लक्ष्यहीन कौवा।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

ϒ लक्ष्यहीन कौवा। ϒ

प्यारे दोस्तो – जीवन में लक्ष्य का हाेना ताे बहुत ज़रूरी है। बिना लक्ष्य का जीवन भेड़ चाल जीवन है, कहा जा रहे है क्यों जा रहे है कुछ भी पता नहीं।

kmsraj51-aimless-crow

एक बार एक नदी में हाथी की लाश बही जा रही थी। एक काैए ने लाश देखी, ताे प्रसन्न हाे उठा, तुरंत उस पर आ बैठा। यथेष्ट मांस खाया! नदी का जल पिया। उस लाश पर इधर-उधर फुदकते हुए काैए ने परम तृप्ति की डकार ली। वह सोचने लगा, अहा! यह ताे अत्यंत सुंदर यान है, यहा भाेजन और जल की भी कमी नहीं। फिर इसे छाेड़कर अन्यत्र क्यों भटकता फिरूं ?

काैवा नदी के साथ बहने वाली उस लाश के ऊपर कई दिनाें तक रमता रहा। भूख लगने पर वह लाश काे नाेचकर खा लेता, प्यास लगने पर नदी का पानी पी लेता। अगाध जलराशि, उसका तेज प्रवाह, किनारे पर दूर-दूर तक फैले प्रकृति के मनाेहर दृश्य इन्हें देख-देखकर वह विभाेर हाेता रहा।

नदी एक दिन आखिर महासागर में मिली। वह मुदित थी कि उसे अपना गंतव्य प्राप्त हुआ। सागर से मिलना ही उसका चरम लक्ष्य था, किंतु उस दिन लक्ष्यहीन कौए की ताे बड़ी दुर्गति हाे गई। चार दिन की माैज-मस्ती ने उसे ऐसी जगह ला पटका था, जहां उसके लिए न भाेजन था, न पेयजल और न ही काेई आश्रय। सब ओर सीमाहीन अनंत खारी जल-राशि तरंगायित हाे रही थी।

काैवा थका-हारा और भूखा-प्यासा कुछ दिन तक ताे चाराें दिशाओं में पंख फटकारता रहा, अपनी छिछली और टेढ़ी-मेढ़ी उड़ानाें से झूठा राैब फैलाता रहा, किंतु महासागर का ओर-छाेर उसे कहीं नजर नहीं आया। आखिरकार थककर, दुःख से कातर हाेकर वह सागर की उन्हीं गगनचुंबी लहराें में गिर गया। एक विशाल मगरमच्छ उसे निगल गया।

सीख – शारीरिक सुख में लिप्त मनुष्याें की भी गति उसी काैए की तरह हाेती है, जाे आहार और आश्रय काे ही परम गति मानते हैं और अंत में अनंत संसार रूपी सागर में समा जाते है।

जीत किसके लिए, हार किसके लिए।
ज़िदगीभर ये तकरार किसके लिए॥

जाे भी आया है वाे जायेगा एकदिन।
फिर ये इतना अहंकार किसके लिए॥

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

* अपनी आदतों को कैसे बदलें।

निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

क्या करें – क्या ना करें।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

* विचारों का स्तर श्रेष्ठ व पवित्र हो।

* अच्छी आदतें कैसे डालें।

KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

~KMSRAJ51

 

 

 

तांबे का सिक्का।

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ϒ तांबे का सिक्का। ϒ

एक राजा का जन्मदिन था। सुबह जब वह घूमने निकला, तो उसने तय किया कि वह रास्ते मे मिलने वाले पहले व्यक्ति को पूरी तरह खुश व संतुष्ट करेगा। उसे एक भिखारी मिला। भिखारी ने राजा से भीख मांगी, तो राजा ने भिखारी की तरफ एक तांबे का सिक्का उछाल दिया।

सिक्का भिखारी के हाथ से छूट कर नाली में जा गिरा। भिखारी नाली में हाथ डाल तांबे का सिक्का ढूंढ़ने लगा। राजा ने उसे बुला कर दूसरा तांबे का सिक्का दिया। भिखारी ने खुश होकर वह सिक्का अपनी जेब में रख लिया और वापस जाकर नाली में गिरा सिक्का ढूंढ़ने लगा।

राजा को लगा की भिखारी बहुत गरीब है, उसने भिखारी को चांदी का एक सिक्का दिया। भिखारी राजा की जय जयकार करता फिर नाली में सिक्का ढूंढ़ने लगा। राजा ने अब भिखारी को एक सोने का सिक्का दिया।

भिखारी खुशी से झूम उठा और वापस भाग कर अपना हाथ नाली की तरफ बढ़ाने लगा। राजा को बहुत खराब लगा। उसे खुद से तय की गयी बात याद आ गयी कि पहले मिलने वाले व्यक्ति को आज खुश एवं संतुष्ट करना है।

उसने भिखारी को बुलाया और कहा कि मैं तुम्हें अपना आधा राज-पाट देता हूं, अब तो खुश व संतुष्ट हो? भिखारी बोला, मैं खुश और संतुष्ट तभी हो सकूंगा जब नाली में गिरा तांबे का सिक्का मुझे मिल जायेगा।

हमारा हाल भी उस भिखारी जैसा ही है।

हमें भगवान(GOD) ने आध्यात्मिकता रूपी अनमोल खजाना दिया है और हम उसे भूलकर संसार रूपी नाली में तांबे के सिक्के निकालने के लिए जीवन गंवाते जा रहे है। परमात्मा को याद कियें बिन कैसे हो, बेड़ा तेरा पार जी। शवास हाथ से जा रहे हैं, कीमत बेशुमार जी।

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सकारात्मक सोच + निरंतर कार्य = सफलता।

स्वयं पर और स्व-कर्माे पर विश्वास माना सफलता का आधार(नींव) मज़बूत।

 ~KMSRAJ51

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

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“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की व्यर्थ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51

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भगवान पर सच्चा विश्वास।

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 भगवान पर सच्चा विश्वास।

एक अत्यंत गरीब महिला थी जो ईश्वरीय शक्ति पर बेइंतहा विश्वास करती थी। एक बार अत्यंत ही विकट स्थिति में आ गई, कई दिनों से खाने के लिए पुरे परिवार को कुछ नहीं मिला।

