Exercise On Self Discovery

Kmsraj51 की कलम से…..


Exercise On Self Discovery

Mera Baba

मेरा बाबा

Exercise On Self Discovery – Part 1

Many people today do not have a clear sense of identity. In fact, when you ask people about the image they have of themselves, it is usually negative, and they see their weaknesses (negative sanskaras) and mistakes committed in the past more easily than their qualities (positive sanskaras) and achievements. This negative image of oneself leads us to an identity crisis. A negative image causes feelings of dissatisfaction to accumulate within oneself. Then our lifestyle is affected by the need for recognition and approval, by the need to justify ourselves, of obtaining material achievements and success.

Given below is an exercise to experience your true self:
Sit back and observe yourself. What is the image you have of yourself? How do you see yourself? Who are you really? What is there left when you have removed all the labels? Are you thoughts, feelings, free will, energy, ideas, being, conscience, intellect, life? What do the majority have in common? They are internal, incorporeal and invisible: they are non-physical aspects. The true self is incorporeal and invisible.

Now experience your ideal self: Make a list of which qualities you think your ideal self should have, the self you deeply long to be and experience in your life. The list may include qualities such as: joyful, tolerant, generous, fearless, free, loving, among others.

— Message —

To see specialities in all is to become special.

Projection: Most of the time, I’m caught up in looking at people’s negativity. When I see some negative quality in someone, I immediately make his specialities a background and start focusing on his negative traits. The more I think of these negative qualities, the more they occupy my conscious mind, changing my reactions too.

Solution: It is natural to be coloured or influenced by what I see. If I see specialities, I’ll take on a little of that and if I see weaknesses, I’ll take on a little of that too. So I need to make an attempt to look at only specialities and encourage others too to use their specialities.



Exercise On Self Discovery – Part 2

Think about which qualities you need to possess as a professional or as a homemaker e.g. qualities of a team leader in a corporate organization would be: efficiency, responsibility, focus, precision, determination, etc. Then, leaving aside the professional aspect, explore your basic, innate qualities. Reflect on your inner and spiritual values. Which values make you happy? Look deep into your inner self. Take some time in this and note down three of these essential values in your life. What conclusion have you come to? What are these values?

The more we really understand ourselves, with our defects, weaknesses, virtues and values, the better our relationships will be with others. We will understand when they have little understanding of themselves and others. Knowing oneself in-depth, taking into account everything described above as well as in yesterday’s message, requires time, effort, observation and the practice of silence. In silence one can begin a conversation with oneself. In this way we can gradually discover our inner beauty and strength, and be aware of the basis of our value and dignity as human beings. When we relearn to see ourselves with our original qualities and innate values, it is also easier to recognise these qualities in others.

— Message —

To do a task with love is to be constantly successful.

Projection: When I start with something new, I usually notice that I’m successful for sometime, but I do not experience long lasting success. This is because I did the task on being told or being forced by the situation. External force makes me use my resources with commitment for sometime.

Solution: Love brings constant success because once I’ve experienced the joy of doing the task itself, I’ll never give it up. Because it is done with love, I’ll put in all my resources and do my best. So I’ll experience constant success.

In Spiritual Service,
Brahma Kumaris

आपका दोस्त

कृष्ण मोहन सिंह ५१


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पवित्रता सच शांति और खुशी का आधार है.

यह आपके जीवन में सबसे मूल्यवान संपत्ति है.

यह किसी भी कलाकार की रक्षा करता है!!


“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की व्यर्थ के लिए समय ही ना बचे” -Kmsraj51 




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पवित्र विचार-

Kmsraj51 की कलम से…..


Kmsraj51 – Motivational Thoughts 

अपनी साेंच काे वृहद बनाआे।

ये मत साेंचाे की कल तक तुम्हारे पास क्या था या तुम कैसे थें,

मगर तुम यह जरूर साेंचाे की आज तुम क्या कर रहें हाे, आैर अपने भविष्य के लिए क्या कर रहें हाे।

ये साेंचाे की आज तुम्हारे पास क्या हैं, अपना एक सटिक लक्ष्य बनाआेे।

“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की व्यर्थ के लिए समय ही ना बचे” -Kmsraj51 

सच्चें मन से अगर कुछ करने की ठान लाे, ताे आपकाे सभी काम में सफलता मिल जाती हैं।

जीवन में जाे भी काम कराें पुरे मन से कराें, ताे सफलता आपकाे जरूर मिलेगी।

आपका दोस्त

कृष्ण मोहन सिंह ५१


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स्वामी विवेकानन्द के अनमोल वचन

Kmsraj51 की कलम से…..



उठो, जागो और तब तक रुको नहीं जब तक मंज़िल प्राप्त न हो जाये।

जो सत्य है, उसे साहसपूर्वक निर्भीक होकर लोगों से कहो – उससे किसी को कष्ट होता है या नहीं, इस ओर ध्यान मत दो। दुर्बलता को कभी प्रश्रय मत दो। सत्य की ज्योति ‘बुद्धिमान’ मनुष्यों के लिए यदि अत्यधिक मात्रा में प्रखर प्रतीत होती है, और उन्हें बहा ले जाती है, तो ले जाने दो – वे जितना शीघ्र बह जाएँ उतना अच्छा ही है।


तुम अपनी अंत:स्थ आत्मा को छोड़ किसी और के सामने सिर मत झुकाओ। जब तक तुम यह अनुभव नहीं करते कि तुम स्वयं देवों के देव हो, तब तक तुम मुक्त नहीं हो सकते।

ईश्वर ही ईश्वर की उपलब्धि कर सकता है। सभी जीवंत ईश्वर हैं – इस भाव से सब को देखो। मनुष्य का अध्ययन करो, मनुष्य ही जीवन्त काव्य है। जगत में जितने ईसा या बुद्ध हुए हैं, सभी हमारी ज्योति से ज्योतिष्मान हैं। इस ज्योति को छोड़ देने पर ये सब हमारे लिए और अधिक जीवित नहीं रह सकेंगे, मर जाएंगे। तुम अपनी आत्मा के ऊपर स्थिर रहो।

ज्ञान स्वयमेव वर्तमान है, मनुष्य केवल उसका आविष्कार करता है।

मानव – देह ही सर्वश्रेष्ठ देह है, एवं मनुष्य ही सर्वोच्च प्राणी है, क्योंकि इस मानव – देह तथा इस जन्म में ही हम इस सापेक्षिक जगत से संपूर्णतया बाहर हो सकते हैं – निश्चय ही मुक्ति की अवस्था प्राप्त कर सकते हैं, और यह मुक्ति ही हमारा चरम लक्ष्य है।

जो मनुष्य इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त करना चाहता है, उसे एक ही जन्म में हज़ारों वर्ष का काम करना पड़ेगा। वह जिस युग में जन्मा है, उससे उसे बहुत आगे जाना पड़ेगा, किन्तु साधारण लोग किसी तरह रेंगते-रेंगते ही आगे बढ़ सकते हैं।

जो महापुरुष प्रचार – कार्य के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं, वे उन महापुरुषों की तुलना में अपेक्षाकृत अपूर्ण हैं, जो मौन रहकर पवित्र जीवनयापन करते हैं और श्रेष्ठ विचारों का चिन्तन करते हुए जगत की सहायता करते हैं। इन सभी महापुरुषों में एक के बाद दूसरे का आविर्भाव होता है – अंत में उनकी शक्ति का चरम फलस्वरूप ऐसा कोई शक्तिसम्पन्न पुरुष आविर्भूत होता है, जो जगत को शिक्षा प्रदान करता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से विकसित हो चुकने पर धर्मसंघ में बना रहना अवांछनीय है। उससे बाहर निकलकर स्वाधीनता की मुक्त वायु में जीवन व्यतीत करो।

मुक्ति – लाभ के अतिरिक्त और कौन सी उच्चावस्था का लाभ किया जा सकता है ? देवदूत कभी कोई बुरे कार्य नहीं करते, इसलिए उन्हें कभी दंड भी प्राप्त नहीं होता, अतएव वे मुक्त भी नहीं हो सकते। सांसारिक धक्का ही हमें जगा देता है, वही इस जगत्स्वप्न को भंग करने में सहायता पहुँचाता है। इस प्रकार के लगातार आघात ही इस संसार से छुटकारा पाने की अर्थात् मुक्ति-लाभ करने की हमारी आकांक्षा को जाग्रत करते हैं।

