जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51

Kmsraj51 की कलम से…..
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ϒ जीवन परिवर्तक 51 सकारात्मक Quotes of KMSRAJ51 ϒ

51 LCQof KMSRAJ51

Δ मानव मस्तिष्क असीमित शक्तियों से भरा हैं, लेकिन ये शक्तियां सुषुप्त अवस्था में है, बस ज़रूरत है इन सुषुप्त शक्तियों काे जगाने की। {1}

Δ आत्मा कि मुख्यतः तीन शक्तिया है, प्रथम – मन, द्वितीय – बुद्धि(विवेक) और तृतीय संस्कार। मन सोचने का कार्य करती है, बुद्धि(विवेक) निर्णय(Judgment) करने का कार्य करती है तथा बुद्धि के निर्णय अनुसार मानव शरीर की कर्मइंद्रियाे द्वारा जाे कर्म हाेता है वही  संस्कार के रूप में आत्मा के अंदर रिकॉर्ड हाेता रहता हैं, और संस्कार अनुसार ही काेई भी आत्मा नया शरीर(पुनर्जन्म) लेती हैं। {2}

Δ “सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।” {3}

Δ मनुष्य सदैव मनुष्य के ही रूप में जन्म लेता हैं, हा बस फ़र्क इतना ही पड़ता है कि हर तीन जन्म के बाद पुरुष शरीर – नारी शरीर के रूप में जन्म लेती है और नारी शरीर हर तीन जन्म के बाद पुरुष शरीर के रूप में जन्म लेती है। यह परिवर्तन चक्र हर तीन जन्म पर हाेता रहता हैं। {4}

Δ “अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की व्यर्थ के लीये समय ही ना बचे”। {5}

Δ “अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।” {6}

Δ जीवन मंदिर सा पावन हाे, बाताें में सुंदर सावन हाे।
स्वाथ॔ ना भटके पास ज़रा भी, हर दिन मानो वृंदावन हाे॥ {7}

Δ अगर कुछ बदलना है ताे सबसे पहले अपने सोच, कर्म व अपने आप काे बदलें। {8}

Δ काेई भी ज्ञान कभी बुरा नहीं हाेता – हा इंसान बुरे हाे सकते हैं। {9}

Δ सकारात्मक सोच + निरंतर कार्य = सफलता। {10}

Δ आत्मबल और मन को शक्तिशाली बनाने के लिए – आत्मा को ईश्वरीय स्मृति और सकारात्मक विचार रूपी शक्ति का भोजन दो। {11}

Δ स्वयं पर और स्व-कर्माे पर विश्वास माना सफलता का आधार(नींव) मज़बूत। {12}

Δ जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान रुपी भोजन जरूरी हैं। {13}

Δ हमेशा अच्छे कार्य के लिए समर्थन व सहयाेग करें। चाहे उस अच्छे कार्य की अगुआई आपके दुश्मन(Eनेम्य्) के द्वारा ही हाे रही हाे। {14}

Δ मूर्खाें कि एक खासियत हाेती हैं, ओ किसी एक बात काे लेकर लंबे समय तक बैठे रहते है, और मूर्खाें काे बात-बात पर बिना किसी मतलब के भी हंसी खुब आती हैं। {15}

Δ समय न गवाये वरना पछताने के अलावा कुछ न बचेगा जीवन में। {16}

Δ आप अपने अतीत काे नही बदल सकते, लेकिन अपने वर्तमान और भविष्य काे बदलना आपके अपने हाथ में हैं। इसलिए जाे बीत गया उसे याद कर, अपने वर्तमान और भविष्य काे समाप्त ना करें। {17}

Δ आज के समय में ९७% मनुष्य यही साेचते है, कि मेरे किस्मत में जाे हाेगा वही मिलेगा और ऐसा साेचकर वह बैठ जाते हैं। आचार्य चाणक्य जी ने कितनी अच्छी बात कही हैं। “क्या पता किस्मत में ही लिखा हाे की काेशिश करने से ही मिलेगा।” {18}

Δ हमेशा अपनी सोच काे अन्य लोगों(दुसराें) से अलग रखाें तभी आपकी अपनी कुछ अलग पहचान बन पायेगी। {19}

