The Life and Times of Gautama Buddha in Hindi

Kmsraj51 की कलम से…..

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हिन्दी में गौतम बुद्ध के जीवन और समय का विस्तार

 सामान्य व्यक्ति से महापुरुष तक का सफर – महात्मा बुद्ध 

भारत की पवित्र भूमि पर ऐसे कई महापुरुषों ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने कृत्यों और सिद्धांतों के बल पर मानव जीवन के भीतर छिपे गूढ़ रहस्यों को उजागर किया. इन्हीं में से एक हैं महात्मा बुद्ध, जिन्होंने सामान्य मनुष्य के रूप में जन्म लेकर अध्यात्म की उस ऊंचाई को छुआ जहां तक पहुंचना किसी आम व्यक्ति के लिए मुमकिन नहीं है. ऐसे महान पुरुष के दिखलाए गए मार्ग को लोगों ने एक धर्म के रूप में ग्रहण किया जिसके परिणामस्वरूप भारत समेत सभी बड़े देशों में बौद्ध धर्म एक प्रमुख धर्म के रूप में स्वीकृत कर लिया गया.

महात्मा बुद्ध का वास्तविक नाम सिद्धार्थ था किंतु गौतमी द्वारा पाले जाने के कारण उन्हें गौतम भी कहा गया. बुद्धत्व की प्राप्ति के बाद उनके नाम के आगे बुद्ध उपसर्ग जोड़ दिया गया और धीरे-धीरे वे महात्मा बुद्ध के तौर पर प्रख्यात हो गए. गौतम बुद्ध के आदर्शों और बौद्ध धर्म में आस्था रखने वाले लोगों के लिए आज का दिन बेहद खास है. मान्यताओं के अनुसार बैसाख मास की पूर्णिमा के दिन महात्मा बुद्ध पृथ्वी पर अवतरित हुए थे और इसी दिन उन्हें बुद्धत्व के साथ-साथ महापरिनिर्वाण की भी प्राप्ति हुई थी.

महात्मा बुद्ध का जीवन

सिद्धार्थ का जन्म शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन के घर हुआ था. जन्म के सात दिन के भीतर ही सिद्धार्थ की मां का निधन हो गया था. उनका पालन पोषण शुद्धोधन की दूसरी रानी महाप्रजावती ने किया. सिद्धार्थ के जन्म के समय ही एक महान साधु नेब यह घोषणा कर दी थी कि यह बच्चा या तो एक महान राजा बनेगा या फिर एक बेहद पवित्र मनुष्य के रूप में अपनी पहचान स्थापित करेगा.

इस भविष्यवाणी को सुनकर राजा शुद्धोधन ने अपनी सामर्थ्य की हद तक सिद्धार्थ को दुःख से दूर रखने की कोशिश की. लेकिन छोटी सी आयु में ही सिद्धार्थ जीवन और मृत्यु की सच्चाई को समझ गए. उन्होंने यह जान लिया कि जिस प्रकार मनुष्य का जन्म लेना एक सच्चाई है उसी प्रकार बुढ़ापा और निधन भी जीवन की कभी ना टलने वाली हकीकत है. संसार की सबसे बड़ी सच्चाई जानने के बाद महात्मा बुद्ध सांसारिक खुशियों और विलासिता भरे जीवन से पूरी तरह विमुख हो गए. राज पाठ के साथ, पत्नी और पुत्र को छोड़कर उन्होंने एक साधु का जीवन अपना लिया !!

बुद्धत्व की प्राप्ति 

दो अन्य ब्राह्मणों के साथ सिद्धार्थ ने अपने भीतर उपज रहे प्रश्नों के हल ढूंढ़ने शुरू किए. लेकिन समुचित ध्यान लगाने और कड़े परिश्रम के बाद भी उन्हें अपने प्रश्नों के हल नहीं मिले. हर बार असफलता हाथ लगने के बाद उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ कठोर तप करने का निर्णय लिया. छ: वर्षों के कठोर तप के बाद भी वह अपने उद्देश्यों को पूरा नहीं कर पाए. इसके बाद उन्होंने कठोर तपस्या छोड़कर आर्य अष्टांग मार्ग, जिसे मध्यम मार्ग भी कहां जाता है, ढूंढ़ निकाला. वह एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गए और निश्चय किया कि अपने प्रश्नों के उत्तर जाने बिना वह यहां से उठेंगे नहीं. लगभग 49 दिनों तक ध्यान में रहने के बाद उन्हें सर्वोच्च ज्ञान की प्राप्ति हुई और मात्र 35 वर्ष की उम्र में ही वह सिद्धार्थ से महात्मा बुद्ध बन गए!!