हमारी नैतिक प्रकृति जितनी उन्नत होती है, उतना ही उच्च हमारा प्रत्यक्ष अनुभव होता है, और उतनी ही हमारी इच्छा शक्ति अधिक बलवती होती है।

मन का विकास करो और उसका संयम करो, उसके बाद जहाँ इच्छा हो, वहाँ इसका प्रयोग करो – उससे अति शीघ्र फल प्राप्ति होगी। यह है यथार्थ आत्मोन्नति का उपाय। एकाग्रता सीखो, और जिस ओर इच्छा हो, उसका प्रयोग करो। ऐसा करने पर तुम्हें कुछ खोना नहीं पड़ेगा। जो समस्त को प्राप्त करता है, वह अंश को भी प्राप्त कर सकता है।

पहले स्वयं संपूर्ण मुक्तावस्था प्राप्त कर लो, उसके बाद इच्छा करने पर फिर अपने को सीमाबद्ध कर सकते हो। प्रत्येक कार्य में अपनी समस्त शक्ति का प्रयोग करो।

सभी मरेंगे- साधु या असाधु, धनी या दरिद्र – सभी मरेंगे। चिर काल तक किसी का शरीर नहीं रहेगा। अतएव उठो, जागो और संपूर्ण रूप से निष्कपट हो जाओ। भारत में घोर कपट समा गया है। चाहिए चरित्र, चाहिए इस तरह की दृढ़ता और चरित्र का बल, जिससे मनुष्य आजीवन दृढ़व्रत बन सके।

संन्यास का अर्थ है, मृत्यु के प्रति प्रेम। सांसारिक लोग जीवन से प्रेम करते हैं, परन्तु संन्यासी के लिए प्रेम करने को मृत्यु है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम आत्महत्या कर लें। आत्महत्या करने वालों को तो कभी मृत्यु प्यारी नहीं होती है। संन्यासी का धर्म है समस्त संसार के हित के लिए निरंतर आत्मत्याग करते हुए धीरे – धीरे मृत्यु को प्राप्त हो जाना।

हे सखे, तुम क्यों रो रहे हो ? सब शक्ति तो तुम्हीं में हैं। हे भगवन, अपना ऐश्वर्यमय स्वरूप को विकसित करो। ये तीनों लोक तुम्हारे पैरों के नीचे हैं। जड़ की कोई शक्ति नहीं प्रबल शक्ति आत्मा की हैं। हे विद्वान! डरो मत; तुम्हारा नाश नहीं हैं, संसार-सागर से पार उतरने का उपाय हैं। जिस पथ के अवलम्बन से यती लोग संसार-सागर के पार उतरे हैं, वही श्रेष्ठ पथ मैं तुम्हें दिखाता हूँ!

बडे-बडे दिग्गज बह जायेंगे। छोटे – मोटे की तो बात ही क्या है! तुम लोग कमर कसकर कार्य में जुट जाओ, हुंकार मात्र से हम दुनिया को पलट देंगे। अभी तो केवल मात्र प्रारम्भ ही है। किसी के साथ विवाद न कर हिल-मिलकर अग्रसर हो – यह दुनिया भयानक है, किसी पर विश्वास नहीं है। डरने का कोई कारण नहीं है, माँ मेरे साथ हैं – इस बार ऐसे कार्य होंगे कि तुम चकित हो जाओगे। भय किस बात का? किसका भय? वज्र जैसा हृदय बनाकर कार्य में जुट जाओ।

किसी बात से तुम उत्साहहीन न होओ; जब तक ईश्वर की कृपा हमारे ऊपर है, कौन इस पृथ्वी पर हमारी उपेक्षा कर सकता है? यदि तुम अपनी अन्तिम साँस भी ले रहे हो तो भी न डरना। सिंह की शूरता और पुष्प की कोमलता के साथ काम करते रहो।

लोग तुम्हारी स्तुति करें या निन्दा, लक्ष्मी तुम्हारे ऊपर कृपालु हो या न हो, तुम्हारा देहान्त आज हो या एक युग मे, तुम न्यायपथ से कभी भ्रष्ट न हो।

वीरता से आगे बढो। एक दिन या एक साल में सिद्धि की आशा न रखो। उच्चतम आदर्श पर दृढ रहो। स्थिर रहो। स्वार्थपरता और ईर्ष्या से बचो। आज्ञा-पालन करो। सत्य, मनुष्य जाति और अपने देश के पक्ष पर सदा के लिए अटल रहो, और तुम संसार को हिला दोगे। याद रखो – व्यक्ति और उसका जीवन ही शक्ति का स्रोत है, इसके सिवाय अन्य कुछ भी नहीं।

मैं चाहता हूँ कि मेरे सब बच्चे, मैं जितना उन्नत बन सकता था, उससे सौगुना उन्न्त बनें। तुम लोगों में से प्रत्येक को महान शक्तिशाली बनना होगा- मैं कहता हूँ, अवश्य बनना होगा। आज्ञा-पालन, ध्येय के प्रति अनुराग तथा ध्येय को कार्यरूप में परिणत करने के लिए सदा प्रस्तुत रहना। इन तीनों के रहने पर कोई भी तुम्हे अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सकता।

जिस तरह हो, इसके लिए हमें चाहे जितना कष्ट उठाना पडे- चाहे कितना ही त्याग करना पडे यह भाव (भयानक ईर्ष्या) हमारे भीतर न घुसने पाये- हम दस ही क्यों न हों- दो क्यों न रहें- परवाह नहीं परन्तु जितने हों, सम्पूर्ण शुद्धचरित्र हों।

शक्तिमान, उठो तथा सामर्थ्यशाली बनो। कर्म, निरन्तर कर्म; संघर्ष, निरन्तर संघर्ष! अलमिति। पवित्र और निःस्वार्थी बनने की कोशिश करो – सारा धर्म इसी में है।

शत्रु को पराजित करने के लिए ढाल तथा तलवार की आवश्यकता होती है। इसलिए अंग्रेज़ी और संस्कृत का अध्ययन मन लगाकर करो।

बच्चों, धर्म का रहस्य आचरण से जाना जा सकता है, व्यर्थ के मतवादों से नहीं। सच्चा बनना तथा सच्चा बर्ताव करना, इसमें ही समग्र धर्म निहित है। जो केवल प्रभु – प्रभु की रट लगाता है, वह नहीं, किन्तु जो उस परम पिता के इच्छानुसार कार्य करता है वही धार्मिक है। यदि कभी कभी तुमको संसार का थोडा-बहुत धक्का भी खाना पडे, तो उससे विचलित न होना, मुहूर्त भर में वह दूर हो जायगा तथा सारी स्थिति पुनः ठीक हो जायगी।

‘जब तक जीना, तब तक सीखना’ – अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है।

जिस प्रकार स्वर्ग में, उसी प्रकार इस नश्वर जगत में भी तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो, क्योंकि अनन्त काल के लिए जगत में तुम्हारी ही महिमा घोषित हो रही है एवं सब कुछ तुम्हारा ही राज्य है।

पवित्रता, दृढता तथा उद्यम- ये तीनों गुण मैं एक साथ चाहता हूँ।

‘पवित्रता, धैर्य तथा प्रयत्न’ के द्वारा सारी बाधाएँ दूर हो जाती हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि महान कार्य सभी धीरे धीरे होते हैं।

साहसी होकर काम करो। धीरज और स्थिरता से काम करना – यही एक मार्ग है। आगे बढो और याद रखो धीरज, साहस, पवित्रता और अनवरत कर्म। जब तक तुम पवित्र होकर अपने उद्देश्य पर डटे रहोगे, तब तक तुम कभी निष्फल नहीं होओगे – माँ तुम्हें कभी न छोडेगी और पूर्ण आशीर्वाद के तुम पात्र हो जाओगे।