एक दिन उसने रेडियो के माध्यम से ईश्वर को अपना सन्देश भेजा कि वह उसकी मदद करे। यह प्रसारण एक नास्तिक ,घमण्डी और अहंकारी उद्योगपति ने सुना और उसने सोचा कि क्यों न इस महिला के साथ कुछ ऐसा मजाक किया जाये कि उसकी ईश्वर के प्रति आस्था डिग जाय।

उसने आपने सेक्रेटरी को कहा कि वह ढेर सारा खाना और महीने भर का राशन उसके घर पर देकर आ जाये, और जब वह महिला पूछे किसने भेजा है तो कह देना कि ” शैतान” ने भेजा है।

जैसे ही महिला के पास सामान पंहुचा पहले तो उसके परिवार ने तृप्त होकर भोजन किया, फिर वह सारा राशन अलमारी में रखने लगी।

जब महिला ने पूछा नहीं कि यह सब किसने भेजा है तो सेक्रेटरी से रहा नहीं गया और पूछा- आपको क्या जिज्ञासा नही होती कि यह सब किसने भेजा है।

उस महिला ने बेहतरीन जवाब दिया- मैं इतना क्यों सोंचू या पूंछू, मुझे भगवान पर पूरा भरोसा है, मेरा भगवान जब आदेश देते है तो शैतानों को भी उस आदेश का पालन करना पड़ता है।

Jaya Kishori Ji-kmsraj51

जया शर्मा किशोरी जी।

Post share by जया शर्मा किशोरी जी। We are grateful to “Jaya Kishori Ji” for sharing this inspirational Hindi Story for Kmsraj51.com readers.

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

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अधूरी भक्ति।

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ϒ अधूरी भक्ति। ϒ

Incomplete Bhakti-kmsraj51

मृत्यु के उपरांत एक साधु तथा डाकू साथ-साथ यमराज की सभा में पहुँचे। यमराज ने अपने बही-खातों की जाँच-पड़ताल करके उनसे कहा-यदि तुम दोनों को अपने लिए कुछ कहना हो तो कह सकते हो।

“डाकू विनम्र स्वर में बोला-महाराज मैंने जीवन में बहुत पाप किए हैं। जो भी दंड विधान आपके यहाँ मेरे लिए हो वह करें। मैं प्रस्तुत हूँ।” फिर साधु बोले-आप तो जानते ही हैं, मैंने जीवनभर भक्ति की है। कृपया मेरे सुख साधनों का प्रबंध शीघ्र करवाएँ।

“यमराज ने दोनों की इच्छा सुनकर डाकू से कहा-तुम्हें यह दंड दिया जाता है कि तुम आज से इस साधु की सेवा किया करो।” डाकू ने सिर झुकाकर आज्ञा शिरोधार्य की, परंतु साधु ने आपत्ति की-महाराज इस दुष्ट के स्पर्श से मैं भ्रष्ट हो जाऊँगा। मेरी भक्ति तथा तपस्या खंडित हो जाएगी।

अब यमराज के आदेश के स्वर में आक्रोश बोले-निरपराध भोले व्यक्तियों का वध करने वाला तो इतना विनम्र हो गया कि तुम्हारी सेवा करने को तत्पर है और तुम हो कि वर्षों की तपस्या के पश्चात् भी यह न जान सके कि सबमें एक ही आत्म-तत्त्व समाया हुआ है। जाओ तुम्हारी भक्ति अभी अधूरी है, अतः आज से तुम इसकी सेवा किया करो।’

सीख: अहंकार काे त्याग कर, विनम्रता के गुण काे धारण करना ही सच्ची भक्ति हैं।

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सकारात्मक सोच + निरंतर कार्य = सफलता।

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भटकता इंसान।

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ϒ भटकता इंसान। ϒ

Wandering-humen-kmsraj51

भटकता इंसान।

एक किसान के घर एक दिन उसका कोई परिचित मिलने आया। उस समय वह घर पर नहीं था। उसकी पत्नी ने कहा-‘वह खेत पर गए हैं। मैं बच्चे को बुलाने के लिए भेजती हूं। तब तक आप इंतजार करें।’ कुछ ही देर में किसान खेत से अपने घर आ पहुंचा। उसके साथ-साथ उसका पालतू कुत्ता भी आया। कुत्ता जोरों से हांफ रहा था। उसकी यह हालत देख, मिलने आए व्यक्ति ने किसान से पूछा-‘क्या तुम्हारा खेत बहुत दूर है?’ किसान ने कहा-‘नहीं, पास ही है। लेकिन आप ऐसा क्यों पूछ रहे हैं?’ उस व्यक्ति ने कहा-‘मुझे यह देखकर आश्चर्य हो रहा है कि तुम और तुम्हारा कुत्ता दोनों साथ-साथ आए, लेकिन तुम्हारे चेहरे पर रंच मात्र थकान नहीं जबकि कुत्ता बुरी तरह से हांफ रहा है।’ किसान ने कहा-‘मैं और कुत्ता एक ही रास्ते से घर आए हैं। मेरा खेत भी कोई खास दूर नहीं है। मैं थका नहीं हूं। मेरा कुत्ता थक गया है। इसका कारण यह है कि मैं सीधे रास्ते से चलकर घर आया हूं, मगर कुत्ता अपनी आदत से मजबूर है। वह आसपास दूसरे कुत्ते देखकर उनको भगाने के लिए उसके पीछे दौड़ता था और भौंकता हुआ वापस मेरे पास आ जाता था।

फिर जैसे ही उसे और कोई कुत्ता नजर आता, वह उसके पीछे दौड़ने लगता। अपनी आदत के अनुसार उसका यह क्रम रास्ते भर जारी रहा।
इसलिए वह थक गया है।’ देखा जाए तो यही स्थिति आज के इंसान की भी है। जीवन के लक्ष्य तक पहुंचना यूं तो कठिन नहीं है, लेकिन लोभ, मोह अहंकार और ईर्ष्या जीव को उसके जीवन की सीधी और सरल राह से भटका रही है। अपनी क्षमता के अनुसार जिसके पास जितना है, उससे वह संतुष्ट नहीं। आज लखपति, कल करोड़पति, फिर अरबपति बनने की चाह में उलझकर इंसान दौड़ रहा है। अनेक लोग ऐसे हैं जिनके पास सब कुछ है।