ज्ञान की प्राप्ति होने के बाद महात्मा बुद्ध दो व्यापारियों, तपुसा और भलिका, से मिले जो उनके पहले अनुयायी भी बने. वाराणसी के समीप स्थित सारनाथ में उन्होंने अपना पहला धर्मोपदेश दिया !!

बुद्ध का महापरिनिर्वाण 

बौद्ध धर्म से जुड़े साहित्य के अनुसार 80 वर्ष की आयु में महात्मा बुद्ध ने यह घोषित कर दिया था कि बहुत ही जल्द वह महापरिनिर्वाण की अवस्था में पहुंच जाएंगे. इस कथन के बाद महात्मा बुद्ध ने एक लुहार के हाथ से आखिरी निवाला खाया. इसके बाद वह बहुत ज्यादा बीमार हो गए. लुहार को लगा कि उसके हाथ से खाने के कारण महात्मा बुद्ध की यह हालत हुई है इसीलिए महात्मा बुद्ध ने अपने एक अनुयायी को कुंडा नामक लुहार को समझाने भेजा. वैद्य ने भी यह प्रमाणित कर दिया था कि उनका निधन वृद्धावस्था के कारण हुआ है ना कि विशाक्त खाद्य के कारण!!

बौद्ध धर्म की मुख्य-शिक्षा 

सम्यक दृष्टि – सम्यक दृष्टि का अर्थ है कि जीवन में हमेशा सुख-दुख आता रहता है हमें अपने नजरिये को सही रखना चाहिए. अगर दुख है तो उसे दूर भी किया जा सकता है!!

सम्यक संकल्प – इसका अर्थ है कि जीवन में जो काम करने योग्य है, जिससे दूसरों का भला होता है हमें उसे करने का संकल्प लेना चाहिए और ऐसे काम कभी नहीं करने चाहिए जो अन्य लोगों के लिए हानिकारक साबित हो!!

सम्यक वचन – इसका अर्थ यह है कि मनुष्य को अपनी वाणी का सदैव सदुपयोग ही करना चाहिए. असत्य, निंदा और अनावश्यक बातों से बचना चाहिए!!

सम्यक कर्मांत – मनुष्य को किसी भी प्राणी के प्रति मन, वचन, कर्म से हिंसक व्यवहार नहीं करना चाहिए. उसे दुराचार और भोग विलास से दूर रहना चाहिए!!

सम्यक आजीविका – गलत, अनैतिक या अधार्मिक तरीकों से आजीविका प्राप्त नहीं करना!!

सम्यक व्यायाम – बुरी और अनैतिक आदतों को छोडऩे का सच्चे मन से प्रयास करना चाहिए. मनुष्य को सदगुणों को ग्रहण करने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए!!

सम्यक स्मृति – इसका अर्थ यह है कि हमें कभी भी यह नहीं भूलना चाहिए कि सांसारिक जीवन क्षणिक और नाशवान है!!

सम्यक समाधि – ध्यान की वह अवस्था जिसमें मन की अस्थिरता, चंचलता, शांत होती है तथा विचारों का अनावश्यक भटकाव रुकता है!!

 

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The Life and Times of Gautama Buddha in Hindi ~ हिन्दी में गौतम बुद्ध के जीवन और समय का विस्तार !!

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** हिन्दी में गौतम बुद्ध के जीवन और समय का विस्तार **


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** सामान्य व्यक्ति से महापुरुष तक का सफर – महात्मा बुद्ध **

buddha --

भारत की पवित्र भूमि पर ऐसे कई महापुरुषों ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने कृत्यों और सिद्धांतों के बल पर मानव जीवन के भीतर छिपे गूढ़ रहस्यों को उजागर किया. इन्हीं में से एक हैं महात्मा बुद्ध, जिन्होंने सामान्य मनुष्य के रूप में जन्म लेकर अध्यात्म की उस ऊंचाई को छुआ जहां तक पहुंचना किसी आम व्यक्ति के लिए मुमकिन नहीं है. ऐसे महान पुरुष के दिखलाए गए मार्ग को लोगों ने एक धर्म के रूप में ग्रहण किया जिसके परिणामस्वरूप भारत समेत सभी बड़े देशों में बौद्ध धर्म एक प्रमुख धर्म के रूप में स्वीकृत कर लिया गया.