बच्चों, जब तक तुम लोगों को भगवान तथा गुरु में, भक्ति तथा सत्य में विश्वास रहेगा, तब तक कोई भी तुम्हें नुक़सान नहीं पहुँचा सकता। किन्तु इनमें से एक के भी नष्ट हो जाने पर परिणाम विपत्तिजनक है।

महाशक्ति का तुममें संचार होगा – कदापि भयभीत मत होना। पवित्र होओ, विश्वासी होओ, और आज्ञापालक होओ।

बिना पाखण्डी और कायर बने सबको प्रसन्न रखो। पवित्रता और शक्ति के साथ अपने आदर्श पर दृढ रहो और फिर तुम्हारे सामने कैसी भी बाधाएँ क्यों न हों, कुछ समय बाद संसार तुमको मानेगा ही।

धीरज रखो और मृत्युपर्यन्त विश्वासपात्र रहो। आपस में न लड़ो! रुपये – पैसे के व्यवहार में शुद्ध भाव रखो। हम अभी महान कार्य करेंगे। जब तक तुममें ईमानदारी, भक्ति और विश्वास है, तब तक प्रत्येक कार्य में तुम्हें सफलता मिलेगी।

जो पवित्र तथा साहसी है, वही जगत में सब कुछ कर सकता है। माया-मोह से प्रभु सदा तुम्हारी रक्षा करें। मैं तुम्हारे साथ काम करने के लिए सदैव प्रस्तुत हूँ एवं हम लोग यदि स्वयं अपने मित्र रहें तो प्रभु भी हमारे लिए सैकडों मित्र भेजेंगे, आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुः।

ईर्ष्या तथा अंहकार को दूर कर दो – संगठित होकर दूसरों के लिए कार्य करना सीखो।

पूर्णतः निःस्वार्थ रहो, स्थिर रहो, और काम करो। एक बात और है। सबके सेवक बनो और दूसरों पर शासन करने का तनिक भी यत्न न करो, क्योंकि इससे ईर्ष्या उत्पन्न होगी और इससे हर चीज़ बर्बाद हो जायेगी। आगे बढ़ो, तुमने बहुत अच्छा काम किया है। हम अपने भीतर से ही सहायता लेंगे अन्य सहायता के लिए हम प्रतीक्षा नहीं करते। मेरे बच्चे, आत्मविशवास रखो, सच्चे और सहनशील बनो।

यदि तुम स्वयं ही नेता के रूप में खडे हो जाओगे, तो तुम्हे सहायता देने के लिए कोई भी आगे न बढेगा। यदि सफल होना चाहते हो, तो पहले ‘अहं’ ही नाश कर डालो।

यदि कोई तुम्हारे समीप अन्य किसी साथी की निन्दा करना चाहे, तो तुम उस ओर बिल्कुल ध्यान न दो। इन बातों को सुनना भी महान पाप है, उससे भविष्य में विवाद का सूत्रपात होगा।

गम्भीरता के साथ शिशु सरलता को मिलाओ। सबके साथ मेल से रहो। अहंकार के सब भाव छोड दो और साम्प्रदायिक विचारों को मन में न लाओ। व्यर्थ विवाद महापाप है।

बच्चे, जब तक तुम्हारे हृदय में उत्साह एवं गुरु तथा ईश्वर में विश्वास – ये तीनों वस्तुएँ रहेंगी – तब तक तुम्हें कोई भी दबा नहीं सकता। मैं दिनोदिन अपने हृदय में शक्ति के विकास का अनुभव कर रहा हूँ। हे साहसी बालकों, कार्य करते रहो।

किसी को उसकी योजनाओं में हतोत्साह नहीं करना चाहिए। आलोचना की प्रवृत्ति का पूर्णतः परित्याग कर दो। जब तक वे सही मार्ग पर अग्रसर हो रहे हैं; तब तक उन्के कार्य में सहायता करो; और जब कभी तुमको उनके कार्य में कोई ग़लती नज़र आये, तो नम्रतापूर्वक ग़लती के प्रति उनको सजग कर दो। एक दूसरे की आलोचना ही सब दोषों की जड है। किसी भी संगठन को विनष्ट करने में इसका बहुत बड़ा हाथ है।

किसी बात से तुम उत्साहहीन न होओ; जब तक ईश्वर की कृपा हमारे ऊपर है, कौन इस पृथ्वी पर हमारी उपेक्षा कर सकता है? यदि तुम अपनी अन्तिम साँस भी ले रहे हो तो भी न डरना। सिंह की शूरता और पुष्प की कोमलता के साथ काम करते रहो।

क्या तुम नहीं अनुभव करते कि दूसरों के ऊपर निर्भर रहना बुद्धिमानी नहीं है। बुद्धिमान व्यक्ति को अपने ही पैरों पर दृढता पूर्वक खडा होकर कार्य करना चहिए। धीरे धीरे सब कुछ ठीक हो जाएगा।

आओ हम नाम, यश और दूसरों पर शासन करने की इच्छा से रहित होकर काम करें। काम, क्रोध एंव लोभ – इस त्रिविध बन्धन से हम मुक्त हो जायें और फिर सत्य हमारे साथ रहेगा।

न टालो, न ढूँढों – भगवान अपनी इच्छानुसार जो कुछ भेजें, उसके लिए प्रतिक्षा करते रहो, यही मेरा मूलमंत्र है।

शक्ति और विश्वास के साथ लगे रहो। सत्यनिष्ठा, पवित्र और निर्मल रहो, तथा आपस में न लडो। हमारी जाति का रोग ईर्ष्या ही है।

एक ही आदमी मेरा अनुसरण करे, किन्तु उसे मृत्युपर्यन्त सत्य और विश्वासी होना होगा। मैं सफलता और असफलता की चिन्ता नहीं करता। मैं अपने आन्दोलन को पवित्र रखूँगा, भले ही मेरे साथ कोई न हो। कपटी कार्यों से सामना पडने पर मेरा धैर्य समाप्त हो जाता है। यही संसार है कि जिन्हें तुम सबसे अधिक प्यार और सहायता करो, वे ही तुम्हे धोखा देंगे।

मेरा आदर्श अवश्य ही थोडे से शब्दों में कहा जा सकता है – मनुष्य जाति को उसके दिव्य स्वरूप का उपदेश देना, तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उसे अभिव्यक्त करने का उपाय बताना।

जब कभी मैं किसी व्यक्ति को उस उपदेशवाणी (श्री रामकृष्ण के वाणी) के बीच पूर्ण रूप से निमग्न पाता हूँ, जो भविष्य में संसार में शान्ति की वर्षा करने वाली है, तो मेरा हृदय आनन्द से उछलने लगता है। ऐसे समय मैं पागल नहीं हो जाता हूँ, यही आश्चर्य की बात है।

‘बसन्त की तरह लोग का हित करते हुए’ – यहि मेरा धर्म है। “मुझे मुक्ति और भक्ति की चाह नहीं। लाखों नरकों में जाना मुझे स्वीकार है, बसन्तवल्लोकहितं चरन्तः – यही मेरा धर्म है।”

हर काम को तीन अवस्थाओं में से गुज़रना होता है – उपहास, विरोध और स्वीकृति। जो मनुष्य अपने समय से आगे विचार करता है, लोग उसे निश्चय ही ग़लत समझते हैं। इसलिए विरोध और अत्याचार हम सहर्ष स्वीकार करते हैं; परन्तु मुझे दृढ और पवित्र होना चाहिए और भगवान में अपरिमित विश्वास रखना चाहिए, तब ये सब लुप्त हो जायेंगे।

यही दुनिया है! यदि तुम किसी का उपकार करो, तो लोग उसे कोई महत्त्व नहीं देंगे, किन्तु ज्यों ही तुम उस कार्य को बन्द कर दो, वे तुरन्त (ईश्वर न करे) तुम्हें बदमाश प्रमाणित करने में नहीं हिचकिचायेंगे। मेरे जैसे भावुक व्यक्ति अपने सगे – स्नेहियों द्वरा सदा ठगे जाते हैं।

