“Soul Sustenance & Message for the day 26-01-2014”

KMSRAJ51 Celebrate ~ Happy Anniversary!! Month
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kmsraj51 की कलम से …..
Indian Flag

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Soul Sustenance 26-03-2014
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The Life Jacket Of Hope

In the midst of the constant changes of life and confusing or chaotic situations, hope, becomes our life jacket, which helps us to keep afloat and not to drown in the hurricane that at times causes unexpected or sudden changes. Without hope, we expect the worst. Our vision gets cloudy; we do not find or see any ray of light to see by. The mind fills with questions, allowing it to be overpowered by doubts and insecurity. Fear takes control of us and everything turns into a mountain or an un-climbable wall. It seems to us that we will not be able to get out of the difficult and critical moments, or it will be difficult for us to get out of the “hole”. We feel incapable of going forward. Fear and doubt paralyze us and prevent us from deciding with clarity and acting with determination. We need to find support or help and, when we don’t get it, we go even further down.

Living with hope keeps us awake. With hope we are open to the opportunities that life offers us. We overcome fear and expect the best. With hope our forces are joined in order to deal with and overcome difficulties. We maintain the vision that everything will get better and things will streamline themselves, giving out benefits to all. Hope helps us to keep the meaning of our life alive.

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Message for the day 26-03-2014
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Cooperation brings beauty and growth.

Expression: Everyone seeks for cooperation from others, but the beauty lies in cooperating with others. True cooperation is that which is given with the heart and touches the lives of others positively. It inspires others to be cooperative too. This is the true help that one can extend to others.

Experience: When I am able to be cooperative with others and provide them with the help that they require, I am able to enjoy the joy of giving unconditionally. I am free from expectations from others and I am able to enjoy the growth that I perceive in others. I don’t expect others to change for me but because they can improve.

In Spiritual Service,
Brahma Kumaris

Note::-
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Complete Chanakya Niti in Hindi !!


::- Krishna Mohan Singh(kmsraj51) …..
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$$ चाणक्य नीति हिन्दी में $$

Chanakya


शक्तिशाली लोगों के लिए कौनसा कार्य कटीं है ? व्यापारिओं के लिए कौनसा जगह दूर है, विद्वानों के लिए कोई देश विदेश नहीं है, मधुभाषियों का कोई शत्रु नहीं!!

राजा लोग अपने आस पास अच्छे कुल के लोगो को इसलिए रखते है क्योंकि ऐसे लोग ना आरम्भ मे, ना बीच मे और ना ही अंत मे साथ छोड़कर जाते है!!

जिस तरह सारा वन केवल एक ही पुष्प अवं सुगंध भरे वृक्ष से महक जाता है उसी तरह एक ही गुणवान पुत्र पुरे कुल का नाम बढाता है!!

जिस प्रकार केवल एक सुखा हुआ जलता वृक्ष सम्पूर्ण वन को जला देता है उसी प्रकार एक ही कुपुत्र सरे कुल के मान, मर्यादा और प्रतिष्ठा को नष्ट कर देता है!!

कुल की रक्षा के लिए एक सदस्य का बिलदान दें,गाव की रक्षा के लिए एक कुल का बिलदान दें, देश की रक्षा के लिए एक गाव का बिलदान दें, आतमा की रक्षा के लिए देश का बिलदान दें!!

ऐसे अनेक पुत्र किस काम के जो दुःख और निराशा पैदा करे. इससे तो वह एक ही पुत्र अच्छा है जो समपूणर घर को सहारा और शान्ति पर्दान करे!!

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उस देश मे निवास न करे जहा आपकी कोई इजजत नहीं, जहा आप रोजगार नहीं कमा सकते,
जहा आपके कोई मित्र नहीं और जहा आप कोई ज्ञान आर्जित नहीं कर सकते।।

वहा एक दिन भी ना रके जहा ये पाच ना हो!!
धनवान व्यक्ति ,
विदान व्यक्ति जो शास्त्रों को जानता हो,
राजा,
नदियाँ,
और चिकित्सक !!

बुद्धिमान व्यक्ति ऐसे देश कभी ना जाए जहा …
रोजगार कमाने का कोई माधयम ना हो!
जहा लोग किसी से डरते न हो!
जहा लोगो को किसी बात की लज्जा न हो!!
जहा लोगो के पास बुद्धिमत्ता न हो!
जहा के लोगो की वृत्ति दान धरम करने की ना हो!!