Δ आप रहाे या ना रहाे, लेकिन ऐसा कर्म कराें जीवनभर की आपके कर्म सदैव आपकाे जिवित रखें। {20}

Δ जीवन में एक बार की हुई गलती को बार-बार सोचना अर्थात दाग पर दाग लगाना इसलिए बीती को बिन्दी लगाओ(Full Stop), और आगे बढ़ाे। {21}

Δ किस्मत, नसीब़ और लक के भराेसे रहने पर किसी काे सफलता नहीं मिलती, सफलता ताे सच्चे मन से निरन्तर कार्य करने से ही मिलती हैं। इसलिए जीवन में निरन्तर कार्य करते हुए आगे बढ़ते चलाे। {22}

Δ केवल एक ही बुरा कर्म, किसी भी मनुष्य का शानाें, शाैंकत और इज़्ज़त यू मिनटाें में मिट्टी में मिला देता हैं। जैसे रेत से बना घर त्त्वरित गिर जाता हैं। {23}

Δ बुरी बातें ना खुद सुनो, ना ही किसी काे सुनाओं। {24}

Δ सच्चा ब्राह्मण वह है जो पूर्ण शुद्धि और विधि पूर्वक हर कार्य करे। {25}

Δ ज्ञान और ध्यान का हाेना जरूरी हैं जीवन में। बिना ज्ञान और ध्यान के दिमाग शांत नहीं हाे सकता, साे जीवन में, ज्ञान और ध्यान का हाेना बहुत जरूरी हैं। {26}

Δ “आत्मविश्वास किसी भी इंसान के लिए सर्वश्रेष्ठ आत्मिक शक्ति है। अगर वह स्वयं पर विश्वास रखकर कोई कर्म करता है तो कोई भी मुश्किल उसका रास्ता नहीं रोक सकती”। {27}

Δ चोट लगाने वाले का काम है चोट लगाना और आपका काम है अपने को सदैव बचा लेना। {28}

Δ ज्ञान कभी बुरा नहीं हाेता, इंसान(जीवआत्मा) आैर इंसान के कर्म बुरे हाे सकते हैं। {29}

Δ किसी भी मनुष्य का परम धर्म है, सात्त्विक आहार, सात्त्विक विचार और सात्त्विक जीवन। जिससे निराेगी काया(तन-Body), दिघा॔यु जीवन और स्वस्थ मन काे प्राप्त हाे। {30}

Δ “अगर अपनी अलग पहचान बनानी है तो कुछ अलग कीजिए। जब तक दूसरों से डिफरेंट और अच्छा नहीं करेंगे, तब तक आगे बढ़ना मुश्किल है। अलग करने से रिस्क तो होता है पर कंपीटिशन भी तो कम ही रहता है।” {31}

Δ मन को प्रभू की अमानत समझकर उसे सदा श्रेष्ठ कार्य में लगाओ। {32}

Δ सदैव याद रखें जीवन का सबसे बड़ा शान है सदा खुश रहना और खुशी बांटना-यही सबसे बड़ा शान है। {33}

Δ संकल्पों की शक्ति-संकल्पों को बचाओ तो समय, बोल सब स्वत: ही बच जायेंगे। {34}

Δ अगर जीवन में सफल हाेना चाहते हैं ताे अवसर का लाभ उठाओ, समय की कद्र करो, और शब्दों को सोच समझ कर खर्च करो। {35}

Δ आत्मा रूपी पुरूष को श्रेष्ठ बनाने वाले ही सच्चे पुरूषार्थी हैं। सबसे बड़े ज्ञानी वह हैं जो सदैव आत्म-अभिमानी रहते हैं। {36}

Δ जाे आपका आैर आपके समय के वैल्यू काे ना समझे।
उसके लिए कभी भी कार्य (Work) ना कराे॥ {37}

Δ सदैव याद रखें किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए हिम्मत और उमंग-उत्साह बहुत जरूरी है। जहाँ उमंग-उत्साह नहीं होता वहाँ थकावट होती है और थका हुआ कभी सफल नहीं होता। {38}

Δ अगर जीवन में सफल हाेना हैं, ताे कभी भी काेई भी कार्य करें ताे पुरें मन से करे। {39}

