शास्त्रों से प्रेरक प्रसंग।

Kmsraj51 की कलम से…..

CYMT-KMSRAJ51-4

एक साधु महाराज अपने सतसंग मे श्रोताओ को शराब से दूर रहने का उपदेश देते थे।

एक दिन एक नास्तिक व्यक्ति साधू के पास गया और उनसे बोला:- ‘महोदय, एक बात बताइए।’

साधू ने प्रश्न किया:- क्या?’

नास्तिक ने पूछा:- ‘यदि मैं खजूर खाऊं, तो क्या मुझे पाप लगेगा?’

साधू ने जवाब दिया:- ‘बिल्कुल नहीं।’

नास्तिक ने अगला प्रश्न किया:-‘और यदि मैं उस खजूर के साथ थोड़ा पानी मिला लूं और तब खाऊं, तो क्या मुझे पाप लगेगा?’

साधू ने कहा:- ‘इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा।’

उस नास्तिक ने पुन: प्रश्न किया:- ‘और महोदय, यदि मैं उस खजूर में पानी के साथ-साथ थोड़ा खमीर मिलाकर खाऊं, तो क्या उससे कोई धार्मिक अवज्ञा होगी?’

साधू सारी बात समझ गए थे, किंतु फिर भी बड़े शांत स्वर में उन्होंने उत्तर दिया:-‘नहीं, बिल्कुल नहीं।’

अब नास्तिक तर्क करता हुआ बोला:-‘तो फिर
धार्मिक ग्रंथों में शराब पीना पाप क्यों बतलाया गया है, जबकि वह इन तीनों के मिलाने से ही बनती है?’

साधू ने नास्तिक के सवाल का जवाब न देते हुए उलटे उससे ही प्रश्न कर दिया:- ‘अच्छा, एक बात बताओ।
यदि मैं तुम पर मुट्ठी भर धूल फेंकूं, तो क्या तुम्हें चोट लगेगी?’

नास्तिक का जवाब था:- ‘नहीं’

साधू ने पूछा:- ‘और, यदि मैं उस धूल में थोड़ा पानी मिला लूं और तब तुम पर फेंकूं, तो क्या कोई फर्क पड़ेगा?’

प्रसन्नता से नास्तिक बोला:- ‘तो भी मुझे कोई चोट नहीं पहुंचेगी।’

साधू ने अगला प्रश्न किया:- ‘और मित्र, यदि मैं उस मिट्टी और पानी में कुछ पत्थर मिला कर तुम्हारे ऊपर फेंकूं, तो क्या अंतर होगा?’

घबराकर नास्तिक बोला:- ‘तब तो मेरा सिर ही फूट जाएगा’,

अब साधू ने शांति से कहा:- ‘मुझे विश्वास है कि अब तुम्हें अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया होगा।’

अब नास्तिक वास्तविकता से परिचित हो चुका था।

सत्संग में तथा शास्त्रों मे हमे जो समझाया जाता है और जिन चीजो का परित्याग करने को कहा जाता है उसमे जीवात्मा का ही फायदा है।

~जया शर्मा किशोरी जी।

We are grateful to Pujya Jaya sharma Kishori Ji.

Jaya Kishori Ji-kmsraj51

जया शर्मा किशोरी जी।

 

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दूसरों के साथ अपनी तुलना करके खुद को कमतर न आंकें।

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 दूसरों के साथ अपनी तुलना करके खुद को कमतर न आंकें।