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इन बातो को बार बार गौर करे…
सही समय
सही मित्र
सही ठिकाना
पैसे कमाने के सही साधन
पैसे खर्चा करने के सही तरीके
आपके उर्जा स्रोत!!

आत्याधिक सुन्दरता के कारन सीताहरण हुआ,
अत्यंत घमंड के कारन रावन का अंत हुआ,
अत्यधिक दान देने के कारन रजा बाली को बंधन में बंधना पड़ा,
अतः सर्वत्र अति को त्यागना चाहिए!!

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यदि कर्म का फल तुरन्त नहीं मिलता तो इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि उसके भले-बुरे परिणाम से हम सदा के लिए बच गयें । कर्म-फल एक ऐसा अमिट तथ्य है जो आज नहीं तो कल भुगतना अवश्य ही पड़ेगा । कभी-कभी इन परिणामों में देर इसलिये होती है कि ईश्वर मानवीय बुद्धि की परीक्षा करना चाहता है कि व्यक्ति अपने कर्तव्य-धर्म समझ सकने और निष्ठापूर्वक पालन करने लायक विवेक बुद्धि संचित कर सका या नहीं । जो दण्ड भय से डरे बिना दुष्कर्मों से बचना मनुष्यता का गौरव समझता है और सदा सत्कर्मों तक ही सीमित रहता है, समझना चाहिए कि उसने सज्जनता की परीक्षा पास कर ली और पशुता से देवत्व की और बढऩे का शुभारम्भ कर दिया ।

लाठी के बल पर जानवरों को इस या उस रास्ते पर चलाया जाता है और अगर ईश्वर भी बलपूर्वक अमुक मार्ग पर चलने के लिए विवश करता तो फिर मनुष्य भी पशुओं की श्रेणी में आता, इससे उसकी स्वतंत्र आत्म-चेतना विकसित हुई या नहीं इसका पता ही नहीं चलता । भगवान ने मनुष्य को भले या बुरे कर्म करने की स्वतंत्रता इसीलिए प्रदान की है कि वह अपने विवेक को विकसित करके भले-बुरे का अन्तर करना सीखे और दुष्परिणामों के शोक-संतापों से बचने एवं सत्परिणामों का आनन्द लेने के लिए स्वत: अपना पथ निर्माण कर सकने में समर्थ हो । अतएव परमेश्वर के लिए यह उचित ही था कि मनुष्य को अपना सबसे बड़ा बुद्धिमान और सबसे जिम्मेदार बेटा समझकर उसे कर्म करने की स्वतंत्रता प्रदान करे और यह देखे कि वह मनुष्यता का उत्तरदायित्व सम्भाल सकने मे समर्थ है या नहीं ? परीक्षा के बिना वास्तविकता का पता भी कैसे चलता और उसे अपनी इस सर्वश्रेष्ठ रचना मनुष्य में कितने श्रम की सार्थकता हुई यह कैसे अनुभव होता । आज नहीं तो कल उसकी व्यवस्था के अनुसार कर्मफल मिलकर ही रहेगा । देर हो सकती है अन्धेर नहीं । ईश्वरीय कठोर व्यवस्था, उचित न्याय और उचित कर्म-फल के आधार पर ही बनी हुई है सो तुरन्त न सही कुछ देर बाद अपने कर्मों का फल भोगने के लिए हर किसी को तैयार रहना चाहिए ।

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हर मित्रता के पीछे कुछ स्वार्थ जरूर छिपा होता है। दुनिया में ऐसी कोई दोस्ती नहीं जिसके पीछे लोगों के अपने हित न छिपे हों, यह कटु सत्य है, लेकिन यही सत्य है। और जो मित्र आपके सामने चिकनी-चुपड़ी बातें करता हो और पीठ पीछे आपके कार्य को बिगाड़ देता हो, उसे त्याग देने में ही भलाई है। चाणक्य कहते हैं कि वह उस बर्तन के समान है, जिसके ऊपर के हिस्से में दूध लगा है परंतु अंदर विष भरा हुआ होता है।