महात्मा बुद्ध का वास्तविक नाम सिद्धार्थ था किंतु गौतमी द्वारा पाले जाने के कारण उन्हें गौतम भी कहा गया. बुद्धत्व की प्राप्ति के बाद उनके नाम के आगे बुद्ध उपसर्ग जोड़ दिया गया और धीरे-धीरे वे महात्मा बुद्ध के तौर पर प्रख्यात हो गए. गौतम बुद्ध के आदर्शों और बौद्ध धर्म में आस्था रखने वाले लोगों के लिए आज का दिन बेहद खास है. मान्यताओं के अनुसार बैसाख मास की पूर्णिमा के दिन महात्मा बुद्ध पृथ्वी पर अवतरित हुए थे और इसी दिन उन्हें बुद्धत्व के साथ-साथ महापरिनिर्वाण की भी प्राप्ति हुई थी.


buddha_nature

** महात्मा बुद्ध का जीवन **

सिद्धार्थ का जन्म शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन के घर हुआ था. जन्म के सात दिन के भीतर ही सिद्धार्थ की मां का निधन हो गया था. उनका पालन पोषण शुद्धोधन की दूसरी रानी महाप्रजावती ने किया. सिद्धार्थ के जन्म के समय ही एक महान साधु नेब यह घोषणा कर दी थी कि यह बच्चा या तो एक महान राजा बनेगा या फिर एक बेहद पवित्र मनुष्य के रूप में अपनी पहचान स्थापित करेगा.

इस भविष्यवाणी को सुनकर राजा शुद्धोधन ने अपनी सामर्थ्य की हद तक सिद्धार्थ को दुःख से दूर रखने की कोशिश की. लेकिन छोटी सी आयु में ही सिद्धार्थ जीवन और मृत्यु की सच्चाई को समझ गए. उन्होंने यह जान लिया कि जिस प्रकार मनुष्य का जन्म लेना एक सच्चाई है उसी प्रकार बुढ़ापा और निधन भी जीवन की कभी ना टलने वाली हकीकत है. संसार की सबसे बड़ी सच्चाई जानने के बाद महात्मा बुद्ध सांसारिक खुशियों और विलासिता भरे जीवन से पूरी तरह विमुख हो गए. राज पाठ के साथ, पत्नी और पुत्र को छोड़कर उन्होंने एक साधु का जीवन अपना लिया !!


Cosmic_Buddha

** बुद्धत्व की प्राप्ति **

दो अन्य ब्राह्मणों के साथ सिद्धार्थ ने अपने भीतर उपज रहे प्रश्नों के हल ढूंढ़ने शुरू किए. लेकिन समुचित ध्यान लगाने और कड़े परिश्रम के बाद भी उन्हें अपने प्रश्नों के हल नहीं मिले. हर बार असफलता हाथ लगने के बाद उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ कठोर तप करने का निर्णय लिया. छ: वर्षों के कठोर तप के बाद भी वह अपने उद्देश्यों को पूरा नहीं कर पाए. इसके बाद उन्होंने कठोर तपस्या छोड़कर आर्य अष्टांग मार्ग, जिसे मध्यम मार्ग भी कहां जाता है, ढूंढ़ निकाला. वह एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गए और निश्चय किया कि अपने प्रश्नों के उत्तर जाने बिना वह यहां से उठेंगे नहीं. लगभग 49 दिनों तक ध्यान में रहने के बाद उन्हें सर्वोच्च ज्ञान की प्राप्ति हुई और मात्र 35 वर्ष की उम्र में ही वह सिद्धार्थ से महात्मा बुद्ध बन गए!!

ज्ञान की प्राप्ति होने के बाद महात्मा बुद्ध दो व्यापारियों, तपुसा और भलिका, से मिले जो उनके पहले अनुयायी भी बने. वाराणसी के समीप स्थित सारनाथ में उन्होंने अपना पहला धर्मोपदेश दिया !!