भरा-पूरा परिवार, कोठी, बंगला, एक से एक बढ़िया कारें, क्या कुछ नहीं है। फिर भी उनमें बहुत से दुखी रहते हैं। बड़ा आदमी बनना, धनवान
बनना बुरी बात नहीं, बनना चाहिए। यह हसरत सबकी रहती है। उसके लिए स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होगी तो थकान नहीं होगी। लेकिन दूसरों के सामने खुद को बड़ा दिखाने की चाह के चलते आदमी राह से भटक रहा है और यह भटकाव ही इंसान को थका रहा है।

पढ़ेंविमल गांधी जी कि शिक्षाप्रद कविताओं का विशाल संग्रह।

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खुद के गिरहबान में झांक कर ताे देख लाे।

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ϒ खुद के गिरहबान में झांक कर ताे देख लाे। ϒ

एक गाँव में एक किसान रहता था। जो दूध से दही और मक्खन बनाकर बेचने का काम करता था। एक दिन उसकी बीवी ने उसे मक्खन तैयार करके दिया। वो उसे बेचने के लिए अपने गाँव से शहर की तरफ रवाना हुवा।

वो मक्खन गोल पेढ़ो की शकल में बना हुवा था और हर पेढ़े का वज़न एक Kg था। शहर मे किसान ने उस मक्खन को हमेशा की तरह एक दुकानदार को बेच दिया, और दुकानदार से चायपत्ती, चीनी, तेल और साबुन वगैरह खरीदकर वापस अपने गाँव को रवाना हो गया।

किसान के जाने के बाद। दुकानदार ने मक्खन को फ्रिज़र मे रखना शुरू किया। उसे खयाल आया के क्यूँ ना एक पेढ़े का वज़न किया जाए, वज़न करने पर पेढ़ा सिर्फ 900 gm. का निकला।

हैरत और निराशा से उसने सारे पेढ़े तोल डाले मगर किसान के लाए हुए सभी पेढ़े 900-900 gm. के ही निकले।

अगले हफ्ते फिर किसान हमेशा की तरह मक्खन लेकर जैसे ही दुकानदार की दहलीज़ पर चढ़ा, दुकानदार ने किसान से चिल्लाते हुए कहा, के वो दफा हो जाए, किसी बे-ईमान और धोखेबाज़ मनुष्य से कारोबार करना उसे गवारा नही।

900 gm. मक्खन को पूरा एक Kg. कहकर बेचने वाले शख्स की वो शक्ल भी देखना गवारा नही करता। किसान ने बड़ी ही आजिज़ी (विनम्रता) से दुकानदार से कहा “मेरे भाई मुझसे बद-ज़न ना हो हम तो गरीब और बेचारे लोग है, हमारी माल तोलने के लिए बाट (वज़न) खरीदने की हैसियत कहाँ” आपसे जो एक किलो चीनी लेकर जाता हूँ उसी को तराज़ू के एक पलड़े मे रखकर दूसरे पलड़े मे उतने ही वज़न का मक्खन तोलकर ले आता हूँ।

दोस्तों,

इस कहानी को पढ़ने के बाद आप क्या महसूस करते हैं, किसी पर उंगली उठाने से पहले क्या हमें अपने गिरहबान में झांक कर देखने की ज़रूरत नही……? कहीं ये खराबी हमारे अंदर ही तो मौजूद नही…..?

 अपने भीतर की कमजोरी की जाँच करें।

⇒ किसी पर उंगली उठाने से पहले स्वयं कि कमजोरी को देखे।

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सर्वश्रेष्ठ कौन है।

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© “जो दूसरों के बारे में सोंचने और उनका भला करने से नही चुकता, वही सर्वश्रेष्ठ है ।” ®

बहुत समय पहले की बात है। एक बिख्यात ऋषि गुरुकुल में बालको को शिक्षा प्रदान किया करते थे। उनके गुरुकुल में राजा महाराजा के पुत्रों से लेकर साधारण परिवार के लड़के भी पढ़ा करते थे।

वर्षो से शिक्षा प्राप्त कर रहे शिष्यों की शिक्षा आज पूर्ण हो रही थी, और सभी बड़े उत्साह के साथ अपने अपने घरो को लौटने की तैयारी कर रहे थे क़ि तभी ऋषि की तेज आवाज सभी के कानो में पड़ी, आप सभी मैदान में एकत्रित हो जाएं।

आदेश सुनते ही शिष्यों ने ऐसा किया। ऋषिवर बोले, प्रिय शिष्यों ! आज इस गुरुकुल में आपका अंतिम दिन है। मैं चाहता हूँ कि यहाँ से प्रस्थान करने से पहले आप सभी एक बाधा दौड़ में हिस्सा लें।

दौड़ शुरू हुई। वे तमाम बाधाओ को पार करते हुए, अंत में एक सुरंग के पास पहुँचे।

सुरंग में अँधेरा था और नुकीले पत्थर जैसे कुछ चमक रहे थे। जिनके चुभने से असहनीय पीड़ा का अनुभव होता था। दौड़ के बाद सभी सुरंग में अलग अलग व्यवहार कर रहे थे। दौड़ पूरा करने की होड़ में सही गलत सब कुछ भूल गए।

खैर दौड़ जैसे तैसे सभी ने पूरी की और ऋषिवर के समक्ष एकत्रित हुए। ऋषि बोले, मैं देख रहा हूँ, कुछ ने दौड़ बहुत जल्दी पूरी की और कुछ ने काफी समय लगाया। ऐसा क्यों हुआ ?

यह सुनकर एक शिष्य ने बोला, हम सभी लगभग एक ही साथ दौड़ रहे थे, पर सुरंग में पहुँचते ही स्थिति बदल गयी। कोई-कोई तो एक दूसरे को धकेलते हुए आगे बढ़ रहे थे, तो कोई संभल संभलकर आगे बढ़ रहा था।

कुछ तो ऐसे भी थे जो पैर में चुभ रहे पत्थरों को उठाकर अपनी जेब में रख रहे थे, ताकि बाद में आने वालों को पीड़ा न सहनी पड़े। इसीलिए सबने अलग-अलग समय में दौड़ पूरी की। ठीक है जिन्होंने भी पत्थर उठायें हैं वो आगे आएं और मुझे दिखाएं, ऋषि ने आदेश दिया।

कुछ शिष्य आगे आये और पत्थर निकालने लगे। पर ये क्या, जिन्हें वो पत्थर समझ रहे थे वो तो बहुमूल्य हीरे है। सभी आश्चर्य में पड़ गए। ऋषि ने कहा इन हीरों को मैंने ही सुरंग में रखा था। दुसरों के विषय में सोंचने वाले शिष्यों को ये मेरा उपहार है।