जीवन में सफलता आपकाे देर से ही सही लेकिन सफलता आपकाे जरुर मिलेगी॥

Δ जिनके संकल्प में दृढ़ता की शक्ति है, उनके लिए हर कार्य सम्भव है। {40}

Δ जीवन में सदैव शांत मन से साेंच समझ़ कर हीं काेई निर्णय लें, और जाे निर्णय एकबार लें उसका जीवन में दृढ़ता से पालन करें। {41}

Δ याद रखें प्रत्यक्ष प्रमाण वह है जिसका हर कर्म सर्व को प्रेरणा देने वाला हाे। {42}

Δ पवित्रता सच शांति और खुशी का आधार है।
यह आपके जीवन में सबसे मूल्यवान संपत्ति है।
यह किसी भी कलाकार की रक्षा करता है॥ {43}

Δ मास्टर(मालिक) का अर्थ है कि जिस शक्ति का जिस समय आह्वान करो वो शक्ति उसी समय प्रैक्टिकल स्वरूप में अनुभव हो। आर्डर किया और हाजिर। ऐसे नहीं कि आर्डर करो सहनशक्ति को और आये सामना करने की शक्ति, तो उसको मास्टर नहीं कहेंगे। तो ट्रायल करो कि जिस समय जो शक्ति आवश्यक है उस समय वही शक्ति कार्य में आती है? एक सेकण्ड का भी फर्क पड़ा तो जीत के बजाए हार हो जायेगी। {44}

Δ काेई भी इंसान जितना अध्ययन करता हैं, उतना ही उसे अपने अज्ञान का आभास होता जाता है। {45}

Δ सदैव याद रखें जीवन में सबसे बड़ी ख़ुशी तथा चुनाैती उस काम काे करने में है जिसे लाेग कहते हैं कि “तुम नहीं कर सकते” या “तुम्हारे बस की बात नहीं”। {46}

Δ मनुष्य के विचार बहते हुए पानी की तरह है, यदि हम उसमें गदंगी मिलाएँगे ताे वह नाला बन जाएगा आैर यदि ज्ञान व ध्यान रूपी सुगंध मिला देंगे ताे वही पवित्र बन जाएगा। {47}

Δ हम अपने असली स्वरूप काे भुल गये है, जिस कारण हमे अपने निजी गुण और संस्कार भी याद नही हैं। यह भुल ही सभी दुःखाे का कारण हैं।आत्मा की तीन मुख्य शक्तिया हाेती हैं। {48}

“प्रथम-मन, द्वितीय-बुद्धि और तृतीय-संस्कार।”

Δ अगर जीवन में सफल हाेना हैं, ताे जहाँ १० शब्दाें से काेई बात बन जाये वहा पर,
१०० शब्द बाेलकर अपनी मानसिक और वाणी की ऊर्जा को नष्ट नहीं करना चाहिए॥ {49}

Δ मन कि शक्ति काे सही समय पर उपयोग करें।

मन में वह असिमित शक्ति भरी हैं, जिसका सही उपयोग कर, हर असंभव कार्य काे सरलता पूर्वक संभव में बदला जा सकता हैं। मन कि शक्तियाे काे सही समय पर और सही दिशा में उपयोग करना सीखें। {50}

Δ आत्मा के सात माैलिक गुण हाेते हैं।

1. शांति (Shanti),

2. सुख (Sukh),

3. प्रेम (Prem),

4. शक्ति (Power),

5. ज्ञान (Gyan),

6. पवित्रता (शुद्धि-Purity),

7. आनंद (आत्मिक खुशी-Anand), {51}

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जैसे शरीर के लिए भोजन जरूरी है वैसे ही मस्तिष्क के लिए भी सकारात्मक ज्ञान रुपी भोजन जरूरी हैं। ~ कृष्ण मोहन सिंह(KMS)

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– कुछ उपयोगी पोस्ट सफल जीवन से संबंधित –

* विचारों की शक्ति-(The Power of Thoughts)

निश्चित सफलता के २१ सूत्र।

KMSRAJ51 के महान विचार हिंदी में।

* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

* चांदी की छड़ी।

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“सफलता का सबसे बड़ा सूत्र”(KMSRAJ51)

“स्वयं से वार्तालाप(बातचीत) करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा करके आप अपने भीतर छिपी बुराईयाें(Weakness) काे पहचानते है, और स्वयं काे अच्छा बनने के लिए प्रोत्सािहत करते हैं।”

In English

Amazing changes the conversation yourself can be brought tolife by. By doing this you Recognize hidden within the buraiyaensolar radiation, and encourage good solar radiation to becomethemselves.