** बुद्ध का महापरिनिर्वाण **

बौद्ध धर्म से जुड़े साहित्य के अनुसार 80 वर्ष की आयु में महात्मा बुद्ध ने यह घोषित कर दिया था कि बहुत ही जल्द वह महापरिनिर्वाण की अवस्था में पहुंच जाएंगे. इस कथन के बाद महात्मा बुद्ध ने एक लुहार के हाथ से आखिरी निवाला खाया. इसके बाद वह बहुत ज्यादा बीमार हो गए. लुहार को लगा कि उसके हाथ से खाने के कारण महात्मा बुद्ध की यह हालत हुई है इसीलिए महात्मा बुद्ध ने अपने एक अनुयायी को कुंडा नामक लुहार को समझाने भेजा. वैद्य ने भी यह प्रमाणित कर दिया था कि उनका निधन वृद्धावस्था के कारण हुआ है ना कि विशाक्त खाद्य के कारण!!

bbuddha

** बौद्ध धर्म की मुख्य-शिक्षा **

=> सम्यक दृष्टि – सम्यक दृष्टि का अर्थ है कि जीवन में हमेशा सुख-दुख आता रहता है हमें अपने नजरिये को सही रखना चाहिए. अगर दुख है तो उसे दूर भी किया जा सकता है!!

=> सम्यक संकल्प – इसका अर्थ है कि जीवन में जो काम करने योग्य है, जिससे दूसरों का भला होता है हमें उसे करने का संकल्प लेना चाहिए और ऐसे काम कभी नहीं करने चाहिए जो अन्य लोगों के लिए हानिकारक साबित हो!!

=> सम्यक वचन – इसका अर्थ यह है कि मनुष्य को अपनी वाणी का सदैव सदुपयोग ही करना चाहिए. असत्य, निंदा और अनावश्यक बातों से बचना चाहिए!!

=> सम्यक कर्मांत – मनुष्य को किसी भी प्राणी के प्रति मन, वचन, कर्म से हिंसक व्यवहार नहीं करना चाहिए. उसे दुराचार और भोग विलास से दूर रहना चाहिए!!

=> सम्यक आजीविका – गलत, अनैतिक या अधार्मिक तरीकों से आजीविका प्राप्त नहीं करना!!

=> सम्यक व्यायाम – बुरी और अनैतिक आदतों को छोडऩे का सच्चे मन से प्रयास करना चाहिए. मनुष्य को सदगुणों को ग्रहण करने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए!!

=> सम्यक स्मृति – इसका अर्थ यह है कि हमें कभी भी यह नहीं भूलना चाहिए कि सांसारिक जीवन क्षणिक और नाशवान है!!

=> सम्यक समाधि – ध्यान की वह अवस्था जिसमें मन की अस्थिरता, चंचलता, शांत होती है तथा विचारों का अनावश्यक भटकाव रुकता है!!

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गौतम बुद्ध के जीवन और समय का विस्तार।

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गौतम बुद्ध के जीवन और समय का विस्तार।

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सामान्य व्यक्ति से महापुरुष तक का सफर – महात्मा बुद्ध।

buddha --

भारत की पवित्र भूमि पर ऐसे कई महापुरुषों ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने कृत्यों और सिद्धांतों के बल पर मानव जीवन के भीतर छिपे गूढ़ रहस्यों को उजागर किया। इन्हीं में से एक हैं महात्मा बुद्ध।

जिन्होंने सामान्य मनुष्य के रूप में जन्म लेकर अध्यात्म की उस ऊंचाई को छुआ जहां तक पहुंचना किसी आम व्यक्ति के लिए मुमकिन नहीं है। ऐसे महान पुरुष के दिखलाए गए मार्ग को लोगों ने एक धर्म के रूप में ग्रहण किया जिसके परिणामस्वरूप भारत समेत सभी बड़े देशों में बौद्ध धर्म एक प्रमुख धर्म के रूप में स्वीकृत कर लिया गया।

महात्मा बुद्ध का वास्तविक नाम सिद्धार्थ था, किंतु गौतमी द्वारा पाले जाने के कारण उन्हें गौतम भी कहा गया। बुद्धत्व की प्राप्ति के बाद उनके नाम के आगे बुद्ध उपसर्ग जोड़ दिया गया और धीरे-धीरे वे महात्मा बुद्ध के तौर पर प्रख्यात हो गए।

गौतम बुद्ध के आदर्शों और बौद्ध धर्म में आस्था रखने वाले लोगों के लिए आज का दिन बेहद खास है। मान्यताओं के अनुसार बैसाख मास की पूर्णिमा के दिन महात्मा बुद्ध पृथ्वी पर अवतरित हुए थे, और इसी दिन उन्हें बुद्धत्व के साथ-साथ महापरिनिर्वाण की भी प्राप्ति हुई थी।

buddha_nature

महात्मा बुद्ध का जीवन।

सिद्धार्थ का जन्म शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन के घर हुआ था। जन्म के सात दिन के भीतर ही सिद्धार्थ की मां का निधन हो गया था। उनका पालन पोषण शुद्धोधन की दूसरी रानी महाप्रजावती ने किया।

