपनी हवस एवं बेलगाम क्षुधा की पूर्ति हेतु इसा पावन धरा को कलुषित किया ताकत का एक बड़ा भाग भारतीय समाज कई बुराईयों जैसे छुआछुत, उच्श्रंखल जातिवाद , संप्रदायवाद इत्यादि में जकड़ा हुआ था तो क्या आज कमोबेश हमारे सामने वही परिदृश्य नहीं दिखाई दे रहा है। किसी ने क्या खूब कहा है कि इतिहास अपनी पुनरावृत्ति करता है पर क्या इतने कम अंतराल पर और क्या हम इससे सीख लेने के बजाय इसकी पुनरावृति होने देंगें। आज ये छोटे-छोटे राज्य जो कि नदी के पानी, भाषा, खनिजों के आधिपत्य के लिए न्यायालय में हाजिरी दे रहे हैं और सैकड़ों पार्टियां जो क्षुद्र स्वार्थों के लिए जनता को सब्ज बाग दिखा कर उनका वोटा हासिल कर रही हैं तत्पश्चात उसी जनता का शोषण तो क्या ये आजादी और उससे भी पूर्व अंग्रेजों के आगमन के समय का परिदृश्य प्रस्तुत नहीं कर रही है तथा जनता लाचार कई मतभेदों में उलझी हुई निरिह बनी सब कुछ सहने को विवश है।अगर इसी का नाम आजादी है तो वह दिन दूर नहीं जब इस देश के गद्दार इस देश की अमूल संपदा के साथ-साथ यहां के कथित मतदाताओं के भविष्य का भी किसी विदेशी के हाथों सौदा कर दें तथा बाद में कहें कि जीडीपी बढ़ाने के लिए यह जरूरी था।
जिस देश के पड़ोसी ताकतवर, कूटनीतिक एवं साम्राज्यवादी हों उस देश का राजनैतिक व नैतिक पतन की ओर अग्रसर होना उसके दुश्मनों के मार्ग को और सुगम बना देता है तथा वह देश बिना किसी युद्ध के ही गुलाम बनाया जा सकता है क्योंकि किसी देश का नेतृत्व ही उस देश की समृद्धि और ताकत का आईना होता है जिसमें उस देश की बाकी आवाम की झलक देखी जा सकती है।

संजय मिश्र “सदांश”

नोट: यह रचना किसी विशेष वर्ग, समुदाय या व्यक्ति विशेष पर आधारित नहीं है, न ही हमारा उद्देश्य किसी के दिल को ठेस पहुंचाना है । यह लेख पूर्ण रुप से मां भारती को समर्पित है। यदि कोई तथ्य किसी से मिलता है तो यह संयोग मात्र होगा।

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Chankya Niti – मूल चाणक्य नीति!!

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** मूल चाणक्य नीति/चाणक्य सूत्र **


आचार्य चाणक्य एक ऐसी महान विभूति थे, जिन्होंने अपनी विद्वत्ता और क्षमताओं के बल पर भारतीय इतिहास की धारा को बदल दिया। मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चाणक्य कुशल राजनीतिज्ञ, चतुर कूटनीतिज्ञ, प्रकांड अर्थशास्त्री के रूप में भी विश्वविख्यात हुए।

इतनी सदियाँ गुजरने के बाद आज भी यदि चाणक्य के द्वारा बताए गए सिद्धांत और नीतियाँ प्रासंगिक हैं तो मात्र इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने गहन अध्ययन, चिंतन और जीवानानुभवों से अर्जित अमूल्य ज्ञान को, पूरी तरह नि:स्वार्थ होकर मानवीय कल्याण के उद्देश्य से अभिव्यक्त किया।

वर्तमान दौर की सामाजिक संरचना, भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था और शासन-प्रशासन को सुचारू ढंग से बताई गई नीतियाँ और सूत्र अत्यधिक कारगर सिद्ध हो सकते हैं। चाणक्य नीति के द्वितीय अध्याय से यहाँ प्रस्तुत हैं कुछ अंश –


1. जिस प्रकार सभी पर्वतों पर मणि नहीं मिलती, सभी हाथियों के मस्तक में मोती उत्पन्न नहीं होता, सभी वनों में चंदन का वृक्ष नहीं होता, उसी प्रकार सज्जन पुरुष सभी जगहों पर नहीं मिलते हैं।