“जो दूसरों के बारे में सोंचने और उनका भला करने से नही चुकता, वही श्रेष्ठ है ।”

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इज्ज़त, क़र्ज़ और पिता का सम्मान।

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ϒ तीन विकल्प- इज्जत, क़र्ज़ और पिता का सम्मान। ϒ

बहुत समय पहले की बात है, किसी गाँव में एक किसान रहता था। उस किसान की एक बहुत ही सुन्दर बेटी थी। दुर्भाग्यवश, गाँव के जमींदार से उसने बहुत सारा धन उधार लिया हुआ था। जमीनदार बूढा और कुरूप था। किसान की सुंदर बेटी को देखकर उसने सोचा क्यूँ न कर्जे के बदले किसान के सामने उसकी बेटी से विवाह का प्रस्ताव रखा जाये।

जमींदार किसान के पास गया और उसने कहा – तुम अपनी बेटी का विवाह मेरे साथ कर दो, बदले में मैं तुम्हारा सारा कर्ज माफ़ कर दूंगा। जमींदार की बात सुन कर किसान और किसान की बेटी के होश उड़ गए।

तब जमींदार ने कहा – चलो गाँव की पंचायत के पास चलते हैं और जो निर्णय वे लेंगे उसे हम दोनों को ही मानना होगा। वो सब मिल कर पंचायत के पास गए और उन्हें सब कह सुनाया।

उनकी बात सुन कर पंचायत ने थोडा सोच विचार किया और कहा-

ये मामला बड़ा उलझा हुआ है अतः हम इसका फैसला किस्मत पर छोड़ते हैं। जमींदार सामने पड़े सफ़ेद और काले रोड़ों के ढेर से एक काला और एक सफ़ेद रोड़ा उठाकर एक थैले में रख देगा फिर लड़की बिना देखे उस थैले से एक रोड़ा उठाएगी, और उस आधार पर उसके पास तीन विकल्प होंगे :

१. अगर वो काला रोड़ा उठाती है तो उसे जमींदार से शादी करनी पड़ेगी और उसके पिता का कर्ज माफ़ कर दिया जायेगा।

२. अगर वो सफ़ेद पत्थर उठती है तो उसे जमींदार से शादी नहीं करनी पड़ेगी और उसके पिता का कर्ज भी माफ़ कर दिया जायेगा।

३. अगर लड़की पत्थर उठाने से मना करती है तो उसके पिता को जेल भेज दिया जायेगा।

पंचायत के आदेशानुसार जमींदार झुका और उसने दो रोड़े उठा लिए। जब वो रोड़ा उठा रहा था तब तेज आँखों वाली किसान की बेटी‬ ने देखा कि उस जमींदार ने दोनों काले रोड़े ही उठाये हैं और उन्हें थैले में डाल दिया है।

लड़की इस स्थिति से घबराये बिना सोचने लगी कि वो क्या कर सकती है, उसे तीन रास्ते नज़र आये:

१. वह रोड़ा उठाने से मना कर दे और अपने पिता को जेल जाने दे।

२. सबको बता दे कि जमींदार दोनों काले पत्थर उठा कर सबको धोखा दे रहा हैं।

३. वह चुप रह कर काला पत्थर उठा ले और अपने पिता को कर्ज से बचाने के लिए जमींदार से शादी करके अपना जीवन बलिदान कर दे।

उसे लगा कि दूसरा तरीका सही है, पर तभी उसे एक और भी अच्छा उपाय सूझा, उसने थैले में अपना हाथ डाला और एक रोड़ा अपने हाथ में ले लिया। और बिना रोड़े की तरफ देखे उसके हाथ से फिसलने का नाटक किया, उसका रोड़ा अब हज़ारों रोड़ों के ढेर में गिर चुका था और उनमे ही कहीं खो चुका था।

लड़की ने कहा – हे भगवान! मैं कितनी फूहड़ हूँ। लेकिन कोई बात नहीं। आप लोग थैले के अन्दर देख लीजिये कि कौन से रंग का रोड़ा बचा है, तब आपको पता चल जायेगा कि मैंने कौन सा उठाया था जो मेरे हाथ से गिर गया।

थैले में बचा हुआ रोड़ा काला था, सब लोगों ने मान लिया कि लड़की ने सफ़ेद पत्थर ही उठाया था। जमींदार के अन्दर इतना साहस नहीं था कि वो अपनी चोरी मान ले। लड़की ने अपनी सोच से असम्भव को संभव कर दिया।

प्यारे दोस्तों,

हमारे जीवन‬ में भी कई बार ऐसी परिस्थितियां आ जाती हैं जहाँ सबकुछ धुंधला दिखता है, हर रास्ता नाकामयाबी की तरफ जाता महसूस होता है पर ऐसे समय में यदि हम परंपरा से हटकर सोचने का प्रयास करें तो उस लड़की की तरह अपनी मुश्किलें दूर कर सकते हैं।

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान और ध्यान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

* अपनी आदतों को कैसे बदलें।

निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

क्या करें – क्या ना करें।

∗ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

* विचारों का स्तर श्रेष्ठ व पवित्र हो।

* अच्छी आदतें कैसे डालें।

KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

CYMT-100-10 WORDS KMS

निश्चय ही आप विजयी होंगे, यदि आप अपनी दुर्बलता (Weakness) को अपनी ताकत में तब्दील करना सीख लें।

 

 

 

रिश्ताे में प्यार।

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रिश्ताे में प्यार। 

दोस्तों कहते हैं रिश्ताे में प्यार हाेना चाहिए। तभी रिश्ते बरकरार (बने) रहते हैं। अच्छी बाते हमे याद रखना चाहिए, और बुरे विचार मन में नहीं आने देना चाहिए। रिश्ताे में प्यार हाेना बहुत जरूरी हैं। बिना प्यार के रिश्ताे में दरार (मनमुटाव) ही आती हैं।

 रिश्ताे में कैसा हाेना चाहिए प्यार। एक छोटी कहानी के माध्यम से समझते हैं।

दो भाई समुद्र के किनारे टहल रहे थे,
दोनों के
बीच किसी बात को लेकर बहस
हो गई…!!

बड़े भाई
ने छोटे भाई को थप्पड़ मार दिया…!!

छोटे भाई ने
कुछ नहीं कहा…!!
सिर्फ रेत पे
लिखा-
“आज मेरे बड़े भाई ने मुझे मारा”

अगले दिन दोनों फिर
समुद्र किनारे घूमने के लिए
निकले छोटा भाई
समुद्र में नहाने लगा…!!