न संख्या-शक्ति, न धन, न पाण्डित्य, न वाक चातुर्य, कुछ भी नहीं, बल्कि पवित्रता, शुद्ध जीवन, एक शब्द में अनुभूति, आत्म – साक्षात्कार को विजय मिलेगी! प्रत्येक देश में सिंह जैसी शक्तिमान दस-बारह आत्माएँ होने दो, जिन्होंने अपने बन्धन तोड डाले हैं, जिन्होंने अनन्त का स्पर्श कर लिया है, जिनका चित्र ब्रह्मानुसन्धान में लीन है, जो न धन की चिन्ता करते हैं, न बल की, न नाम की और ये व्यक्ति ही संसार को हिला डालने के लिए पर्याप्त होंगे।

यही रहस्य है। योग प्रवर्तक पंतजलि कहते हैं, “जब मनुष्य समस्त अलौकेक दैवी शक्तियों के लोभ का त्याग करता है, तभी उसे धर्म मेघ नामक समाधि प्राप्त होती है। वह प्रमात्मा का दर्शन करता है, वह परमात्मा बन जाता है और दूसरों को तदरूप बनने में सहायता करता है। मुझे इसी का प्रचार करना है। जगत में अनेक मतवादों का प्रचार हो चुका है। लाखों पुस्तकें हैं, परन्तु हाय! कोई भी किंचित् अंश में प्रत्यक्ष आचरण नहीं करता।

जो सबका दास होता है, वही उनका सच्चा स्वामी होता है। जिसके प्रेम में ऊँच – नीच का विचार होता है, वह कभी नेता नहीं बन सकता। जिसके प्रेम का कोई अन्त नहीं है, जो ऊँच – नीच सोचने के लिए कभी नहीं रुकता, उसके चरणों में सारा संसार लोट जाता है।

अकेले रहो, अकेले रहो। जो अकेला रहता है, उसका किसी से विरोध नहीं होता, वह किसी की शान्ति भंग नहीं करता, न दूसरा कोई उसकी शान्ति भंग करता है।

मेरी दृढ़ धारणा है कि तुममें अन्धविश्वास नहीं है। तुममें वह शक्ति विद्यमान है, जो संसार को हिला सकती है, धीरे – धीरे और भी अन्य लोग आयेंगे। ‘साहसी’ शब्द और उससे अधिक ‘साहसी’ कर्मों की हमें आवश्यकता है। उठो! उठो! संसार दुःख से जल रहा है। क्या तुम सो सकते हो? हम बार – बार पुकारें, जब तक सोते हुए देवता न जाग उठें, जब तक अन्तर्यामी देव उस पुकार का उत्तर न दें। जीवन में और क्या है? इससे महान कर्म क्या है?

तुमने बहुत बहादुरी की है। शाबाश! हिचकने वाले पीछे रह जायेंगे और तुम कूद कर सबके आगे पहुँच जाओगे। जो अपना उद्धार में लगे हुए हैं, वे न तो अपना उद्धार ही कर सकेंगे और न दूसरों का। ऐसा शोर – गुल मचाओ की उसकी आवाज़ दुनिया के कोने कोने में फैल जाय। कुछ लोग ऐसे हैं, जो कि दूसरों की त्रुटियों को देखने के लिए तैयार बैठे हैं, किन्तु कार्य करने के समय उनका पता नहीं चलता है। जुट जाओ, अपनी शक्ति के अनुसार आगे बढ़ो। इसके बाद मैं भारत पहुँच कर सारे देश में उत्तेजना फूँक दूंगा। डर किस बात का है? नहीं है, नहीं है, कहने से साँप का विष भी नहीं रहता है। नहीं नहीं कहने से तो ‘नहीं’ हो जाना पडेगा। खूब शाबाश! छान डालो – सारी दुनिया को छान डालो! अफ़सोस इस बात का है कि यदि मुझ जैसे दो – चार व्यक्ति भी तुम्हारे साथी होते

श्रेयांसि बहुविघ्नानि अच्छे कर्मों में कितने ही विघ्न आते हैं। – प्रलय मचाना ही होगा, इससे कम में किसी तरह नहीं चल सकता। कुछ परवाह नहीं। दुनिया भर में प्रलय मच जायेगा, वाह! गुरु की फ़तह! अरे भाई श्रेयांसि बहुविघ्नानि, उन्ही विघ्नों की रेल पेल में आदमी तैयार होता है। मिशनरी फिशनरी का काम थोडे ही है जो यह धक्का सम्हाले! ….बड़े – बड़े बह गये, अब गड़रिये का काम है जो थाह ले? यह सब नहीं चलने का भैया, कोई चिन्ता न करना। सभी कामों में एक दल शत्रुता ठानता है; अपना काम करते जाओ किसी की बात का जवाब देने से क्या काम? सत्यमेव जयते नानृतं, सत्येनैव पन्था विततो देवयानः (सत्य की ही विजय होती है, मिथ्या की नहीं; सत्य के ही बल से देवयानमार्ग की गति मिलती है।) …धीरे – धीरे सब होगा।

मन और मुँह को एक करके भावों को जीवन में कार्यान्वित करना होगा। इसी को श्री रामकृष्ण कहा करते थे, “भाव के घर में किसी प्रकार की चोरी न होने पाये।” सब विषयों में व्यवहारिक बनना होगा। लोगों या समाज की बातों पर ध्यान न देकर वे एकाग्र मन से अपना कार्य करते रहेंगे क्या तुने नहीं सुना, कबीरदास के दोहे में है – “हाथी चले बाज़ार में, कुत्ता भोंके हज़ार, साधुन को दुर्भाव नहिं, जो निन्दे संसार” ऐसे ही चलना है। दुनिया के लोगों की बातों पर ध्यान नहीं देना होगा। उनकी भली बुरी बातों को सुनने से जीवन भर कोई किसी प्रकार का महत् कार्य नहीं कर सकता।

अन्त में प्रेम की ही विजय होती है। हैरान होने से काम नहीं चलेगा – ठहरो – धैर्य धारण करने पर सफलता अवश्यम्भावी है – तुमसे कहता हूँ देखना – कोई बाहरी अनुष्ठानपध्दति आवश्यक न हो – बहुत्व में एकत्व सार्वजनिन भाव में किसी तरह की बाधा न हो। यदि आवश्यक हो तो “सार्वजनीनता” के भाव की रक्षा के लिए सब कुछ छोडना होगा। मैं मरूँ चाहे बचूँ, देश जाऊँ या न जाऊँ, तुम लोग अच्छी तरह याद रखना कि, सार्वजनीनता- हम लोग केवल इसी भाव का प्रचार नहीं करते कि, “दूसरों के धर्म का द्वेष न करना”; नहीं, हम सब लोग सब धर्मों को सत्य समझते हैं और उनका ग्रहण भी पूर्ण रूप से करते हैं हम इसका प्रचार भी करते हैं और इसे कार्य में परिणत कर दिखाते हैं सावधान रहना, दूसरे के अत्यन्त छोटे अधिकार में भी हस्तक्षेप न करना – इसी भँवर में बड़े-बड़े जहाज़ डूब जाते हैं पूरी भक्ति, परन्तु कट्टरता छोडकर, दिखानी होगी, याद रखना उनकी कृपा से सब ठीक हो जायेगा।

नीतिपरायण तथा साहसी बनो, अन्त:करण पूर्णतया शुद्ध रहना चाहिए। पूर्ण नीतिपरायण तथा साहसी बनो – प्राणों के लिए भी कभी न डरो। कायर लोग ही पापाचरण करते हैं, वीर पुरुष कभी भी पापानुष्ठान नहीं करते – यहाँ तक कि कभी वे मन में भी पाप का विचार नहीं लाते। प्राणिमात्र से प्रेम करने का प्रयास करो। बच्चों, तुम्हारे लिए नीतिपरायणता तथा साहस को छोडकर और कोई दूसरा धर्म नहीं। इसके सिवाय और कोई धार्मिक मत-मतान्तर तुम्हारे लिए नहीं है। कायरता, पाप, असदाचरण तथा दुर्बलता तुममें एकदम नहीं रहनी चाहिए, बाक़ी आवश्यकीय वस्तुएँ अपने आप आकर उपस्थित होंगी।

यदि कोई भंगी हमारे पास भंगी के रूप में आता है, तो छुतही बीमारी की तरह हम उसके स्पर्श से दूर भागते हैं। परन्तु जब उसके सिर पर एक कटोरा पानी डालकर कोई पादरी प्रार्थना के रूप में कुछ गुनगुना देता है और जब उसे पहनने को एक कोट मिल जाता है – वह कितना ही फटा – पुराना क्यों न हो – तब चाहे वह किसी कट्टर से कट्टर हिन्दू के कमरे के भीतर पहुँच जाय, उसके लिए कहीं रोक-टोक नहीं, ऐसा कोई नहीं, जो उससे सप्रेम हाथ मिलाकर बैठने के लिए उसे कुर्सी न दे! इससे अधिक विड़म्बना की बात क्या हो सकता है?