2. झूठ बोलना, उतावलापन दिखाना, दुस्साहस करना, छल-कपट करना, मूर्खतापूर्ण कार्य करना, लोभ करना, अपवित्रता और निर्दयता – ये सभी स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं। चाणक्य उपर्युक्त दोषों को स्त्रियों का स्वाभाविक गुण मानते हैं। हालाँकि वर्तमान दौर की शिक्षित स्त्रियों में इन दोषों का होना सही नहीं कहा जा सकता है।

3. भोजन के लिए अच्छे पदार्थों का उपलब्ध होना, उन्हें पचाने की शक्ति का होना, सुंदर स्त्री के साथ संसर्ग के लिए कामशक्ति का होना, प्रचुर धन के साथ-साथ धन देने की इच्छा होना। ये सभी सुख मनुष्य को बहुत कठिनता से प्राप्त होते हैं।

4. चाणक्य कहते हैं कि जिस व्यक्ति का पुत्र उसके नियंत्रण में रहता है, जिसकी पत्नी आज्ञा के अनुसार आचरण करती है और जो व्यक्ति अपने कमाए धन से पूरी तरह संतुष्ट रहता है। ऐसे मनुष्य के लिए यह संसार ही स्वर्ग के समान है।

5. चाणक्य का मानना है कि वही गृहस्थी सुखी है, जिसकी संतान उनकी आज्ञा का पालन करती है। पिता का भी कर्तव्य है कि वह पुत्रों का पालन-पोषण अच्छी तरह से करे। इसी प्रकार ऐसे व्यक्ति को मित्र नहीं कहा जा सकता है, जिस पर विश्वास नहीं किया जा सके और ऐसी पत्नी व्यर्थ है जिससे किसी प्रकार का सुख प्राप्त न हो।

6. जो मित्र आपके सामने चिकनी-चुपड़ी बातें करता हो और पीठ पीछे आपके कार्य को बिगाड़ देता हो, उसे त्याग देने में ही भलाई है। चाणक्य कहते हैं कि वह उस बर्तन के समान है, जिसके ऊपर के हिस्से में दूध लगा है परंतु अंदर विष भरा हुआ होता है।

7. जिस प्रकार पत्नी के वियोग का दुख, अपने भाई-बंधुओं से प्राप्त अपमान का दुख असहनीय होता है, उसी प्रकार कर्ज से दबा व्यक्ति भी हर समय दुखी रहता है। दुष्ट राजा की सेवा में रहने वाला नौकर भी दुखी रहता है। निर्धनता का अभिशाप भी मनुष्य कभी नहीं भुला पाता। इनसे व्यक्ति की आत्मा अंदर ही अंदर जलती रहती है।

8. ब्राह्मणों का बल विद्या है, राजाओं का बल उनकी सेना है, वैश्यों का बल उनका धन है और शूद्रों का बल दूसरों की सेवा करना है। ब्राह्मणों का कर्तव्य है कि वे विद्या ग्रहण करें। राजा का कर्तव्य है कि वे सैनिकों द्वारा अपने बल को बढ़ाते रहें। वैश्यों का कर्तव्य है कि वे व्यापार द्वारा धन बढ़ाएँ, शूद्रों का कर्तव्य श्रेष्ठ लोगों की सेवा करना है।

9. चाणक्य का कहना है कि मूर्खता के समान यौवन भी दुखदायी होता है क्योंकि जवानी में व्यक्ति कामवासना के आवेग में कोई भी मूर्खतापूर्ण कार्य कर सकता है। परंतु इनसे भी अधिक कष्टदायक है दूसरों पर आश्रित रहना।

10. चाणक्य कहते हैं कि बचपन में संतान को जैसी शिक्षा दी जाती है, उनका विकास उसी प्रकार होता है। इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे उन्हें ऐसे मार्ग पर चलाएँ, जिससे उनमें उत्तम चरित्र का विकास हो क्योंकि गुणी व्यक्तियों से ही कुल की शोभा बढ़ती है।

11. वे माता-पिता अपने बच्चों के लिए शत्रु के समान हैं, जिन्होंने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दी। क्योंकि अनपढ़ बालक का विद्वानों के समूह में उसी प्रकार अपमान होता है जैसे हंसों के झुंड में बगुले की स्थिति होती है। शिक्षा विहीन मनुष्य बिना पूँछ के जानवर जैसा होता है, इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे बच्चों को ऐसी शिक्षा दें जिससे वे समाज को सुशोभित करें।