 ~KMSRAJ51 (“तू ना हो निराश कभी मन से” किताब से)

“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

~KMSRAJ51

 

चलाे जीवन में चलना सीखें।

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ϒ चलाे जीवन में चलना सीखें। ϒ

चलाे जीवन में चलना सीखें।
जीवन में आगे बढ़ना सीखें॥

हर हाल में मुस्कुरायें हम।
दिल से खुश रहना सीखें॥

चट्टान के जैसे बनाये अपना हाैसला।
डर काे निकाले बाहर, ना डरे किसी से॥

चाहे आये आँधी और तेज तूफ़ान।
खुद की अंदर की शक्ति काे पहचाने॥

खुद पर यक़ीन करना सीखें।
पहचान लिया अगर शक्ति काे विश्वास किया खुद पर॥

आत्मविश्वास बढ़ेगा, ना डर लगेगा किसी से।
ख़ुशहाल हाे जायेगी जिंदगी, सँवर जायेगी जिंदगी॥

©- विमल गांधी 
Vimal Gandhi-kmsraj51

विमल गांधी जी।

हम दिल से आभारी हैं विमल गांधी जी के प्रेरणादायक हिन्दी कविता साझा करने के लिए।

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सकारात्मक सोच + निरंतर कार्य = सफलता।

स्वयं पर और स्व-कर्माे पर विश्वास माना सफलता का आधार(नींव) मज़बूत।

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“अगर अपने कार्य से आप स्वयं संतुष्ट हैं, ताे फिर अन्य लोग क्या कहते हैं उसकी परवाह ना करें।”

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“अपने लक्ष्य को इतना महान बना दो, की व्यर्थ के लीये समय ही ना बचे” -Kmsraj51

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इंसानियत।

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ϒ इंसानियत। ϒ

हमारे देश में बहुत से धर्म और जातियाें के लाेग रहते है। हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई, सब की अलग-अलग भाषा औरअलग-अलग लिबास है। सब के भगवान अलग-अलग है। सब अपने-अपने भगवान की पूजा करते है। कुछ लाेग इस बात काे नज़र मे रखते हुये देश मे दंगा फ़साद करवाने की काेशिश करते है। यह बात बिलकुल गलत है। वाे यह बात भूल जाते है कि सबसे बड़ा धर्म इंसानियत का है। वाे यह बात भी भूल जाते है कि सब धर्माे के ग्रन्थाें में कितनी अच्छी-अच्छी बातें लिखी हुयी है। जैसे गीता, क़ुरान, बाइबल और गुरु ग्रंथ साहिब। किसी में भी लड़ाई-झगड़े के बारे में नही लिखा हुया है। सब ग्रंथाें में आपस में मिल जुल कर रहने की ही बातें लिखी हुयी है, और सब में एक-दूसरे के साथ इंसानियत निभाने के बारे मे ही लिखा है। सब से प्यार कराे एक-दूसरे का दुँख:-सुख: बाँटाे, किसी काे अगर मदद की ज़रूरत है ताे उसकी मदद कराे। मददगार बनाे दुश्मनी मत निभायाे। काेई भी मामला हाे उसे शान्ति से मिल-जुल कर बैठकर हल कराे। हर समस्या का हल झगड़ा ही नही है। लेकिन जाे लाेग आपस में झगड़ा करवाने की काेशिश करते है, उन्हे इस बात से कुछ लेना-देना नही है,उन्हे ताे बस आपस में झगड़ा करवा कर और उसे बढ़ावा देने में ही आनन्द आता है। ऐसे लाेगाे काे भी इस बात काे समझना चाहिये, कि जिंदगी कितनी छाेटी सी है, एक दिन सबकाे रब काे अपना मुँह दिखाना है। इसलिये इस दंगा फ़साद की जगह समाज में मेल-मिलाप प्यार-शान्ति काे बढ़ावा दे। आख़िर यहाँ बेशक बहुत से धर्म और जातियाँ है। लेकिन ऊपर बैठा भगवान ताे एक ही है। आप काेई भी रास्ते से जायाे लेकिन, मंज़िल ताे एक ही है। ऊपर जाने के रास्ते बेशक अलग-अलग है, सबका मालिक एक है। सबसे बड़ा धर्म इंसानियत का है। जाे सब धर्माे से ऊपर है। जिसने इंसानियत का धर्म अपना लिया समझाे उसने भगवान काे पा लिया। हमारे समाज मे बहुत से ऐसे लाेग भी है जिन्हें, एक समय का खाना भी नसीब नही हाेता जिनके पास रहने के लिये घर भी नही है। बेचारे भीख, मांग कर अपना गुज़ारा करते है। “इसलिये जिन लाेगाे काे भगवान ने सब कुछ दिया है उन्हे, इन सबकी मदद करनी चाहिये। सबसे प्यार करना चाहिये,चाहे काेई अमीर हाे या ग़रीब, सबसे इंसानियत निभानी चाहिये। लड़ाई-झगड़े से दूर रहना चाहिये, इंसानियत से बड़ा कुछ नही, इंसानियत ही सब से बड़ा धर्म है।”