सिद्धार्थ के जन्म के समय ही एक महान साधु नेब यह घोषणा कर दी थी कि यह बच्चा या तो एक महान राजा बनेगा या फिर एक बेहद पवित्र मनुष्य के रूप में अपनी पहचान स्थापित करेगा।

इस भविष्यवाणी को सुनकर राजा शुद्धोधन ने अपनी सामर्थ्य की हद तक सिद्धार्थ को दुःख से दूर रखने की कोशिश की। लेकिन छोटी सी आयु में ही सिद्धार्थ जीवन और मृत्यु की सच्चाई को समझ गए।

उन्होंने यह जान लिया कि जिस प्रकार मनुष्य का जन्म लेना एक सच्चाई है उसी प्रकार बुढ़ापा और निधन भी जीवन की कभी ना टलने वाली हकीकत है। संसार की सबसे बड़ी सच्चाई जानने के बाद महात्मा बुद्ध सांसारिक खुशियों और विलासिता भरे जीवन से पूरी तरह विमुख हो गए। राज पाठ के साथ, पत्नी और पुत्र को छोड़कर उन्होंने एक साधु का जीवन अपना लिया।

Cosmic_Buddha

बुद्धत्व की प्राप्ति।

दो अन्य ब्राह्मणों के साथ सिद्धार्थ ने अपने भीतर उपज रहे प्रश्नों के हल ढूंढ़ने शुरू किए। लेकिन समुचित ध्यान लगाने और कड़े परिश्रम के बाद भी उन्हें अपने प्रश्नों के हल नहीं मिले। हर बार असफलता हाथ लगने के बाद उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ कठोर तप करने का निर्णय लिया।

छ: वर्षों के कठोर तप के बाद भी वह अपने उद्देश्यों को पूरा नहीं कर पाए। इसके बाद उन्होंने कठोर तपस्या छोड़कर आर्य अष्टांग मार्ग, जिसे मध्यम मार्ग भी कहां जाता है, ढूंढ़ निकाला।

वह एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गए और निश्चय किया कि अपने प्रश्नों के उत्तर जाने बिना वह यहां से उठेंगे नहीं। लगभग 49 दिनों तक ध्यान में रहने के बाद उन्हें सर्वोच्च ज्ञान की प्राप्ति हुई और मात्र 35 वर्ष की उम्र में ही वह सिद्धार्थ से महात्मा बुद्ध बन गए।

ज्ञान की प्राप्ति होने के बाद महात्मा बुद्ध दो व्यापारियों, तपुसा और भलिका, से मिले जो उनके पहले अनुयायी भी बने। वाराणसी के समीप स्थित सारनाथ में उन्होंने अपना पहला धर्मोपदेश दिया।

बुद्ध का महापरिनिर्वाण।

बौद्ध धर्म से जुड़े साहित्य के अनुसार 80 वर्ष की आयु में महात्मा बुद्ध ने यह घोषित कर दिया था कि बहुत ही जल्द वह महापरिनिर्वाण की अवस्था में पहुंच जाएंगे। इस कथन के बाद महात्मा बुद्ध ने एक लुहार के हाथ से आखिरी निवाला खाया।

इसके बाद वह बहुत ज्यादा बीमार हो गए। लुहार को लगा कि उसके हाथ से खाने के कारण महात्मा बुद्ध की यह हालत हुई है इसीलिए महात्मा बुद्ध ने अपने एक अनुयायी को कुंडा नामक लुहार को समझाने भेजा। वैद्य ने भी यह प्रमाणित कर दिया था कि उनका निधन वृद्धावस्था के कारण हुआ है ना कि विशाक्त खाद्य के कारण।

bbuddha

बौद्ध धर्म की मुख्य-शिक्षा।

सम्यक दृष्टि – सम्यक दृष्टि का अर्थ है कि जीवन में हमेशा सुख-दुख आता रहता है हमें अपने नजरिये को सही रखना चाहिए। अगर दुख है तो उसे दूर भी किया जा सकता है।

सम्यक संकल्प – इसका अर्थ है कि जीवन में जो काम करने योग्य है, जिससे दूसरों का भला होता है हमें उसे करने का संकल्प लेना चाहिए और ऐसे काम कभी नहीं करने चाहिए जो अन्य लोगों के लिए हानिकारक साबित हो।