चाणक्य कहते है कि जो व्यक्ति अच्छा मित्र नहीं है उस पर तो विश्वास नहीं करना चाहिए, परंतु इसके साथ ही अच्छे मित्र के संबंद में भी पूरा विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि यदि वह नाराज हो गया तो आपके सारे भेद खोल सकता है। अत: सावधानी अत्यंत आवश्यक है।

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=> अपने शत्रु को हमेशा भर्म मे रखो! यदि हम कमजोर है तो अपने शत्रु को दिखाओ की हम ताकतवर है , अगर हम ताकतवर है तो अपने शत्रु को दिखाओ की हम कमजोर है।

=> अगर आप उस के पास ( नजदीक ) हँ तो उसे एहसास दिलाओ की आप उस से दूर है! यदि आप उससे दूर हँ तो उसे एहसास दिलाओ की आप उस से पास है हमेसा शत्रु क मन में भर्म की स्थिति पैदा कर के रखे!

=> अगर कोई सांप जहरीला नहीं है, तब भी उसे फुफकारना नहीं छोड़ना चाहिए। उसी तरह से कमजोर व्यक्ति को भी हर वक्त अपनी कमजोरी का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए।

=> सबसे बड़ा गुरुमंत्र : कभी भी अपने रहस्यों को किसी के साथ साझा मत करो, यह प्रवृत्ति तुम्हें बर्बाद कर देगी।

=> किसी भी व्यक्ति को जरूरत से ज्यादा ईमानदार नहीं होना चाहिए। सीधे तने वाले पेड़ ही सबसे काटे जाते हैं और बहुत ज्यादा ईमानदार लोगों को ही सबसे ज्यादा कष्ट उठाने पड़ते हैं।

=> अपने बच्चे को पहले पांच साल दुलार के साथ पालना चाहिए। अगले पांच साल उसे डांट-फटकार के साथ निगरानी में रखना चाहिए। लेकिन जब बच्चा सोलह साल का हो जाए, तो उसके साथ दोस्त की तरह व्यवहार करना चाहिए। बड़े बच्चे आपके सबसे अच्छे दोस्त होते हैं।

=> दिल में प्यार रखने वाले लोगों को दुख ही झेलने पड़ते हैं। दिल में प्यार पनपने पर बहुत सुख महसूस होता है, मगर इस सुख के साथ एक डर भी अंदर ही अंदर पनपने लगता है, खोने का डर, अधिकार कम होने का डर आदि-आदि। मगर दिल में प्यार पनपे नहीं, ऐसा तो हो नहीं सकता। तो प्यार पनपे मगर कुछ समझदारी के साथ। संक्षेप में कहें तो प्रीति में चालाकी रखने वाले ही अंतत: सुखी रहते हैं।

=> हर मित्रता के पीछे कुछ स्वार्थ जरूर छिपा होता है। दुनिया में ऐसी कोई दोस्ती नहीं जिसके पीछे लोगों के अपने हित न छिपे हों, यह कटु सत्य है, लेकिन यही सत्य है।

=> ऐसा पैसा जो बहुत तकलीफ के बाद मिले, अपना धर्म-ईमान छोड़ने पर मिले या दुश्मनों की चापलूसी से, उनकी सत्ता स्वीकारने से मिले, उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए।

=> नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुंचाने वाली, उनके विश्वासों को छलनी करने वाली बातें करते हैं, दूसरों की बुराई कर खुश हो जाते हैं। मगर ऐसे लोग अपनी बड़ी-बड़ी और झूठी बातों के बुने जाल में खुद भी फंस जाते हैं। जिस तरह से रेत के टीले को अपनी बांबी समझकर सांप घुस जाता है और दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है, उसी तरह से ऐसे लोग भी अपनी बुराइयों के बोझ तले मर जाते हैं।

=> जो बीत गया, सो बीत गया। अपने हाथ से कोई गलत काम हो गया हो तो उसकी फिक्र छोड़ते हुए वर्तमान को सलीके से जीकर भविष्य को संवारना चाहिए।

=> असंभव शब्द का इस्तेमाल बुजदिल करते हैं। बहादुर और बुद्धिमान व्यक्ति अपना रास्ता खुद बनाते हैं।