प्रायः देखने में आता है कि अच्छे से अच्छे लोगों पर कष्ट और कठिनाइयाँ आ पडती हैं। इसका समाधान न भी हो सके, फिर भी मुझे जीवन में ऐसा अनुभव हुआ है कि जगत में कोई ऐसी वस्तु नहीं, जो मूल रूप में भली न हो। ऊपरी लहरें चाहे जैसी हों, परन्तु वस्तु मात्र के अन्तरकाल में प्रेम एवं कल्याण का अनन्त भण्डार है। जब तक हम उस अन्तराल तक नहीं पहुँचते, तभी तक हमें कष्ट मिलता है। एक बार उस शान्ति-मण्डल में प्रवेश करने पर फिर चाहे आँधी और तूफ़ान के जितने तुमुल झकोरे आयें, वह मकान, जो सदियों की पुरानि चट्टान पर बना है, हिल नहीं सकता।

मेरी केवल यह इच्छा है कि प्रतिवर्ष यथेष्ठ संख्या में हमारे नवयुवकों को चीन, जापान में आना चाहिए। जापानी लोगों के लिए आज भारतवर्ष उच्च और श्रेष्ठ वस्तुओं का स्वप्नराज्य है। और तुम लोग क्या कर रहे हो? … जीवन भर केवल बेकार बातें किया करते हो, व्यर्थ बकवास करने वालों, तुम लोग क्या हो? आओ, इन लोगों को देखो और उसके बाद जाकर लज्जा से मुँह छिपा लो। सठियाई बुद्धिवालों, तुम्हारी तो देश से बाहर निकलते ही जाति चली जायगी! अपनी खोपडी में वर्षों के अन्धविश्वास का निरन्तर वृद्धिगत कूडा – कर्कट भरे बैठे, सैकडों वर्षों से केवल आहार की छुआछूत के विवाद में ही अपनी सारी शक्ति नष्ट करने वाले, युगों के सामाजिक अत्याचार से अपनी सारी मानवता का गला घोटने वाले, भला बताओ तो सही, तुम कौन हो? और तुम इस समय कर ही क्या रहे हो? …किताबें हाथ में लिए तुम केवल समुद्र के किनारे फिर रहे हो। तीस रुपये की मुंशी-गीरी के लिए अथवा बहुत हुआ, तो एक वकील बनने के लिए जी – जान से तडप रहे हो – यही तो भारतवर्ष के नवयुवकों की सबसे बडी महत्त्वाकांक्षा है। जिस पर इन विद्यार्थियों के भी झुण्ड के झुण्ड बच्चे पैदा हो जाते हैं, जो भूख से तडपते हुए उन्हें घेरकर ‘ रोटी दो, रोटी दो ‘ चिल्लाते रहते हैं। क्या समुद्र में इतना पानी भी न रहा कि तुम उसमें विश्वविद्यालय के डिप्लोमा, गाउन और पुस्तकों के समेत डूब मरो ? आओ, मनुष्य बनो! उन पाखण्डी पुरोहितों को, जो सदैव उन्नति के मार्ग में बाधक होते हैं, ठोकरें मारकर निकाल दो, क्योंकि उनका सुधार कभी न होगा, उनके हृदय कभी विशाल न होंगे। उनकी उत्पत्ति तो सैकडों वर्षों के अन्धविश्वासों और अत्याचारों के फलस्वरूप हुई है। पहले पुरोहिती पाखंड को ज़ड – मूल से निकाल फेंको। आओ, मनुष्य बनों। कूपमंडूकता छोडो और बाहर दृष्टि डालो। देखों, अन्य देश किस तरह आगे बढ रहे हैं। क्या तुम्हें मनुष्य से प्रेम है? यदि ‘हाँ’ तो आओ, हम लोग उच्चता और उन्नति के मार्ग में प्रयत्नशील हों। पीछे मुडकर मत देखों; अत्यन्त निकट और प्रिय सम्बन्धी रोते हों, तो रोने दो, पीछे देखो ही मत। केवल आगे बढते जाओ। भारतमाता कम से कम एक हज़ार युवकों का बलिदान चाहती है — मस्तिष्क वाले युवकों का, पशुओं का नहीं। परमात्मा ने तुम्हारी इस निश्चेष्ट सभ्यता को तोडने के लिए ही अंग्रेज़ी राज्य को भारत में भेजा है…[1]

एक महान रहस्य का मैंने पता लगा लिया है – वह यह कि केवल धर्म की बातें करने वालों से मुझे कुछ भय नहीं है। और जो सत्यदृष्ट महात्मा हैं, वे कभी किसी से बैर नहीं करते। वाचालों को वाचाल होने दो! वे इससे अधिक और कुछ नहीं जानते! उन्हें नाम, यश, धन, स्त्री से सन्तोष प्राप्त करने दो। और हम धर्मोपलब्धि, ब्रह्मलाभ एवं ब्रह्म होने के लिए ही दृढव्रत होंगे। हम आमरण एवं जन्म – जन्मान्त में सत्य का ही अनुसरण करेंगें। दूसरों के कहने पर हम तनिक भी ध्यान न दें और यदि आजन्म यत्न के बाद एक, केवल एक ही आत्मा संसार के बन्धनों को तोडकर मुक्त हो सके तो हमने अपना काम कर लिया।

वत्स, धीरज रखो, काम तुम्हारी आशा से बहुत ज़्यादा बढ जाएगा। हर एक काम में सफलता प्राप्त करने से पहले सैंकडों कठिनाइयों का सामना करना पडता है। जो उद्यम करते रहेंगे, वे आज या कल सफलता को देखेंगे। परिश्रम करना है वत्स, कठिन परिश्रम ! काम कांचन के इस चक्कर में अपने आप को स्थिर रखना, और अपने आदर्शों पर जमे रहना, जब तक कि आत्मज्ञान और पूर्ण त्याग के साँचे में शिष्य न ढल जाय निश्चय ही कठिन काम है। जो प्रतीक्षा करता है, उसे सब चीज़े मिलती हैं। अनन्त काल तक तुम भाग्यवान बने रहो।

हर अच्‍छे, श्रेष्‍ठ और महान कार्य में तीन चरण होते हैं, प्रथम उसका उपहास उड़ाया जाता है, दूसरा चरण उसे समाप्‍त या नष्‍ट करने की हद तक विरोध किया जाता है और तीसरा चरण है, स्‍वीकृति और मान्‍यता, जो इन तीनों चरणों में बिना विचलित हुये अडिग रहता है, वह श्रेष्‍ठ बन जाता है और उसका कार्य सर्व स्‍वीकृत होकर अनुकरणीय बन जाता है।


Source:- http://bharatdiscovery.org/



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“तू ना हो निराश कभी मन से”


मन काे कैसे नियंत्रण में करें।

मन के विचारों काे कैसे नियंत्रित करें॥

विचारों के प्रकारएक खुशी जीवन के लिए।

अपनी सोच काे हमेशा सकारात्मक कैसे रखें॥

“मन के बहुत सारे सवालाें का जवाब-आैर मन काे कैसे नियंत्रित कर उसे सहीं तरिके से संचालित कर शांतिमय जीवन जियें”