एक कुम्हार घड़ा बना रहा था। पास ही कुछ सुराहियां, दीपक, मूर्तियां और गुल्लकें बनी रखीं थीं। ये सभी आपस में बातें कर रहे थे। घड़े ने दीपकों से कहा- ‘तुम सभी कितने सुंदर हो अलग अलग आकृतियों में। एक हम हैं… सब के सब मोटे-मोटे। जरा-सा ढलक जाएं तो टूट ही जाएं।’ एक दीपक बोला-‘अरे कहां, घड़े काका। हमारा आकार तो देखो आपके आगे कितना छोटा है। किसी सामान के पीछे कब दब कर टूट जाएं, पता भी न चले। ये मूर्तियां हमसे कहीं ज्यादा सुंदर हैं। काश, हम भी मूर्ति होते।’ दीपक और घड़े की बातें सुनकर मूर्तियां भी उदास हो गईं। एक मूर्ति बोली- ‘भैया, ये आप क्या कह रहे हैं! आपको नहीं पता कि हमें इस आकार को पाने के लिए कितनी तकलीफ सहनी पड़ती है। अपने अंगों को जगह-जगह से सुडौल आकार देने की खातिर कितने कष्ट उठाने पड़ते हैं। हमें तो गुल्लक बनना पसंद था। काश, हम गुल्लक होतीं तो सब हमारे भीतर खूब सारे पैसे रखते।’ गुल्लकें काफी देर से सब की बातें सुन रहीं थीं, वे भी विचलित हो उठीं। एक गुल्लक तो बिफर ही पड़ी- ‘आप सब हमारा दर्द नहीं समझ पाएंगे। लोग हमारे भीतर अपनी सबसे प्रिय वस्तु ‘अपना पैसा’ संचित करते हैं ताकि वह इधर-उधर न पड़ा रहे और सुरक्षित रहे, लेकिन इसी पैसे की खातिर वे लोग एक दिन हमें बड़ी निर्ममता से पटक कर फोड़ देते हैं। अब आप ही बताइए, क्या आपको कोई ऐसे तोड़ता है?’

कुम्हार का चाक अपना काम करते हुए इन सभी की तकलीफें सुन रहा था। जब उसका काम पूरा हो गया तो उसने भी बातचीत शुरू कर दी। उसने घड़े को समझाया- ‘तुम बहुत ही उपयोगी हो। अपने शीतल जल से तमाम लोगों की प्यास बुझाते हो और कुछ लोग तो तुम्हारे भीतर अपना अनाज तक रख लेते हैं।’ फिर वह दीपक से बोला- ‘तुम आकार में बेशक छोटे हो, लेकिन तुमसे प्रकाश फूटता है। तुम मंदिरों में जगह पाते हो। घरों और देहरियों को जगमगाते हो।’ इसके बाद चाक ने मूर्तियों की तरफ देखा और कहा- ‘तुम्हारी शोभा इसीलिए है कि तुम इतनी तकलीफ सहती हो। इसीलिए तुम घरों, मंदिरों, ऑफिसों की शोभा बढ़ाती हो।’ आखिर में उसने गुल्लकों की और बड़े प्यार से देखते हुए कहा- ‘तुम सभी बहुत कीमती हो| तुम बच्चों की खुशी हो। तुम लोगों के बुरे वक्त में उनके काम आकर अपना जीवन सार्थक कर देती हो।’

इस तरह वह चाक उन चीजों के साथ-साथ हम इंसानों को भी ये सीख दे गया कि अपने गुणों को पहचानते हुए खुद का भी सम्मान करना चाहिए। दूसरे लोगों के साथ अपनी तुलना करके बेवजह खुद को कमतर नहीं आंकना चाहिए। अपनी-अपनी जगह पर हम सभी उपयोगी हैं। हमें अपना मोल खुद पहचानना चाहिए।

Source(स्रोत): http://navbharattimes.indiatimes.com/

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समाज के सहयोग के बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते।

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Kmsraj51-CYMT-Oct-14-5

समाज के सहयोग के बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते।

अक्सर कुछ लोग शिकायत करते हैं कि हमें अपने मां-बाप से विरासत में कुछ नहीं मिला। वे खुद को सेल्फ मेड कहते और मानते हैं। यह भ्रम ही नहीं, अहंकार भी है। प्रश्न उठता है कि क्या मात्र धन-दौलत या पैसा ही वास्तविक विरासत है? कुछ लोगों को तो मां-बाप से ही नहीं, पूरे समाज से शिकायत होती है। उनका कहना है कि दुनिया ने उनके लिए कुछ नहीं किया। उनके लिए सबकी जिम्मेदारी होती है लेकिन वे खुद किसी के लिए जिम्मेदार नहीं होते। वे कभी ये सोचने की जहमत नहीं उठाते कि उन्होंने समाज के लिए क्या किया है।