=> संकट काल के लिए धन बचाएं। परिवार पर संकट आए तो धन कुर्बान कर दें। लेकिन अपनी आत्मा की हिफाजत हमें अपने परिवार और धन को भी दांव पर लगाकर करनी चाहिए।

=> भाई-बंधुओं की परख संकट के समय और अपनी स्त्री की परख धन के नष्ट हो जाने पर ही होती है।

=> कष्टों से भी बड़ा कष्ट दूसरों के घर पर रहना है।

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=> चाणक्य कहते है कि जो व्यक्ति अच्छा मित्र नहीं है उस पर तो विश्वास नहीं करना चाहिए, परंतु इसके साथ ही अच्छे मित्र के संबंद में भी पूरा विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि यदि वह नाराज हो गया तो आपके सारे भेद खोल सकता है। अत: सावधानी अत्यंत आवश्यक है।

=> चाणक्य का मानना है कि व्यक्ति को कभी अपने मन का भेद नहीं खोलना चाहिए। उसे जो भी कार्य करना है, उसे अपने मन में रखे और पूरी तन्मयता के साथ समय आने पर उसे पूरा करना चाहिए।

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$$ Chanakya story in hindi $$


एक दिन चाणक्य का एक परिचित उनके पास आया और उत्साह से कहने लगा, ‘आप जानते हैं, अभी-अभी मैंने आपके मित्र के बारे में क्या सुना?’

चाणक्य अपनी तर्क-शक्ति, ज्ञान और व्यवहार-कुशलता के लिए विख्यात थे। उन्होंने अपने परिचित से कहा, ‘आपकी बात मैं सुनूं, इसके पहले मैं चाहूंगा कि आप त्रिगुण परीक्षण से गुजरें।’
उस परिचित ने पूछा, ‘ यह त्रिगुण परीक्षण क्या है?’

चाणक्य ने समझाया , ‘ आप मुझे मेरे मित्र के बारे में बताएं, इससे पहले अच्छा यह होगा कि जो कहें, उसे थोड़ा परख लें, थोड़ा छान लें। इसीलिए मैं इस प्रक्रिया को त्रिगुण परीक्षण कहता हूं। इसकी पहली कसौटी है सत्य। इस कसौटी के अनुसार जानना जरूरी है कि जो आप कहने वाले हैं, वह सत्य है। आप खुद उसके बारे में अच्छी तरह जानते हैं?’

‘नहीं,’ वह आदमी बोला, ‘वास्तव में मैंने इसे कहीं सुना था। खुद देखा या अनुभव नहीं किया था।’

‘ठीक है,’ – चाणक्य ने कहा, ‘आपको पता नहीं है कि यह बात सत्य है या असत्य। दूसरी कसौटी है -‘ अच्छाई। क्या आप मुझे मेरे मित्र की कोई अच्छाई बताने वाले हैं?’
‘नहीं,’ उस व्यक्ति ने कहा। इस पर चाणक्य बोले,’ जो आप कहने वाले हैं, वह न तो सत्य है, न ही अच्छा। चलिए, तीसरा परीक्षण कर ही डालते हैं ।’

‘तीसरी कसौटी है – उपयोगिता। जो आप कहने वाले हैं, वह क्या मेरे लिए उपयोगी है?’

‘नहीं, ऐसा तो नहीं है।’ सुनकर चाणक्य ने आखिरी बात कह दी।’ आप मुझे जो बताने वाले हैं, वह न सत्य है, न अच्छा और न ही उपयोगी, फिर आप मुझे बताना क्यों चाहते हैं?’

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अग्निहोत्र बिनु वेद नहिं, यज्ञ क्रिया बिनु दान ।
भाव बिना नहिं सिध्दि है, सबमें भाव प्रधान ॥

Hindi Meaning –>

बिना अग्निहोत्र के वेदपाठ व्यर्थ है और दान के बिना यज्ञादि कर्म व्यर्थ हैं ।
भाव के बिना सिध्दि नहीं प्राप्त होती इसलिए भाव ही प्रधान है ॥१॥

English Meaning –>
Chanting of the Vedas without making ritualistic sacrifices to the Supreme Lord through the medium of Agni, and sacrifices not followed by bountiful gifts are futile. Perfection can be achieved only through devotion (to the Supreme Lord) for devotion is the basis of all success.

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