अगर जीवन में सफल हाेना हैं. ताे जहाँ १० शब्दाें से काेई बात बन जाये वहा पर

१०० शब्द बाेलकर अपनी मानसिक और वाणी की ऊर्जा को नष्ट नहीं करना चाहिए॥




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तीन बातें-अनमोल वचन

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अनमोल वचन

तीन बातें

तीन बातें कभी न भूलें – प्रतिज्ञा करके, क़र्ज़ लेकर और विश्वास देकर। – महावीर

तीन बातें करो – उत्तम के साथ संगीत, विद्वान् के साथ वार्तालाप और सहृदय के साथ मैत्री। – विनोबा

तीन अनमोल वचन – धन गया तो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य गया तो कुछ गया और चरित्र गया तो सब गया। – अंग्रेजी कहावत

तीन से घृणा न करो – रोगी से, दुखी से और निम्न जाती से। – मुहम्मद साहब

तीन के आंसू पवित्र होते हैं – प्रेम के, करुना के और सहानुभूति के। – बुद्ध

तीन बातें सुखी जीवन के लिए- अतीत की चिंता मत करो, भविष्य का विश्वास न करो और वर्तमान को व्यर्थ मत जाने दो।

तीन चीज़ें किसी का इन्तजार नहीं करती – समय, मौत, ग्राहक।

तीन चीज़ें जीवन में एक बार मिलती है – मां, बांप, और जवानी।

तीन चीज़ें पर्दे योग्य है – धन, स्त्री और भोजन।

तीन चीजों से सदा सावधान रहिए – बुरी संगत, परस्त्री और निन्दा।

तीन चीजों में मन लगाने से उन्नति होती है – ईश्वर, परिश्रम और विद्या।

तीन चीजों को कभी छोटी ना समझे – बीमारी, कर्जा, शत्रु।

तीनों चीजों को हमेशा वश में रखो – मन, काम और लोभ।

तीन चीज़ें निकलने पर वापिस नहीं आती – तीर कमान से, बात जुबान से और प्राण शरीर से।

तीन चीज़ें कमज़ोर बना देती है – बदचलनी, क्रोध और लालच।



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“तू ना हो निराश कभी मन से”



“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की व्यर्थ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51 



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How Our Thoughts Shape Our Personality And Actions

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How Our Thoughts Shape Our Personality And Actions 


With your thoughts and feelings you create and perceive the world that surrounds you. According to what your thoughts are, thus will be your feelings and emotions, your attitude and your actions. This process usually happens rapidly, and you are not usually aware that it is taking place. As this process repeats itself often, it is easy for a set of habits to be created.

The effort lies in slowing down this process in the mind, as if you were watching television in slow motion. On the screen of your consciousness you can use meditation as a method to slow down this process and be aware of what you are feeling and thinking, how you are acting and being aware of the result that you obtain. It is important to learn to transform (change) and to avoid, that is, to not create unnecessary thoughts in order to be more centered and energized, and to have more clarity in order to take the right decisions. 

Positive thoughts heal and strengthen the mind. A healthy mind and thought pattern is the basis of a balanced personality finally.

Let us learn to create thoughts of greater quality. They arise out of a wider vision of spirituality. In this way, thanks to those positive thoughts, full of peace, harmony and creativity, the mind will clean itself, and the memory of our innate qualities will be activated once more, replacing, in a natural way, the old habits and negative tendencies.

Message for the day 06-07-2014

The index of change is to have better relationship with others.

Projection: Change or progress for me is usually success in terms of money, status, or name. But usually this does not give an accurate index of the change that is taking place within me.

Solution: Real change can be measured with the quality of my interaction with others. The more I progress, the more I find my relationship with others getting better. Others will also be happy with my progress and me

In Spiritual Service,
Brahma Kumaris


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“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की  व्यथ॔ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51 


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Coming soon book (जल्द ही आ रहा किताब)…..

“तू ना हो निराश कभी मन से”


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Factors That Bring Us Closer To Success

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Brahma Kumaris –

Soul Sustenance and Message for the day


Soul Sustenance 26-04-2014

Factors That Bring Us Closer To Success 

Given below are some factors that bring us closer to success: 

• High self-esteem. 
• Constancy. 
• Courage and determination. 
• Integrity and honesty. 
• Self-acceptance and acceptance of others. 
• Believing in what you do, regardless of external factors. 
• Responsibility. 
• Dedication, determination and tranquility. 
• Being positive in the face of adversities (negative circumstances). 
• Being consistent with your values. 
• Precision in decisions and choices. 
• Focus. 
• Performing all karmas with love and happiness. 
• Giving the maximum of yourself in everything you do. 
• Creativity. 
• Thoughts and actions in tune with each other. 
• Appreciation and blessings (good wishes) from others. 
• Gratitude toward oneself and others. 

Message for the day 26-04-2014

To have an open mind is to be prepared for mistakes too. 

Expression: The one with an open mind is the one who is able to see things for what they are and accept them. He is able to take the lesson from each situation that happens and move forward with confidence. He never lets any situation or even his own mistake discourage him, but he is able to move forward with renewed confidence. 

Experience: I am able to learn from my mistakes and be ready for the next learning too when I am able to keep my mind open. Each mistake that happens is also a beautiful teaching when I am willing to learn. With each new situation I find myself growing very beautifully within. 

In Spiritual Service,
Brahma Kumaris




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Picture Quotes By- “तू न हो निराश कभी मन से” किताब से


100 शब्द  या  10 शब्द – एक सफल जीवन के लिए –

(100 Word “or” Ten Word For A Successful Life )

“तू न हो निराश कभी मन से” किताब => लेखक कृष्ण मोहन सिंह (kmsraj51)

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अपना एक उद्देश्य निश्चित करें!!

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प्रिय पाठकों,

एक लड़के ने एक बहुत धनी आदमी को देखकर धनवान बनने का निश्चय किया। कई दिन वह कमाई में लगा रहा और कुछ पैसे भी कमा लिया। इस बीच उसकी भेंट एक विद्वान से हुई। अब उसने विद्वान बनने का निश्चय किया और दूसरे ही दिन से कमाई-धमाई छोड़कर पढ़ने में लग गया।

अभी अक्षर अभ्यास ही सीख पाया था कि उसकी भेंट एक संगीतज्ञ से हुई। उसे संगीत में अधिक आकर्षण दिखाई दिया, अतः उस दिन से पढ़ाई बंद कर दी और संगीत सीखने लगा। काफी उम्र बीत गई, न वह धनी हो सका न विद्वान। न संगीत सीख पाया न नेता बन सका। तब उसे बड़ा दुःख हुआ। 

एक दिन उसकी एक महात्मा से भेंट हुई। उसने अपने दुःख का कारण बताया। महात्मा मुसकरा कर बोले- बेटा दुनियाँ बड़ी चिकनी है। जहाँ जाओगे कोई न कोई आकर्षण दिखाई देगा। एक निश्चय कर लो और फिर जीते- जी उसी पर अमल करते रहो तो तुम्हारी उन्नति अवश्य हो जाएगी। बार-बार रुचि बदलते रहने से कोई भी उन्नति न कर पाओगे।’’ युवक समझ गया और अपना एक उद्देश्य निश्चित कर उसी का अभ्यास करने लगा।


:=> Post inspired by-Poojya Acharya Bal Krishan Ji Maharaj

Bal Krishna Ji-2 Bal Krishna Ji

“पूज्य आचार्य बाल कृष्ण जी महाराज”



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100 शब्द  या  10 शब्द – एक सफल जीवन के लिए –

(100 Word “or” Ten Word For A Successful Life )

“तू न हो निराश कभी मन से” किताब => लेखक कृष्ण मोहन सिंह (kmsraj51)

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Your Identity is Your Destiny !!

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“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की  व्यथ॔ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51

(Quotes By- “तू न हो निराश कभी मन से” किताब से)

Author Of-

“तू न हो निराश कभी मन से” 



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Brahma Kumaris – Soul Sustenance and Message for the day


Soul Sustenance 22-04-2014

Your Identity is Your Destiny 

There is a direct connection between identity and destiny. It’s a simple process to see and understand, even on a daily basis. If you wake up irritated (in a bad mood) it means you are seeing yourself as an irritated being (soul). Perhaps you even think and sometimes say to your self, “I’m irritated today.” 