अचानक
वो डूबने लगा बड़े
भाई ने उसे बचाया…!!
छोटे भाई ने पत्थर पे
लिखा-
” आज मेरे भाई ने मुझे बचाया “

बड़े भाई
ने पूछा जब मैने तुम्हे मारा तब
तुमने रेत पे लिखा और
जब तुमको बचाया तो पत्थर पे
लिखा ऐसा क्यों…??

विवेकशील छोटे
भाई ने जवाब
दिया –
”जब हमे कोई दुःख दे तो रेत पे लिखना चाहिए”
ताकि
वे जल्दी मिट जाये…!!

परन्तु
जब कोई हमारे लिए अच्छा करता है
तो
हमें पत्थर पर
लिखना चाहिए…??
जहा मिट ना पाएं…!!’

भाव ये हैं की हमे अपने साथ हुई बुरी घटना को भूल जाना चाहिए…!!
जबकि अच्छी घटना को सदैव याद रखना चाहिए…!!

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* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

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* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

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किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए हिम्मत और उमंग-उत्साह बहुत जरूरी है।

जहाँ उमंग-उत्साह नहीं होता वहाँ थकावट होती है और थका हुआ कभी सफल नहीं होता।

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उदारता और ज्यादा क्यों ना की जीवन में।

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उदारता और ज्यादा क्यों ना की जीवन में।

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उदारता और ज्यादा क्यों ना की जीवन में।

एक काफिला सफ़र के दौरान अँधेरी सुरंग से गुजर रहा था। उनके पैरों में कंकरिया चुभी, कुछ लोगों ने इस ख्याल से कि किसी और को ना चुभ जाये, नेकी की खातिर उठाकर जेब में रख ली । कुछ ने ज्यादा उठाई कुछ ने कम । जब अँधेरी सुरंग से बाहर आये तो देखा वो हीरे थे। जिन्होंने कम उठाये वो पछताए कि ज्यादा क्यों नहीं उठाए । जिन्होंने नहीं उठाए वो और पछताए । दुनिया में जिन्दगी की मिसाल इस अँधेरी सुरंग जैसी है और नेकी यहाँ कंकरियों की मानिंद है । इस जिंदगी में जो नेकी की वो आखिर में हीरे की तरह कीमती होगी और इन्सान तरसेगा कि और ज्यादा क्यों ना की। 

इसलिए मित्राें जीवन में जितना भी ज्यादा से ज्यादा हाे सके दूसराे का भी नेकी(भलाई) करें।

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पानी का ग्लास।

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पानी का ग्लास।

एक प्रोफ़ेसर ने अपने हाथ में पानी से भरा एक ग्लास पकड़ते हुए कक्षा शुरू की। उन्होंने उसे ऊपर उठा कर सभी छात्रों को दिखाया और पूछा – “आपके हिसाब से ग्लास का वज़न कितना होगा ?”

‘५० ग्राम, १०० ग्राम, १२५ ग्राम’। छात्रों ने उत्तर दिया।

“जब तक मैं इसका वज़न ना कर लूँ, मैं इसका सही वज़न नहीं बता सकता”। प्रोफ़ेसर ने कहा पर मेरा सवाल है –

यदि मैं इस ग्लास को थोड़ी देर तक इसी तरह उठा कर पकडे रहूँ तो क्या होगा ?

‘कुछ नहीं’। छात्रों ने कहा।

‘अच्छा, अगर मैं इसे इसी तरह एक घंटे तक उठाये रहूँ तो क्या होगा ?” प्रोफ़ेसर ने पूछा।

‘आपका हाथ दर्द होने लगेगा।’ एक छात्र ने कहा।

”तुम सही हो, अच्छा अगर मैं इसे इसी तरह पूरे दिन उठाये रहूँ तो का होगा ?”

“आपका हाथ सुन्न हो सकता है, आपके मांसपेसियों में भारी तनाव आ सकता है, लकवा मार सकता है और पक्का आपको अस्पताल जाना पड़ सकता है।” किसी छात्र ने कहा, और बाकी सभी हंस पड़े।

“बहुत अच्छा , पर क्या इस दौरान ग्लास का वज़न बदला?” प्रोफ़ेसर ने पूछा।

उत्तर आया – “नहीं”

“तब भला हाथ में दर्द और मांशपेशियों में तनाव क्यों आया ?”

छात्र अचरज में पड़ गए।

फिर प्रोफ़ेसर ने पूछा – ”अब दर्द से निजात पाने के लिए मैं क्या करूँ ?”

ग्लास को नीचे रख दीजिये। एक छात्र ने कहा।

”बिलकुल सही।” प्रोफ़ेसर ने कहा।

जीवन की समस्याएं भी कुछ इसी तरह होती हैं। इन्हें कुछ देर तक अपने दिमाग में रखिये और लगेगा की सब कुछ ठीक है। उनके बारे में ज्यादा देर सोचिये और आपको तकलीफ होने लगेगी, और इन्हें और भी देर तक अपने दिमाग में रखिये और ये आपको लकवाग्रस्त करने लगेंगी। और आप कुछ नहीं कर पायेंगे।

अपने जीवन में आने वाली चुनौतियों और समस्याओं के बारे में सोचना ज़रूरी है, पर उससे भी ज्यादा ज़रूरी है दिन के अंत में सोने जाने से पहले उन्हें नीचे रखना।इस तरह से, आप तनाव में भी नहीं रहेंगे, आप हर रोज़ मजबूती और ताजगी के साथ उठेंगे और सामने आने वाली किसी भी चुनौती का सामना कर सकेंगे।

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प्रभु हममें अपनी मौजूदगी का अहसास हरदम कराते रहते।

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प्रभु हममें अपनी मौजूदगी का अहसास हरदम कराते रहते।

एक संत के आश्रम में दीक्षा ग्रहण समारोह चल रहा था। आश्रम में पधारे महा गुरु ने दीक्षा देने से पहले शिष्यों से प्रश्न किया, ‘ईश्वर कहां बसते हैं?’ किसी ने कहा संसार में तो किसी ने जीव-जंतुओं में। किसी ने पेड़-पौधों में बताया तो किसी ने ब्रहमांड में। शिष्यों के उत्तरों से नाखुश गुरुजी बोले- ‘परमात्मा प्रकृति के रोम-रोम में तो बसते ही हैं, लेकिन वे मनुष्य की अंतरात्मा में सर्वाधिक वास करते हैं। इसीलिए कहा गया है कि आत्मा परमात्मा का एक अंश है।’