सम्यक वचन – इसका अर्थ यह है कि मनुष्य को अपनी वाणी का सदैव सदुपयोग ही करना चाहिए। असत्य, निंदा और अनावश्यक बातों से बचना चाहिए।

सम्यक कर्मांत – मनुष्य को किसी भी प्राणी के प्रति मन, वचन, कर्म से हिंसक व्यवहार नहीं करना चाहिए। उसे दुराचार और भोग विलास से दूर रहना चाहिए।

सम्यक आजीविका – गलत, अनैतिक या अधार्मिक तरीकों से आजीविका प्राप्त नहीं करना।

सम्यक व्यायाम – बुरी और अनैतिक आदतों को छोडऩे का सच्चे मन से प्रयास करना चाहिए. मनुष्य को सदगुणों को ग्रहण करने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए।

सम्यक स्मृति – इसका अर्थ यह है कि हमें कभी भी यह नहीं भूलना चाहिए कि सांसारिक जीवन क्षणिक और नाशवान है।

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Krishna Mohan Singh(KMS)
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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

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Message for the day 12-11-2013 !!

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kmsraj51 की कलम से …..
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The one who has the power to face is free from tensions.

Projection: To be good with those who are good is quite natural, but to be good with those who are bad is known as having the power to face. This naturally comes when there is the power to transform even that which in negative into something positive. When there is the power to face, there is no retaliation, no conflict. There is love given to all around.


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Solution: When I am able to transform and look at each and everything in a positive way, I will not have any difficulty with any situation. I will naturally be able to face all situations in a light and easy way. When I am able to be free from tension in this way, I am also able to give my best and thus become an inspiration for those around me.

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सद्विचार-हिन्दी में !!

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इस संसार में प्यार करने लायक दो वस्तुएँ हैं-एक दुःख और दूसरा श्रम । दुख के बिना हृदय निर्मल नहीं होता और श्रम के बिना मनुष्यत्व का विकास नहीं होता ।

ज्ञान का अर्थ है-जानने की शक्ति । झूठ को सच से पृथक् करने वाली जो विवेक बुद्धि है-उसी का नाम ज्ञान है ।

अध्ययन, विचार, मनन, विश्वास एवं आचरण द्वार जब एक मार्ग को मजबूती से पकड़ लिया जाता है, तो अभीष्ट उद्देश्य को प्राप्त करना बहुत सरल हो जाता है ।

आदर्शों के प्रति श्रद्धा और कर्तव्य के प्रति लगन का जहाँ भी उदय हो रहा है, समझना चाहिए कि वहाँ किसी देवमानव का आविर्भाव हो रहा है ।

कुचक्र, छद्म और आतंक के बलबूते उपार्जित की गई सफलताएँ जादू के तमाशे में हथेली पर सरसों जमाने जैसे चमत्कार दिखाकर तिरोहित हो जाती हैं । बिना जड़ का पेड़ कब तक टिकेगा और किस प्रकार फलेगा-फूलेगा ।

जो दूसरों को धोखा देना चाहता है, वास्तव में वह अपने आपको ही धोखा देता है ।

समर्पण का अर्थ है-पूर्णरूपेण प्रभु को हृदय में स्वीकार करना, उनकी इच्छा, प्रेरणाओं के प्रति सदैव जागरूक रहना और जीवन के प्रत्येक क्षण में उसे परिणत करते रहना ।

मनोविकार भले ही छोटे हों या बड़े, यह शत्रु के समान हैं और प्रताड़ना के ही योग्य हैं ।

सबसे महान् धर्म है, अपनी आत्मा के प्रति सच्चा बनना ।

सद्व्यवहार में शक्ति है । जो सोचता है कि मैं दूसरों के काम आ सकने के लिए कुछ करूँ, वही आत्मोन्नति का सच्चा पथिक है ।

जिनका प्रत्येक कर्म भगवान् को, आदर्शों को समर्पित होता है, वही सबसे बड़ा योगी है ।

कोई भी कठिनाई क्यों न हो, अगर हम सचमुच शान्त रहें तो समाधान मिल जाएगा ।

सत्संग और प्रवचनों का-स्वाध्याय और सदुपदेशों का तभी कुछ मूल्य है, जब उनके अनुसार कार्य करने की प्रेरणा मिले । अन्यथा यह सब भी कोरी बुद्धिमत्ता मात्र है ।