12. चाणक्य कहते हैं कि अधिक लाड़ प्यार करने से बच्चों में अनेक दोष उत्पन्न हो जाते हैं। इसलिए यदि वे कोई गलत काम करते हैं तो उसे नजरअंदाज करके लाड़-प्यार करना उचित नहीं है। बच्चे को डाँटना भी आवश्यक है।

13. शिक्षा और अध्ययन की महत्ता बताते हुए चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य का जन्म बहुत सौभाग्य से मिलता है, इसलिए हमें अपने अधिकाधिक समय का वेदादि शास्त्रों के अध्ययन में तथा दान जैसे अच्छे कार्यों में ही सदुपयोग करना चाहिए।

14. चाणक्य कहते हैं कि जो व्यक्ति अच्छा मित्र नहीं है उस पर तो विश्वास नहीं करना चाहिए, परंतु इसके साथ ही अच्छे मित्र के संबंद में भी पूरा विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि यदि वह नाराज हो गया तो आपके सारे भेद खोल सकता है। अत: सावधानी अत्यंत आवश्यक है।

चाणक्य का मानना है कि व्यक्ति को कभी अपने मन का भेद नहीं खोलना चाहिए। उसे जो भी कार्य करना है, उसे अपने मन में रखे और पूरी तन्मयता के साथ समय आने पर उसे पूरा करना चाहिए।

15. चाणक्य के अनुसार नदी के किनारे स्थित वृक्षों का जीवन अनिश्चित होता है, क्योंकि नदियाँ बाढ़ के समय अपने किनारे के पेड़ों को उजाड़ देती हैं। इसी प्रकार दूसरे के घरों में रहने वाली स्त्री भी किसी समय पतन के मार्ग पर जा सकती है। इसी तरह जिस राजा के पास अच्छी सलाह देने वाले मंत्री नहीं होते, वह भी बहुत समय तक सुरक्षित नहीं रह सकता। इसमें जरा भी संदेह नहीं करना चाहिए।

17. चाणक्य कहते हैं कि जिस तरह वेश्या धन के समाप्त होने पर पुरुष से मुँह मोड़ लेती है। उसी तरह जब राजा शक्तिहीन हो जाता है तो प्रजा उसका साथ छोड़ देती है। इसी प्रकार वृक्षों पर रहने वाले पक्षी भी तभी तक किसी वृक्ष पर बसेरा रखते हैं, जब तक वहाँ से उन्हें फल प्राप्त होते रहते हैं। अतिथि का जब पूरा स्वागत-सत्कार कर दिया जाता है तो वह भी उस घर को छोड़ देता है।

18. बुरे चरित्र वाले, अकारण दूसरों को हानि पहुँचाने वाले तथा अशुद्ध स्थान पर रहने वाले व्यक्ति के साथ जो पुरुष मित्रता करता है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। आचार्य चाणक्य का कहना है मनुष्य को कुसंगति से बचना चाहिए। वे कहते हैं कि मनुष्य की भलाई इसी में है कि वह जितनी जल्दी हो सके, दुष्ट व्यक्ति का साथ छोड़ दे।

19. चाणक्य कहते हैं कि मित्रता, बराबरी वाले व्यक्तियों में ही करना ठीक रहता है। सरकारी नौकरी सर्वोत्तम होती है और अच्छे व्यापार के लिए व्यवहारकुशल होना आवश्यक है। इसी तरह सुंदर व सुशील स्त्री घर में ही शोभा देती है।

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The Life and Times of Gautama Buddha in Hindi

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हिन्दी में गौतम बुद्ध के जीवन और समय का विस्तार

 सामान्य व्यक्ति से महापुरुष तक का सफर – महात्मा बुद्ध 

भारत की पवित्र भूमि पर ऐसे कई महापुरुषों ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने कृत्यों और सिद्धांतों के बल पर मानव जीवन के भीतर छिपे गूढ़ रहस्यों को उजागर किया. इन्हीं में से एक हैं महात्मा बुद्ध, जिन्होंने सामान्य मनुष्य के रूप में जन्म लेकर अध्यात्म की उस ऊंचाई को छुआ जहां तक पहुंचना किसी आम व्यक्ति के लिए मुमकिन नहीं है. ऐसे महान पुरुष के दिखलाए गए मार्ग को लोगों ने एक धर्म के रूप में ग्रहण किया जिसके परिणामस्वरूप भारत समेत सभी बड़े देशों में बौद्ध धर्म एक प्रमुख धर्म के रूप में स्वीकृत कर लिया गया.