हम सभी जानते हैं कि हमारे शरीर में परमात्मा की आत्मा का वास है। हमारा नश्वर शरीर एक दिन पृथ्वी में मिल जाएगा और आत्मा परमात्मा में एक हो जाएगी। अंत में रह जाएंगे तो सिर्फ हमारे द्वारा किए गए सत्कर्म। इसलिए जीवन रहते कुछ न कुछ अच्छा कर जाना जरूरी है। कम से कम जरूरतमंदों की मदद कर कुछ पुण्य ही कमाने का प्रयास करें, ताकि नेक कर्मों द्वारा हम खुद को हासिल कर सकें।

हमारे मन, दिल, और शरीर पर रजस, तमस और सात्विक गुणों का प्रभाव शुरू से ही पड़ने लगता है। जो इंसान अपनी जीवन यात्रा के दौरान इन सभी पर संतुलन रख पाता है वही आगे चलकर अपने इष्ट देवता को खोज पाता है। जिसने सत्कर्मों से खुद को खोज लिया है, उसने दूसरों को भी पा लिया है। ऐसे व्यक्ति शाश्वत परमेश्वर का स्वरूप होते हैं। उनका अपने अहम पर काबू होता है। वे स्वभाव से निर्मल, मन से कोमल, दिल के प्रेमी और आत्मा के मधुर होते हैं। वे हमेशा दूसरों का भला पहले चाहते हैं।

ऐसे लोगों ने स्वयं को खुद से जीत लिया है। वे अपनी आत्मा की आवाज जानते और सुनते हैं। उसमें समाये ईश्वर के स्वरूप को भी पहचानते हैं। वे खुद ईश्वर का प्रतीक हैं। ईश्वर से संवाद करना ऐसे इंसानों के लिए बहुत आसान होता है। यह संभव है तो फिर ईश्वर को कहीं ओर क्यों खोजें? जो लोग ईश्वर को नहीं पहचान पाते, उसे आत्मसात नहीं कर पाते, उन पर दुखों का पहाड़ यहीं गिरता है। वे अंधकार में जीते हैं। अधूरी लालसा पूरा करने के लिए उनकी आत्मा अपने परमात्मा को खोजने में लगी रहती है।

बाइबल में लिखा है- ‘क्या आप यह नहीं जानते कि आपका शरीर पवित्र आत्मा का मंदिर है? वह आप में निवास करता है और आपको ईश्वर से मिला है।’ अगर हम अपने भीतर बसने वाले ईश्वर को पहचान लें तो हमारी आत्मा का मिलन परमात्मा से हो जाएगा। जरूरत है बस अपने अंदर झांकने की। क्योंकि प्रभु हममें अपनी मौजूदगी का अहसास बराबर कराते रहते हैं। बस जरा ध्यान देने की जरूरत है? आप ही परमात्मा हैं, आपके द्वारा किए गए सभी कार्य परम हैं। आइये, संसार में परमत्व लाएं और क्यों न कुछ अच्छा कर जाएं।

Source: http://navbharattimes.indiatimes.com/

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परोपकारी बनें, स्वार्थी नहीं।

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परोपकारी बनें, स्वार्थी नहीं।

परोपकारी बनें, स्वार्थी नहीं।

एक दिन मैं किसी काम से कहीं जा रहा था। रास्ते में बहुत से लोग आते-जाते दिखे, लेकिन तभी एक बुजुर्ग महिला मुझे मिलीं। उन्होंने मुझसे कहा, ‘बेटा, मुझे मेट्रो स्टेशन के गेट तक छोड़ दो।’ मैंने उनका हाथ पकड़ा और उन्हें मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियों के पास तक छोड़ दिया। वह प्रेम से सौ रुपये देने लगीं तो मैंने लेने से इनकार कर दिया और कहा, ‘ये रुपये आप उस जरूरतमंद इंसान को दे दीजिए, जिसे इसकी जरूरत हो।’ इस पर वह मुझे बहुत गौर से देखने लगीं और कहने लगीं- ‘बेटा, तुम हमेशा यही कोशिश करना और जरूरतमंदों की मदद करते रहना।’

वह दिन आज तक मुझे याद है। स्वार्थ भावना से रहित दूसरों के कल्याण के लिए मन, वचन और कर्म से किया गया कार्य परोपकार कहलाता है। पारस्परिक विरोध की भावना का नाश करना और प्रेम-भाव को बढ़ाना परोपकार कहलाता है। प्रकृति हमें निरंतर यह संदेश देती रहती है। पवन, प्राण वायु देकर हमारी गति को संचालित करता है। नदियां अपना अनंत जल जगत के लिए अर्पित कर देती हैं। वृक्ष अपनी छाया और फल दूसरों के लिए प्रस्तुत करते हैं।

यदि हम महान लोगों के इतिहास को देखें तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और मदर टेरेसा की याद आना स्वाभाविक है। गांधी जी ने देश के हित के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर दिया और मदर ने अनगिनत अनाथों, विकलागों और रोगियों को अपने सीने से लगाया। लेकिन आज का मनुष्य इंसानियत को भूलता जा रहा है। वह परोपकारी लोगों को मूर्ख समझने लगा है। ऐसे लोग उसके लिए हंसी का पात्र बन जाते हैं।

आमतौर पर लोगों के हृदय से दया, करुणा और सहानुभूति जैसी मानवीय प्रवृत्तियां निकल भागी हैं। आज का मनुष्य स्वार्थ की जीती जागती परिभाषा बनकर रह गया है। राह चलते सड़क पर अगर कोई असहाय मिल जाए तो उसे देखते ही लोग अपना मुंह मोड़ लेते हैं। सड़क पर पड़ा कराहता घायल और दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति जैसे उसके लिए ध्यान देने का विषय ही नहीं रह गया है। जबकि सच यह है कि इंसान इस संसार में परोपकार के लिए ही जन्म लेता है।