यह सही है कि आपने खुद अपना विकास किया। आपने अपने समय का सदुपयोग किया, खूब मेहनत करके पढ़ाई की, लेकिन एक विद्यार्थी को भी पढ़ने-लिखने और आगे बढ़ने के लिए कापी-किताब और कलम-दवात आदि न जाने कितनी चीजों की जरूरत पड़ती है। उनके लिए वह दूसरों पर निर्भर होता है। यह ठीक है कि आपने पुरुषार्थ किया और एक अच्छी सी नौकरी पा गए या अपना एक अच्छा-सा व्यवसाय स्थापित कर लिया। यदि पुरुषार्थ नहीं करते तो आपका ही अहित होता। पुरुषार्थ करके आपने अपने लिए अच्छा किया, लेकिन क्या प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से अनेक व्यक्तियों और समाज ने आपको आगे बढ़ने के अवसर उपलब्ध नहीं कराए?

बड़ी-बड़ी चीजों की बात छोड़िए, छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी हम दूसरों पर निर्भर होते हैं। एक मामूली सी लगने वाली कमीज जो हमने पहन रखी है, उसे हमारे तन पर सुशोभित करने में सैकड़ों लोगों का योगदान है। खेत में बीज बोने से लेकर पौधे उगने और उनसे कपास मिलने फिर कपास से कपड़ा और कमीज बनने के बीच असंख्य हाथों का परिश्रम है। कपड़े से कमीज बनाने के लिए एक सिलाई मशीन की जरूरत पड़ती है। वह लोहे और कई दूसरे पदार्थों से बनती है। खनिकों द्वारा लोहा और अन्य खनिज पदार्थ खानों से निकाले जाते हैं। बड़े-बड़े करखानों में मजदूरों द्वारा लोहा साफ किया जाता है। फिर दूसरे बड़े-बड़े करखानों में लोहे से बड़ी-बड़ी मशीनों द्वारा छोटी मशीनें बनती हैं। उन्हीं में से एक मशीन पर कारीगर कपड़े से एक कमीज सिलकर आपको पहनाता है।

यदि कमीज में बटन न लगे हों तो कैसा लगे। एक बटन जैसी अल्प मूल्य की वस्तु भी ऐसे ही नहीं बन जाती। उसके लिए भी न जाने कितने हाथों के सहारे की जरूरत पड़ती है। एक बटन टांकने के लिए सबसे जरूरी यंत्र सुई है। इस छोटी सी चीज को भी हम स्वयं नहीं बना सकते। सच तो ये है कि हम सब एक दूसरे के सहयोग के बिना अधूरे हैं। हमारे विकास में हमारा पुरुषार्थ ही नहीं, अन्य सभी का सहयोग भी अपेक्षित है। माता-पिता, भाई-बंधु, समाज, विरोधी-प्रतिद्वंद्वी और प्रकृति के मिले जुले प्रयासों से हमारा जीवन गति पाता है।

Source: http://navbharattimes.indiatimes.com/

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एक सफल जीवन के लिए-आत्मा का दैनिक भोजन-08-May-2014

kmsraj51 की कलम से…..

Soulword_kmsraj51 - Change Y M TFor a successful life the daily food of the soul-08-May-2014

English Murli

Essence: Sweet children, the Father has come to change thorns into flowers. The biggest thorn is body consciousness. It is through this that all other vices come. Therefore, become soul conscious.

Question: Due to not understanding which of the Father’s tasks have devotees considered Him to be omnipresent?
Answer: The Father is the One with many forms and, wherever there is a need, He enters any child in a second and benefits the soul in front of that one. He grants visions to devotees. He is not omnipresent but is a very fast rocket. It doesn’t take the Father long to come and go. Due to not understanding this, devotees say that He is omnipresent.