महात्मा बुद्ध का वास्तविक नाम सिद्धार्थ था किंतु गौतमी द्वारा पाले जाने के कारण उन्हें गौतम भी कहा गया. बुद्धत्व की प्राप्ति के बाद उनके नाम के आगे बुद्ध उपसर्ग जोड़ दिया गया और धीरे-धीरे वे महात्मा बुद्ध के तौर पर प्रख्यात हो गए. गौतम बुद्ध के आदर्शों और बौद्ध धर्म में आस्था रखने वाले लोगों के लिए आज का दिन बेहद खास है. मान्यताओं के अनुसार बैसाख मास की पूर्णिमा के दिन महात्मा बुद्ध पृथ्वी पर अवतरित हुए थे और इसी दिन उन्हें बुद्धत्व के साथ-साथ महापरिनिर्वाण की भी प्राप्ति हुई थी.

महात्मा बुद्ध का जीवन

सिद्धार्थ का जन्म शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन के घर हुआ था. जन्म के सात दिन के भीतर ही सिद्धार्थ की मां का निधन हो गया था. उनका पालन पोषण शुद्धोधन की दूसरी रानी महाप्रजावती ने किया. सिद्धार्थ के जन्म के समय ही एक महान साधु नेब यह घोषणा कर दी थी कि यह बच्चा या तो एक महान राजा बनेगा या फिर एक बेहद पवित्र मनुष्य के रूप में अपनी पहचान स्थापित करेगा.

इस भविष्यवाणी को सुनकर राजा शुद्धोधन ने अपनी सामर्थ्य की हद तक सिद्धार्थ को दुःख से दूर रखने की कोशिश की. लेकिन छोटी सी आयु में ही सिद्धार्थ जीवन और मृत्यु की सच्चाई को समझ गए. उन्होंने यह जान लिया कि जिस प्रकार मनुष्य का जन्म लेना एक सच्चाई है उसी प्रकार बुढ़ापा और निधन भी जीवन की कभी ना टलने वाली हकीकत है. संसार की सबसे बड़ी सच्चाई जानने के बाद महात्मा बुद्ध सांसारिक खुशियों और विलासिता भरे जीवन से पूरी तरह विमुख हो गए. राज पाठ के साथ, पत्नी और पुत्र को छोड़कर उन्होंने एक साधु का जीवन अपना लिया !!

बुद्धत्व की प्राप्ति 

दो अन्य ब्राह्मणों के साथ सिद्धार्थ ने अपने भीतर उपज रहे प्रश्नों के हल ढूंढ़ने शुरू किए. लेकिन समुचित ध्यान लगाने और कड़े परिश्रम के बाद भी उन्हें अपने प्रश्नों के हल नहीं मिले. हर बार असफलता हाथ लगने के बाद उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ कठोर तप करने का निर्णय लिया. छ: वर्षों के कठोर तप के बाद भी वह अपने उद्देश्यों को पूरा नहीं कर पाए. इसके बाद उन्होंने कठोर तपस्या छोड़कर आर्य अष्टांग मार्ग, जिसे मध्यम मार्ग भी कहां जाता है, ढूंढ़ निकाला. वह एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गए और निश्चय किया कि अपने प्रश्नों के उत्तर जाने बिना वह यहां से उठेंगे नहीं. लगभग 49 दिनों तक ध्यान में रहने के बाद उन्हें सर्वोच्च ज्ञान की प्राप्ति हुई और मात्र 35 वर्ष की उम्र में ही वह सिद्धार्थ से महात्मा बुद्ध बन गए!!

ज्ञान की प्राप्ति होने के बाद महात्मा बुद्ध दो व्यापारियों, तपुसा और भलिका, से मिले जो उनके पहले अनुयायी भी बने. वाराणसी के समीप स्थित सारनाथ में उन्होंने अपना पहला धर्मोपदेश दिया !!

बुद्ध का महापरिनिर्वाण 

बौद्ध धर्म से जुड़े साहित्य के अनुसार 80 वर्ष की आयु में महात्मा बुद्ध ने यह घोषित कर दिया था कि बहुत ही जल्द वह महापरिनिर्वाण की अवस्था में पहुंच जाएंगे. इस कथन के बाद महात्मा बुद्ध ने एक लुहार के हाथ से आखिरी निवाला खाया. इसके बाद वह बहुत ज्यादा बीमार हो गए. लुहार को लगा कि उसके हाथ से खाने के कारण महात्मा बुद्ध की यह हालत हुई है इसीलिए महात्मा बुद्ध ने अपने एक अनुयायी को कुंडा नामक लुहार को समझाने भेजा. वैद्य ने भी यह प्रमाणित कर दिया था कि उनका निधन वृद्धावस्था के कारण हुआ है ना कि विशाक्त खाद्य के कारण!!