मानव जीवन की सार्थकता इसी में है कि अपने बारे में सोचने के साथ-साथ हम दूसरों के बारे में भी सोचें। परोपकार करने से खुद को भी खुशी मिलती है। कभी किसी जरूरतमंद की मदद करके देखिए, आप पाएंगे कि अपने जीने की सार्थकता का अहसास होने लगा है। परोपकारी व्यक्ति दुखियों के प्रति उदार, निर्बलों के रक्षक और जन-कल्याण की भावना से ओत-प्रोत होते हैं। परोपकार से जो आनंद हमें मिलता है, वह एकदम अलौकिक होता है। इसीलिए परोपकारी व्यक्ति खुद भी सुखी रहता है और दूसरों में भी सुख बांटता चलता है। वह खुद तो ऐसा करता ही है, दूसरों को भी प्रेरित करता है।

Source: http://navbharattimes.indiatimes.com/

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निष्काम कर्म से जीवन सफल।

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Kmsraj51-CYMT-Oct-14-1

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निष्काम कर्म से जीवन सफल।

एक कलाकार के सामने बिक्री के लिए लगभग एक जैसी दो लकड़ी की मूर्तियां रखी हुई थीं। एक मूर्ति की कीमत थी दो हजार रुपए और दूसरी की कीमत थी पांच हजार रुपए। मूर्तियों की कीमतों में भारी अंतर के विषय में पूछने पर कलाकार ने बताया कि जो ज्यादा कीमती मूर्ति है उसकी लकड़ी बहुत अच्छी है और उसके रेशों की बनावट ऐसी है कि उस पर की गई खुदाई एकदम साफ और सुंदर दिखाई पड़ती है। लेकिन जो कम दाम की मूर्ति है, उस पर किया गया काम भी उतना सुंदर और साफ नहीं है।

ये पूछने पर कि बढ़िया मूर्ति को बनाने में समय भी ज्यादा लगा होगा, कलाकार ने उत्तर दिया, ‘समय तो बराबर ही लगता है। लकड़ी अच्छी निकल आए तो काम जल्दी और अच्छा हो जाता है और दाम भी अच्छे मिल जाते हैं।’ ‘काम जल्दी और अच्छा हो और दाम भी अच्छे मिल जाएं, इसलिए आप हमेशा अच्छी लकड़ी का चुनाव क्यों नहीं करते?’ कलाकार ने बताया कि कोशिश तो होती है, लेकिन यह हमेशा संभव नहीं हो पाता। एक ही प्रजाति में हर पेड़ की लकड़ी की क्वालिटी में भी काफी अंतर मिल जाता है। कई बार लकड़ी पर कुछ काम करने के बाद लकड़ी टूट या फट जाती है। इससे सारी मेहनत बेकार चली जाती है।

जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी ऐसा ही होता है। कहा जाता है कि जितना गुड़़ डालोगे उतना ही मीठा होगा, लेकिन जीवन में यह हमेशा संभव नहीं होता। आज अधिकांश माता-पिता बच्चों की शिक्षा और पढ़ाई-लिखाई को लेकर बहुत चिंतित रहते हैं। वे इसके लिए कोई कसर नहीं छोड़ते। और जब बच्चा उनकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता तो वे मायूस हो जाते हैं। जरूरी है कि हमारे लक्ष्य ऊंचे हों और हम उन्हें पाने के प्रयास करें। हमारे प्रयास महत्वपूर्ण होते हैं जबकि अपेक्षाएं कर्म के लिए उत्प्रेरक तत्व।

अलग-अलग प्रकार की लकड़ियों के रेशों की बनावट की तरह ही हर बच्चे के व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों की बनावट भी अलग और विशिष्ट होती है। हर बच्चे को एक जैसा तथाकथित बड़ा आदमी बनाना संभव नहीं, लेकिन हर बच्चे को किसी न किसी निश्चित आकार में ढालना तो संभव है ही। यही स्वीकार करने को हम तैयार नहीं होते और इसी से पैदा होती हैं ज्यादातर समस्याएं।

हम किसी भी धातु, पत्थर या लकड़ी के टुकड़े को बेशक बेशकीमती कलाकृति में न परिवर्तित कर सकें, लेकिन यदि उसे एक उपयोगी आकार और स्थान ही उपलब्ध करवा दें तो यह कलात्मकता ही होगी। कलात्मकता महत्वपूर्ण है न कि कलाकृति की कीमत। गीता में कहा गया अकारण नहीं है कि हम कर्म करें, फल की इच्छा नहीं। फल चाहे जो भी हो निष्काम कर्म के द्वारा हम जीवन में उत्कृष्टता ही पाते हैं।

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

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* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

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भारत अपडेट हो गया।

Kmsraj51 की कलम से…..