Essence for dharna:
1. In order to become worthy and sensible, become pure. Do service with the Father in order to change the whole world from hell into heaven. Become a helper of God.
2. Renounce the systems of the iron-aged world, the opinion of society and the code of conduct of the family and observe the true code of conduct. Become full of divine virtues and establish the deity community.

Blessing: May you be truthful and, with the foundation of truth, give the experience of divinity through your face and your activity.
In the world, many souls are called truthful or consider themselves to be truthful, but complete truthfulness is based on purity. Where there is no purity, there cannot be truth. The foundation of truth is purity and the practical proof of truth is the divinity on your face and in your activity. On the basis of purity, there is naturally and easily the form of truth. When both the soul and body become pure, you would then be said to be truthful, that is, you would be a deity who is filled with divinity.

Slogan: Remain busy in unlimited service and there will automatically be unlimited disinterest.


 

Hindi Murli-हिन्दी मुरली

मुरली सार:- “मीठे बच्चे – बाप आये हैं कांटों को फूल बनाने, सबसे बड़ा कांटा है देह-अभिमान, इससे ही सब विकार आते हैं, इसलिए देहीअभिमानी बनो”

प्रश्न:- भक्तों ने बाप के किस कर्त्तव्य को न समझने के कारण सर्वव्यापी कह दिया है?
उत्तर:- बाप बहुरूपी है, जहाँ आवश्यकता होती सेकण्ड में किसी भी बच्चे में प्रवेश कर सामने वाली आत्मा का कल्याण कर देते हैं। भक्तों को साक्षात्कार करा देते हैं। वह सर्वव्यापी नहीं लेकिन बहुत तीखा राकेट है। बाप को आने-जाने में देरी नहीं लगती। इस बात को न समझने के कारण भक्त लोग सर्वव्यापी कह देते हैं।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) लायक और समझदार बनने के लिए पवित्र बनना है। सारी दुनिया को हेल से हेविन बनाने के लिए बाप के साथ सर्विस करनी है। खुदाई खिदमतगार बनना है।
2) कलियुगी दुनिया की रस्म-रिवाज, लोक-लाज, कुल की मर्यादा छोड़ सत्य मर्यादाओं का पालन करना है। दैवीगुण सम्पन्न बन दैवी सम्प्रदाय की स्थापना करनी है।

वरदान:- सत्यता के फाउण्डेशन द्वारा चलन और चेहरे से दिव्यता की अनुभूति कराने वाले सत्यवादी भव
दुनिया में अनेक आत्मायें अपने को सत्यवादी कहती वा समझती हैं लेकिन सम्पूर्ण सत्यता पवित्रता के आधार पर होती है। पवित्रता नहीं तो सदा सत्यता नहीं रह सकती। सत्यता का फाउण्डेशन पवित्रता है और सत्यता का प्रैक्टिकल प्रमाण चेहरे और चलन में दिव्यता होगी। पवित्रता के आधार पर सत्यता का स्वरूप स्वत: और सहज होता है। जब आत्मा और शरीर दोनों पावन होंगे तब कहेंगे सम्पूर्ण सत्यवादी अर्थात् दिव्यता सम्पन्न देवता।

स्लोगन:- बेहद की सेवा में बिजी रहो तो बेहद का वैराग्य स्वत: आयेगा।


 

Hinglish Murli

Murli Saar : – Meethe Bacche – Baap Aaye Hai Kaanton Ko Phul Banane, Sabse Bada Kaanta Hai Deh – Abhiman, Isse Hi Sab Vikaar Aate Hai, Isliye Dehi – Ahimani Banno”

Prashna : – Bhakto Ne Baap Ke Kis Kartavya Ko Na Samajhne Ke Karan Sarvavyapi Kah Dia Hai ?