It means your self-identity is negative. So you filter the world through your negative filter and the world actually looks like an irritable place. As a result, you think negative thoughts, generate a negative attitude and give negative energy to others. They in turn will likely return the same negative energy, which you are sending to them and perhaps avoid you altogether. So your destiny of the day becomes …. Not so positive! Now see the same principle and process in life on larger scale. Look around outside you now, and you will see a reflection of how you see your self inside. Your circumstances, your relationships and even the events of the day reflect back to you how you see yourself. 

Message for the day 22-04-2014

The one who is able to discriminate well is able to bring about real benefit. 

Expression: Everyone naturally works for the benefit of the self and others. But the one who discriminates well is able to understand the other person’s need and give accordingly. So whatever is done naturally brings benefit for others and also for the self. 

Experience: When I am able to bring benefit for the right person at the right time with the right thing, I am able to win the trust of the other person. I expect nothing in return, but have the satisfaction of helping at the right time. 

In Spiritual Service,
Brahma Kumaris



विशेष:- Coming Soon …..

Brahma Kumaris – Soul Sustenance and Message for the day

in English & Hindi(अंग्रेजी और हिंदी में) …..


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 Picture Quotes By- “तू न हो निराश कभी मन से” किताब से

100 शब्द  या  10 शब्द – एक सफल जीवन के लिए – (100 Word “or” Ten Word For A Successful Life )

“तू न हो निराश कभी मन से” किताब => लेखक कृष्ण मोहन सिंह (kmsraj51)

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सफलता के लिए ज़रूरी है Focus !!

kmsraj51 की कलम से …..
SUCCESSSuccess Key

यह पोस्ट गोपाल मिश्रा द्वारा प्रस्तुत है…..

सफलता के लिए ज़रूरी है Focus !

ऐसा क्यों होता है कि कई बार सब कुछ होते हुए भी हम वो नहीं कर पाते जिसको करने के बारे में हमने सोचा होता है ….दृढ निश्चय किया होता ……खुद को promise किया होता है कि हमें ये काम करना ही करना है …चाहे जो हो जाए ….!!!

“सब कुछ होते हुए” से मेरा मतलब है आपके पास पर्याप्त talent, पैसा , समय , या ऐसी कोई भी चीज जो उस काम को करने के लिए ज़रूरी है ; होने से है .

2009-10 में मैंने अपने दोस्तों के साथ मिल कर Bodhitree Consulting Group (BCG) की शुरुआत की थी , इसके अंतर्गत हमने कुछ Personality Development ओर Quizzing से related programs भी किये , जो काफी पसंद किये गए ,….पर within 6-7 months BCG को बंद करना पड़ा .

आज जब मैं इस बारे में सोचता हूँ कि आखिर BCG क्यों unsuccessful रहा …तो मुझे ऐसी कोई वजह नहीं दिखती जो इस ओर इशारा करे की हमारे team में Talent, Time , या पैसे की कमी थी ….हमारे अन्दर जोश भी काफी था ….पर फिर भी हम इस venture को successful नहीं बना पाए .

तो आखिर वजह क्या थी ?

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वजह थी FOCUS.

चूँकि BCG शुरू करने का initiative मेरा ही था इसलिए मुझे इसपर पूरी तरह से अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहिए था …..पर मैं उस वक़्त अपनी Tata Aig की जॉब में इतना अधिक involve था कि मैं BCG पर focus नहीं कर पाया …और सबकुछ होते हुए भी हम इसे सफल नहीं बना पाए .

यह एक शाश्वत सत्य है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में हम जिस चीज पर ध्यान केन्द्रित करते हैं उस चीज में आश्चर्यजनक रूप से विस्तार होता है . इसलिए सफल होने के लिए हमें अपने चुने हुए लक्ष्य पर पूरी तरह से focussed होना होगा ; और तभी हम उसे हकीकत बनते देख पायेंगे .

Focus करने का क्या अर्थ है ?

एक idea लो . उस idea को अपनी life बना लो – उसके बारे में सोचो उसके सपने देखो , उस idea को जियो . अपने दिमाग , muscles, nerves, शरीर के हर हिस्से को उस आईडिया में डूब जाने दो , और बाकी सभी ideas को किनारे रख दो . यही सफल होने का तरीका है , यही वो तरीका है जिससे महान लोग निर्मित होते हैं .

Friends, उपरोक्त कथन Swami Vivekananda के हैं और मुझे लगता है कि Focus शब्द को शायद ही इससे अच्छे ढंग से समझा जा सकता है .

इस कथन में जहाँ स्वामी जी ने किसी एक आईडिया को अपनाना आवश्यक बताया है वहीँ दूसरी तरफ इस दौरान अन्य ideas को किनारे रखने के लिए भी कहा है. और सही मायने में यही है Focussed होना.

Focus करता क्या है ?

आपने बचपन में lens ज़रूर use किया होगा ….lens देखने में तो एक साधारण कांच का टुकड़ा लगता है …पर जब हम उसे कागज़ के किसी एक हिस्से पर focus करते हैं तो थोड़ी देर में वो कागज़ जलने लगता है …..

Focus चीजों को संभव बनाता है ….जब आप भी अपने goal पर focused रहते हैं तो मार्ग में आने वाली बाधाएं जल कर ख़ाक हो जाती हैं , आपका रास्ता साफ़ हो जाता है , और आप अपना goal achieve कर पाते हैं . Focus आपको सिर्फ यह नहीं बताता कि करना क्या है , यह भी बताता है कि क्या नहीं करना है .Focus आपको आपके goal से बांधता ही नहीं , आपको बेकार की चीजों में बंधने से बचाता भी है .

मैं हमेशा से सोचता था की मुझे कुछ बड़ा achieve करना है . मेरे लिए बड़े का अर्थ कभी lucrative jobs और अधिक पैसे कमाना नहीं रहा है, हालांकि मैं भी financially abundant होना चाहता हूँ … पर मेरे लिए जो काम बड़ा है वो है अधिक से अधिक लोगों का जीवन बेहतर बनाना . और कुछ हद्द तक मैं ऐसा अपनी NGO Kartavya के through कर पाया …पर वो मेरे लिए satisfactory नहीं था . इसीलिए जब मैंने AchhiKhabar.Com(AKC) की शुरआत की तभी मैंने ठान लिया था की अब मैं अपना पूरा focus इसी एक चीज पर रखूँगा , और तब तक रखूँगा जब तक मैं इसमें सफल नहीं हो जाता , इस दौरान मैं किसी और चीज पर ध्यान नहीं दूंगा …यहाँ तक की अपनी NGO की तरफ भी , और ना ही अपनी जॉब में exceptional होने की कोशिश करूँगा , अब मेरा एक ही लक्ष्य होगा AKC को अपनी पहली major Success Story बनाना . और आज इसे Worl’d Most Read Hindi Blog* बना कर मैं कुछ हद्द तक सफल भी हुआ हूँ , पर अभी भी मैं इसे major success नहीं कह सकता , इसमें कुछ और समय लगेगा. 🙂

क्या Focused रहना आसान है ?

नहीं , पिछले डेढ़ साल में AKC पर अपना focus बनाये रखने के लिए मैंने बहुत सी चीजों को ना कहा है ; including better job opportunities, foreign travel breaks, other promising income generating ideas, etc. Friends, अगर आपको कुछ World Class करना है तो आपको पूरी तरह से उस काम में डूबना होगा और तब तक लगे रहना होगा जब तक की आप अपने efforts को physical reality में तब्दील होते हुए ना देख लें .बीच में बहुत सारे distractions आयेंगे ; पर उस वक़्त आपको अपना focus नहीं loose करना है ….और ऐसा तभी संभव होगा जब आप अपने काम या idea में पूरी तरह से believe करते हैं . इस मुश्किल समय में जब mind में self doubt आने लगता है तब आपका belief system ही आपको distract होने से बचा सकता है . इसलिए काम शुरू करने से पहले ही आप उस पर अच्छी तरह से सोच विचार कर लीजिये , in fact आप अपने friends को आपको उस idea या plan को लेकर challenge करने के लिए भी कह सकते हैं . और अगर कोई भी तर्क -वितर्क आपकी आईडिया को लेकर आपके अन्दर doubt डालता है तो आप उस पर पुनः विचार कर सकते हैं . कुछ शुरू करने से पहले आपका अपने काम के successful होने पर believe करना बहुत ज़रूरी है आगे यही आपके FOCUS को उस पर बनाये रखने में मदद करेगा .