∅- विमल गांधी ∇
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दूसरों के साथ अपनी तुलना करके खुद को कमतर न आंकें।

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 दूसरों के साथ अपनी तुलना करके खुद को कमतर न आंकें।

एक कुम्हार घड़ा बना रहा था। पास ही कुछ सुराहियां, दीपक, मूर्तियां और गुल्लकें बनी रखीं थीं। ये सभी आपस में बातें कर रहे थे। घड़े ने दीपकों से कहा- ‘तुम सभी कितने सुंदर हो अलग अलग आकृतियों में। एक हम हैं… सब के सब मोटे-मोटे। जरा-सा ढलक जाएं तो टूट ही जाएं।’ एक दीपक बोला-‘अरे कहां, घड़े काका। हमारा आकार तो देखो आपके आगे कितना छोटा है। किसी सामान के पीछे कब दब कर टूट जाएं, पता भी न चले। ये मूर्तियां हमसे कहीं ज्यादा सुंदर हैं। काश, हम भी मूर्ति होते।’ दीपक और घड़े की बातें सुनकर मूर्तियां भी उदास हो गईं। एक मूर्ति बोली- ‘भैया, ये आप क्या कह रहे हैं! आपको नहीं पता कि हमें इस आकार को पाने के लिए कितनी तकलीफ सहनी पड़ती है। अपने अंगों को जगह-जगह से सुडौल आकार देने की खातिर कितने कष्ट उठाने पड़ते हैं। हमें तो गुल्लक बनना पसंद था। काश, हम गुल्लक होतीं तो सब हमारे भीतर खूब सारे पैसे रखते।’ गुल्लकें काफी देर से सब की बातें सुन रहीं थीं, वे भी विचलित हो उठीं। एक गुल्लक तो बिफर ही पड़ी- ‘आप सब हमारा दर्द नहीं समझ पाएंगे। लोग हमारे भीतर अपनी सबसे प्रिय वस्तु ‘अपना पैसा’ संचित करते हैं ताकि वह इधर-उधर न पड़ा रहे और सुरक्षित रहे, लेकिन इसी पैसे की खातिर वे लोग एक दिन हमें बड़ी निर्ममता से पटक कर फोड़ देते हैं। अब आप ही बताइए, क्या आपको कोई ऐसे तोड़ता है?’

कुम्हार का चाक अपना काम करते हुए इन सभी की तकलीफें सुन रहा था। जब उसका काम पूरा हो गया तो उसने भी बातचीत शुरू कर दी। उसने घड़े को समझाया- ‘तुम बहुत ही उपयोगी हो। अपने शीतल जल से तमाम लोगों की प्यास बुझाते हो और कुछ लोग तो तुम्हारे भीतर अपना अनाज तक रख लेते हैं।’ फिर वह दीपक से बोला- ‘तुम आकार में बेशक छोटे हो, लेकिन तुमसे प्रकाश फूटता है। तुम मंदिरों में जगह पाते हो। घरों और देहरियों को जगमगाते हो।’ इसके बाद चाक ने मूर्तियों की तरफ देखा और कहा- ‘तुम्हारी शोभा इसीलिए है कि तुम इतनी तकलीफ सहती हो। इसीलिए तुम घरों, मंदिरों, ऑफिसों की शोभा बढ़ाती हो।’ आखिर में उसने गुल्लकों की और बड़े प्यार से देखते हुए कहा- ‘तुम सभी बहुत कीमती हो| तुम बच्चों की खुशी हो। तुम लोगों के बुरे वक्त में उनके काम आकर अपना जीवन सार्थक कर देती हो।’