सब ने सही जाग्रत् आत्माओं में से जो जीवन्त हों, वे आपत्तिकालीन समय को समझें और व्यामोह के दायरे से निकलकर बाहर आएँ । उन्हीं के बिना प्रगति का रथ रुका पड़ा है ।

साधना एक पराक्रम है, संघर्ष है, जो अपनी ही दुष्प्रवृत्तियों से करना होता है ।

आत्मा को निर्मल बनाकर, इंद्रियों का संयम कर उसे परमात्मा के साथ मिला देने की प्रक्रिया का नाम योग है ।

जैसे कोरे कागज पर ही पत्र लिखे जा सकते हैं, लिखे हुए पर नहीं, उसी प्रकार निर्मल अंतःकरण पर ही योग की शिक्षा और साधना अंकित हो सकती है ।

योग के दृष्टिकोण से तुम जो करते हो वह नहीं, बल्कि तुम कैसे करते हो, वह बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण है ।

यह आपत्तिकालीन समय है । आपत्ति धर्म का अर्थ है-सामान्य सुख-सुविधाओं की बात ताक पर रख देना और वह करने में जुट जाना जिसके लिए मनुष्य की गरिमा भरी अंतरात्मा पुकारती है ।

जीवन के प्रकाशवान् क्षण वे हैं, जो सत्कर्म करते हुए बीते ।

प्रखर और सजीव आध्यात्मिकता वह है, जिसमें अपने आपका निर्माण दुनिया वालों की अँधी भेड़चाल के अनुकरण से नहीं, वरन् स्वतंत्र विवेक के आधार पर कर सकना संभव हो सके ।

बलिदान वही कर सकता है, जो शुद्ध है, निर्भय है और योग्य है ।

जिस आदर्श के व्यवहार का प्रभाव न हो, वह फिजूल है और जो व्यवहार आदर्श प्रेरित न हो, वह भयंकर है ।

भगवान जिसे सच्चे मन से प्यार करते हैं, उसे अग्नि परीक्षाओं में होकर गुजारते हैं ।

हम अपनी कमियों को पहचानें और इन्हें हटाने और उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियाँ स्थापित करने का उपाय सोचें, इसी में अपना व मानव मात्र का कल्याण है ।

प्रगति के लिए संघर्ष करो । अनीति को रोकने के लिए संघर्ष करो और इसलिए भी संघर्ष करो कि संघर्ष के कारणों का अन्त हो सके ।

धर्म की रक्षा और अधर्म का उन्मूलन करना ही अवतार और उसके अनुयायियों का कर्त्तव्य है । इसमें चाहे निजी हानि कितनी ही होती हो, कठिनाई कितनी ही उठानी पड़ती हों ।

अवतार व्यक्ति के रूप में नहीं, आदर्शवादी प्रवाह के रूप में होते हैं और हर जीवन्त आत्मा को युगधर्म निबाहने के लिए बाधित करते हैं ।

शरीर और मन की प्रसन्नता के लिए जिसने आत्म-प्रयोजन का बलिदान कर दिया, उससे बढ़कर अभागा एवं दुर्बुद्धि और कौन हो सकता है?

जीवन के आनन्द गौरव के साथ, सम्मान के साथ और स्वाभिमान के साथ जीने में है ।

आचारनिष्ठ उपदेशक ही परिवर्तन लाने में सफल हो सकते हैं । अनधिकारी धर्मोपदेशक खोटे सिक्के की तरह मात्र विक्षोभ और अविश्वास ही भड़काते हैं ।

इन दिनों जाग्रत् आत्मा मूक दर्शक बनकर न रहे । बिना किसी के समर्थन, विरोध की परवाह किए आत्म-प्रेरणा के सहारे स्वयंमेव अपनी दिशाधारा का निर्माण-निर्धारण करें ।

जो भौतिक महत्त्वाकांक्षियों की बेतरह कटौती करते हुए समय की पुकार पूरी करने के लिए बढ़े-चढ़े अनुदान प्रस्तुत करते और जिसमें महान् परम्परा छोड़ जाने की ललक उफनती रहे, यही है-प्रज्ञापुत्र शब्द का अर्थ ।

दैवी शक्तियों के अवतरण के लिए पहली शर्त है- साधक की पात्रता, पवित्रता और प्रामाणिकता ।

आशावादी हर कठिनाई में अवसर देखता है, पर निराशावादी प्रत्येक अवसर में कठिनाइयाँ ही खोजता है ।
चरित्रवान् व्यक्ति ही किसी राष्ट्र की वास्तविक सम्पदा है ।