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भारत अपडेट हो गया।

भारत अपडेट हो गया।

पिछले सप्ताह काफी वर्षों बाद मैं अपने मित्र से मिलने भारत आया। एयरपोर्ट पर मित्र ने कार भेज दी थी, जिससे उसके घर की ओर निकल चला। रास्ते में शहर की तरक्की देखकर खुशी भी हुई एवं आश्चर्य भी हुआ, खैर जैसे ही मित्र के घर पहुँचा उसके नौकर ने अभिवादन करते हुए कहा कि आप चाय नाश्ता लेकर आराम किजीये साहब थोडी देर से आयेंगे। तभी मित्र का विडियो कॉल आया और कहने लगा Sorry यार थोडी देर हो जायेगी तु आराम कर। मैं जब तक कुछ बोलता फोन कट हो गया।
मै पुरानी यादों  में चला गया, सोचने लगा कि पहले तो मुझे लेने एक घंटे पहले एयरपोर्ट पहुँच जाता था।  अब इतना व्यस्त है की कार भेज दी, खैर मेने सोचा कम से कम फोन तो किया भले ही मुझसे यात्रा के बारे में कुछ नही पूछा। रात के खाने पर मित्र से मुलाकात हुई, जनरल बातों के बाद मैने मित्र से कहा कि यहाँ बहुत कुछ बदल गया है, लोग छतों पर नही दिखते।
मित्र बोला छत अब हैं कहाँ ऊंची-ऊंची इमारतों ने छत की संस्कृति को दूर कर दिया है। मेरे भाई; आज बमुश्किल लोगों को सर पर छत नसीब हो रही है और तुम हो की खुली छत की बात कर रहे हो। मैने कहा मैं पूरे दिन यहाँ रहा, पहले जैसे तुम्हारे पढोसी मिलने नही आए! मित्र बोला क्या बात करते हो! किस दुनिया में हो, फेसबुक के जमाने में फेस टू फेस बात करने का टाइम किसके पास है।
मैने कहा जब मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा था तो 8 बजे  मेरा मन हुआ कि बाहर बगीचे में चलें वहाँ जरूर कोई मिलेगा परंतु बाहर बगीचे में भी कोई नही मिला, वो सामाजिकता, मिलना जुलना सब कहीं खो गया है। मित्र बोला सामाजिकता तो अभी भी है, कुछ लोग निशा के कजिन  से मिलने गये होंगे तो कुछ लोग महादेव  के दर्शन कर रहे होंगे।  देश-दुनिया की चिंता करने वाले लोग राजनैतिक बहस  में शामिल होने गये होंगे। मैने कहा परंतु बाहर तो कहीं भी कोई आता-जाता नही दिखा।
मित्र हँसते हुए बोला, कैसे नजर आयेंगे। कोई ड्राइंग रूम में तो कोई लिविंग रूम में 24 या 32 इंच के एल सी डी के सामने बैठकर अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को निभा रहा होगा। मैने बीच में ही टोकते हुए कहा, अरे यार मैं तुझे एक बात बताना तो भूल ही गया शाम को जब बाहर टहल रहा था तो अपना अजय दिखा, देखते ही कहने लगा कब आये? जब तक मैं कुछ बोलता पूछने लगा वाट्सअप पर हो, नम्बर क्या है? जैसे ही मैने नम्बर बताया, पता नही कितनी जल्दी में था मुस्कराते हुए bye करके चला गया। मित्र मुस्कराते हुए बोला भारत अपडेट हो गया, हम मंगल पर पहुँच गये हैं और तुम अभी पुराने भारत को ही ढूंढ रहे हो।
मैने आश्चर्य से कहा, लेकिन तुम्हारे प्रधानमंत्री तो अभी भी रेडियो पर मन की बात करते हैं, दिपावली पर कश्मीर जाते हैं तथा अमेरीका जाकर वहाँ के लोगों को आमंत्रित करके  भारतीय संस्कृति को निभा रहे हैं।  गाँधी जी के सपनो को साकार करने हरिजन बस्ती में भी जा रहे हैं और साफ-सफाई के महत्व को पूरे भारत में पहुँचाने के लिये स्वंय झाडु़ उठाने में भी संकोच नही कर रहे,  माँ गंगा के महत्व को  जन-जन की आवाज बना रहे हैं तो कहीं गॉव का विकास कर रहे हैं और  तुम कह रहे हो कि  भारत अपडेट हो गया।
मित्र बोला, हाँ मैं सच ही तो कह रहा हूँ, भारत अपडेट हो गया हमारे प्रधानमंत्री को मालूम है कि यदि भारत के प्रत्येक व्यक्ति तक अपना वर्चस्व स्थापित करना है तो रेडियो को अपनी आवाज बनानी होगी, टीवी वाले तो स्वंय ही पीछे आ जायेंगे। तुम्हे तो पता ही होगा कि कोकाकोला कंपनी ने भारत की ऐसी-ऐसी जगह पर कोकाकोला बेचा जहाँ बिजली भी नही आती इसी लिये तो दो बार दिवालिया घोषित होने पर भी आज बङी कंपनी में गिनी जाती है और अच्छा कारोबार कर रही है। तुम अभी हमारे प्रधानमंत्री को जानते नही वो बाजू में IIM लेकर घूमते हैं और तो और हमारे प्रधानमंत्री  अपनी कंपनी यानि की पार्टी के CEO भी तो हैं। कश्मीर की बात करते हो, क्या तुमने देखा नही महाराष्ट्र और हरियाणां में पहली बार भाजपा आगई; आशा करते हैं दूरदर्शिता तुम्हे समझ में आगई होगी।
मैने कहा ये तो अच्छी बात है, अपनी पार्टी का कर्ज तो अदा कर रहे हैं वरना कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्होने वसियत में मिली पार्टी को ही निगल लिया। मित्र बोला, कौन किसका कर्ज अदा कर रहा है मैं ये तो नही जानता लेकिन एक बात ये जरूर जानता हुँ कि पेट्रोल डीजल के दाम कम होने से हम जनता को जरूर राहत महसूस हो रही है।
मेरे और मित्र के बीच बात करते हुए कब सुबह हो गई पता ही नही चला। ये सुबह मेरे लिये नई जरूर थी किन्तु अपनी भारतीय संस्कृति की खुशबु के साथ थी। आज हमारी सामाजिक संरचना पहले से अपडेट हो गई है, पहले से कहीं अधिक संख्या में दामिनी के साथ खङी होती है तो कहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ एक साथ विरोध करती दिखती है। पलभर में फेसबुक,ट्युटर और वाट्सअप के जरिये फेस टू फेस नजर आती है। परिवर्तन तो जीवन का चक्र है और विकास का सूचक भी, यदि इस विकास में हम अपनी वसुधैव कुटुंबकम  की संस्कृति से भी जुङे हुए हैं तो ये अपडेट सोने में सुहागा है। इन्ही अच्छी यादों के साथ मैंने अपने कार्यक्षेत्र की ओर वापसी की…….
धन्यवाद,
अनीता शर्मा जी।

श्रीमती -अनीता शर्मा जी। (http://roshansavera.blogspot.in/)

I am grateful to Mrs. Anita Sharma Ji, for sharing inspirational real story in Hindi with Kmsraj51 readers.

एक अपील –

आज कई दृष्टीबाधित बच्चे अपने हौसले से एवं ज्ञान के बल पर अपने भविष्य को सुनहरा बनाने का प्रयास कर रहे हैं। कई दृष्टीबाधित बच्चे तो शिक्षा के माधय्म से अध्यापक पद पर कार्यरत हैं। उनके आत्मनिर्भर बनने में शिक्षा का एवं आज की आधुनिक तकनिक का विशेष योगदान है। आपका साथ एवं नेत्रदान का संकल्प कई दृष्टीबाधित बच्चों के जीवन को रौशन कर सकता है। मेरा प्रयास शिक्षा के माध्यम से दृष्टीबाधित बच्चों को आत्मनिर्भर बनाना है। इस प्रयोजन हेतु, ईश कृपा से एवं परिवार के सहयोग से कुछ कार्य करने की कोशिश कर रहे हैं जिसको YouTube पर “audio for blind by Anita Sharma” लिख कर देखा जा सकता है।

आपका सबका प्रिय दोस्त,

Krishna Mohan Singh(KMS)
Head Editor Founder & CEO
of,,  http://kmsraj51.com/

———– @ Best of Luck @ ———–

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