इस तरह वह चाक उन चीजों के साथ-साथ हम इंसानों को भी ये सीख दे गया कि अपने गुणों को पहचानते हुए खुद का भी सम्मान करना चाहिए। दूसरे लोगों के साथ अपनी तुलना करके बेवजह खुद को कमतर नहीं आंकना चाहिए। अपनी-अपनी जगह पर हम सभी उपयोगी हैं। हमें अपना मोल खुद पहचानना चाहिए।

Source(स्रोत): http://navbharattimes.indiatimes.com/

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* खुश रहने के तरीके हिन्दी में।

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* अपनी खुद की किस्मत बनाओ।

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* सकारात्‍मक सोच है जीवन का सक्‍सेस मंत्र 

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* चांदी की छड़ी।

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समाज के सहयोग के बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते।

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Kmsraj51-CYMT-Oct-14-5

समाज के सहयोग के बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते।

अक्सर कुछ लोग शिकायत करते हैं कि हमें अपने मां-बाप से विरासत में कुछ नहीं मिला। वे खुद को सेल्फ मेड कहते और मानते हैं। यह भ्रम ही नहीं, अहंकार भी है। प्रश्न उठता है कि क्या मात्र धन-दौलत या पैसा ही वास्तविक विरासत है? कुछ लोगों को तो मां-बाप से ही नहीं, पूरे समाज से शिकायत होती है। उनका कहना है कि दुनिया ने उनके लिए कुछ नहीं किया। उनके लिए सबकी जिम्मेदारी होती है लेकिन वे खुद किसी के लिए जिम्मेदार नहीं होते। वे कभी ये सोचने की जहमत नहीं उठाते कि उन्होंने समाज के लिए क्या किया है।

यह सही है कि आपने खुद अपना विकास किया। आपने अपने समय का सदुपयोग किया, खूब मेहनत करके पढ़ाई की, लेकिन एक विद्यार्थी को भी पढ़ने-लिखने और आगे बढ़ने के लिए कापी-किताब और कलम-दवात आदि न जाने कितनी चीजों की जरूरत पड़ती है। उनके लिए वह दूसरों पर निर्भर होता है। यह ठीक है कि आपने पुरुषार्थ किया और एक अच्छी सी नौकरी पा गए या अपना एक अच्छा-सा व्यवसाय स्थापित कर लिया। यदि पुरुषार्थ नहीं करते तो आपका ही अहित होता। पुरुषार्थ करके आपने अपने लिए अच्छा किया, लेकिन क्या प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से अनेक व्यक्तियों और समाज ने आपको आगे बढ़ने के अवसर उपलब्ध नहीं कराए?

बड़ी-बड़ी चीजों की बात छोड़िए, छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी हम दूसरों पर निर्भर होते हैं। एक मामूली सी लगने वाली कमीज जो हमने पहन रखी है, उसे हमारे तन पर सुशोभित करने में सैकड़ों लोगों का योगदान है। खेत में बीज बोने से लेकर पौधे उगने और उनसे कपास मिलने फिर कपास से कपड़ा और कमीज बनने के बीच असंख्य हाथों का परिश्रम है। कपड़े से कमीज बनाने के लिए एक सिलाई मशीन की जरूरत पड़ती है। वह लोहे और कई दूसरे पदार्थों से बनती है। खनिकों द्वारा लोहा और अन्य खनिज पदार्थ खानों से निकाले जाते हैं। बड़े-बड़े करखानों में मजदूरों द्वारा लोहा साफ किया जाता है। फिर दूसरे बड़े-बड़े करखानों में लोहे से बड़ी-बड़ी मशीनों द्वारा छोटी मशीनें बनती हैं। उन्हीं में से एक मशीन पर कारीगर कपड़े से एक कमीज सिलकर आपको पहनाता है।