बौद्ध धर्म की मुख्य-शिक्षा 

सम्यक दृष्टि – सम्यक दृष्टि का अर्थ है कि जीवन में हमेशा सुख-दुख आता रहता है हमें अपने नजरिये को सही रखना चाहिए. अगर दुख है तो उसे दूर भी किया जा सकता है!!

सम्यक संकल्प – इसका अर्थ है कि जीवन में जो काम करने योग्य है, जिससे दूसरों का भला होता है हमें उसे करने का संकल्प लेना चाहिए और ऐसे काम कभी नहीं करने चाहिए जो अन्य लोगों के लिए हानिकारक साबित हो!!

सम्यक वचन – इसका अर्थ यह है कि मनुष्य को अपनी वाणी का सदैव सदुपयोग ही करना चाहिए. असत्य, निंदा और अनावश्यक बातों से बचना चाहिए!!

सम्यक कर्मांत – मनुष्य को किसी भी प्राणी के प्रति मन, वचन, कर्म से हिंसक व्यवहार नहीं करना चाहिए. उसे दुराचार और भोग विलास से दूर रहना चाहिए!!

सम्यक आजीविका – गलत, अनैतिक या अधार्मिक तरीकों से आजीविका प्राप्त नहीं करना!!

सम्यक व्यायाम – बुरी और अनैतिक आदतों को छोडऩे का सच्चे मन से प्रयास करना चाहिए. मनुष्य को सदगुणों को ग्रहण करने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए!!

सम्यक स्मृति – इसका अर्थ यह है कि हमें कभी भी यह नहीं भूलना चाहिए कि सांसारिक जीवन क्षणिक और नाशवान है!!

सम्यक समाधि – ध्यान की वह अवस्था जिसमें मन की अस्थिरता, चंचलता, शांत होती है तथा विचारों का अनावश्यक भटकाव रुकता है!!

 

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अच्छे लोग और अपने हितैषियों को हम पहचान नहीं पाते और अपने विरोधियों के प्रति पूरी तरह शत्रुता, इन्कारने का भाव रख लेते हैं। इसे चिंतन दोष कहा जाएगा। न कोई पूरी तरह अच्छाई से भरा है और नहीं बुराइयों से भरपूर होगा। मनुष्य गुण-दुर्गुण का मिलाजुला रूप है। हमें इस संतुलन के विचार को सावधानी से उपयोग में लाना चाहिए। अपने विरोधियों के विचार जानते रहना चाहिए, खासतौर पर जब वे आपके लिए व्यक्तिगत टिप्पणी कर रहे हों।

यदि इसका निष्पक्ष विश्लेषण करें तो हमें बहुत सी काम की और हितकारी बातें हाथ लग सकती हैं। इस प्रयोग को झेन फकीरों ने बखूबी किया है। जब भी कोई शिष्य उनसे दीक्षित होता, तो गुरु कहते जाओ, हमने पा लिया, हमारे हो गए, अब कुछ दिन जरूरी रूप से हमारे विरोधी के पास जाकर रहो। हमारा दूसरा पक्ष वहां नजर आएगा, लेकिन जाना निष्पक्ष होकर। इस बात की पूरी संभावना रहेगी कि विरोधी कुछ मामले में सही भी हो।

हमारा और विरोधी का पक्ष मिलकर एक तीसरा नया पक्ष बन जाए जो और भी श्रेष्ठ हो सकता है। यदि तुम्हारा इरादा नेक होगा तो हमारे और हमारे विरोधी दोनों की गलत बात को नकार कर तुम एक नई सही बात प्राप्त कर लोगे। इसलिए विरोधी विचार या व्यक्ति से शत्रुता न पाली जाए। यदि नेक इरादे से चलेंगे तब जो आज शत्रु है कल मित्र हो सकता है। यदि अपने भीतर की आध्यात्मिक योग्यता को विकसित करना है तो विरोधी के विचार को सम्मान देना सीख जाएं। स्वयं के व्यक्तित्व को अपने ही विचारों में बांधें न बल्कि विरोधी के विचारों से खोलना भी सीखें।


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