Uttar : – Baap Bahurupi Hai, Jaha Aavasyak Hoti Second Mei Kisi Bhi Bacche Mei Pravesh Kar Samne Vaali Atma Ka Kalyan Kar Dete Hai. Bhakto Ko Sakshatkar Kara Dete Hai. Vah Sarvavyapi Nahi Lekin Bahut Teekha Rocket Hai. Baap Ko Aane – Jane Mei Dairi Nahi Lagti. Is Baat Ko Na Samajhne Ke Karan Bhakt Log Sarvavyapi Kah Dete Hai.

Dharan Ke Liye Mukhya Saar : –

1 ) Layak Aur Samajdar Banne Ke Liye Pavitra Bannna Hai. Saari Dunia Ko Hell Se Heaven Banane Ke Liye Baap Ke Saath Service Karni Hai. Khudayi Khidmadgar Bannna Hai.

2 ) Kaliyugi Dunia Ki Rasm – Rivaz, Lok – Laaz, Kul Ki Maryada Chod Satya Maryadaon Ka Palan Karna Hai. Daivigun Sampann Ban Daivi Sampradaye Ki Stapna Karni Hai.

Vardan : – Satyata Ke Foundation Dwara Chalan Aur Chehre Se Divyata Ki Anubhuti Karane Wale Satyavadi Bhav

Dunia Mei Anek Atmae Apne Ko Satyavadi Kehti Va Samajti Hai Lekin Sampurn Satyata Pavitrata Ke Aadhar Par Hoti Hai. Pavitrata Nahi Toh Sada Satyata Nahi Rah Sakti. Satyata Ka Foundation Pavitrata Hai Aur Satyata Ka Practical Praman Chehre Aur Chalan Mei Divyata Hogi. Pavitrata Ke Aadhar Par Satyata Ka Swarup Swatah : Aur Sahaj Hota Hai. Jab Atma Aur Sharir Dono Paavan Honge Tab Kahenge Sampurn Satyavadi Arthat Divyata Sampann Devta.

Slogan : – Behad Ki Seva Mei Busy Raho Toh Behad Ka Vairagya Swatah : Aayega.

 

आध्यात्मिक सेवा में, 
ब्रह्माकुमारी

brahmakumaris-kmsraj51

Note::-

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love-rose-kmsraj51Picture Quotes By- “तू न हो निराश कभी मन से” किताब से

Book-Red-kmsraj51

100 शब्द  या  10 शब्द – एक सफल जीवन के लिए –

(100 Word “or” Ten Word For A Successful Life )

“तू न हो निराश कभी मन से” किताब => लेखक कृष्ण मोहन सिंह (kmsraj51)

“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की  व्यथ॔ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51

Soulword_kmsraj51 - Change Y M T

“सफल लोग अपने मस्तिष्क को इस तरह का बना लेते हैं कि उन्हें हर चीज सकारात्मक व खूबसूरत लगती है।”
-KMSRAJ51

“हमारी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि हम अपने जीवन का कुछ सेकंड, प्रतिघंटा और प्रतिदिन कैसे बिताते हैं”
-KMSRAJ51

-A Message To All-

मत करो हतोत्साहित अपने शब्दों से ……आने वाली नयी पीढ़ी को ,
वो भी करेंगे कुछ ऐसा एक दिन…. जिसे देखेगा ज़माना ….पकड़ती हुई नयी सीढ़ी को ॥

कुछ भी आप के लिए संभव है ॥

जीवन मंदिर सा पावन हाे, बाताें में सुंदर सावन हाे।

स्वाथ॔ ना भटके पास ज़रा भी, हर दिन मानो वृंदावन हाे॥

~kmsraj51

95+ देश के पाठकों द्वारा पढ़ा जाने वाला हिन्दी वेबसाइट है,, –

https://kmsraj51.wordpress.com/

मैं अपने सभी प्रिय पाठकों का आभारी हूं…..  I am grateful to all my dear readers …..

“तू न हो निराश कभी मन से” book

~Change your mind thoughts~

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