यदि कमीज में बटन न लगे हों तो कैसा लगे। एक बटन जैसी अल्प मूल्य की वस्तु भी ऐसे ही नहीं बन जाती। उसके लिए भी न जाने कितने हाथों के सहारे की जरूरत पड़ती है। एक बटन टांकने के लिए सबसे जरूरी यंत्र सुई है। इस छोटी सी चीज को भी हम स्वयं नहीं बना सकते। सच तो ये है कि हम सब एक दूसरे के सहयोग के बिना अधूरे हैं। हमारे विकास में हमारा पुरुषार्थ ही नहीं, अन्य सभी का सहयोग भी अपेक्षित है। माता-पिता, भाई-बंधु, समाज, विरोधी-प्रतिद्वंद्वी और प्रकृति के मिले जुले प्रयासों से हमारा जीवन गति पाता है।

Source: http://navbharattimes.indiatimes.com/

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प्रभु हममें अपनी मौजूदगी का अहसास हरदम कराते रहते।

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प्रभु हममें अपनी मौजूदगी का अहसास हरदम कराते रहते।

एक संत के आश्रम में दीक्षा ग्रहण समारोह चल रहा था। आश्रम में पधारे महा गुरु ने दीक्षा देने से पहले शिष्यों से प्रश्न किया, ‘ईश्वर कहां बसते हैं?’ किसी ने कहा संसार में तो किसी ने जीव-जंतुओं में। किसी ने पेड़-पौधों में बताया तो किसी ने ब्रहमांड में। शिष्यों के उत्तरों से नाखुश गुरुजी बोले- ‘परमात्मा प्रकृति के रोम-रोम में तो बसते ही हैं, लेकिन वे मनुष्य की अंतरात्मा में सर्वाधिक वास करते हैं। इसीलिए कहा गया है कि आत्मा परमात्मा का एक अंश है।’

हम सभी जानते हैं कि हमारे शरीर में परमात्मा की आत्मा का वास है। हमारा नश्वर शरीर एक दिन पृथ्वी में मिल जाएगा और आत्मा परमात्मा में एक हो जाएगी। अंत में रह जाएंगे तो सिर्फ हमारे द्वारा किए गए सत्कर्म। इसलिए जीवन रहते कुछ न कुछ अच्छा कर जाना जरूरी है। कम से कम जरूरतमंदों की मदद कर कुछ पुण्य ही कमाने का प्रयास करें, ताकि नेक कर्मों द्वारा हम खुद को हासिल कर सकें।

हमारे मन, दिल, और शरीर पर रजस, तमस और सात्विक गुणों का प्रभाव शुरू से ही पड़ने लगता है। जो इंसान अपनी जीवन यात्रा के दौरान इन सभी पर संतुलन रख पाता है वही आगे चलकर अपने इष्ट देवता को खोज पाता है। जिसने सत्कर्मों से खुद को खोज लिया है, उसने दूसरों को भी पा लिया है। ऐसे व्यक्ति शाश्वत परमेश्वर का स्वरूप होते हैं। उनका अपने अहम पर काबू होता है। वे स्वभाव से निर्मल, मन से कोमल, दिल के प्रेमी और आत्मा के मधुर होते हैं। वे हमेशा दूसरों का भला पहले चाहते हैं।

ऐसे लोगों ने स्वयं को खुद से जीत लिया है। वे अपनी आत्मा की आवाज जानते और सुनते हैं। उसमें समाये ईश्वर के स्वरूप को भी पहचानते हैं। वे खुद ईश्वर का प्रतीक हैं। ईश्वर से संवाद करना ऐसे इंसानों के लिए बहुत आसान होता है। यह संभव है तो फिर ईश्वर को कहीं ओर क्यों खोजें? जो लोग ईश्वर को नहीं पहचान पाते, उसे आत्मसात नहीं कर पाते, उन पर दुखों का पहाड़ यहीं गिरता है। वे अंधकार में जीते हैं। अधूरी लालसा पूरा करने के लिए उनकी आत्मा अपने परमात्मा को खोजने में लगी रहती है।