व्यक्तिगत स्वार्थों का उत्सर्ग सामाजिक प्रगति के लिए करने की परम्परा जब तक प्रचलित न होगी, तब तक कोई राष्ट्र सच्चे अर्थों में सार्मथ्यवान् नहीं बन सकता है ।

युग निर्माण योजना का लक्ष्य है-शुचिता, पवित्रता, सच्चरित्रता, समता, उदारता, सहकारिता उत्पन्न करना ।
भुजाएँ साक्षात् हनुमान हैं और मस्तिष्क गणेश, इनके निरन्तर साथ रहते हुए किसी को दरिद्र रहने की आवश्यकता नहीं ।

विद्या की आकांक्षा यदि सच्ची हो, गहरी हो तो उसके रहते कोई व्यक्ति कदापि मूर्ख, अशिक्षित नहीं रह सकता ।

मनुष्य दुःखी, निराशा, चिंतित, उदिग्न बैठा रहता हो तो समझना चाहिए सही सोचने की विधि से अपरिचित होने का ही यह परिणाम है ।

धर्म अंतःकरण को प्रभावित और प्रशासित करता है, उसमें उत्कृष्टता अपनाने, आदर्शों को कार्यान्वित करने की उमंग उत्पन्न करता है ।

जीवन साधना का अर्थ है- अपने समय, श्रम और साधनों का कण-कण उपयोगी दिशा में नियोजित किये रहना ।

निकृष्ट चिंतन एवं घृणित कर्तृत्व हमारी गौरव गरिमा पर लगा हुआ कलंक है ।

आत्मा का परिष्कृत रूप ही परमात्मा है ।

हम कोई ऐसा काम न करें, जिसमें अपनी अंतरात्मा ही अपने को धिक्कारे ।

अपनी दुष्टताएँ दूसरों से छिपाकर रखी जा सकती हैं, पर अपने आप से कुछ भी छिपाया नहीं जा सकता ।

किसी महान् उद्देश्य की ओर न चलना उतनी लज्जा की बात नहीं होती, जितनी कि चलने के बाद कठिनाइयों के भय से पीछे हट जाना ।

महानता का गुण न तो किसी के लिए सुरक्षित है और न प्रतिबंधित । जो चाहे अपनी शुभेच्छाओं से उसे प्राप्त कर सकता है ।

सच्ची लगन तथा निर्मल उद्देश्य से किया हुआ प्रयत्न कभी निष्फल नहीं जाता ।

खरे बनिये, खरा काम कीजिए और खरी बात कहिए । इससे आपका हृदय हल्का रहेगा ।

मनुष्य जन्म सरल है, पर मनुष्यता कठिन प्रयत्न करके कमानी पड़ती है ।

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।

सज्जनों की कोई भी साधना कठिनाइयों में से होकर निकलने पर ही पूर्ण होती है ।

असत् से सत् की ओर, अंधकार से आलोक की और विनाश से विकास की ओर बढ़ने का नाम ही साधना है ।

किसी सदुद्देश्य के लिए जीवन भर कठिनाइयों से जूझते रहना ही महापुरुष होना है ।

अपना मूल्य समझो और विश्वास करो कि तुम संसार के सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति हो ।

उत्कृष्ट जीवन का स्वरूप है-दूसरों के प्रति नम्र और अपने प्रति कठोर होना ।

वही जीवति है, जिसका मस्तिष्क ठण्डा, रक्त गरम, हृदय कोमल और पुरुषार्थ प्रखर है ।

चरित्र का अर्थ है- अपने महान् मानवीय उत्तरदायित्वों का महत्त्व समझना और उसका हर कीमत पर निर्वाह करना ।

मनुष्य एक भटका हुआ देवता है । सही दिशा पर चल सके, तो उससे बढ़कर श्रेष्ठ और कोई नहीं ।

अपने अज्ञान को दूर करके मन-मन्दिर में ज्ञान का दीपक जलाना भगवान् की सच्ची पूजा है ।

जो बीत गया सो गया, जो आने वाला है वह अज्ञात है! लेकिन वर्तमान तो हमारे हाथ में है ।

हर वक्त, हर स्थिति में मुस्कराते रहिये, निर्भय रहिये, कर्त्तव्य करते रहिये और प्रसन्न रहिये ।

वह स्थान मंदिर है, जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक किन्तु ज्ञान की चेतनायुक्त देवता निवास करते हैं ।

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