तो क्या focus करने का ये मतलब है कि हम और कोई काम करे ही नहीं ?

नहीं , आप और काम करते हुए भी अपना focus किसी एक चीज पर बनाये रख सकते हैं . For example: Mahendra Singh Dhoni Railways में TTE की job करते थे पर फिर भी उनका focus cricket था . आप रोज TV पर कितने ही singers और dancers को देखते हैं , वो भी और लोगों की तरह पढने जाते हैं या job करते हैं पर उनका focus तो singing या dancing होता है . इसी तरह मैंने आपके साथ World’s Youngest CEO , Suhas Gopinath की story share की थी , पढाई करते वक़्त भी उनका focus अपनी company establish करने का था ; और इसी एकाग्रता के दम पर उन्होंने छोटी सी उम्र में multi million dollar company खड़ी कर दी.

देखिये , जब तक आपके मन का काम आपको financially support नहीं करने लगता तब तक कुछ ना कुछ तो करते रहना होगा ….पर ध्यान देने की बात ये है कि आपको और चीजों को सिर्फ करना है …पर आपने अपने लिए जो Goal decide किया है उसे achieve करने के लिए आपको उसमे डूबना है , और यही आपकी success और failure के बीच का सबसे बड़ा differentiator होगा.

इतना याद रखिये कि अपने जीवन में एक normal focussed व्यक्ति एक talented unfocussed व्यक्ति से कहीं ज्यादा achieve कर सकता है . और सच पूछिए तो अगर हमने इस अनमोल जीवन को छोटी – मोटी चीजें करने में ही बिता दिया तो हमारे life की कोई value नहीं रहेगी …..हमारी अपनी नज़रों में भी ….इसलिए बड़े लक्ष्य बनाइये और उस पर focussed होकर उसे achieve करिए ….तभी जीने का असली मजा है .


Post inspired by AKC. I am grateful to Mr. Gopal Mishra & AKC (http://www.achhikhabar.com/) Thanks a lot !!

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क्या बनना चाहेंगे आप : Fault Finder या Solution Seeker ?

kmsraj51 की कलम से …..

यह पोस्ट गोपाल मिश्रा द्वारा प्रस्तुत है …..

बात बहुत पुरानी है , 13-14 साल पुरानी ….मैं Gorakhpur से Lucknow या शायद Lucknow से Gorakhpur जा रहा था …train मुसाफिरों से भरी हुई थी , गप लड़ाने वालों के ठहाकों और चाय -समोसा बेचने वालों के शोर के बीच एक तीखी आवाज़ कान के पर्दों को लगभग चीरते हुए मुझसे टकराई ….”सरकार चोर है. ”

और उसके बाद ऐसी लाइनों की झड़ी सी लग गयी ,क्या युवा , क्या अधेड़ और क्या बुजुर्ग हर एक व्यक्ति system को कोसने में लग गया …मैं वहीँ बैठा ये सब सुन रहा था , कुछ देर सुनता रहा , पर किसी को positively बात ना करते देख मुझसे रहा नहीं गया और मैं भी discussion में शामिल हो गया .

मैंने कहा , “ system तो हमी लोगों से बना है , अगर ये गड़बड़ है तो इसे ठीक भी हमी को करना होगा .”
“ हम कैसे ठीक कर सकते हैं , हमारे हाथ में क्या है , ये तो सरकार की जिम्मेदारी है …” ’ उधर से जवाब आया और ऐसे करते-करते बात बहस में बदल गयी …जहाँ तक मुझे याद है मेरी last lines कुछ ऐसे थीं ….”आप नहीं बदल सकते तो न सही मैं बदलूँगा system को …”

Friends, भारत में Fault Finders की कमी नहीं है …करोड़ों हैं …ज़रुरत तो Solution Seekers की है …किसी समस्या को देखकर उसे लगातार कोसना आपको part of problem बना देता है , and in fact ऐसा करके आप problem को बढाते ही हैं घटाते नहीं …so never be a part of problem try to be a part of solution.

क्या होता है जब हम Fault Finding में लगे रहते हैं ?

हम negative सोचते हैं , अपनी energy का गलत इस्तेमाल करते हैं , अपने life में और भी अधिक stress और tension attract करते हैं और सबसे बड़ी चीज हम fault को fault ही रहने देते हैं.

क्या होता है जब हम Solution Seeking में लगे रहते हैं ?

हम positive सोचते हैं , अपनी energy का सही इस्तेमाल करते हैं ,अपनी life में और भी अधिक happiness और self satisfaction attract करते हैं और सबसे बड़ी चीज हम fault को fault नहीं रहने देते उसका solution निकाल लेते हैं .

तो फिर क्या बनना पसंद करेंगे आप Fault Finder या Solution seeker?

फैसला आसान है , हर कोई यही कहेगा की वो solution seeker बनना पसंद करेगा . पर ये बोलने जितना आसान नहीं है . कोई बरसो से fault finding में लगा हो तो ये चीज उसकी habit में आ जाती है .

तो सबसे पहले आप ऐसा करिए की खुद को observe करिए , कहीं ये संक्रमण आपके अन्दर तक तो नहीं फ़ैल गया है , कहीं आप चाय में चीनी कम होने जैसी छोटी सी fault से लेकर चीनीयों की घुसपैठ जैसी गंभीर समस्या तक हर जगह fault ही तो नहीं find करते रहते ???

अब आपको इस संक्रमण को दूर करना होगा , आप इसे कई तरीकों से कर सकते हैं :

For instance जैसे ही आपको लगे कि आपने fault finding चालू कर दी है तो topic को नयी दिशा देते हुए उसके solution के बारे में बात करना शुरू कर दीजिये …. “ सरकार निठल्ली है , भला चीन कैसे हमारी सीमा में घुस सकता है …., हमें अपनी सीमा पर और सैनिक लगाने चाहिए और satellite से नज़र रखनी चाहिए …हमें International community में भी lobbying करनी चाहिए …”
आप मन ही मन ये निश्चय कर सकते हैं कि आज से आप हर एक चीज, हर एक situation चाहे वो कितनी बुरी ही क्यों न हो कुछ न कुछ अच्छा खोज कर दिखायेंगे…
अगर आदत कुछ ज्यादा ही लग गयी है तो आप अपनी फाल्ट फाइंडिंग को लिमिट भी कर सकते हैं…मैं हर रोज अधिक से अधिक तीन बातों पर negatively बात करूँगा..कोटा पूरा होते ही मैं सिर्फ और सिर्फ positive aspects पर फोकस करूँगा….and so on …
Well, हो सकता है कि “ fault finding” आपको आम सी बात लगे , और आप इसे seriously न लें पर यकीन जानिये अगर आप इससे suffer कर रहे हैं तो ये आपके personal development में एक बहुत बड़ा bottleneck है …क्योंकि जब आप अपने mind को fault find करने के लिए train कर देते हैं तो वो सिर्फ सरकार और देश की ही नहीं आपकी अपने लाइफ की भी fault गिनाता रहता है , आप ना जाने कब औरों को कोसते -कोसते खुद को भी कोसने लगते हैं …और इसी का बिगड़ा हुआ रूप depression में बदल जाता है ….मैं आपको डरा नहीं रहा , बस alert कर रहा हूँ , Fault Finder नहीं Solution Seeker बनिए …क्योंकि हर कोई यही चाहता है …आपका देश , आपकी company , आपकी family और आपका inner -self हर कोई यही चाहता है ….so don’t be a Fault Finder be a Solution Seeker.

All the best 🙂


Post inspired by AKC. I am grateful to Mr. Gopal Mishra & AKC (http://www.achhikhabar.com/) Thanks a lot !!

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