बाइबल में लिखा है- ‘क्या आप यह नहीं जानते कि आपका शरीर पवित्र आत्मा का मंदिर है? वह आप में निवास करता है और आपको ईश्वर से मिला है।’ अगर हम अपने भीतर बसने वाले ईश्वर को पहचान लें तो हमारी आत्मा का मिलन परमात्मा से हो जाएगा। जरूरत है बस अपने अंदर झांकने की। क्योंकि प्रभु हममें अपनी मौजूदगी का अहसास बराबर कराते रहते हैं। बस जरा ध्यान देने की जरूरत है? आप ही परमात्मा हैं, आपके द्वारा किए गए सभी कार्य परम हैं। आइये, संसार में परमत्व लाएं और क्यों न कुछ अच्छा कर जाएं।

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परोपकारी बनें, स्वार्थी नहीं।

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परोपकारी बनें, स्वार्थी नहीं।

परोपकारी बनें, स्वार्थी नहीं।

एक दिन मैं किसी काम से कहीं जा रहा था। रास्ते में बहुत से लोग आते-जाते दिखे, लेकिन तभी एक बुजुर्ग महिला मुझे मिलीं। उन्होंने मुझसे कहा, ‘बेटा, मुझे मेट्रो स्टेशन के गेट तक छोड़ दो।’ मैंने उनका हाथ पकड़ा और उन्हें मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियों के पास तक छोड़ दिया। वह प्रेम से सौ रुपये देने लगीं तो मैंने लेने से इनकार कर दिया और कहा, ‘ये रुपये आप उस जरूरतमंद इंसान को दे दीजिए, जिसे इसकी जरूरत हो।’ इस पर वह मुझे बहुत गौर से देखने लगीं और कहने लगीं- ‘बेटा, तुम हमेशा यही कोशिश करना और जरूरतमंदों की मदद करते रहना।’

वह दिन आज तक मुझे याद है। स्वार्थ भावना से रहित दूसरों के कल्याण के लिए मन, वचन और कर्म से किया गया कार्य परोपकार कहलाता है। पारस्परिक विरोध की भावना का नाश करना और प्रेम-भाव को बढ़ाना परोपकार कहलाता है। प्रकृति हमें निरंतर यह संदेश देती रहती है। पवन, प्राण वायु देकर हमारी गति को संचालित करता है। नदियां अपना अनंत जल जगत के लिए अर्पित कर देती हैं। वृक्ष अपनी छाया और फल दूसरों के लिए प्रस्तुत करते हैं।

यदि हम महान लोगों के इतिहास को देखें तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और मदर टेरेसा की याद आना स्वाभाविक है। गांधी जी ने देश के हित के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर दिया और मदर ने अनगिनत अनाथों, विकलागों और रोगियों को अपने सीने से लगाया। लेकिन आज का मनुष्य इंसानियत को भूलता जा रहा है। वह परोपकारी लोगों को मूर्ख समझने लगा है। ऐसे लोग उसके लिए हंसी का पात्र बन जाते हैं।

आमतौर पर लोगों के हृदय से दया, करुणा और सहानुभूति जैसी मानवीय प्रवृत्तियां निकल भागी हैं। आज का मनुष्य स्वार्थ की जीती जागती परिभाषा बनकर रह गया है। राह चलते सड़क पर अगर कोई असहाय मिल जाए तो उसे देखते ही लोग अपना मुंह मोड़ लेते हैं। सड़क पर पड़ा कराहता घायल और दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति जैसे उसके लिए ध्यान देने का विषय ही नहीं रह गया है। जबकि सच यह है कि इंसान इस संसार में परोपकार के लिए ही जन्म लेता है।

मानव जीवन की सार्थकता इसी में है कि अपने बारे में सोचने के साथ-साथ हम दूसरों के बारे में भी सोचें। परोपकार करने से खुद को भी खुशी मिलती है। कभी किसी जरूरतमंद की मदद करके देखिए, आप पाएंगे कि अपने जीने की सार्थकता का अहसास होने लगा है। परोपकारी व्यक्ति दुखियों के प्रति उदार, निर्बलों के रक्षक और जन-कल्याण की भावना से ओत-प्रोत होते हैं। परोपकार से जो आनंद हमें मिलता है, वह एकदम अलौकिक होता है। इसीलिए परोपकारी व्यक्ति खुद भी सुखी रहता है और दूसरों में भी सुख बांटता चलता है। वह खुद तो ऐसा करता ही है, दूसरों को भी प्रेरित करता है।

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